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Saturday, February 8, 2020

स्वास्थ्य ही परम धन है -- आधुनिक आहार ( फास्टफूड और जंक फूड) का अधिक सेवन नुकसानदायक

  <<<<<<  स्वास्थ्य ही परम धन है  >>>>>>

" स्वास्थ्य ही परम धन है "  यह उक्ति पूर्णरूपेण सत्य है ; क्योंकि स्वास्थ्य ही सुखी , संतुलित एवं सफल जीवन का आधार है ।जीवन के चारों पुरुषार्थ-- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष स्वास्थ्य के बल पर ही संभव हैं ।स्वास्थ्य वेष कीमती है, बहुमूल्य है।जीवन का कोई भी सुख उत्तम स्वास्थ्य के बिना नहीं उठाया जा सकता ।

 " खाना जितना सादा, स्वास्थ्य लाभ उतना ज्यादा "

स्वास्थ्य होगा तो ही जीवन में सुख, समृद्धि एवं वैभव का आनन्द उठाया जा सकता है।इस सत्य और तथ्य को जानते हुए भी अक्सर बहुसंख्यक लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति घोर लापरवाही बरतते हैं, स्वास्थ्य की अनदेखी, उपेक्षा और अवहेलना करते हैं ।हमारी खान-पान के प्रति लापरवाही कालांतर में रोगों के रूप में सामने आती है।स्वास्थ्य की उपेक्षा अनगिनत बीमारियों को जन्म देती है और जीवन रोगों का घर बन जाता है।

 आज जितने शारीरिक रोग बढ़ रहे हैं उनमें अधिकांश विकृत जीवन शैली और विकृत खान-पान की ही देन हैं ।मधुमेह, उक्त रक्तचाप, हृदयाघात, मोटापा जैसे रोग तो आज आम हो गए हैं ।

स्वास्थ्य की अनदेखी करने के पीछे अनेक तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं ।कोई व्यस्तता को स्वास्थ्य की अनदेखी का कारण बताता है तो कोई परिस्थितियों का बहाना बनाता है।कोई कहता है कि-- हमें समय नहीं मिलता , समय मिलने पर कुछ भी खा लेते हैं । किसी-किसी को सादा भोजन नहीं अच्छा लगता उन्हें सदा चटपटा स्वादिष्ट भोजन ही चाहिए ।

आजकल स्कूलों और कॉलेजों की कैन्टीनों में भी फास्टफूड और जंक फूड ही ज्यादा मिलते हैं ।आजकल हमारे देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या में भी वृद्धि हो रही है ।परिणाम स्वरूप कुछ   महिलाएँ अक्सर ही  घर पर खाना न बनाके बाहर से फास्टफूड आदि मँगाकर बच्चों को खिलाती हैं ।हमारे देश में आजकल फास्टफूड की अनेक दुकानें खुलती चली जा रही हैं ।अब तो गाँवों में भी फास्टफूड का प्रचलन बढ़ रहा है।
 
<<<फास्टफूड व जंकफूड का अधिक सेवन नुकसानदायक>>>

आजकल रोगों में वृद्धि के अनेक कारण हैं उनमें से एक है -          आधुनिक आहार ( फास्टफूड और जंक फूड) का अधिक सेवन। यदि कभी-कभी स्वाद बदलने के लिए हम फास्ट फूड या जंक फूड का सेवन करें, तो इतना नुकसान दायक नहीं होगा लेकिन यदि हम इन्हें अपना नियमित आहार बना लें या इन फास्टफूड या जंकफूड का अधिक उपयोग करें तो इनके दीर्घकालिक दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं ।

उचित मात्रा एवं अनुकूल भोजन का गुण फास्टफूड में नहीं होता ।जैव विविधता वाले अपने देश में फास्टफूड का प्रचलन कहीं भी शुभ नहीं है ।पश्चिमी अंधानुकरण से हम पाश्चात्य भोजन को अपनाकर अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा रहे हैं ।हम जो खाद्य या पेय पदार्थ ग्रहण कर रहे हैं, उनसे होने वाले असर का भी हमें खयाल करना चाहिए ।अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाना हो बिल्कुल सादा, पौष्टिक और संतुलित ।

                            जंक फूड उन्हें कहते हैं, जो व्यावसायिक होते हैं व जिनमें पोषक तत्व न्यून (कम) होते हैं ।डाॅक्टर एंड्रयू स्मिथ ने इनसाइक्लोपीडिया ऑफ जंक फूड एंड फास्ट फूड में इन आहारों का विस्तृत वर्णन किया है ।
 
आजकल बच्चे व बड़े सभी आयु वर्ग के लोगों में फास्टफूड के प्रति आकर्षण बढ़ा है।हम जिसे फास्टफूड कहते हैं, उसके स्वाद को बढ़ाने के लिए, चटपटा एवं तीखापन लाने के लिए तरह-तरह के रसायनों का भरपूर प्रयोग किया जाता है । अधिकांश फास्टफूड मैदा से ही निर्मित होते हैं और अधिक मैदा का भी प्रयोग स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। 

जिह्वा के स्वाद के लिए तरह-तरह के उपक्रम किए जाते हैं ।इसमें पोषक तत्वों की कमी रहती है तथा वसा और सोडियम की मात्रा अधिक होती है।फास्ट फूड  शारीरिक वजन में वृद्धि, मोटा, डायबिटीज , हृदयरोग आदि का कारण बन सकता है ।फास्ट फूड के अधिक सेवन से -- अनिद्रा , तनाव, चिंता आदि भी होते हैं ।

केनेडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हैल्थ के अनुसार फास्ट फूड स्वास्थ्य को बढ़ाने में कुछ सहयोग नहीं करता।फास्ट फूड में सोडियम की मात्रा अधिक होती है,जिसको ग्रहण करने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है और प्यास लगती है प्यास लगने पर कुछ लोग कोकाकोला जैसे एसिड से युक्त पेय पदार्थों को ग्रहण करते हैं और दोनों ( फास्टफूड और कोकाकोला) का सम्मिलित उपभोग अनेक रोगों को जन्म देता है।इनसे किडनी सम्बंधित रोग और हाई ब्लडप्रेशर का खतरा भी बढ़ जाता है, हाई कोलेस्ट्रॉल से हृदय रोग की सम्भावना भी बढ़ जाती है।

                     फास्ट फूड का बच्चों को ज्यादा शौक होता है।पब्लिक हैल्थ न्यूट्रीशन के अनुसार अधिक बेकरी प्रोडक्ट जैसे-- पिज्जा, हैंबबर्गर , हाॅटडाॅग्स आदि का अत्यधिक सेवन नुकसानदायक है।जंक फूड के अति अधिक सेवन से मस्तिष्क के न्यूरॉन्स के बीच साइनेप्सेस प्रभावित होते हैं, जिससे स्मरण शक्ति घट सकती है और सीखने की प्रवृत्ति में भी कमी आती है।इस भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है, जिससे रक्त में शर्करा बढ़ जाती है और त्वचा में भी विविध रोग होने लगते हैं , जैसे-- त्वचा में चकते पड़ना, खुजली होना आदि।

 यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कले , कैलिफोर्निया में 2009  में किए गए एक शोध के अनुसार--- जो व्यक्ति सप्ताह में दो से अधिक बार फास्टफूड का सेवन करते हैं उन्हें मोटापा होने की संभावना बढ़ जाती है ।आगे चलकर मोटापा कई बीमारियों को जन्म देता है।

चिकित्सकों के अनुसार-- फास्टफूड के निरंतर सेवन से डायबिटीज होने की संभावना रहती है।एक आंकड़े के अनुसार सन्  1980 में पूरे विश्व में 15.30 करोड़ लोग डायबिटीज से ग्रसित थे ,जिनकी संख्या सन्  2011 में दोगुनी होकर 35 करोड़ हो गई ।इस बढोत्तरी का मुख्य कारण है-- स्वाद पूर्ति के लिए कुपोषित एवं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्वों से युक्त भोजन ग्रहण करना।

आज के समय में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और खाद्य सामग्री पहले जैसी शुद्ध नहीं-- ऐसे वातावरण में और भी ज्यादा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरुरत है ।

                        हमारे देश के अलग-अलग प्रदेशों में विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व पोषक तत्वों  से भरपूर पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे हैं ।इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हुए अपने पारंपरिक भोजन की ओर लौटना चाहिए ।

                   बच्चे खुद अपने स्वास्थ्य और सेहत के प्रति सजग नहीं हो सकते और न ही वे खान- पान की गलत आदतों के खतरे समझ सकते हैं इसलिए हमें बच्चों के आहार में शुरू से ही सब फलों का समावेश करना चाहिए । छोटे बच्चों को भी शुरू से ही घर पर अपने हाथों से बने हुए भोजन की आदत डालें ,जिससे उनका स्वास्थ्य अच्छा बने ; क्योंकि उत्तम स्वास्थ्य जीवन के विकास का प्रथम सोपान है। 
 "जिसको हो परिवार की सेहत से प्यार , 
               वह भला भोजन बनाने से क्यों इन्कार "

सभी स्वास्थ्यप्रद भोजन ग्रहण करके सुखी और समृद्ध बनें, यही शुभकामना ।
     " स्वास्थ्य ही परम धन है "  और  "पहला सुख निरोगी काया" 
सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Friday, February 7, 2020

सूर्य षष्ठी (छठ पर्व) कब और क्यों मनाते हैं, छठ पर्व के चार पवित्र दिन , छठ पर्व के लोकगीतों का महत्व, वैज्ञानिक स्तर पर छठी मइया की व्याख्या एवं छठ पर्व से जुड़े पौराणिक आख्यान ।

<<<<<<  सूर्य षष्ठी( छठ पर्व) कब और क्यों मनाते हैं  >>>>>>
छठ शब्द का प्रादुर्भाव ' षष्ठी शब्द ' से हुआ है।यह सूर्य उपासना की विशिष्ट व विशेष तिथि है।कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्य षष्ठी कहलाती है।सूर्य षष्ठी व्रत मुख्यतः रोग मुक्ति, पुत्र प्राप्ति और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है ।अत्यन्त श्रद्धा और सच्ची भावना से किया गया व्रत लाभदायक व फलदायक होता है।सूर्योपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आध्यात्मिक अनुदान-वरदान प्राप्त होते हैं ।
 
भारतीय संस्कति में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है।भगवान के अनेक रूपों में से सूर्य ही एकमात्र ऐसे भगवान हैं, जिनके प्रत्यक्ष दर्शन सम्भव हैं , जिनसे यह सृष्टि प्रकाशित है और पोषण पाती है।सूर्य इस सृष्टि की आत्मा हैं ।ऐसे सूर्य भगवान की आराधना का पर्व है -- यह सूर्य षष्ठी या छठ व्रत।

                        यह हमारे देश का प्रसिद्ध व्रत है।यह व्रत हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।पहले तो यह पर्व बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में ही मनाया जाता था लेकिन आज यह पर्व देश और विदेश में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है ।बिहार और झारखंड में यह पर्व  छठ व्रत के रूप में मनाई जाता है।इस व्रत को सूर्य षष्ठी या स्कंदषष्ठी भी कहते हैं।

