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Monday, November 30, 2020

भारतीय धर्म शास्त्रों में चंद्रमा,चंद्रमा की उत्पत्ति,ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा,वैदिक साहित्य में चंद्रमा, चंद्रमा की परिधि का मान ।

          ●●● भारतीय धर्म शास्त्रों में चन्द्रमा ●●●
भारतीय धर्म शास्त्रों में चन्द्रमा के विषय में  जितना अधिक वर्णन मिलता है , उतना अन्यत्र किसी भी ज्ञानकोष में नहीं मिलता ।प्राचीन वैदिक काल से ही प्रकृति एवं परमात्मा के प्रतीक रूप में जिन देवताओं की पूजा की जाती है उनमें सूर्य , वरुण, वायु, पृथ्वी, इंद्र एवं चन्द्रमा प्रमुख हैं ।हमारे शास्त्रों ने चंद्रमा को पितरों की भूमि माना है ।
         
सौम्य एवं शीतल किरणें होने के कारण चंद्रमा को सोम,शीतकर तथा रात्रि का स्वामी होने के कारण राकेश, निशाधिपति,निशाकर आदि भी कहा जाता है ।चंद्रमा हमारे सनातन धर्म में वर्णित प्रत्यक्ष देवताओं में प्रधान देवता है ।

महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय उज्जैन के ज्योतिर्विज्ञान के प्राध्यापक प्रोo उपेंद्र भार्गव के अनुसार-- ' चंद्रमा को ध्यान में रखकर हमारे धर्मशास्त्रीय विधान, जप, तप, व्रत, उपवास, दान,यात्रा, विवाह एवं उत्सव आदि का निर्णय किया जाता है ।

               ●●● चंद्रमा की उत्पत्ति ●●●

● वेदों में---- चंद्रमा की उत्पत्ति के विषय में वेद में कहा गया है कि ब्रह्मा अर्थात सृष्टिकर्त्ता ने सर्वप्रथम भूमितत्व को उत्पन्न किया तदनंतर मरुद्गण व 49 प्रकार की वायु को उत्पन्न किया, इसके उपरांत ब्रह्मा ने आदित्य-सूर्य को उत्पन्न किया तथा सूर्य से ही चंद्रमा की उत्पत्ति हुई । 
 
● माध्यंदिनी संहिता में----- माध्यंदिनी संहिता में कहा गया है ---- " ब्रह्मा ने कामना की , कि भूमि उत्पन्न हो गई ।उन्होंने सूर्य के उत्पन्न होने की कामना की और सूर्य सहित दिशाएँ उत्पन्न हो गईं।एक विशालकाय सोने का अंडा हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ, जिसमें विक्षोभ हुआ और वह दो भागों में विभक्त हुआ।उसके विभाजन से प्रवाहित हो रहे रेतस् से चंद्रमा तथा नक्षत्र आदि उत्पन्न हुए ।

● वायु पुराण में----- वायु पुराण में कहा गया है--- " नक्षत्र, चंद्रमा एवं ग्रह आदि सभी की उत्पत्ति सूर्य से हुई है ।"

● अग्नीषोमात्मकं जगत् --- अग्नीषोमात्मकं जगत् के अनुसार--- " संसार अग्नि और सोम रूप है ।"  अग्नि ही सूर्य रूप में व्याप्त होता है और सोम चंद्रमा के रूप में । सृष्टि में दोनों की आवश्यकता अनिवार्य है।

          ●●● ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा ●●●

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को जलीय ग्रह कहा गया है ।हमारा ज्योतिष विज्ञान कितना उन्नत है , इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आधुनिक विज्ञान आज भी चंद्रमा पर पानी और बरफ की खोज कर रहा है, लेकिन हमारे ज्योतिष विज्ञान में चंद्रमा को जलतत्व का कारक ग्रह कहा गया है ।

ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से चंद्रमा की गति पूर्वाभिमुख है ।वह कर्क राशि का स्वामी, गौर वर्ण का, वायव्य दिशा का अधिपति, शुभग्रह, सत्वगुणयुक्त, जलतत्व प्रधान जलीय ग्रह है तथा मणि उसकी धातु कही गई है ।

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को जलीय ग्रह कहा गया है कि।अतः उसके रात्रि में प्रकाशित होने के कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार दर्पण पर गिरी हुई सूर्य की किरणों के प्रतिबिम्ब से घर के अंदर का अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी जलमय पिंड की तरह दिखने वाले चंद्रमा के ऊपर गिरने वाली सूर्य की किरणों के प्रतिबिम्ब से पृथ्वी पर रात्रिसंबंधी अंधकार नष्ट होता है ।

चंद्रमा पर होने वाले उल्कापातों के विषय में भी भारतीय ज्योतिषियों ने ज्ञान प्राप्त कर लिया था ।उन्होंने ग्रहणकाल में चंद्रमा पर होने वाले उल्कापातों के फल का भी विवेचन किया ।

          ●●● वैदिक साहित्य में चंद्रमा ●●●

वैदिक साहित्य में चंद्रमा की गति का भी उल्लेख मिलता है ।ऐतरेय ब्राह्मण में अमावस्या में उदयकालिक सूर्य की ओर जाते हुए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्य से आग निकलते हुए चंद्रमा को देखकर लिखा गया है ---   "चंद्रमा वा अमावास्यायाम् आदित्यमनुप्रविशति आदित्याद्वै चंद्रमा जायते ।।"   अर्थात चंद्रमा में स्वयं का प्रकाश नहीं होता ।इस विषय का ज्ञान भी वैदिक काल में किया जा चुका था कि वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है ।इस कारण "तैत्तिरीय संहिता" में चंद्रमा को  'सूर्यरश्मि चंद्रमा'  कहकर संबोधित किया गया है ।
● शुक्ल यजुर्वेद के अनुसार सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा के मन में चंद्रमा की उत्पत्ति हुई , अतः चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है ।
● ऋग्वेद के अनुसार चंद्रमा की किरणें अमृत-बिंदु के समान हैं तथा वह समस्त औषधियों का स्वामी है ।
            त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो 
                                      अजनयस्त्वं    गाः ।
             त्वमा  ततन्थोर्वन्तरिक्षं  त्वं 
                                     ज्योतिषा  वि तमो ववर्थ ।।
● पुराणों के अनुसार, एक बार रावण ने चंद्रलोक में जाकर चंद्रमा पर वाणों का प्रयोग किया था तथा ब्रह्मा की आज्ञा से वह वापस लौट आया था ।महिषासुर ने भी चंद्रमा पर अपना आधिपत्य जमा लिया था , जिसका देवी दुर्गा ने वध किया था ।
● धर्म शास्त्र के अनुसार चंद्रमा या चंद्रलोक को एक दिव्य धाम माना गया है ; जहाँ विविध प्रकार का ऐश्वर्य व वैभव माना जाता है और उसे धर्ममार्ग पर चलकर , तप व योगपूर्वक ही प्राप्त किया जा सकता है ।
● वृहत्संहिता में वराहमिहिर ने लिखा है कि जिस तरह धूप में स्थित घड़े का सूर्य की तरफ का आधा भाग रोशनी वाला और विरुद्ध दिशा में स्थित दूसरा आधा भाग अपनी छाया से ही काला दिखाई देता है, उसी तरह सदा सूर्य के अधोभाग में स्थित चंद्रमा का सूर्य की तरफ का आधा भाग शुक्ल और उसके विपरीत का आधा भाग अपनी ही छाया से काला (कृष्ण)दिखाई देता है ।

