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Tuesday, November 24, 2020

भारतीय रसोईघर व स्वास्थ्य, रसोईघर की साफ-सफाई,खाद्य सामग्री का रखरखाव, किस प्रहर में कैसा आहार करें, मन के भावों का भोजन पर प्रभाव ।

            ●●● भारतीय रसोईघर व स्वास्थ्य ●●●
भारतीय घरों में रसोई का अति महत्वपूर्ण स्थान है ; क्योंकि यह वह स्थान है , जहाँ से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता है और परिवार के सभी सदस्यों के  स्वास्थ्य का निर्धारण भी होता है ।इसीलिए रसोई एक ऐसा स्थान है, जहाँ सबसे अधिक साफ-सफाई की जरूरत होती है; क्योंकि यह स्थान सबसे अधिक प्रयोग में आता है और यदि यहाँ सफाई न हो तो स्वास्थ्य बढ़ाने के स्थान पर बीमारियाँ फैलाने का स्रोत बन जाता है ।
         
         ●●● रसोईघर की साफ-सफाई ●●●

सदियों से घर के बड़े बुजुर्गों ने रसोईघर की स्वच्छता व साफ-सफाई पर बहुत जोर दिया है ।स्नान करके ही इस स्थान पर प्रवेश करने व भोजन पकाने की अनुमति रही है ।बरतनों की साफ-सफाई, उनकी सुव्यवस्था, अन्न , सब्जियाँ, मसाले व अन्य आवश्यक सामग्रियों का भली प्रकार रखरखाव , समय-समय पर उनका निरीक्षण , आवश्यकतानुसार उनके संग्रह व क्रय आदि पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है ।

आधुनिक समय की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है तो रसोईघर में भी बदलाव स्वाभाविक है ।बदलते समय के साथ रसोईघर में कुकिंग गैस, प्रेशर कुकर  व अन्य  बिजली उपकरणों का समावेश हो गया है ।जिनका उपयोग करने में बहुत सावधानी व रखरखाव की जरूरत है ।

पहले बरतन मिट्टी से साफ किए जाते थे आजकल बरतन साफ करने के लिए तरह-तरह के डिटरजेंट बाजारों में मिलने लगे हैं ।बरतनों की सफाई में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि उनमें डिटर्जेंट का अंश न रहे ।
    
रसोईघर में मक्खियाँ, काॅकरोच व अन्य कीड़े आदि न पनपने
 पाएँ , इसका विशेष ध्यान रखा जाए ।रसोईघर में उपयोग आने वाले उपकरणों, जूठे बरतन , फ्रिज , डस्टबिन, रसोई में इस्तेमाल होने वाले कपड़े आदि भी नियमित साफ किए जाएँ जिससे उनमें बैक्टीरिया न पनपें।

वैसे तो रसोईघर में चप्पल का प्रवेश वर्जित होना चाहिए, लेकिन आज के समय में शायद बिजली उपकरणों के कारण या अन्य कारणों से चप्पल का इस्तेमाल जरूरी हो तो रसोईघर की अलग चप्पल रखनी चाहिए ।

 ●रसोईघर में प्रयुक्त होने वाली खाद्यसामग्री का रखरखाव●

अच्छे स्वास्थ्य के लिए रसोईघर की साफ-सफाई व सजावट के साथ-साथ रसोईघर में प्रयुक्त होने वाली खाद्यसामग्री का उचित रखरखाव  व समयानुसार उनका प्रयोग आवश्यक है अन्यथा वे उपयोग के लायक नहीं रह जातीं ।रसोईघर में जो सूखी खाद्य सामग्रियाँ होती हैं उन्हें सदा सूखे डिब्बों में ही रखनी चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनमें किसी भी तरह की नमी न होने पाए इसलिए गीले हाथों से सामग्री न निकालें और न ही उन्हें निकालने के लिए गीली चम्मच आदि का इस्तेमाल करें ; क्योंकि जरा सी भी नमी खाद्य सामग्री को खराब कर सकती है ।

भोजन बनाने में प्रयुक्त सब्जियों को अच्छी तरह धोना अति आवश्यक है , लेकिन कुछ सामग्रियाँ जो सूखी होती हैं उन्हें छान-बीन कर ही डिब्बों में रखना चाहिए व भोजन बनाते समय भी एक बार पुनः ध्यान कर लेना चाहिए क्योंकि कभी-कभी सामग्रियों में कीड़े भी लग जाते हैं।

भोजन में पोषक तत्व बने रहें इसलिए जहाँ तक हो सके , ताजी सब्जियों का ही भोजन बनाने में उपयोग किया जाए।कई दिनों तक रखी हुई सब्जियों में स्वाद व पोषक तत्व , दोनों की ही कमी हो जाती है । भोजन बनाने में चोकर वाला आटा व हरी पत्तेदार सब्जियों आदि का यदि भोजन बनाने में प्रयोग हो व भरपूर मात्रा में इनका सेवन हो तो अलग से फाइबर की जरूरत नहीं पड़ती ।ठंडी-गरम आदि विपरीत प्रकृति वाली चीजों को एक साथ न खाया जाए ।साथ ही मौसमी ताजे फलों व सब्जियों को अपने भोजन में अवश्य शामिल करें ।

    ●●●किस प्रहर में कैसा आहार ग्रहण करें ●●●

भारतीय संस्कृति में आहार ग्रहण करने में समय का भी अत्यन्त महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार दिन में जब वातावरण गरम होता है, तब शरीर की पाचनशक्ति भी तीव्र रहती है ।इस आधार पर हम अपने शरीर की  जरूरत व माँग के हिसाब से दिन में तीन या चार बार आहार ग्रहण कर सकते हैं ।