छठ पूजा का उल्लेख करते समय जो पहली छवि उभरती है , वह है सूर्य को पवित्र जल-प्रवाह में अर्ध्य देती परवैतिन (व्रती) की छवि।छठ पूजा एक ऐसी प्रक्रिया है, जो चार दिनों की यात्रा में अनेक अर्थ समेटे हुए है।यह पर्व सामाजिक रूप से बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है ।

प्राचीनकाल से यह व्रत भौतिक सुखों की कामनापूर्ति हेतु मनाया जाता रहा है, लेकिन इस पर्व में व्रती को आध्यात्मिक तप से गुजरना होता है। इस व्रत में अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष सभी बिना किसी भेदभाव के नदी के घाटों पर जाकर पूजा करते हैं, जल में एक साथ खड़े होते हैं ।एक महीने पहले से ही इस पर्व की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं ।

इस व्रत का सबसे कठिन व सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है -- 48 घंटे का उपवास, जिसमें व्रती स्त्री-पुरुष की आस्था,विश्वास व संकल्प की पराकाष्ठा प्रत्यक्ष होती है।इन दिनों में व्रत के नियमोंका कठोरता से पालन किया जाता है।

<<<<<< छठ पर्व के चार पवित्र दिन >>>>>>

यह व्रत कार्तिक की चतुर्थी से शुरू होता है।यह पर्व स्वच्छता को पवित्रता तक ले जाने की प्रक्रिया से गुजरता है।घर, देह और अंतःकरण की शुद्धि के बाद साधकगण सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और इस दिन को 'नहाय- खाय' के नाम से पुकारते हैं ।

दूसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल पंचमी को साधक दिन भर उपवास रखने के बाद गन्ने के रस से बनी खीर खाकर अपने उपवास को पूर्ण करते हैं इसलिए इसे 'खरना' कहते हैं और इस दिन साधक पवित्र आचरण व ईश्वर-आराधना में बिताते हैं ।

तीसरा दिन अर्थात छठी मइया का दिन ।कार्तिक शुक्ल षष्ठी इस पर्व के उत्कर्ष का दिन होता है। शाम होते ही बाँस की टोकरी में विविध पकवान , फल, फूल और पूजन सामग्री सूप में सजाकर व्रत करने वालों के साथ परिवार के सभी लोग पवित्र जलस्रोतों पर जाते हैं । व्रत करने वाले जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देते हैं ।  ' त्वदीयं वस्तु गोविंद, तुभ्यमेव समर्पये ' की भावना से जो भी वस्तुएँ सूर्य की शक्ति से उपजती हैं जैसे-- फल-फूल, सब्जियाँ, गेहूँ, चावल ; उन्हें अर्ध्य रूप में भगवान सूर्य को समर्पित किया जाता है।

 चौथे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल सप्तमी को उदित सूर्य को अर्ध्य देते हैं और इसके बाद कच्चे दूध को पीकर व्रत पूर्ण करते हैं ।इसके साथ यह उत्सव विदा लेता है, लेकिन लोक-जीवन में यह संदेश देता है कि दिव्यता की ओर अग्रसर होना ही मानव जीवन का उद्देश्य है।

<<<<<<  छठ पर्व के लोकगीतों का महत्व >>>>>>

भारत में मनाए जाने वाले तरह-तरह के व्रत उत्सवों में यह छठ पर्व अपने लोक-गीतों के कारण भी विलक्षण कहलाता है।इन लोक गीतों में छठ मैया से संवाद का भाव है।इन गीतों में भगवान के साथ व्रती व्यक्ति का ऐसा वार्तालाप होता है जैसे वे उसकी प्रार्थना को पूर्ण करने  के लिए ही उपस्थित हुए हों। 

 छठ पर्व के लोकगीतों में विविध प्रकार की कल्पनाएँ की जाती हैं व तरह- तरह से भगवान से अपना नाता इन लोकगीतों के माध्यम से जोड़ा जाता है और उनसे ऐसे बाल हठ किया जाता है , जैसे भगवान हमारे घर के ही एक सदस्य हों तथा बाद में उनसे प्रार्थना की जाती है कि कोई भूल हुई हो थो माफ करना ।

<<<<<< वैज्ञानिक स्तर पर छठी मइया की व्याख्या >>>>>>

 वैज्ञानिक स्तर पर भी छठी मइया की व्याख्या की गई है ।ऋग्वेद कहता है कि ' सूर्य जगत की आत्मा है ' ।ऋषियों ने भी न केवल सूर्य की उपासना की , वरन लोक जीवन ने भी सूर्य के महत्व को पहचाना और छठ पूजा जैसे पर्व की शुरुआत हुई ।जगत के सभी जड़ व चेतन वर्ग  में सूर्य की रश्मियों से ही जीवन संचार होता है ।सूर्य की रश्मियों में छह अप्रतिम शक्तियाँ विद्यमान हैं ।ये हैं--- 
 1   दहनी =    जलाने वाली
 2  पचनी =   पाचन क्रिया करने वाली
 3  धूम्रा =      लोहित करने वाली
 4  कर्षिणी =   आकर्षण करने वाली
 5   वर्षिणी  =   वर्षा करने वाली
 6   रसा  =      रस प्रदान करने वाली 
भगवान सूर्य की ये छह शक्तियाँ ही छठी मइया कहलाती हैं ।