● भारतीय गणितज्ञों के अनुसार चंद्रमा की परिधि का मान ●

भारतीय गणितज्ञों ने चंद्रमा की परिधि का मान-- सूर्य सिद्धांत के अनुसार 480 योजन तथा कक्षामान 3, 24, 000 योजन तथा आर्यभट्ट के अनुसार चंद्रपरिधि 315 योजन तथा कक्षामान
 2, 16,000 योजन के बराबर बताया है ।आधुनिक मान में लगभग 12 किलोमीटर का एक योजन माना गया है , इस अनुसार गणना का आंकलन किया जा सकता है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Thursday, November 26, 2020

यज्ञ एक समग्र जीवन दर्शन, यज्ञाग्नि में निहित शिक्षाएँ


           ●●●यज्ञ एक समग्र जीवन दर्शन ●●●
यज्ञ वैदिक संस्कृति का मुख्य प्रतीक है ।भारतीय संस्कृति में जितना महत्व यज्ञ को दिया गया है, उतना शायद किसी और क्रियाकलाप का नहीं ।

                 यज्ञ का वेदोक्त आयोजन, शक्तिशाली मंत्रों का विधिवत् उच्चारण, विधिपूर्वक बनाए हुए कुंड, शास्त्रोक्त समिधाएँ तथा सामग्रियाँ जब विधानपूर्वक हवन की जातीं हैं तो उनका दिव्य प्रभाव आकाश- मंडल में फैल जाता है ।उस प्रभाव के फलस्वरूप प्रजा के अंतःकरण में प्रेम, एकता, सहयोग, सद्भाव, उदारता, ईमानदारी, संयम, सदाचार, आस्तिकता जैसे सद्गुणों का विकास होने लगता है ।इस तरह व्यक्ति एवं समूह पर यज्ञ के अद्भुत सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं ।

यज्ञ से जुड़ा केंद्रीय तत्व -- अग्नि, स्वयं अजस्र प्रेरणाओं से भरा हुआ है, जिसके महत्व को समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी गई है ।ऋग्वेद की शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं--

         ●●● यज्ञाग्नि में निहित शिक्षाएँ●●●

● 1-- अग्नि में जो कुछ भी पदार्थ ( यज्ञ सामग्री, घृत आदि ) हवन कुंड में समर्पित किए जाते हैं, यज्ञाग्नि उन्हें संग्रहीत नहीं रखती , बल्कि सर्वसाधारण के लिए वायुमंडल में बिखेर देती है ।इसी तरह हमारी शिक्षा,समृद्धि, प्रतिभा, प्रभाव आदि का न्यूनतम उपयोग करते हुए शेष का अधिकाधिक उपयोग जनकल्याण के लिए होना चाहिए ।

●  2 -- जो भी वस्तु अग्नि के संपर्क में आती है , उसे वह दुत्कारती नहीं, बल्कि स्वयं में आत्मसात् करके अपने जैसा बना लेती है ।इससे यह प्रेरणा मिलती है कि हमारे संपर्क में जो पिछड़े, छोटे या पीड़ित व्यक्ति आएँ, उन्हें आत्मसात् कर अपने जैसा बनाने की कोशिश हममें से हरेक को करनी चाहिए ।

● 3 ---  अग्नि की लौ पर कितना ही दबाव पड़े, लेकिन वह दबती नहीं, बल्कि ऊपर को ही उठी रहती है ।इसी तरह हमारे सामने कितने भी भय, प्रलोभन, संकल्प एवं जिजीविषा को दबने नहीं देना चाहिए, बल्कि अग्निशिखा की भाँति ऊँचा उठाए रखना चाहिए ।

● 4 --- अग्नि कभी भी अपनी उष्णता एवं प्रकाश की विशेषताओं को नहीं छोड़ती ।उसी प्रकार हमें सदा मेहनत व कर्तव्यनिष्ठता  के साथ जीवन जीना चाहिए और स्वयं को सदा सक्रिय रखना चाहिए व धर्म की राह पर चलना चाहिए ।

● 5 -- यज्ञाग्नि का अति विशिष्ट गुण यह है कि वह अपने में आहुत सामग्री को वायुरूप बनाकर समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना भेदभाव किए गुप्तदान के रूप में बिखेर देती है, जो स्वयं में एक विलक्षण शिक्षा है - इससे हमें प्रेरणा मिलती है कि हमारा जीवन भी समस्त प्राणियों के लिए एक वरदानस्वरूप होना चाहिए ।अपने संसाधन,उपलब्धियों व ज्ञान को हमें मुक्तहस्त से लोक-कल्याण में लगाना चाहिए ।

इस तरह यज्ञ स्वयं में प्रचंड प्रेरणाओं से भरा एक आध्यात्मिक प्रयोग है , जिसे यदि उचित विधि से संपन्न किया जाए तो इसके कर्मकांड द्वारा देव आवाहन , मंत्र प्रयोग, संकल्प एवं सद्भावनाओं की सामूहिक शक्ति से एक ऐसी सशक्त ऊर्जा पैदा की जाती है, जिसके द्वारा अंतःवृत्तियों को गलाकर परिष्कार किया जाता है ।
यज्ञाग्नि से प्रेरणाएँ ग्रहण करके मनुष्य अपने  प्रसुप्त देवत्व का जागरण कर सकता है ।यज्ञाग्नि की प्रेरणा से मनुष्य अपने व्यक्तित्व का रूपांतरण करके समाज निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है ।

इस तरह यज्ञ एक समग्र जीवन दर्शन है, जो सशक्त प्रेरणा-प्रवाह लिए हुए है ।यज्ञ को जीवन का अभिन्न अंग बनाते हुए हम अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण के गहन प्रयोग को संपन्न कर सकते हैं तथा दूसरों को भी प्रेरित कर सकते हैं । यज्ञाग्नि की शिक्षाएँ ग्रहण करके हम परिवार, समाज, प्रकृति एवं सृष्टि के हित साधन का माध्यम बन सकते हैं ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Wednesday, November 25, 2020