●सुबह--   स्वल्पाहार (सुबह का नाश्ता) का समय होता है ,इस प्रहर में हल्की धूप होती है, इस समय फल, दूध, अंकुरित अनाज, दलिया आदि लिया जा सकता है ।
●दोपहर-   इसके चार या पाँच घंटे बाद दोपहर के भोजन का समय होता है ।इस प्रहर में वातावरण गरम होता है और शरीर की पाचनशक्ति भी तीव्र होती है, इसलिए इस समय संपूर्ण आहार ले सकते हैं ।
●शाम  -- शाम के समय फलों का ज्यूस, सब्जियों का सूप, तुलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि से बनी हर्बल चाय या इनके विकल्प के रूप में  अपनी रुचिअनुसार अल्प आहार ग्रहण कर सकते हैं ।
●रात्रि  --- रात्रि का भोजन ऐसा होना चाहिए, जो गरिष्ठ न हो, आसानी से पचने योग्य हो ।जो लोग रात्रि के समय कार्यस्थल पर जाते हों उन्हें अपनी नींद का विशेष ध्यान रखना चाहिए उन्हें  रात्रि में अधिकतम 9 से 10 के बीच भोजन कर लेना या शाम को 5 से 6 के बीच भोजन करके ही अपने कार्यस्थल में जाना चाहिए ।

●भोजन पकाते समय मन के भावों का भोजन पर प्रभाव●

भोजन बनाते समय, बनाने वाले के मन के जो भाव होते हैं, उन भावों का भी भोजन पर असर पड़ता है अतः भोजन बनाते समय , परोसते समय मन को शांत व प्रसन्न रखना चाहिए ।जब भोजन पकाते समय हमारे मन के भाव अच्छे होंगे तो वह भोजन ग्रहण करने वाले को भी प्रसन्नता प्रदान करेगा ।

भोजन , बनाते व पकाते समय , परोसते समय व खाते समय हमारे मन में क्या भाव हैं--- इनका हमारे स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है ।ये भाव हमारे स्वास्थ्य को बहुत प्रभावित करते हैं ।कहा भी गया है-- जैसा खाएँ अन्न , वैसा बने मन ।अतः किसी कारणवश यदि व्यक्ति की मनोदशा कुप्रभावित है तो उसे सही व सामान्य करने के बाद ही भोजन करना चाहिए ।

       भोजन करते समय मन को प्रसन्न रखना चाहिए और इस वक्त अन्य काम नहीं करने चाहिए-- जैसे मोबाइल पर बात करना, टीवी देखना जैसे कार्य नहीं करने चाहिए । भोजन बहुत जल्दी-जल्दी भी नहीं करना चाहिए , भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए । जल्दी-जल्दी कम चबाया हुआ भोजन हमें अपनी पौष्टिकता नहीं दे पाता ।

भोजन की पौष्टिकता ग्रहण करने के लिए और उसे आसानी से पचाने के लिए भोजन को अच्छी तरह चबा कर खाना चाहिए ।आयुर्वेदाचार्य कहते हैं कि जल भी पिया जाए तो उसे भी धीरे-धीरे पीना चाहिए ; क्योंकि जब हमारे ग्रहण किए जाने वाले भोजन व पेय पदार्थों में लार का सम्मिश्रण होता है तो रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनमें आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है और वह पाचन में मदद करके हमें स्वास्थ्य लाभ पहुँचाता है ।

         हमारे पूर्वजों ने कहा है ---- लंबी उम्र जीने के दो ही रहस्य हैं--- कठोर परिश्रम करना और बिना कड़ी भूख लगे कुछ न खाना ।क्योंकि कड़ी भूख लगने पर खाना अधिक स्वादिष्ट लगने लगता है ।

अतः अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमारा रसोईघर अच्छी तरह साफ व व्यवस्थित होना आवश्यक है साथ ही खाद्य सामग्रियाँ भी साफ होनी जरूरी हैं एवं भोजन सही समय पर , सही मात्रा व कुछ आयुर्वेद के नियमों के अनुसार ग्रहण किया जाए ।इसलिए यह सत्य ही है कि हमारी रसोईघर का हमारे स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Monday, November 23, 2020

भक्ति योग,सकाम भक्ति,निष्काम भक्ति,श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार भक्ति,श्री कृष्ण के अनुसार भक्तों के प्रकार,

                       ●●●  भक्ति योग ●●●
● भक्ति का अर्थ--- परमात्मा की प्राप्ति के यूँ तो अनेक मार्ग हैं, पर उन सभी में भक्ति का मार्ग सबसे सरल व सुगम है ।सभी   छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबके लिए यह समान रूप से सहज, सरल है।
भक्ति  'भज्' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है - ईश्वर सेवा (ईश्वर स्मरण) ।इस तरह से भक्ति का अर्थ- स्वयं का ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ।जीवात्मा का परमात्मा में संपूर्ण समर्पण, विसर्जन व विलय ही भक्ति योग है ।प्रेम योग , समर्पण योग, उपासना योग आदि भक्तियोग के ही विविध नाम हैं ।भक्ति योग अथवा प्रेमयोग परमात्मा के साथ एकरूपता की जीवंत अनुभूति है ।

जगत में जो सबसे महान और सर्वोपरि तत्व है, उसके प्रति नैसर्गिक श्रद्धा-समर्पण का भाव होना ही भक्ति योग है ।नारद भक्ति सूत्र के अनुसार -- सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा ।अर्थात भगवान के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है ।शांडिल्य सूत्र के अनुसार-- सा परानुरक्तिरीश्वरे ! अर्थात ईश्वर के प्रति परम अनुराग ही भक्ति है ।स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि सच्चे व निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज करना ही भक्ति है ।

सच्चे साधक को सृष्टि के कण-कण में, चेतन-अचेतन , पेड़-पौधे , वनस्पतियों एवं समस्त प्राणियों में सिर्फ ईश्वर और ईश्वर का ही रूप व नूर दिखाई पड़ने लगता है ।तब उस साधक के लिए यह सारा विश्व, सारा ब्रह्माण्ड ही प्रभु का बनाया देवालय नजर आता है ।तह हर जीव में परमेश्वर की छवि दीखने लगती है और जीव सेवा ही प्रभु सेवा जान पड़ती है ।