 <<<<<  छठ पर्व से जुड़े पौराणिक आख्यान  >>>>>>

                            भारतीय शास्त्रों में छठी मइया के सन्दर्भ में अनेकों आख्यान- उपाख्यान मिलते हैं ।शिव पुराण की रूद्रसंहिता के अनुसार,भगवान शिव के तेज से छह मुख वाले बालक का
जन्म हुआ, जिसका पालन-पोषण छह कृत्तिकाओं ( तपस्विनी नारी)  ने किया, जिससे वह बालक कार्तिकेय कहलाया।कृत्तिकाएँ कार्तिकेय की माता कहलाईं।ये छह कृत्तिकाएँ ही षष्ठी माता
अथवा छठी मइया कहलाती हैं ।

   देवी भागवत पुराण के अनुसार, स्वायंभुव मनु के संतानहीन पुत्र प्रियव्रत को जब मणियुक्त विमान से आती हुई एक देवी के दर्शन हए , तो देवी ने बतलाया कि वह ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं और स्वामी कार्तिकेय की पत्नी हैं ।मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वे षष्ठी देवी अर्थात छठी मइया कहलाईं।

एक कथा महाभारत के वनपर्व में मिलती है।कपट- द्यूत में हारकर जब पाँचों पांडव वनवास को गए , तो अन्न की कमी से बचने के लिए युधिष्ठिर को धौम्य ऋषि ने सूर्य के 108 नामों से उनकी उपासना करने का परामर्श दिया।इसके बाद सूर्य भगवान ने प्रकट होकर उन्हें एक ताम्रपात्र दिया और कहा कि जब तक महारानी द्रोपदी इस पात्र में भोजन नहीं करेंगी , तब तक इसमें भोज्य पदार्थों की कमी नहीं होगी।इसके पश्चात महारानी द्रोपदी षष्ठी तिथि के दिन उपासना करने लगीं ।फलस्वरूप पांडवों को उनका खोया राज्य वापस मिल गया ।

                             सूर्य षष्ठी अर्थात छठ पूजा एक ऐसा पर्व है , जो उपासना को उत्सव बना देता है जो निज उत्थान को लोक-मंगल के स्वर में गाता है तथा जो प्रकृति और पुरुष के योग में आत्मा और परमात्मा को एकाकार करने की सामर्थ्य धारण करता है।इस पर्व का आधार " सर्वमंगलकारिणी सर्वमांगल्यधारिणी " जन-जन के हृदय में विराजने वाली छठी मइया हैं ।इस तरह सूर्य षष्ठी का यह व्रत अद्भुत व अनुपम है।निश्चित रूप से इस पर्व का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है, जो व्रती के जीवन में सुख- समृद्धि- स्वास्थ्य प्रदान करता है।
          "  छठी मइया की जय , छठी मइया की जय "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

स्वास्थ्य--- रीढ़ की हड्डी सीधी क्यों रखें? रीढ़ की हड्डी सीधी रखने स्वास्थ्य लाभ , आध्यात्मिक लाभ एवं मनोवैज्ञानिक व नैतिक दृष्टि कोण ।

    <<<<<< रीढ़ की हड्डी सीधी क्यों रखनी चाहिए ? >>>>>>
रीढ़ की हड्डी मानव शरीर का आधार है।इसको मानव शरीर की नींव भी कह सकते हैं ।मानव शरीर की ऊर्जा संचालन का विशेष केंद्र है, रीढ की हड्डी ।जब कोई मकान का निर्माण कार्य शुरू किया जाता है , तो सबसे पहले नींव भरी जाती है।नींव गहरी और मजबूत होगी तो मकान अधिक वर्षों तक साथ निभाएगा।यही बात  हमारे शरीर में लागू होती है। अतः बचपन से हमें हमारे शरीर की नींव यानी कि रीढ़ को सीधा रखने कहा जाता है।

हमें बैठते समय, खड़े होते समय, पढ़ते समय रीढ की हड्डी सदा सीधी रखनी के निर्देश दिए जाते हैं ।ऐसा हम विद्यार्थी जीवन में  पुस्तकों में भी पढ़ते हैं ।अक्सर योग की क्रियाओं में भी हमें रीढ़ की हड्डी सीधी रखने का निर्देश दिया जाता है।लेकिन हमें रीढ की हड्डी सीधी क्यों रखनी चाहिए, ऐसा हममें से कम लोगों को ही पता है।
हमारी पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति हर वस्तु को अपनी ओर अर्थात नीचे की ओर खींचती है।सीधे बैठने , उठने, चलने से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव कम हो जाता है, लेकिन हमारे आड़े- तिरछे होते ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति हम पर अपना कार्य करने लगती है, जिससे हमारे शरीर की अधिकांश  ऊर्जा इसको संतुलित करने में व्यय हो जाती है लेकिन रीढ़ की हड्डी सीधी रखने से एक तो हमारी ऊर्जा की बचत हो जाने से हम अधिक देर तक सक्रिय रह सकते हैं ।

  <<<<<< रीढ़ की हड्डी सीधी रखने के स्वास्थ्य लाभ>>>>>>

                          रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर का मुख्य अवयव है।शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से रीढ़ की हड्डी सीधा रखने से हृदय तथा फेफड़ों के कार्य में रुकावट नहीं आती ; जब कि रीढ़ को सीधा नहीं रखने से हृदय और फेफड़ों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है तथा श्वसननलियों द्वारा फेफड़ों में ऑक्सीजन व कार्बन-डाइऑक्साइड का ठीक तरह से आदान-प्रदान नहीं हो पाता है।इससे हमारे रक्त को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलने के कारण रक्त शुद्धिकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है ।