वामन अवतार और राजा बलि,बलि का जीवन परिचय, बलि की इंद्रलोक पर विजय,भगवान का वामन रूप में अवतार लेना, वामन का बलि के यज्ञमंडप की ओर प्रस्थान,वामन द्वारा तीन पग भूमि की माँग, भगवान का तीनों लोकों को नापना, वामन शब्द का अर्थ ।

           ●●● वामन अवतार और राजा बलि ●●●                ●●राजा बलि का जीवन परिचय ●●
राजा बलि महान भक्त प्रहलाद के पौत्र एवं दानवीर विलोचन के पुत्र थे ।बलि का जन्म अवश्य दैत्य वंश में हुआ था , परन्तु वे भगवान के अनन्य भक्त थे ।उनकी रगों में पितामह प्रहलाद एवं पिता विरोचन के सभी श्रेष्ठ गुण थे ।उनमें गुरुभक्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी ।उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य की खूब सेवा सुश्रूषा की थी ।

गुरु शुक्राचार्य ने बलि की गुरुभक्ति एवं निष्काम सेवा से प्रसन्न होकर उसे एक यज्ञ करने की प्रेरणा दी ।उस यज्ञ का नाम था अभिजित यज्ञ ।इसे संपन्न कर पाना हर किसी के वश की बात नहीं थी ।शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में यज्ञ संपन्न हुआ ।यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड से अनगिनत बेशकीमती एवं बहुमूल्य वस्तुएँ बाहर निकलीं, जिनमें कवच, रथ, धनुष और कभी न रिक्त होने वाला तरकश मुख्य थे ।

स्वयं बलि के पितामह ने यज्ञमंडप में उपस्थित होकर बलि को ऐसी माला प्रदान की, जिसके फूल कभी मुरझाते नहीं थे ।बलि ने श्रद्धा भाव से माला और कवच को धारण किया ।उसने रथ पर आरूढ़ होकर और हाथ में धपुष-वाण लेकर पृथ्वी और पाताल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया ।उसकी सेना निरंतर बड़ी और शक्तिशाली होती जा रही थी  ।

बलि न्यायप्रिय व नीतिपरायण राजा थे।उन्होंने पृथ्वी एवं पाताललोक, सभी जगहों पर सुशासन स्थापित कर लिया था ।उनके राज्य में प्रजा सुखी व संतुष्ट थी ।बलि पुण्यात्मा थे औल उनकी सर्वोपरि विशेषता थी सरल एवं निष्कपट भावना ।वे अपने गुरु शुक्राचार्य की छद्म लड़ाई से  कभी भी सहमत एवं संतुष्ट नहीं थे ।वे धर्म युद्ध पर विश्वास करते थे और उनका अपार बल , शौर्य, पराक्रम एवं प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति का दुर्लभ संयोग उनको सर्वत्र अजेय बनाता था ।

    ●●● राजा बलि की इंद्र लोक पर विजय ●●●

राजा बलि इंद्रलोक की घोर अव्यवस्था एवं देवताओं की भोगवृत्ति व लापरवाही से भलीभाँति परिचित थे ।इन दिनों सृष्टि-संचालन की प्रकिया में जिम्मेदार देवता ,  उर्वशी , रंभा, मेनका आदि अप्सराओं के रूप-रंग एवं नृत्य में अपने कर्तव्य भूले हुए थे ।इसी कारण धरती पर समय पर बरसात न होना , अकाल पड़ने जैसे अनेक व्यतिक्रम आ गए थे ।इंद्रलोक के उस कुशासन को सुशासन में परिवर्तित करने के राजा बलि ने इंद्रलोक पर अपनी विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी और अपने शौर्य व बल से देवताओं को परास्त कर दिया ।

धर्मपरायण दैत्य राजा बलि ने भोग-विलास में डूबे रहने वाले स्वर्गाधिपति इंद्र को परास्त कर देव व्यवस्था सँभाल ली। स्वर्गाधिपति हो जाने के बाद भी बलि सदा तप एवं यज्ञ में निरत रहते थे।उनकी रुचि सुशासन , विष्णु भक्ति एवं तप-य्ज्ञ में थीवन कि भोगों में ।

इंद्रलोक पर विजय प्राप्त करने के बाद राजा बलि ने इंद्रलोक की व्यवस्था ही बदल दी ।जहाँ प्रातः- साँय नृत्य की झंकार सुनाई देती थी , वहाँ वेदमंत्रों का उच्चारण होने लगा ।विभिन्नप्रकार के यज्ञों से वातावरण में  दिव्यता छाने लगी ।स्वर्ग के सभी संसाधन एवं साधनों को तप एवं यज्ञ में प्रयुक्त किया जाने लगा ।

अब स्वयं राजा बलि देवताओं को उन्हें उनकी जिम्मेदारी का भलीभाँति निर्वहन करने का आदेश देते थे ।अब कहीं भी कोई अपने काम में आलस्य-प्रमाद नहीं बरत पा रहा था ।इस वजह से अब पृथ्वी पर पर्यावरण संतुलित रहने लगा ।धन्य-धान्य में भी वृद्धि होने लगी ।

   ●●● भगवान का वामन रूप में अवतार लेना ●●●

त्रिलोक अधिपति राजा बलि के शासनकाल में तीनों लोकों में सुख-शांति एवं समृद्धि का वातावरण बन गया था ।सभी प्रसन्न थे,
लेकिन देवता खुश नहीं थे ; क्योंकि भोगविलास प्रिय देवताओं को भला त्याग-तपस्या से क्या सरोकार ।अतः सभी देवताओं ने इंद्र के साथ मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि कृपा कर राजा बलि से देवलोक वापस दिलाएँ ।इस प्रार्थना पर भगवान को भारी असमंजस हुआ ; क्योंकि इस बात से वे भलीभाँति परिचित थे कि धर्मपरायण परम भक्त बलि से अब युद्ध करना संभव नहीं है ।

भगवान विष्णु ने महर्षि कश्यप की धर्मपरायणा पत्नी के घर वामन रूप में प्रकट हुए ।बड़े-बड़े नेत्र , चमकता दीप्तिमान मुखमंडल, विशाल वक्षस्थल , लंबी-लंबी भुजाएँ और सिर पर घने केश से सुशोभित वामन अवतार में भगवान बालसूर्य के समान प्रतीत हो रहे थे , परन्तु वे स्वयं अपने उद्देश्य को लेकर खुश नहीं थे , क्योंकि उनके मन में बलि के प्रति छल भरा हुआ था ।