सच्ची भक्ति वही है ; जिसमें याचना नहीं, कामना नहीं, जिसमें कुछ माँगना नहीं ।ईश चरणों में स्वयं को ही समर्पित कर देने का नाम भक्ति है । कुछ माँगना नहीं होता है बल्कि स्वयं समर्पित हो जाना है ।ऐसी परम भक्ति विरलों में ही पाई जाती है ।
संत कबीर ने कहा है -- 
        भक्ति भाव भादों नहीं, सबहि चली घहराय ।
        सरिता सोहि सराहिए, जेठ मास ठहराय ।।
अर्थात भादों में नदियाँ उमड़ चलती हैं, परन्तु प्रशंसा तो उसी नदी की  है , जो ज्येष्ठ महीने में अधिक जलयुक्त हो ।इसी प्रकार देखा-देखी थोड़े समय के लिए भक्ति भाव उमड़ आना अलग बात है , परंतु आपत्ति काल में भी भक्ति बनी रहे , तभी उस भक्ति की प्रशंसा है ।
      
     ●●● सकाम भक्ति, निष्काम भक्ति ●●●

भक्त की प्रकृति एवं भक्ति के उद्देश्य के आधार पर भक्ति दो प्रकार की कही गई है -- सकाम भक्ति व निष्काम भक्ति ।किसी कामनापूर्ति के उद्देश्य से की गई भक्ति सकाम भक्ति कहलाती है , पर बिना किसी कामना के निष्काम भाव से की गई भक्ति  'निष्काम' भक्ति कहलाती है ।निष्काम भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है ।

भौतिक  कामना से की गई भक्ति अर्थात सकाम भक्ति से इच्छाओं की प्राप्ति तो हो सकती है पर भगवान की नहीं ।सकाम भक्त भक्ति से प्राप्त पुण्य के कारण भोगों को प्राप्त कर लेते हैं, स्वर्ग भी प्राप्त कर लेते हैं पर पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः मृत्युलोक में अर्थात जन्म-मरण के बन्धन में पड़ जाते हैं ।परंतु निष्काम भक्ति द्वारा ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होती है।

 ●●● श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार भक्ति ●●●

श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार लोग लौकिक कामनाओं के लिए दुखी होते रहते हैं और आँसू बहाते हैं, पर भगवान के लिए भला कौन रोता है? भक्ति लौकिक कामनाओं के लिए नहीं, वरन भगवान के लिए रोने का नाम है ।भक्ति संसार को पाने का नहीं, ईश्वर को पाने का मार्ग है ।

सच्चे भक्त के हृदय में इसीलिए तो अनंत प्रेम की  की अजस्र धारा बहने लगती है ।फिर वही धारा प्रभु प्रेम में सावन-भादों बनकर साधक के नेत्रों से भी बहने लगती है ।साधक फिर उन्हीं आँसुओं से अपने इष्ट, अपने आराध्य, अपने प्रभु को प्रेम का अर्ध्य देता है, उनका हर पल अभिषेक करता रहता है ।

          जब भक्ति भाव मन में उमड़े
           दर्शन की आस नयन उमड़े
           नैनों के नीर से भरी गगरी 
           प्रभु चरणों में ढुलकाया करो 

उन्हीं आँसुओं से कई जन्मों से संचित चित्त के विकारों, संस्कारों का क्षय होने लगता है ।तभी साधक के शुद्ध चित्ताकाश में प्रभु का ज्योतिर्मय रूप में अवतरण होता है ।तब सचमुच उपास्य एवं उपासक , भक्त व भगवान एक हो जाते हैं ।

तब सारा ब्रह्माण्ड ही प्रभु का बनाया देवालय नजर आता है ।ऐसे में सूर्य-चंद्र के रूप में उन्हीं प्रभु का जीवंत दीदार होने लगता है ।धरती की सभी नदियाँ व समुद्र उन्हीं प्रभु के पाँव पखारते नजर आते हैं ।सभी सुगन्धित व खिले हुए पुष्प उन्हीं देव के चरणों में चढ़ते, खिलते व मुस्कराते दीखते हैं । शीतल, सुगन्धित पवन प्रभु के चरणों में बयार बनकर बहने लगती है ।तब साधक हर पल ही प्रभु का स्मरण करता हुआ , उन्हीं के बनाए देवालय में उनकी आराधना , अभ्यर्थना करने लगता है ।

साधक की ऐसी परम भक्ति को देखकर प्रभु भी अपने भक्त के लिए विह्वल व व्याकुल हो उठते हैं ।


 ●●●योगेश्वर श्री कृष्ण के अनुसार भक्तों के प्रकार●●●
श्री मद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण निष्काम भक्ति, निष्काम भक्त व ज्ञानी भक्त की भूरि-भूरि प्रशंसा इस प्रकार करते हुए  कहते हैं-- अर्जुन ! आर्त्त , जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी -- ये चार प्रकार के भक्त मेरा भजन किया करते हैं । उन भक्तों में से नित्य एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है और मुझे अत्यन्त प्रिय है ।
● अर्थार्थी भक्त--- अर्थार्थी भक्त वह है -- जो भोग , ऐश्वर्य और सुख प्राप्त करने के लिए भक्ति करता है ।
● आर्त्त भक्त--  आर्त्त भक्त वह है -- जो कोई कष्ट, संकट आने पर मुझे पुकारता है ।
● जिज्ञासु भक्त--- जिज्ञासु भक्त संसार को अनित्य जानकर मुझको तत्व से जानने की जिज्ञासा व पाने के लिए भजन करता
 है ।
● ज्ञानी भक्त--- ज्ञानी भक्त सदैव निष्काम होता है ।वह मुझे तत्व से जानता है ।

भगवान कहते हैं- अर्जुन ! ये सभी चारों प्रकार के भक्त उदार हैं, परन्तु ज्ञानी भक्त तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है ; क्योंकि वह मुझमें ही अच्छी प्रकार से स्थित है ।अनेक जन्मों के अंत में तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष यह भलीभाँति समझकर कि सब कुछ ईश्वर ही है -- इस प्रकार मुझे भजता है , ऐसा भक्त ( महात्मा) अत्यन्त दुर्लभ
 है ।

●●● श्री मद्भगवद्गीता में परम ज्ञानी भक्त के लक्षण ●●●

श्री मद्भगवद्गीता में भगवान परम ज्ञानी भक्त के लक्षण बताते हुए कहते हैं--  अर्जुन! जो पुरुष द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित और दयालु है तथा आसक्ति व अहंकार से रहित, सुख-दुख की प्राप्ति में सम और क्षमावान है , निरंतर संतुष्ट, मन इंद्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है-- वह भक्त मुझे प्रिय है ।जो शत्रु-मित्र में, मान-अपमान में सम है तथा सरदी-गरमी में और सुख-दुख में सम है , वह मुझे प्रिय है ।

निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है -- वह स्थिर बुद्धि, भक्तिमान मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

 सच्चे भक्त की यह पुकार होनी चाहिए---
       "दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना 
         दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना ।।"

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

वेजीटेबल कटलेट ( स्वादिष्ट व कुरकुरे ) सामग्री व बनाने की विधि

 ‌‌‌‌‌‌    ●●● कटलेट के  लिए सामग्री व बनाने की विधि ●●●


सभी कटी हुई सब्जियाँ, उबले आलू , धोकर भिगाए गए पोहे, तेल 

अदरक का पेस्ट, कटी हरी मिर्च,नीबू का रस ,काॅर्न फ्लोर व मसाले आदि ।
               ●●●कटलेट कैसे तैयार करें ●●●

बेजीटेबल कटलेट बनाने के लिए सबसे पहले कढाई में  दो छोटी चम्मच गर्म तेल में  दो मिनट तक प्याज भूनें, उसके बाद हरी मिर्च कटी हुई , अदरक का पेस्ट डाल दें ,फिर कटी हुई कैप्सिकम ( शिमला मिर्च ), कैरट ( गाजर ) बीन्स ( फली )  पीज ( मटर के दाने  ) डालकर थोड़ा नमक डालें  कुछ देर सभी सब्जियों को धीमी आग पर ढक कर  पकने दें ( जिससे सब्जियाँ कढ़ाई में चिपकें नहीं)।  जब सब सब्जियाँ पक जाएँ , तब उसमें मिर्च पावडर , गरम मसाला, धनिया पावडर , लेमन ज्यूस ( नीबू का रस) और काॅर्न फ्लोर डाल दें , 

ठन्डा होने पर अच्छी तरह सब सब्जियाँ मिला लें, और उबले आलू व भीगे पोहे ( धोकर छाने हुए )भी उसमें मिला दें, जरूरत के अनुसार थोड़ा नमक और मिला दें ।फिर हाथों से गोल टिक्की बना लें ।टिक्की बनाकर थोड़ी देर फ्रिज में रख दें।

            ●●● मैदा , पानी , नमक, काॅर्न फ्लोर ●●●

● मैदा का घोल कैसे बनाएँ-- मैदा में थोड़ा पानी , नमक, काॅर्न फ्लोर डालकर घोल बना लें ( बहुत पतला नहीं, बहुत गाढ़ा नहीं)

                 ●●●   ब्रेड का चूरा ●●●
● चार-पाँच ब्रेड के पीस लेकर पहले टोस्टर में रोस्ट कर लें 
( ब्राऊन )और फिर मिक्सर में चूरा बना लें ( सूखा चूरा )
                  
● क्रस्ड ब्रेड कैसे बनाएँ ---
चार -पाच  ब्रेड के पीस लेकर पहले टोस्टर में थोड़े रोस्ट कर लें, फिर मिक्सर में थोड़ा पिसा , सूखा चूरा बना लें 
               
●मैदा का घोल कैसे बनाएँ ---
अब मैदा में थोड़ा पानी , नमक और काॅर्न फ्लोर डालकर घोल बना लें (न बहुत पतला न बहुत गाढ़ा) 
                    
  ● तलने के लिए कढ़ाई व तेल   (कटलेट तलना )

उसके बाद फ्रिज में से कटलेट( टिक्की) निकालकर  टिक्की को पहले मैदा के घोल का कोड करें ( घोल में डुबा कर तुरंत निकालें)   फिर क्रश्ड ब्रेड ( ब्रेड का चूरा) का कोड करें, फिर से  मैदा का कोड करें, एक बार और ब्रेड के चूरा का कोड करके  कढ़ाई में तलें, मध्यम आग पर।

किसी भी तरह की चटनी या साॅस के साथ परोसे जा सकते हैं ।

तीन-चार मिनट तक तलने पर अच्छे कुरकुरे कटलेट बनते हैं ।


Sunday, November 22, 2020

धैर्य का महत्व , आध्यात्मिक जीवन में धैर्य का महत्व

                 ●●● धैर्य का महत्व ●●●
धैर्य जीवन का एक ऐसा गुण है , जिसको धारण कर हम बाहरी जीवन में परिपूर्ण सफलता को हासिल कर सकते हैं और साथ ही आंतरिक जीवन में भी शांति के अधिकारी बन सकते हैं ।वर्तमान में धैर्य का महत्व और बढ़ गया है ।जिसमें धैर्य है , समझो उसने सब कुछ अपने पक्ष में करने की कला जान ली ।धैर्य व्यक्ति को सहिष्णु बनाता है ।ऐसे व्यक्ति के जीवन में अभावों, कष्टों, विषमताओं के बीच उसके अंतस् में जल रहा धैर्य का दीपक उसे रोशनी देता है ।

             भगवान श्री राम ने बड़े धैर्य के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए ।रावण द्वारा हरण किए जाने पर माता सीता ने अशोक वाटिका में प्रभु श्री राम की प्रतीक्षा में समय बिताया।पांडवों ने अपना तेरह वर्ष के वनवास का समय धैर्य के  साथ  बिताया। इसी तरह हमारे इतिहास व शास्त्रों में अनेक धैर्यवान नायकों के उदाहरण मिलते हैं ।

परिस्थितियों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं, लेकिन मनःस्थिति तो बहुत कुछ उसके हाथ में ही है ,जिसको धैर्य के बल पर व्यक्ति सँभाले रहता है और अनुकूल दिशा देता है ।धैर्यवान व्यक्ति जानता है कि बोए बीज का फल समय पर मिलेगा , अतः वह हर पल का सदुपयोग करता है ।वह अपने छोटे-छोटे प्रयासों के साथ अभीष्ट लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहता है ।सच्चिंतन, सत्कर्म व सद्भाव की त्रिवेणी में निरंतर स्नान करता है, सत्कर्म की बोई फसल के पकने का इंतजार करता है।