 रीढ को आड़ा- तिरछा रखकर उठने-बैठने से जब हमारे रक्त में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है और सारे शरीर में ऑक्सीजनेटेड रक्त (शुद्ध रक्त) के स्थान पर डी- ऑक्सीजनेटेड 
 ( अशुद्ध रक्त) कार्बोक्सिल एसिड परिभ्रमण करता है , तो इसके परिणामस्वरूप शरीर में थकान एवं आलस्य महसूस होता है। रीढ़ को सीधा रखकर चलने, बैठने व सोने से शरीर में ऑक्सीजनेटेड रक्त अर्थात शुद्ध रक्त का परिसंचरण होता है।रीढ़ के निरंतर झुके रहने से हृदय, फेफड़े, गुर्दे , स्नायु एवं पाचनतंत्र कमजोर एवं रोगग्रस्त हो सकते हैं इसके विपरीत रीढ को सीधा रखने से दिल, दिमाग, फेफड़ों को भरपूर ऑक्सीजन एवं पोषण मिलता है।

बहुत से बच्चे पढ़ाई करते समय कमर झुकाकर बैठते हैं, स्कूल जाते समय पीठ पर बस्ते का वजन अधिक होने के कारण झुककर चलते हैं, इससे भी उनकी शारीरिक बनावट पर असर पड़ता है और उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। कंप्यूटर पर कार्य करते समय या मोबाइल पर वीडियो देखते समय यदि बहुत देर तक झुककर बैठा जाए या हमारी गर्दन की स्थिति सही नहीं हो तो उससे हमारी गर्दन, रीढ़ की हड्डी, कमर, हाथों की उँगलियों व आँखों आदि पर बुरा असर पड़ता है और प्रायः उनमें दर्द रहने लगता है।

गलत शारीरिक बनावट प्रायः व्यक्ति को शिथिलता व सुस्ती से भर देती है और सही तरीका व्यक्ति के अन्दर आत्मविश्वास के स्तर को बढ़ाता है -- इस बात को अब शोध अध्ययन भी प्रमाणित कर चुके हैं ।

   बच्चों को भी पढ़ते सम उन्हें सदा रीढ़ की हड्डी सीधी रखने के लिए कहें ।इससे वे जल्दी थकेंगे नहीं और उनके स्वास्थ्य के लिए भी यह अच्छा रहेगा।रीढ़ को सीधा रखकर काम करने से नेत्र ज्योति भी अच्छी बनी रहती है।आयुर्वेद आचार्यों से यह भी सुना है कि सदा रीढ़ की हड्डी सीधी रखने वालों के बाल भी जल्दी सफेद नहीं होते ।

             हम सभी को अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए रीढ को सीधा रखकर बैठने-चलने व लेटने का अभ्यास करना चाहिए ।यदि हम लंबे समय तक रीढ़ की हड्डी को झुका कर ही उठते-बैठते हैं,तो इससे हमारे शरीर के आकार-प्रकार में भी गड़बड़ी आ सकती है ; जब कि रीढ को सीधा रखने से शरीर का आकार भी सुडौल रहता है , साथ ही अन्य शारीरीक गतिविधियाँ भी सुचारु रूप से अपना काम करती हैं । रीढ़ को सीधा रखकर बैठने व कार्य करने की आदत से हम शरीर व मन सम्बन्धी अनेक परेशानियों से बच जाते हैं ।
 <<<<< रीढ़ की हड्डी सीधी रखने से आध्यात्मिक लाभ>>>>>

आध्यात्मिक व सूक्ष्म दृष्टि के अनुसार--- हमारी रीढ़ की हड्डी में क्रमशः सात चक्र स्थित हैं और इनमें से होकर ही हमारे शरीर में ऊर्जा का संचार होता रहता है।  रीढ़ की हड्डी को सीधा नहीं रखने से चक्र व ग्रन्थियों में ऊर्जा अवरुद्ध भी हो जाती है।यदि हम योग क्रियाओं के समय रीढ़ को सीधा नहीं रखेंगे तो योग से प्राप्त ऊर्जा को पूर्ण संरक्षित नहीं कर पाएँगे। इसलिए जप, ध्यान, प्राणायाम आदि सभी योग साधनाओं में रीढ़ को सीधा रखने पर बहुत जोर दिया जाता है।

हमारे देश के अनेक धार्मिक कार्यक्रमों में हम अपने आदरणीय कथाकारों व आध्यात्मिक गुरुजनों को व्यास गद्दी ( मंच ) पर देखते हैं ।वे सभी सदा अपनी रीढ़ को सीधा करके ही बैठकर लगातार तीन-चार घंटे तक प्रवचन करते रहते हैं ; क्योंकि रीढ़ को सीधा रखने से ऊर्जा ( शक्ति) कम व्यय होती है।

<<<रीढ़ को सीधा रखने का मनोवैज्ञानिक व नैतिक दृष्टिकोण>>>

                       मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार रीढ़ को सीधा रखने से व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है।बातचीत में स्पष्टता आती है ।हमारा स्वास्थ्य अच्छा होगा तो स्वाभाविक ही है कि हमारे मन में सजगता, उल्लास, आत्मविश्वास, उमंग व आनन्द का संचार होगा ; जब कि झुकी हुई रीढ़ उदासी, आलस्य,निराशा व कमजोरी का प्रतीक है।'रीढ़ का कमजोर होना'  एक मुहावरा भी है, जिसका अर्थ है---आधार  का कमजोर होना।

 नैतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो सत्यवादी, अहिंसक,सदाचारी, धर्म रक्षक, व्रतधारी सदा रीढ़ की हड्डी को सीधा व सिर ऊँचा करके ही चलते हैं ।हम अपने देश के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में  सैनिकों की परेड का शानदार प्रदर्शन देखते हैं, वे सदा अपनी रीढ़ को सीधा ही रखते हैं और आत्मविश्वास से भरे होते हैं ।