●● भगवान वामन का बलि के यज्ञमंडप की ओर प्रस्थान●●

अब भगवान ने अपनी माता को प्रणाम करके , नर्मदा के तट पर उस स्थान की ओर प्रस्थान किया, जहाँ भक्त एवं राजा बलि अश्वमेध यज्ञ संपन्न कर रहे थे ।भगवान वामन मूँज की करधनी पहने , गले में यज्ञोपवीत धारण किए पैरों में पादुका एवं सिर के ऊपर सुन्दर छाता लगाए हुए थे ।

जब भगवान वामन ने यज्ञमंडप में प्रवेश किया तो सभी भृगुवंशी ब्राह्मणों और विद्वानों ने उठकर उनका स्वागत-सत्कार एवं अभिनन्दन किया ।स्वयं राजा बलि ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हुए भगवान को रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठाकर उनके चरण धोए और उस चरणोदक का पान किया और कहा -- " हे भगवान ! आपने यहाँ पधारकर हम सबको कृतार्थ किया है ।कृपया हमें अपने आगमन के कारण से अवगत कराएँ।

●● भगवान का राजा बलि से तीन पग पृथ्वी की माँग ●●

जब राजा बलि ने भगवान वामन से उनके आगमन का कारण जानना चाहा तब वामन भगवान ने प्रत्युत्तर में कहा -- " महाराज बलि ! आप परम भक्त हैं ।आपको अपने महान कुल की मर्यादा एवं परम्परा का न केवल ज्ञान है , अपितु आप उसका यथोचित निर्वहन भी करते हैं ।आपके पितामह प्रहलाद परम भक्त, महादानी और धर्मात्मा रहे हैं एवं आपके पिता विरोचन का स्थान सर्वश्रेष्ठ दानियों के बीच सुशोभित है ।

 राजन ! आप स्वयं परमधर्मात्मा एवं श्रेष्ठ पुण्यात्मा हैं ।मैं ब्रह्मचारी हूँ ! भला किसी ब्रह्मचारी को धन, वैभव एवं ऐश्वर्य से क्या प्रयोजन ! मैं तो केवल तीन पग पृथ्वी की इच्छा लिए आपके समक्ष प्रकट हुआ हूँ ।मेरी यही माँग है और आशा है कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे ।

महाराजा बलि पाँच वर्ष के उस तेजस्वी ब्राह्मण को यज्ञशाला में प्रवेश करते ही पहचान गए थे ।उन्होंने एक पल में ही अपने आराध्य एवं इष्ट को जान लिया था ।वामन अवतार में अवतरित बिष्णु भगवान ने तीन पग पृथ्वी माँगी वे उसे कैसे अस्वीकार कर सकते थे ।

● वामन से विराट होकर भगवान का तीनों लोकों को नापना ●

भगवान की माँग स्वीकारते हुए राजा बलि ने भूमि दान का संकल्प करने के लिए अपनी अंजलि में जल लिया , उसी समय दैत्यों के गुरु एवं महान तांत्रिक शुक्राचार्य ने कहा -- ठहरो बलि ये वामन वेश में विष्णु हैं, ये तुम्हें छलने आए हैं ।ये तुमसे तीन पग भूमि नहीं, बल्कि तुम्हारे तीनों लोकों का राज्य लेने आए हैं ।
शुक्राचार्य की बात सुनकर बलि ने कहा -- " हे गुरुदेव ! आपका संशय सर्वथा सच संभावित हो सकता है ।भले ही ये मेरे तीनों लोकों को लेने आए हों और भले ही इनका उद्देश्य हमें छलना हो, परन्तु भक्त के लिए अपना सर्वस्व लुटाने वाले भगवान आज स्वयं अपने भक्त के पास याचक बनकर आए हैं, अतः मैं याचक बने भगवान को खाली कैसे लौटा सकता हूँ ।भगवान की याचना को मैं जरूर ही पूरा करूँगा , फिर भले ही मुझे भिखारी बनकर दर-दर ठोकरें खानी पडें।"  

जब बलि ने भगवान की याचना पूरी करने का दृढ़ निश्चय कर लिया तो गुरू शुक्राचार्य ने अप्रसन्न होकर राजा बलि को तेजहीन होने का श्राप दे दिया , जिसे बलि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन्होंने भगवान वामन को दान देने के लिए हाँ कर दिया।

बलि के हाँ कहते ही भगवान वामन से विराट हो गए और उन्होंने दो पग में तीनों लोकों को नाप लिया और कहा--  " बलि ! अब बताओ मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ ।"  तीसरा  पग रखबाने के लिए बलि के पास कुछ नहीं था , तो भगवान ने बलि को वरुण पाश में बाँध लिया ।पाश में बँधे बलि मुस्करा ने मुस्कराते हुए कहा--- " प्रभु ! आपने दो पगों में मेरे तीनों लोकों के राज्यों की धरती नाप ली ।मेरे पास अब धरती नहीं है तो क्या है, मेरा मस्तक तो है ।आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दें ।" वामन से विराट होकर भगवान ने तीनों लोकों के साथ बलि को भी नाप लिया ।

देने वाले महाराज बलि अपना सर्वस्व देकर प्रसन्न थे, परन्तु भगवान को अपने द्वारा किए छल पर क्षोभ था ; क्योंकि इस जगत में जिस अधर्म रूपी छल को मिटाने के लिए वे बार-बार अवतार लेते हैं आज उन्हीं जगत पति को अधर्म रूपी छल का सहारा लेना पड़ा ।भगवान ने बलि से कहा -- " वत्स ! इस अमिट दान के कारण तुम्हारी कीर्ति सदा अमर रहेगी , जब कि मेरे छल के कारण मुझ विराट को भी सदा याचक एवं वामन ही कहा जाएगा ।" 

स्वयं भगवान अपने छल के कारण विराट होने पर भी वामन कहे गए ।स्वयं भगवान विष्णु को परम धर्मात्मा बलि के पास याचक बनकर वामन के रूप में जाना पडा।

          ●●●वामन शब्द का अर्थ ●●●

वामन का अर्थ होता है बौना अर्थात छोटा ।वामन वही नहीं होते , जिनकी लंबाई कम होती है , वरन वामन वे भी होते हैं, जिनके व्यक्तित्व की ऊँचाई कम होती है, जिनके मन, अंतःकरण छल-छद्म और कपट-कलुष से भरे होते हैं ।ऐसे लोग भले ही कितने बुद्धिमान, तर्ककुशल व साधनसंपन्न हों , भले ही उनके पास कितनी ही अलौकिक शक्तियाँ, सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ-निधियाँ क्यों न हों , परन्तु अपने छल-कपट के कारण उन्हें सदा ही वामन कहा और समझा जाता है ।

भगवान की लीला  सदा कल्याणकारी होती है , संसार के भले के लिए ही होती है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Tuesday, November 24, 2020