धैर्य व्यक्ति का एक ऐसा गुण है, जिसके गर्भ से बाकी सब गुण प्रस्फुटित होते हैं ।यदि व्यक्ति में धैर्य नहीं है तो उसकी शक्ति-- दुर्बलता में बदल जाती है व मेहनत का वह फल नहीं मिल पाता, जिसका वह हकदार है ।

धैर्यवान व्यक्ति जीवन की विषमताओं एवं प्रतिकूलताओं में भी अपना विश्वास बनाए रखता है और नकारात्मक भावों से दूर रहता है।विपरीत परिस्थितियों में भी शान्त भाव से पार निकलने की राह निकालता है । कबीर दास ने कहा है ---
           धीरे-धीरे  रे  मना , धीरे सब कुछ होय ।
         माली सींचै सौ घड़ा , ऋतु आए फल होय ।।
इस तरह धैर्य जीवन में उसका अभिन्न सहचर बनता है ।धैर्यवान व्यक्ति एक किसान की मनोदशा में जीता है, जो बीज से फसल बनने तक की धीमी , किंतु क्रमिक प्रक्रिया को बखूबी जानता है ।

    ●●● आध्यात्मिक जीवन में धैर्य का महत्व ●●●

                लौकिक जीवन की तरह आध्यात्मिक जीवन में भी धैर्य एक विशिष्ट गुण है , बल्कि इसकी आवश्यकता एवं महत्व यहाँ और भी अधिक है ।लौकिक जीवन में पुरुषार्थ के फल की इच्छा इसी जन्म की रहती है, लेकिन एक आध्यात्मिक पथ का पथिक अपनी चेतना के रूपांतरण से लेकर आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर प्राप्ति आदि आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने हेतु जन्म-जन्मांतर की प्रतीक्षा के साथ साधनारत रहता है ।वह अपनी आत्मा के अजर,अमर,अविनाशी स्वरूप को मानते हुए उसी के अनुरूप अनंत धैर्य के साथ अभीष्ट लक्ष्य हेतु साधना पथ पर डटा रहता है।

धैर्य पूर्वक जीवनलक्ष्य की ओर निरंतर प्रगति करते रहना ही सफल जीवन का राज है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।




Saturday, November 21, 2020

दशहरा, विजयादशमी क्यों कहते हैं?, महाज्ञानी होने पर भी रावण अधर्मी, सीता की खोज, राम-रावण युद्ध

              ●●●दशहरा ( विजया दशमी )●●●
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक दुर्गा पूजा ( शक्ति पूजा) बाद दशमी के दिन पूरे भारत वर्ष में बड़ी धूमधाम के साथ  दशहरा मनाया जाता है ।इस दिन भगवान श्री राम ने दशानन रावण का वध करके दसों दिशाओं को उसके ( रावण ) के आतंक से मुक्त किया था । दशहरा यानी जिसने दसों दिशाओं पर विजय प्राप्त कर ली है ।ज

दशहरा पर्व मनाने के पीछे बड़े ही मार्मिक अर्थ छिपे हैं ।इस दिन मर्यादा के प्रतीक भगवान श्री राम ने अहंकार व अनैतिकता के मार्ग पर चलने वाले राक्षस राज रावण का अन्त किया था । यह इस बात का संकेत देता है कि समाज में जो भी अहंकारी है , अनैतिक मार्ग का अनुसरण करता है, अधर्म करता है, उसका पतन सुनिश्चित है , इसलिए नीति व धर्म को अपनाना चाहिए, अनैतिकता का परित्याग करना चाहिए ।

   ●●● दशहरे को विजयादशमी क्यों कहते हैं ?●●●

एक तो इस दिन भगवान श्री राम ने रावण के ऊपर विजय प्राप्त की, इसलिए इसको विजयादशमी कहा जाता है । विजयादशमी के संदर्भ में ज्योतिर्विज्ञान में लिखा है कि आश्विन शुक्ल दशमी के दिन तारे उदय होने के समय विजय नामक काल होता है, जो समस्त कार्यों में सफलता दिलाने वाला होता है , इसलिए इसे विजयादशमी कहते हैं ।यह पर्व एक तरह से न्याय और नैतिकता का पर्व है ।धर्भ की विजय का पर्व है ।

 ●● महाज्ञानी होने पर भी रावण अहंकार वश अधर्मी ●●

लंकापति रावण बड़ा ज्ञानी, वेद शास्त्रों का ज्ञाता, परम शक्तिशाली था, लेकिन अधर्म का आचरण करता था । कोई भी उसकी सोने की लंका में उसकी मर्जी के बिना न तो प्रवेश कर सकता था और न ही कोई कार्य कर सकता था ।

रावण मायापति था , आसुरी माया में निपुण था ।उसके संरक्षण में रहने वाले राक्षस व असुर बड़े ही मदांध होकर विचरण करते थे और मनुष्यों का संहार करते थे ।चारों दिशाओं में रावण ने आतंक फैलाया हुआ था ।

पराक्रमी व सामर्थ्यवान होने पर भी उसने माता सीता का छलपूर्वक हरण किया और सागर पार उन्हें अपने अभेद्य दुर्ग लंका में छिपाकर रखा, जहाँ किसी का पहुँचना तो दूर, किसी का प्रवेश भी वर्जित था ।जगह-जगह पर उसने मायावी राक्षसों को तैनात कर रखा था ।लंका के चारों ओर ऐसे यंत्र स्थापित किए थे, जिनके समीप व समक्ष जाने पर किसी का भी अंत हो जाए ।

    ●● हनुमान द्वारा सीता की खोज, राम-रावण युद्ध ●●

जब सीता का पता लगाने भगवान श्री राम ने हनुमान जी को भेजा तो हनुमान जी मार्ग की समस्त रुकावटों को दूर करते हुए, यंत्रों का शमन करते हुए, अभेद्य लंका में प्रविष्ट हुए तथा माता सीता तक पहुँचकर उन्हें आश्वासन दिया कि भगवान राम जल्द ही यहाँ आएँगे ।

तत्पश्चात उन्होंने लंकादहन करके , राजाओं व देवताओं को रावण के चंगुल से मुक्त किया ।वहाँ से वापस आकर, भगवान राम को सीता की कुशलता का समाचार दिया ।इसके बाद भगवान राम  ने  समस्त बानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान किया ।तत्पश्चात सागर पर सेतु बना और सागर पार करके श्री राम जी की सेना लंका क्षेत्र में आ गई ।