सैनिक प्रशिक्षण के दौरान सैनिकों को सबसे पहले सिर व रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने का अभ्यास करवाया जाता है।इससे उनमें आत्म विश्वास व सजगता में वृद्धि होती है ; क्योंकि जब वे सजग  रहना सीख जाएँगे तो  अपने सीनियर अधिकारियों का निर्देश मिलते ही अपने कार्य में तत्पर हो जाएँगे।सैनिकों के लिए हर पल सजग रहना ही पड़ता है।

  हम सभी रीढ़ को सीधा रखने के लाभों से अवगत होकर बैठते, चलते, व सोते समय रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने का अभ्यास करना चाहिए ।इससे हम अधिक देर तक सक्रिय रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे एवं ऊर्जावान रहेंगे।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Thursday, February 6, 2020

मीरा-- मीरा का कृष्ण प्रेम

    <<<<<<  मीरा का बचपन , मीरा का कृष्ण प्रेम  >>>>>>
लगभग चार- पाँच वर्ष की मीरा कुछ समझ पाती इससे पहले ही उसकी माँ ने शरीर त्याग दिया था। उसके सिर पर अब पिता रतन सिंह और उसके प्यारे राव दादू का हाथ था।पिता सारे दिन कामकाज में रहते और मीरा अपना अधिक समय अपने दादू के संग व्यतीत करती। एक बात जिससे उसका बाल मन अत्यन्त प्रभावित था, वह था उसका कृष्ण प्रेम ।यह कृष्ण प्रेम उसको अपनी माँ से विरासत में मिला था।मीरा की माँ भी कृष्ण की उपासक थीं ।


मीरा का जब भी मन करता, अपने भगवान मुरलीधर के सामने खड़ी हो जाती, और मूर्ति से बहुत सी बातें करती। मीरा के दादू यह देखकर महसूस करते कि यह कृष्णोपासना उसकी माँ के गुण हैं ।मीरा को जब अपनी माँ की याद आती तो वह कृष्ण से पूछती कि मेरी माँ मुझे छोड़कर कहाँ गई है।कभी -कभी रोती हुई कृष्ण की मूर्ति से कुछ बोलने का आग्रह करती।माँ की याद में छलकते हुए आँसू देखकर दादू का मन दुखी हो जाता ।
 
कुछ दन बाद दादू नन्ही मीरा को साथ लेकर मेड़ता आ गए ।मीरा अपने मुरली मनोहर और उनके सामान को लाना नहीं भूली।मीरा का माता की याद में दुखी देखकर , उसके दादू उसको साथ ही रखते ।तरह- तरह से उसका दुःख भुलाने की कोशिश करते।उसके मन को बाँटने का हर सम्भव प्रयास करते।कभी उसे जलाशय में स्फटिक से स्वच्छ जल में झिलमिलाती तारकावल्लियों को दिखाते।ज्योत्सना पूर्ण रात्रि होती तो जल में पड़ते, चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को दिखाते।

दादू के अगाध प्रेम में पल-बढ़कर और कृष्ण की भक्ति करती हुई  मीरा अब ग्यारह वर्ष की हो गई।मीरा के अंतर्मन से कृष्ण के प्रति शब्दावलियाँ स्वतः ही फूट पड़तीं।यह देखकर दादू प्रसन्न होते ।ऐसा लगता, कि अब तो मीरा बहुत समझदार हो गई है।एक दिन दादू से बोली कि दादू वचन दो- कि मैं कभी कृष्ण भक्ति से विमुख न होऊँ।दादू भी उसका कृष्ण अनुराग देखकर बोले कि " तुम्हें तो हम कृष्णार्पिता कर चुके हैं ।आगे मीरा बोली कि विवाह और भक्ति दोनों साथ-साथ निभाना मेरे लिए कठिन होगा।दादू ने उसकी जिद देखकर उस समय उसकी बात को मान लिया।
 अब कृष्ण भक्ति ही मीरा का ध्येय था।मीरा चतुर्भुज मंदिर की ओर हाथ जोड़कर खड़ी हो गई ।

राव दादू सोचने लगे कि भक्ति का मार्ग सरल भी है और कठिन भी।कठिन इसलिए है कि भक्ति के मार्ग में घर-संसार, स्वजन-परिजन सब एक-एक करके खोते चले जाते हैं और अंत में हृदय में केवल भगवान बच जाते हैं ।मीरा के भाग्य में क्या है, रह सोचकर उनका मन काँप जाता ।इस संसार में भक्ति नहीं है और भक्ति में संसार वास नहीं करता ।मीरा को संसार में रहकर भक्ति साधनी है।
                               दादू की उम्र भी अस्सी वर्ष की थी और मीरा की चिन्ता भी रहती थी इस कारण वह अस्वस्थ रहने लगे।एक दिन प्रातः जब मीरा को पता चला कि दादू अधिक अस्वस्थ हैं, वह दादू की शय्या के पास पहुँची ।मीरा को देखकर उनकी आँखों में हल्की चमक आई , और उनके मुख से अस्पष्ट शब्दों में निकला -- 'मीरा'।मीरा रोने लगी कि माँ भी मुझे छोड़कर चली गई और अब तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगी ? दादू  के ओंठ हिले , उन्होंने कहा कि--" जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है।मुरली मनोहर तुम्हारा ध्यान रखेंगे।वही तुम्हारे सगे-सम्बन्धी होंगे।तुम उनको नहीं भूलना।वे तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।