भारतीय रसोईघर व स्वास्थ्य, रसोईघर की साफ-सफाई,खाद्य सामग्री का रखरखाव, किस प्रहर में कैसा आहार करें, मन के भावों का भोजन पर प्रभाव ।

            ●●● भारतीय रसोईघर व स्वास्थ्य ●●●
भारतीय घरों में रसोई का अति महत्वपूर्ण स्थान है ; क्योंकि यह वह स्थान है , जहाँ से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता है और परिवार के सभी सदस्यों के  स्वास्थ्य का निर्धारण भी होता है ।इसीलिए रसोई एक ऐसा स्थान है, जहाँ सबसे अधिक साफ-सफाई की जरूरत होती है; क्योंकि यह स्थान सबसे अधिक प्रयोग में आता है और यदि यहाँ सफाई न हो तो स्वास्थ्य बढ़ाने के स्थान पर बीमारियाँ फैलाने का स्रोत बन जाता है ।
         
         ●●● रसोईघर की साफ-सफाई ●●●

सदियों से घर के बड़े बुजुर्गों ने रसोईघर की स्वच्छता व साफ-सफाई पर बहुत जोर दिया है ।स्नान करके ही इस स्थान पर प्रवेश करने व भोजन पकाने की अनुमति रही है ।बरतनों की साफ-सफाई, उनकी सुव्यवस्था, अन्न , सब्जियाँ, मसाले व अन्य आवश्यक सामग्रियों का भली प्रकार रखरखाव , समय-समय पर उनका निरीक्षण , आवश्यकतानुसार उनके संग्रह व क्रय आदि पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है ।

आधुनिक समय की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है तो रसोईघर में भी बदलाव स्वाभाविक है ।बदलते समय के साथ रसोईघर में कुकिंग गैस, प्रेशर कुकर  व अन्य  बिजली उपकरणों का समावेश हो गया है ।जिनका उपयोग करने में बहुत सावधानी व रखरखाव की जरूरत है ।

पहले बरतन मिट्टी से साफ किए जाते थे आजकल बरतन साफ करने के लिए तरह-तरह के डिटरजेंट बाजारों में मिलने लगे हैं ।बरतनों की सफाई में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि उनमें डिटर्जेंट का अंश न रहे ।
    
रसोईघर में मक्खियाँ, काॅकरोच व अन्य कीड़े आदि न पनपने
 पाएँ , इसका विशेष ध्यान रखा जाए ।रसोईघर में उपयोग आने वाले उपकरणों, जूठे बरतन , फ्रिज , डस्टबिन, रसोई में इस्तेमाल होने वाले कपड़े आदि भी नियमित साफ किए जाएँ जिससे उनमें बैक्टीरिया न पनपें।

वैसे तो रसोईघर में चप्पल का प्रवेश वर्जित होना चाहिए, लेकिन आज के समय में शायद बिजली उपकरणों के कारण या अन्य कारणों से चप्पल का इस्तेमाल जरूरी हो तो रसोईघर की अलग चप्पल रखनी चाहिए ।

 ●रसोईघर में प्रयुक्त होने वाली खाद्यसामग्री का रखरखाव●

अच्छे स्वास्थ्य के लिए रसोईघर की साफ-सफाई व सजावट के साथ-साथ रसोईघर में प्रयुक्त होने वाली खाद्यसामग्री का उचित रखरखाव  व समयानुसार उनका प्रयोग आवश्यक है अन्यथा वे उपयोग के लायक नहीं रह जातीं ।रसोईघर में जो सूखी खाद्य सामग्रियाँ होती हैं उन्हें सदा सूखे डिब्बों में ही रखनी चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनमें किसी भी तरह की नमी न होने पाए इसलिए गीले हाथों से सामग्री न निकालें और न ही उन्हें निकालने के लिए गीली चम्मच आदि का इस्तेमाल करें ; क्योंकि जरा सी भी नमी खाद्य सामग्री को खराब कर सकती है ।

भोजन बनाने में प्रयुक्त सब्जियों को अच्छी तरह धोना अति आवश्यक है , लेकिन कुछ सामग्रियाँ जो सूखी होती हैं उन्हें छान-बीन कर ही डिब्बों में रखना चाहिए व भोजन बनाते समय भी एक बार पुनः ध्यान कर लेना चाहिए क्योंकि कभी-कभी सामग्रियों में कीड़े भी लग जाते हैं।

भोजन में पोषक तत्व बने रहें इसलिए जहाँ तक हो सके , ताजी सब्जियों का ही भोजन बनाने में उपयोग किया जाए।कई दिनों तक रखी हुई सब्जियों में स्वाद व पोषक तत्व , दोनों की ही कमी हो जाती है । भोजन बनाने में चोकर वाला आटा व हरी पत्तेदार सब्जियों आदि का यदि भोजन बनाने में प्रयोग हो व भरपूर मात्रा में इनका सेवन हो तो अलग से फाइबर की जरूरत नहीं पड़ती ।ठंडी-गरम आदि विपरीत प्रकृति वाली चीजों को एक साथ न खाया जाए ।साथ ही मौसमी ताजे फलों व सब्जियों को अपने भोजन में अवश्य शामिल करें ।

    ●●●किस प्रहर में कैसा आहार ग्रहण करें ●●●

भारतीय संस्कृति में आहार ग्रहण करने में समय का भी अत्यन्त महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार दिन में जब वातावरण गरम होता है, तब शरीर की पाचनशक्ति भी तीव्र रहती है ।इस आधार पर हम अपने शरीर की  जरूरत व माँग के हिसाब से दिन में तीन या चार बार आहार ग्रहण कर सकते हैं ।

●सुबह--   स्वल्पाहार (सुबह का नाश्ता) का समय होता है ,इस प्रहर में हल्की धूप होती है, इस समय फल, दूध, अंकुरित अनाज, दलिया आदि लिया जा सकता है ।
●दोपहर-   इसके चार या पाँच घंटे बाद दोपहर के भोजन का समय होता है ।इस प्रहर में वातावरण गरम होता है और शरीर की पाचनशक्ति भी तीव्र होती है, इसलिए इस समय संपूर्ण आहार ले सकते हैं ।
●शाम  -- शाम के समय फलों का ज्यूस, सब्जियों का सूप, तुलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि से बनी हर्बल चाय या इनके विकल्प के रूप में  अपनी रुचिअनुसार अल्प आहार ग्रहण कर सकते हैं ।
●रात्रि  --- रात्रि का भोजन ऐसा होना चाहिए, जो गरिष्ठ न हो, आसानी से पचने योग्य हो ।जो लोग रात्रि के समय कार्यस्थल पर जाते हों उन्हें अपनी नींद का विशेष ध्यान रखना चाहिए उन्हें  रात्रि में अधिकतम 9 से 10 के बीच भोजन कर लेना या शाम को 5 से 6 के बीच भोजन करके ही अपने कार्यस्थल में जाना चाहिए ।