राम-रावण युद्ध हुआ और उस युद्ध में रावण के समस्त समर्थक व सहयोगी मारे गए ।श्री राम की रावण पर विजय हुई , उन्हें माता सीता मिल गईं ।लंका पर रावण के छोटे भाई विभीषण का राज्याभिषेक किया गया और लंका में भी धर्म की स्थापना हो गई।इस तरह राम जहाँ होते हैं, वहाँ अधर्म व आतंक का साम्राज्य समाप्त होता है औ, धर्म की स्थापना होती है ।

रावण क्रोधी, अहंकारी, मायावी था लेकिन राम उतने ही शांत, मर्यादित, वीर, पराक्रमी थे ।देखने में  तो रावण के वैभव साधनों, प्रशिक्षित सैनिकों व मायावी शक्तियों के समक्ष श्री राम के पास कुछ नहीं था ।भगवान के पास सिर्फ धनुष-वाण और वानर सेना थी पर गहराई से विचार किया जाए तो राम के साथ ऋषियों का सत्संग व ज्ञान था , जो उन्होंने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य व अन्य ऋषियों से प्राप्त किया था ।

                         भगवान राम का आत्मीय भाव था , जिसके कारण जंगलों में निवास करने वाले रीछ-वानर उनके अपने हो गए थे और बिना अपने प्राणों की परवाह किए उनकी सेना में शामिल हो गए ।भगवान श्री राम के व्यक्तित्व में वह अद्भुत शांति थी, सौम्यता थी , जिसके कारण कोई भी उनके व्यक्तित्व से सहज आकर्षित हो जाता था ।भगवान श्री राम ने केवल रावण पर ही विजय प्राप्त नहीं की , बल्कि लोगों के  हृदय को भी जीता, उस पर राज किया ।

वस्तुतः दशहरा पर्व प्रतीक है--- सामूहिकता का, सन्मार्ग का, नैतिकता का ।जिस तरह श्री राम ने वानरों की सेना के साथ रावण व उसके राक्षसों का सामना किया , उसी तरह व्यक्ति को भी बड़े कार्यों के लिए सामूहिकता की शक्ति का एकत्रीकरण करना चाहिए ।अन्याय का डटकर सामना करना चाहिए ।

जब तक समाज में भगवान श्री राम के समान उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का निर्माण नहीं होगा , तब तक आसुरी शक्तियों के प्रतीक रावण का आतंक समाप्त नहीं होगा ।ऐसा होने के लिए शुभ शक्तियों को पुनः सामूहिक ढंग से एकत्र होने व प्रयास करने की जरूरत है ।

Friday, November 20, 2020

प्रकृति शब्द का अर्थ, भगवान श्री कृष्ण के अनुसार प्रकृति

          ●●●●● प्रकृति शब्द का अर्थ ●●●●●
प्रकृति शब्द अद्भुत है ।भारत, भारतीय संस्कृति व भारतीय मनीषा ने इसे गढ़ा है ।'प्रकृति' यह अनूठा शब्द दुनिया की किसी दूसरी भाषा में नहीं है ।अंग्रेजी भाषा में प्रायः प्रकृति शब्द का अनुवाद नेचर (nature) या क्रिएशन (creation) के रूप में किया जाता है ।जब कि ये दोनों शब्द प्रकृति का ठीक-ठीक परिचय देने व इसे परिभाषित करने में असमर्थ हैं ।

       प्रकृति शब्द का अर्थ है--- कृति से पहले ।इस तरह प्रकृति का अनुवाद हुआ -- प्रि क्रिएशन ।प्रकृति शब्द बेजोड़ है ।प्रकृति का अर्थ है -- कृति से पहले यानी कि जब कुछ भी नहीं था , तब भी जो था ।जब कुछ भी विनिर्मित नहीं हुआ था, तब भी जो था -- प्रि -क्रिएशन ।सृजन होने से पहले किसी की शाशवत उपस्थिति रही, वही प्रकृति है ।इसलिए प्रकृति को क्रिएशन से परिभाषित करना संभव नहीं है ।इसी तरह नेचर (nature)भी नहीं कहा जा सकता  ; क्योंकि नेचर तो वह है, जो हमें दिखाई पड़ रहा है ।

प्रकृति शब्द, सांख्य दर्शन का विलक्षण शब्द है ।सांख्य दर्शन ने और विशेषज्ञ व्याख्यारों ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है -- जो कुछ दिखाई पड़ रहा है, वह जब नहीं था और जिसमें छिपा था, उसका नाम प्रकृति है ।जो कुछ दिखाई पड़ रहा है , जब सब मिट जाएगा और उसी में डूब जाएगा, जिससे निकला है, उसका नाम प्रकृति है ।तो इस तरह से प्रकृति वह है, जिसमें से सब निकलता है और जिसमें सब विलीन हो जाता है ।सभी रूप व आकारों के उद्गम व विसर्जन का स्थान है -- प्रकृति ।

●भगवान श्री कृष्ण के अनुसार प्रकृति--   श्री भगवान कहते हैं-- प्रकृति और पुरुष, ईश्वर और शक्ति, माया और ब्रह्म दोनों अनादि हैं ।इनका न तो आरंभ है और न अंत, न इनकी उत्पत्ति है और न विनाश ।भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं--- ये दोनों अनादि हैं ।प्रकृति भी अनादि है और पुरुष भी अनादि है ।यह जगत भी अनादि है और विधाता भी अनादि है ।इनमें से किसी ने किसी को नहीं बनाया ।हाँ, ये कभी दृश्य होते हैं तो कभी अदृश्य, कभी प्रकट होते हैं तो कभी अप्रकट ।लेकिन न तो कुछ मिटता है और न कुछ बनता है ।

सृष्टि में परिवर्तन होता है, रूपांतरण होता है, लेकिन मूलतत्व यथावत् रहता है ।दृश्य और अदृश्य दोनों की उपस्थिति बनी रहती है ।यह दृश्य और अदृश्य होना, प्रकट और अप्रकट होना एक विधि है , एक व्यवस्था है ।इसीलिए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं ।दृष्टा और दृश्य, दोनों का कोई भी आदि और अंत नहीं है ।