दादू के साथ मीरा का संबन्ध भावनात्मक ही नहीं, आध्यात्मिक भी था। दादू को मीरा का कृष्ण के प्रति लगाव देखकर ऐसी अनुभूति होती थी कि --" मीरा भक्ति के क्षेत्र में किसी क्रान्ति को जन्म देने के लिए ही अवतरित हुई है।इसीलिए दादू ने जो मीरा को अन्तिम समय में जो कहा , वह था तो साधारण परंतु उसका प्रभाव व्यापक हुआ मीरा ने अब पूर्ण रूप से अपने मन में यह बात बिठा ली कि -
  "मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरा न कोई 
जाके सिर मोरमुकुट मेरो पति सोई।"

                        मीरा ने निश्चय कर लिया कि भगवान कृष्ण के अतिरिक्त न तो वह किसी को अपना मानेगी और न ही किसी और को समर्पित होगी।  मीरा कृष्ण के गीत गाती रहती।धीरे-धीरे मीरा और उसके कृष्ण, जैसे एक ही व्यक्तित्व हो गए।ऐसा लगा कि अब मीरा अविवाहित ही रहेगी, परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन वह समय भी आया , जब मीरा को विवाह के बंधन में बँधना पड़ा ।मेवाड़ की राजरानी मीरा  " वीरों के वीर राणा संग्राम सिंह की कुलवधू बनीं ।

विवाह के बाद उसके कृष्ण प्रेम में कोई कमी नहीं आई।घर - परिवार में उसका मन नहीं लगता ।वह हर समय अपने कृष्ण के ध्यान में ही रहती ।इस बात से नाराज होकर उसके ससुराल वालों ने उसको मारने की कई बार कोशिश की।कक्ष में जहरीला साँप छोड़ा, एक बार बिष का प्याला दिया । भक्त की रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भगवान की होती है।मीरा के सामने जितनी बार कष्ट आए , उतनी ही बार उनसे रक्षा के साधन भी।परिवार वालों ने
मीरा को भक्ति के मार्ग से विचलित करने के अनेक प्रयास किए।पर मीरा की भक्ति में कोई कमी नहीं आई। 

 मीरा ने कठिन समय में अपने दादू को बहुत याद किया। मीरा ने अपने मन की व्यथा संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी को लिख भेजी ।गोस्वामी तुलसीदास स्वयं भक्ति की परिभाषा थे ।उनका जीवन भगवान श्री राम की भक्ति और उनके प्रति अनन्य प्रेम की अभिव्यक्ति में गुजरा।तुलसीदास भक्ति की राहों से परिचित थे और उस राह पर मिलने वाले कष्टों से भी।तुलसीदास दास जी ने मीरा को उत्तर भेजा--
" जाके प्रिय न राम वैदेही ।तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जदपि परम सनेही ।

मीरा के लिए इतना उत्तर पर्याप्त था।उन्होंने घर- परिवार छोड़ दिया।मीरा का शेष जीवन कृष्ण भक्ति में ही बीता ।ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपना काफी समय वृजमंडल क्षेत्र में गुजारा।
वृज में उन्हें हर समय कृष्ण की निकटता की अनुभूति होती थी।
वृज का समूचा क्षेत्र, यहाँ के रज- कण , यमुना के जल-कण उन्हें बार-बार अपनी ओर खींचा करते थे।अब तो उन्हें यह भी समझ नहीं आता था कि वृज उनके मन में रमा है या उनका मन ही वृज में रम चुका है।

अक्सर ही वे अपनी भाव समाधि में कृष्ण के दर्शन करतीं।कभी कृष्ण के संग होली खेलतीं। यमुना किनारे बैठीं मीरा को यमुना के जल में अपना कृष्ण प्रेम प्रवाहित होता दीखता।वे भाव समाधि में डूब जातीं ।उनके साथ रहने वाली मीणल जानती थी कि रानी सा ( मीरा) समाधि में चली  जाती हैं, जहाँ वे अपने कान्हा के साथ होती हैं ।मीरा के इस समाधि सत्य को वह जानती थी।

जीव गोस्वामी परम विद्वान एवं महान तपस्वी थे।मीरा से मिलने के बाद उन्होंने सच्ची भक्ति का स्वाद चख लिया था।एक बार वे अपनी भाव-समाधि में कान्हा के संग होली खेल रही थीं ।तब जीव गोस्वामी जी ने पूछा --- " किन भाव अनुभूतियों में खोई हुईं थीं आप ?"  मीरा ने कहा -- बस अपने कान्हा के संग होली खेल रही थी।"  गोस्वामी जी ने कहा कि "यह तो बस आपके लिए ही संभव है।" इस पर मीरा ने कहा--" कि आपके लिए भी संभव है।देखिए वृजभूमि को , यहाँ की प्रकृति को ।उत्सव ही उत्सव है।नाद ही नाद है।सब तरह के साज बज रहे हैं ।पक्षियों में, पर्वतों में, वृक्षों में, सागरों में ।सब ओर  विभिन्न रूपों में कन्हाई होली खेल रहा है, कितने रंग औल गुलाल फेंक रहा है।वे गाने लगीं---
" होली खेलत है गिरधारी 
चंदन केसर छिड़कत मोहन , अपने हाथ बिहारी।

इस प्रकार मीरा वृज में अनेक बार भाव समाधि में  कृष्ण के साथ होतीं ।यह अनूठी अवस्था होती , उनका विरह मिलन में परिवर्तित होने लगता। बाद में वे द्वारका में भी रहीं । अन्त में उनकी आत्मा कृष्ण में समा गई।उन्होंने अपनी भक्ति के बल पर कृष्ण को पा लिया।

" हरि नाम में खुद को डुबाया, हरि गुण गाके प्रभु को पाया
      लोक लाज बिसराकर मीरा ,  हर पल तुम्हें पुकारे।"