●भोजन पकाते समय मन के भावों का भोजन पर प्रभाव●

भोजन बनाते समय, बनाने वाले के मन के जो भाव होते हैं, उन भावों का भी भोजन पर असर पड़ता है अतः भोजन बनाते समय , परोसते समय मन को शांत व प्रसन्न रखना चाहिए ।जब भोजन पकाते समय हमारे मन के भाव अच्छे होंगे तो वह भोजन ग्रहण करने वाले को भी प्रसन्नता प्रदान करेगा ।

भोजन , बनाते व पकाते समय , परोसते समय व खाते समय हमारे मन में क्या भाव हैं--- इनका हमारे स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है ।ये भाव हमारे स्वास्थ्य को बहुत प्रभावित करते हैं ।कहा भी गया है-- जैसा खाएँ अन्न , वैसा बने मन ।अतः किसी कारणवश यदि व्यक्ति की मनोदशा कुप्रभावित है तो उसे सही व सामान्य करने के बाद ही भोजन करना चाहिए ।

       भोजन करते समय मन को प्रसन्न रखना चाहिए और इस वक्त अन्य काम नहीं करने चाहिए-- जैसे मोबाइल पर बात करना, टीवी देखना जैसे कार्य नहीं करने चाहिए । भोजन बहुत जल्दी-जल्दी भी नहीं करना चाहिए , भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए । जल्दी-जल्दी कम चबाया हुआ भोजन हमें अपनी पौष्टिकता नहीं दे पाता ।

भोजन की पौष्टिकता ग्रहण करने के लिए और उसे आसानी से पचाने के लिए भोजन को अच्छी तरह चबा कर खाना चाहिए ।आयुर्वेदाचार्य कहते हैं कि जल भी पिया जाए तो उसे भी धीरे-धीरे पीना चाहिए ; क्योंकि जब हमारे ग्रहण किए जाने वाले भोजन व पेय पदार्थों में लार का सम्मिश्रण होता है तो रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनमें आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है और वह पाचन में मदद करके हमें स्वास्थ्य लाभ पहुँचाता है ।

         हमारे पूर्वजों ने कहा है ---- लंबी उम्र जीने के दो ही रहस्य हैं--- कठोर परिश्रम करना और बिना कड़ी भूख लगे कुछ न खाना ।क्योंकि कड़ी भूख लगने पर खाना अधिक स्वादिष्ट लगने लगता है ।

अतः अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमारा रसोईघर अच्छी तरह साफ व व्यवस्थित होना आवश्यक है साथ ही खाद्य सामग्रियाँ भी साफ होनी जरूरी हैं एवं भोजन सही समय पर , सही मात्रा व कुछ आयुर्वेद के नियमों के अनुसार ग्रहण किया जाए ।इसलिए यह सत्य ही है कि हमारी रसोईघर का हमारे स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Monday, November 23, 2020

भक्ति योग,सकाम भक्ति,निष्काम भक्ति,श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार भक्ति,श्री कृष्ण के अनुसार भक्तों के प्रकार,

                       ●●●  भक्ति योग ●●●
● भक्ति का अर्थ--- परमात्मा की प्राप्ति के यूँ तो अनेक मार्ग हैं, पर उन सभी में भक्ति का मार्ग सबसे सरल व सुगम है ।सभी   छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबके लिए यह समान रूप से सहज, सरल है।
भक्ति  'भज्' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है - ईश्वर सेवा (ईश्वर स्मरण) ।इस तरह से भक्ति का अर्थ- स्वयं का ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ।जीवात्मा का परमात्मा में संपूर्ण समर्पण, विसर्जन व विलय ही भक्ति योग है ।प्रेम योग , समर्पण योग, उपासना योग आदि भक्तियोग के ही विविध नाम हैं ।भक्ति योग अथवा प्रेमयोग परमात्मा के साथ एकरूपता की जीवंत अनुभूति है ।

जगत में जो सबसे महान और सर्वोपरि तत्व है, उसके प्रति नैसर्गिक श्रद्धा-समर्पण का भाव होना ही भक्ति योग है ।नारद भक्ति सूत्र के अनुसार -- सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा ।अर्थात भगवान के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है ।शांडिल्य सूत्र के अनुसार-- सा परानुरक्तिरीश्वरे ! अर्थात ईश्वर के प्रति परम अनुराग ही भक्ति है ।स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि सच्चे व निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज करना ही भक्ति है ।

सच्चे साधक को सृष्टि के कण-कण में, चेतन-अचेतन , पेड़-पौधे , वनस्पतियों एवं समस्त प्राणियों में सिर्फ ईश्वर और ईश्वर का ही रूप व नूर दिखाई पड़ने लगता है ।तब उस साधक के लिए यह सारा विश्व, सारा ब्रह्माण्ड ही प्रभु का बनाया देवालय नजर आता है ।तह हर जीव में परमेश्वर की छवि दीखने लगती है और जीव सेवा ही प्रभु सेवा जान पड़ती है ।

सच्ची भक्ति वही है ; जिसमें याचना नहीं, कामना नहीं, जिसमें कुछ माँगना नहीं ।ईश चरणों में स्वयं को ही समर्पित कर देने का नाम भक्ति है । कुछ माँगना नहीं होता है बल्कि स्वयं समर्पित हो जाना है ।ऐसी परम भक्ति विरलों में ही पाई जाती है ।
संत कबीर ने कहा है -- 
        भक्ति भाव भादों नहीं, सबहि चली घहराय ।
        सरिता सोहि सराहिए, जेठ मास ठहराय ।।
अर्थात भादों में नदियाँ उमड़ चलती हैं, परन्तु प्रशंसा तो उसी नदी की  है , जो ज्येष्ठ महीने में अधिक जलयुक्त हो ।इसी प्रकार देखा-देखी थोड़े समय के लिए भक्ति भाव उमड़ आना अलग बात है , परंतु आपत्ति काल में भी भक्ति बनी रहे , तभी उस भक्ति की प्रशंसा है ।
      
     ●●● सकाम भक्ति, निष्काम भक्ति ●●●

भक्त की प्रकृति एवं भक्ति के उद्देश्य के आधार पर भक्ति दो प्रकार की कही गई है -- सकाम भक्ति व निष्काम भक्ति ।किसी कामनापूर्ति के उद्देश्य से की गई भक्ति सकाम भक्ति कहलाती है , पर बिना किसी कामना के निष्काम भाव से की गई भक्ति  'निष्काम' भक्ति कहलाती है ।निष्काम भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है ।