Wednesday, November 18, 2020

देश-विदेश में नववर्ष मनाने की अलग-अलग तिथियाँ व परंपराएँ

देश-विदेश में नववर्ष मनाने की अलग-अलग तिथियाँ व परम्पराएँ
  ●●●भारत में नववर्ष मनाने की तिथियाँ व परम्पराएँ●●●

 वैसे तो पूरी दुनिया एक जनवरी को नए साल का उत्सव मनाती है फिर भी अलग-अलग क्षेत्रों के लोग अपने नए वर्ष की शुरुआत अलग-अलग तिथियों व तारीखों से करते हैं । भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक सूर्य या चंद्र पर आधारित कलेंडर के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ विशेष तिथियों पर नववर्ष मनाया जाता है, जैसे -- 

● --हिन्दू नववर्ष की शुरुआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है ।
●-- तेलगु नववर्ष की शुरुआत भी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है ।इस नववर्ष को (उगादि = युग+आदि) कहा जाता है अर्थात नए युग की शुरुआत ।

●-- मराठी और कोंकणी संस्कृति में नववर्ष 'गुड़ी पड़वा' के रूप में नवरात्रि की प्रतिपदा को मनाया जाता है ।गुड़ी अर्थात पीला वस्त्र , जिसे घर के मुख्य द्वार पर दाईं ओर बाँस के ऊपरी हिस्से पर ताँबे का उलटा लोटा रखकर उस पर फूलों की माला पहनाकर लटकाया जाता है ।यह पर्व विजयोत्सव का भी प्रतीक है ।सिंधी भी नववर्ष  ' चेतीचाँद '  के रूप में इसी दिन मनाते हैं ।

●-- पंजाबियों में नववर्ष  ' बैशाखी ' के रूप में 13 अप्रैल को मनाया जाता है ।यह पंजाब और हरियाणा में फसल कटाई का सबसे बड़ा पर्व है ।यह दिन रबी की फसल कटने की खुशी का प्रतीक भी है ।इस दिन किसान सर्दियों की फसल काट लेने के बाद नए साल की खुशियाँ मनाते हैं ।

इसी दिन 13 अप्रैल, 1699 के दिन सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की शुरुआत की थी ।इसीलिए सिख इस त्यौहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में भी मनाते हैं ।

●-- तमिल नववर्ष  'पुथांडु' के नाम से अपना नववर्ष मनाते हैं ।तमिल कलेंडर का पहला महीना 13 या 14 अप्रैल को चिथिराई से शुरू होता है ।इस दिन तमिल लोग आपस में एकदूसरे को 'पुथांडु बजथुकाल '   कहते हैं जिसका अर्थ है-- नववर्ष मुबारक हो। तमिल परिवार के लोग इस दिन मीनाक्षी मन्दिर में पूजा कर मंगल पचाड़ी बनाते हैं, जो कच्चे आम, गुड़ और मीन के फूलों से बनाई जाती है ।

●--असम में नया साल  'बोहाग बीहू' के नाम से मनाया जाता है ।अप्रैल के मध्य में जब नई खेती के मौसम की शुरुआत होती है , तब बोहाग बीहू यानी नए साल की शुरुआत होती है ।असम में साल में तीन बार बोहाग बीहू मनाया जाता है ।

● -- बंगाल में नववर्ष  'पोहेला बोएशाख' के नाम से मनाया जाता है ।यह भी अप्रैल के बीच में यानी 14 या 15 अप्रैल को आता है ।बंगाल के अलावा अन्य पहाड़ी क्षेत्रों जैसे --- त्रिपुरा आदि में भी नववर्ष  पोहेला बोएशाख के रूप में मनाया जाता है ।

● -- गुजराती लोग दीपावली के दूसरे दिन नववर्ष मनाते हैं, इस दिन गुजराती लोग आपस में एक दूसरे को 'साल मुबारक'  कहकर नववर्ष की शुभकामनाएँ प्रदान करते हैं ।

● --  मलयालम में नववर्ष ग्रेगरी कलेंडर के अनुसार 14 अप्रैल को विशु पर्व के रूप में मनाया जाता है ।विशु पर्व पर विशुकन्नी यानी सुबह-सुबह किसी पहली चीज को देखने का विशेष महत्व है ।
● --  सिक्किम में नववर्ष दिसंबर से शुरू होता है ।दिसंबर में यहाँ फसलों की कटाई होती है ।इस पर्व पर सिक्किम लोग छम नृत्य करते हैं ।

● --- कश्मीर में नववर्ष, चंद्र आधारित कलेंडर के अनुसार-- नवरेह को नए साल के रूप में मनाते हैं ।यहाँ चैत्र नवरात्र के अवसर पर यह पर्व शुरु होता है ।

● --     इस्लाम में नववर्ष हिजरी कलैंडर के अनुसार--'मुहर्रम' के दिन मनाया जाता है।यह दिन नए वर्षगाँठ का पहला दिन होता है। हिजरी कलैंडर पूर्णतया चंद्रमा पर आधारित है, जो हर साल अलग-अलग तारीखों पर शुरु होता है ।

● -- हिन्दू शास्त्रों के अनुसार नया वर्ष शुरू करने का अधिकार उसी राजा का होता था, जिसके राज्य में किसी भी व्यक्ति का कोई ऋण बकाया न हो ।आज से 2066 साल पहले उज्जैन नरेश विक्रमादित्य ने अपने राजकोष से प्रत्येक व्यक्ति का ऋण मुक्त करके इस संवत् की शुरुआत की थी 

●●●विदेशों में नववर्ष मनाने की  तिथियाँ व परम्पराएँ●●●

विदेशों में भी नववर्ष मनाने की तिथियाँ व परम्पराएँ अलग-अलग हैं ।
● -- ईरान में नववर्ष को नौरोज का पर्व कहा जाता है ।वहाँ यह मार्च के महीने में मनाया जाता है ।इस अवसर पर परिवार के सभी लोग एक बड़ी मेज के पास एकत्रित होकर प्रार्थना करते हैं ।प्रार्थना के पश्चात एक प्रीतभोज आयोजित किया जाता है, इसके पश्चात लोग आपस में गले मिलते हैं और रात्रि में घर  को दीपों से सजाते हैं ।