भौतिक  कामना से की गई भक्ति अर्थात सकाम भक्ति से इच्छाओं की प्राप्ति तो हो सकती है पर भगवान की नहीं ।सकाम भक्त भक्ति से प्राप्त पुण्य के कारण भोगों को प्राप्त कर लेते हैं, स्वर्ग भी प्राप्त कर लेते हैं पर पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः मृत्युलोक में अर्थात जन्म-मरण के बन्धन में पड़ जाते हैं ।परंतु निष्काम भक्ति द्वारा ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होती है।

 ●●● श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार भक्ति ●●●

श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार लोग लौकिक कामनाओं के लिए दुखी होते रहते हैं और आँसू बहाते हैं, पर भगवान के लिए भला कौन रोता है? भक्ति लौकिक कामनाओं के लिए नहीं, वरन भगवान के लिए रोने का नाम है ।भक्ति संसार को पाने का नहीं, ईश्वर को पाने का मार्ग है ।

सच्चे भक्त के हृदय में इसीलिए तो अनंत प्रेम की  की अजस्र धारा बहने लगती है ।फिर वही धारा प्रभु प्रेम में सावन-भादों बनकर साधक के नेत्रों से भी बहने लगती है ।साधक फिर उन्हीं आँसुओं से अपने इष्ट, अपने आराध्य, अपने प्रभु को प्रेम का अर्ध्य देता है, उनका हर पल अभिषेक करता रहता है ।

          जब भक्ति भाव मन में उमड़े
           दर्शन की आस नयन उमड़े
           नैनों के नीर से भरी गगरी 
           प्रभु चरणों में ढुलकाया करो 

उन्हीं आँसुओं से कई जन्मों से संचित चित्त के विकारों, संस्कारों का क्षय होने लगता है ।तभी साधक के शुद्ध चित्ताकाश में प्रभु का ज्योतिर्मय रूप में अवतरण होता है ।तब सचमुच उपास्य एवं उपासक , भक्त व भगवान एक हो जाते हैं ।

तब सारा ब्रह्माण्ड ही प्रभु का बनाया देवालय नजर आता है ।ऐसे में सूर्य-चंद्र के रूप में उन्हीं प्रभु का जीवंत दीदार होने लगता है ।धरती की सभी नदियाँ व समुद्र उन्हीं प्रभु के पाँव पखारते नजर आते हैं ।सभी सुगन्धित व खिले हुए पुष्प उन्हीं देव के चरणों में चढ़ते, खिलते व मुस्कराते दीखते हैं । शीतल, सुगन्धित पवन प्रभु के चरणों में बयार बनकर बहने लगती है ।तब साधक हर पल ही प्रभु का स्मरण करता हुआ , उन्हीं के बनाए देवालय में उनकी आराधना , अभ्यर्थना करने लगता है ।

साधक की ऐसी परम भक्ति को देखकर प्रभु भी अपने भक्त के लिए विह्वल व व्याकुल हो उठते हैं ।


 ●●●योगेश्वर श्री कृष्ण के अनुसार भक्तों के प्रकार●●●
श्री मद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण निष्काम भक्ति, निष्काम भक्त व ज्ञानी भक्त की भूरि-भूरि प्रशंसा इस प्रकार करते हुए  कहते हैं-- अर्जुन ! आर्त्त , जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी -- ये चार प्रकार के भक्त मेरा भजन किया करते हैं । उन भक्तों में से नित्य एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है और मुझे अत्यन्त प्रिय है ।
● अर्थार्थी भक्त--- अर्थार्थी भक्त वह है -- जो भोग , ऐश्वर्य और सुख प्राप्त करने के लिए भक्ति करता है ।
● आर्त्त भक्त--  आर्त्त भक्त वह है -- जो कोई कष्ट, संकट आने पर मुझे पुकारता है ।
● जिज्ञासु भक्त--- जिज्ञासु भक्त संसार को अनित्य जानकर मुझको तत्व से जानने की जिज्ञासा व पाने के लिए भजन करता
 है ।
● ज्ञानी भक्त--- ज्ञानी भक्त सदैव निष्काम होता है ।वह मुझे तत्व से जानता है ।

भगवान कहते हैं- अर्जुन ! ये सभी चारों प्रकार के भक्त उदार हैं, परन्तु ज्ञानी भक्त तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है ; क्योंकि वह मुझमें ही अच्छी प्रकार से स्थित है ।अनेक जन्मों के अंत में तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष यह भलीभाँति समझकर कि सब कुछ ईश्वर ही है -- इस प्रकार मुझे भजता है , ऐसा भक्त ( महात्मा) अत्यन्त दुर्लभ
 है ।

●●● श्री मद्भगवद्गीता में परम ज्ञानी भक्त के लक्षण ●●●

श्री मद्भगवद्गीता में भगवान परम ज्ञानी भक्त के लक्षण बताते हुए कहते हैं--  अर्जुन! जो पुरुष द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित और दयालु है तथा आसक्ति व अहंकार से रहित, सुख-दुख की प्राप्ति में सम और क्षमावान है , निरंतर संतुष्ट, मन इंद्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है-- वह भक्त मुझे प्रिय है ।जो शत्रु-मित्र में, मान-अपमान में सम है तथा सरदी-गरमी में और सुख-दुख में सम है , वह मुझे प्रिय है ।

निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है -- वह स्थिर बुद्धि, भक्तिमान मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

 सच्चे भक्त की यह पुकार होनी चाहिए---
       "दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना 
         दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना ।।"

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

वेजीटेबल कटलेट ( स्वादिष्ट व कुरकुरे ) सामग्री व बनाने की विधि

 ‌‌‌‌‌‌    ●●● कटलेट के  लिए सामग्री व बनाने की विधि ●●●


सभी कटी हुई सब्जियाँ, उबले आलू , धोकर भिगाए गए पोहे, तेल 

अदरक का पेस्ट, कटी हरी मिर्च,नीबू का रस ,काॅर्न फ्लोर व मसाले आदि ।
               ●●●कटलेट कैसे तैयार करें ●●●

बेजीटेबल कटलेट बनाने के लिए सबसे पहले कढाई में  दो छोटी चम्मच गर्म तेल में  दो मिनट तक प्याज भूनें, उसके बाद हरी मिर्च कटी हुई , अदरक का पेस्ट डाल दें ,फिर कटी हुई कैप्सिकम ( शिमला मिर्च ), कैरट ( गाजर ) बीन्स ( फली )  पीज ( मटर के दाने  ) डालकर थोड़ा नमक डालें  कुछ देर सभी सब्जियों को धीमी आग पर ढक कर  पकने दें ( जिससे सब्जियाँ कढ़ाई में चिपकें नहीं)।  जब सब सब्जियाँ पक जाएँ , तब उसमें मिर्च पावडर , गरम मसाला, धनिया पावडर , लेमन ज्यूस ( नीबू का रस) और काॅर्न फ्लोर डाल दें , 

ठन्डा होने पर अच्छी तरह सब सब्जियाँ मिला लें, और उबले आलू व भीगे पोहे ( धोकर छाने हुए )भी उसमें मिला दें, जरूरत के अनुसार थोड़ा नमक और मिला दें ।फिर हाथों से गोल टिक्की बना लें ।टिक्की बनाकर थोड़ी देर फ्रिज में रख दें।

            ●●● मैदा , पानी , नमक, काॅर्न फ्लोर ●●●

● मैदा का घोल कैसे बनाएँ-- मैदा में थोड़ा पानी , नमक, काॅर्न फ्लोर डालकर घोल बना लें ( बहुत पतला नहीं, बहुत गाढ़ा नहीं)

                 ●●●   ब्रेड का चूरा ●●●
● चार-पाँच ब्रेड के पीस लेकर पहले टोस्टर में रोस्ट कर लें 
( ब्राऊन )और फिर मिक्सर में चूरा बना लें ( सूखा चूरा )
                  
● क्रस्ड ब्रेड कैसे बनाएँ ---
चार -पाच  ब्रेड के पीस लेकर पहले टोस्टर में थोड़े रोस्ट कर लें, फिर मिक्सर में थोड़ा पिसा , सूखा चूरा बना लें 
               
●मैदा का घोल कैसे बनाएँ ---
अब मैदा में थोड़ा पानी , नमक और काॅर्न फ्लोर डालकर घोल बना लें (न बहुत पतला न बहुत गाढ़ा) 
                    
  ● तलने के लिए कढ़ाई व तेल   (कटलेट तलना )

उसके बाद फ्रिज में से कटलेट( टिक्की) निकालकर  टिक्की को पहले मैदा के घोल का कोड करें ( घोल में डुबा कर तुरंत निकालें)   फिर क्रश्ड ब्रेड ( ब्रेड का चूरा) का कोड करें, फिर से  मैदा का कोड करें, एक बार और ब्रेड के चूरा का कोड करके  कढ़ाई में तलें, मध्यम आग पर।

किसी भी तरह की चटनी या साॅस के साथ परोसे जा सकते हैं ।

तीन-चार मिनट तक तलने पर अच्छे कुरकुरे कटलेट बनते हैं ।


Sunday, November 22, 2020

धैर्य का महत्व , आध्यात्मिक जीवन में धैर्य का महत्व

                 ●●● धैर्य का महत्व ●●●
धैर्य जीवन का एक ऐसा गुण है , जिसको धारण कर हम बाहरी जीवन में परिपूर्ण सफलता को हासिल कर सकते हैं और साथ ही आंतरिक जीवन में भी शांति के अधिकारी बन सकते हैं ।वर्तमान में धैर्य का महत्व और बढ़ गया है ।जिसमें धैर्य है , समझो उसने सब कुछ अपने पक्ष में करने की कला जान ली ।धैर्य व्यक्ति को सहिष्णु बनाता है ।ऐसे व्यक्ति के जीवन में अभावों, कष्टों, विषमताओं के बीच उसके अंतस् में जल रहा धैर्य का दीपक उसे रोशनी देता है ।

             भगवान श्री राम ने बड़े धैर्य के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए ।रावण द्वारा हरण किए जाने पर माता सीता ने अशोक वाटिका में प्रभु श्री राम की प्रतीक्षा में समय बिताया।पांडवों ने अपना तेरह वर्ष के वनवास का समय धैर्य के  साथ  बिताया। इसी तरह हमारे इतिहास व शास्त्रों में अनेक धैर्यवान नायकों के उदाहरण मिलते हैं ।

परिस्थितियों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं, लेकिन मनःस्थिति तो बहुत कुछ उसके हाथ में ही है ,जिसको धैर्य के बल पर व्यक्ति सँभाले रहता है और अनुकूल दिशा देता है ।धैर्यवान व्यक्ति जानता है कि बोए बीज का फल समय पर मिलेगा , अतः वह हर पल का सदुपयोग करता है ।वह अपने छोटे-छोटे प्रयासों के साथ अभीष्ट लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहता है ।सच्चिंतन, सत्कर्म व सद्भाव की त्रिवेणी में निरंतर स्नान करता है, सत्कर्म की बोई फसल के पकने का इंतजार करता है।

धैर्य व्यक्ति का एक ऐसा गुण है, जिसके गर्भ से बाकी सब गुण प्रस्फुटित होते हैं ।यदि व्यक्ति में धैर्य नहीं है तो उसकी शक्ति-- दुर्बलता में बदल जाती है व मेहनत का वह फल नहीं मिल पाता, जिसका वह हकदार है ।

धैर्यवान व्यक्ति जीवन की विषमताओं एवं प्रतिकूलताओं में भी अपना विश्वास बनाए रखता है और नकारात्मक भावों से दूर रहता है।विपरीत परिस्थितियों में भी शान्त भाव से पार निकलने की राह निकालता है । कबीर दास ने कहा है ---
           धीरे-धीरे  रे  मना , धीरे सब कुछ होय ।
         माली सींचै सौ घड़ा , ऋतु आए फल होय ।।
इस तरह धैर्य जीवन में उसका अभिन्न सहचर बनता है ।धैर्यवान व्यक्ति एक किसान की मनोदशा में जीता है, जो बीज से फसल बनने तक की धीमी , किंतु क्रमिक प्रक्रिया को बखूबी जानता है ।

    ●●● आध्यात्मिक जीवन में धैर्य का महत्व ●●●

                लौकिक जीवन की तरह आध्यात्मिक जीवन में भी धैर्य एक विशिष्ट गुण है , बल्कि इसकी आवश्यकता एवं महत्व यहाँ और भी अधिक है ।लौकिक जीवन में पुरुषार्थ के फल की इच्छा इसी जन्म की रहती है, लेकिन एक आध्यात्मिक पथ का पथिक अपनी चेतना के रूपांतरण से लेकर आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर प्राप्ति आदि आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने हेतु जन्म-जन्मांतर की प्रतीक्षा के साथ साधनारत रहता है ।वह अपनी आत्मा के अजर,अमर,अविनाशी स्वरूप को मानते हुए उसी के अनुरूप अनंत धैर्य के साथ अभीष्ट लक्ष्य हेतु साधना पथ पर डटा रहता है।

धैर्य पूर्वक जीवनलक्ष्य की ओर निरंतर प्रगति करते रहना ही सफल जीवन का राज है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।