● -- ईसाई धर्म में एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है, लेकिन इसके आगमन की तैयारी की शुरुआत दिसंबर के अंतिम सप्ताह से ही आरंभ हो जाती है ।

● -- पहले जापान में नववर्ष का त्यौहार एक फरवरी को मनाया जाता था, इस दिन लोग सूर्यदेव की पूजा-आराधना किया करते थे, लेकिन जब से जापान में नई क्रांति आई , तब से एक जनवरी को ही लोग नववर्ष मनाने लगे हैं ।

● -- वर्मा में नववर्ष को 'तिजान' कहा जाता है ।इस दिन यहाँ सभी लोग एक दूसरे पर होली के त्यौहार की तरह रंग डालते हैं ।रात्रि को पूजा करने के बाद एक दूसरे को उपहार दिए जाते हैं ।इस अवसर पर लोग अपने घरों को सजाते हैं ।आधी रात तक प्रीतिभोज करते हैं और रात्रि 12 बजे के बाद खूब आतिशबाजी करते हैं ।

● -- थाइलैंड में नववर्ष  'महासुंग कर्ण'  के नाम से मनाया जाता है ।यह पर्व अप्रैल में मनाया जाता है ।इस दिन थाई लोग पक्षियों को पिंजरे से मुक्त करना, मछलियों को पानी में छोड़ना , दाना देना और घरों की साफ-सफाई करना शुभ मानते हैं ।इस दिन थाई लोग बाजारों से नए वस्त्र खरीदते हैं ।

● -- फ्रांस में नववर्ष की शुरुआत से पहले 31 दिसम्बर की रात्रि को एक घंटा बजाया जाता है और फिर नववर्ष बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ।इस दिन सामूहिक विवाह का भी आयोजन किया जाता है ।स्पेन में 12 अंगूर रात्रि के 12 बजे खाना शुभ माना जाता है ।

● --  येरूशलम में नववर्ष का उत्सव शरद ऋतु के आरंभ का उत्सव है ।इस अवसर पर पूजा-अर्चना भी की जाती है ।लोगों का ऐसा मानना है कि नववर्ष के प्रथम दिवस पर ही मनुष्य पहली बार स्वर्ग से धरती पर आया था ।

● -- इंग्लैंड में नववर्ष के दिन लोग गुजरे वर्ष को भगाने के लिए झाड़ू लेकर घर में प्रवेश करते हैं और बड़े स्तर पर घरों की सफाई करते हैं ।इस दिन चर्च को बड़े स्तर पर सजाया जाता है ।लोग एक-दूसरे को उपहार देते हैं और बड़ी-बड़ी पार्टियों का आयोजन करते हैं ।

● -- दक्षिण अफ्रीका की जुलू जनजाति में नववर्ष के उपलक्ष में सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाता है ।

● -- कोरिया में नववर्ष का उत्सव फरवरी में मनाया जाता है ।इस अवसर पर बच्चों को चौगेरी पहनाई जाती है ।चौगेरी कई प्रकार के रंगीन कपडों को लेकर बनाई जाती है ।सभी लोग नए-नए कपड़े पहनते हैं और युवा लोग बड़े-बूढों के संग नाचते हैं ।

● -- इटली में नववर्ष के अवसर पर रंग-बिरंगे फूलों के पौधे लगाते हैं , ताकि पर्यावरण साफ-सुथरा रहे ।कई जगहों पर नववर्ष पर दरवाजे के ऊपर मोरपंखों की टहनी लटकाते हैं, जो शुभ और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है ।सभी युरोपीय देशों में, जैसे , इटली, पुर्तगाल, नीदरलैंड व अन्य देशों में परिवार के लोग इकट्ठे होकर चर्च जाकर वहाँ सेवा कार्य में भी सम्मिलित होते हैं ।

● -- लंदन में नववर्ष की पूर्वसंध्या पर रात्रि के ठीक बारह बजे एक तोप का गोला दागा जाता है ।तोप के गोले के साथ ही लोग रंगीन टोपियाँ पहनकर घरों के बाहर निकल आते हैं और अपने मित्रों को उपहार और बधाइयाँ देना शुरु करते हैं और यह सिलसिला सारी रात चलता हे ।

● -- नववर्ष में मध्य यूरोप के बाल्कन इलाके में लोग नए साल की पहली किरण आने से पहले अपने घर और आँगन को ताजे पानी से अच्छी तरह धोते हैं या पवित्र जल का छिड़काव करते हैं ।इस तरह आने वाले वर्ष का स्वागत करते हैं ।

● -- इस्लामिक देश मोरक्को में भी साल की शुरुआत में लोग घरों की सफाई करते हैं ।

● -- मैडागास्कर के लोग नए साल के पहले दिन अपने ऊपर पानी की धार उढ़ेलते हैं ।पवित्र नदियों व सरोवरों के जल को सिर पर धार बनाकर डालते हैं, जो इस बात का प्रतीक होता है कि पुराना सब कुछ धुल गया और अब नया शुरु होगा ।

● -- चीन में नए साल पर कई दिनों की छुट्टियाँ होती हैं ।इन छुट्टियों में महिलाएँ नए-नए पकवान बनातीं हैं ।बच्चे पटाखे छोड़ते हैं ।लोग एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं ।

● पूरब के देशों में भी नए साल को मनाने में आमतौर से साफ-सफाई के तौर-तरीकों को प्रमुखता दी जाती है ।पूर्वी गोलार्द्ध के देशों में नए साल के उत्सव में कई जगहों पर लोग नए साल से पहले अपना पूरा कर्ज उतारते हैं और नए साल की शुरुआत बिना कर्ज से करते हैं ।हमारे प्राचीन भारत विक्रम संवत शुरु होने की कहानी भी कुछ यही दर्शाती है ।

इस तरह नववर्ष दुनिया के कोने-कोने में अलग-अलग तरह से मनाया जाता है लेकिन उद्देश्य सभी का एक ही रहता है कि नववर्ष का अच्छे से स्वागत किया जाए ताके नववर्ष सबके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।