भक्ति मार्ग की राह में मीरा ने स्वयं को सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ किया ; क्योंकि मीरा ने स्वयं को कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया था।जिस तरह प्रभु अनंत हैं, वैसे ही उनकी भक्ति के मार्ग अनंत हैं और उन अनंत मार्गों पर चलने वाले पथिक अनंत हैं लेकिन उन पथिकों के बीच यदि कहीं 'रत्न' चमकता है तो वह मीरा की भक्ति का ही है।मीरा की भावपूर्ण शब्दों से प्रारम्भ हुई वह यात्रा भक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर ही सम्पन्न हुई।

मीरा की वाणी सबके हृदय को इसलिए झंकृत कर सकी थी ; क्योंकि उसमें से हृदय के भाव , जीवन के प्रखर प्राण निस्सृत हो रहे थे।मीरा के गीत आज भी भावप्रवण हैं ।
 
"भक्ति भाव में हुई मतवाली, रंग गई मोहन में अलबेली
    चहुँ ओर छवि निरखै मीरा , हर पल तुम्हें पुकारे।"

 कृष्ण भक्त आज भी बड़ी भक्ति भाव से मीरा के पदों को गाकर कृष्ण की भक्ति करते हैं ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Wednesday, February 5, 2020

स्वास्थ्य---- ब्रह्म मुहूर्त में उठना ( प्रातःकालीन जागरण) क्यों है लाभदायक, बदलती आधुनिक जीवनशैली । जानें इस पोस्ट में---



       <<<<<ब्रह्म मुहूर्त में उठना लाभदायक >>>>>
ब्रह्म मुहूर्त यानी रात्रि के अन्तिम प्रहर या सूर्योदय से लगभग डेढ़ दो घंटे पहले का समय ।हमारी प्राचीन परम्पराओं में ' ब्रह्म मुहूर्त '
में उठने का समय तय किया गया है।हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवनशैली के सभी नियम स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए ही बनाए थे।प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है।

 हमारे शास्त्रों में भी ब्रह्म मुहूर्त में जागने को ही सही बताया है, तभी तो प्राचीन काल में ब्रह्म मुहूर्त में, गुरुकुलों में गुरुजन अपने शिष्यों को वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करवाते थे।ऋग्वेद के अनुसार-- जो मनुष्य सुबह जल्दी उठता है , उसकी आयु लम्बी होती है।ब्रह्म मुहूर्त में रजोगुण एवं तमोगुण की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए इस समय में बुरे मानसिक विचार भी शान्त हो जाते हैं ।

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार--- सुबह जल्दी उठने से हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं ।जिससे हमारी स्मरण शक्ति भी अच्छी बनी रहती है।अनेक शोध अध्ययनों ने यह भी प्रमाणित किया है कि ब्रह्म मुहूर्त के समय हमारा वायुमंडल काफी हद तक प्रदूषण रहित होता है।इस समय वातावरण में प्राणवायु ऑक्सीजन की मात्रा भी अधिक रहती है।

आयुर्वेद के अनुसार-- ब्रह्म मुहूर्त में प्रवाहित होने वाली वायु, चन्द्रमा से प्राप्त अमृत कणों से युक्त होने के कारण हमारे स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान होती है, यह वीरवायु कहलाती है।जब हम ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठते हैं, तो यही अमृतमयी वायु हमारे शरीर को स्पर्श करती है।इसके स्पर्श से हमारे शरीर में तेज, बल, शक्ति, स्फूर्ति एवं मेधा का संचार होता है, जिससे मन प्रसन्न व शांत होता है।इससे हमारे फेफड़ों की शक्ति भी बढ़ती है, जिससे रक्त शुद्ध होता है।यही कारण है कि इस समय की गई सैर और व्यायाम, योग और प्राणायाम हमारे शरीर को निरोगी रखते हैं ।

सुबह जल्दी उठना हमारे लिए किसी औषधि से कम नहीं है।इससे हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति ( इम्यून सिस्टम) मजबूत होती है जिससे हम बीमार नहीं पड़ते ।प्रातःकाल टहलने से शरीर में शक्ति का संचार होता है और शरीर कांतियुक्त हो जाता है।

प्रातःकाल पक्षी भी जाग्रत होकर चहचहाने लगते हैं ।इसके साथ विभिन्न तरह के पशु भी प्रातःकाल में ही अधिक सक्रिय रहते हैं , मानो हमें भी संदेश देते हैं- कि अब जाग जाओ।पशु- पक्षियों की नियमित दिनचर्या उन्हें स्वस्थ व सक्रिय बनाए रखती है और हमें भी यह प्रेरणा देती है कि प्रकृति के नियमों का पालन किया जाए।

 सूबह जब व्यक्ति प्रातःकालीन उगते सूर्य का दर्शन करता है , अर्ध्य समर्पित करके सद्प्रार्थनाएँ करता है , तो मन में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होती है  और सूर्य की स्वर्णिम किरणें भी व्यक्ति के शरीर व अंतर्मन में प्रवेश कर उसे लाभान्वित करती हैं ।प्रातःकालीन सूर्योदय व उसके पूर्व- पश्चात का समय आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी उपयुक्त होता है, इसीलिए  हमारी संस्कृति में सुबह के समय जप, पूजा, ध्यान, प्राणायाम व व्यायाम का बहुत महत्व है।

यदि हम रामायण पढें, श्री मद्भागवत महापुराण पढें तो इन शास्त्रों के अनुसार--  ईश्वर रूप श्रीकृष्ण व श्री राम भी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जप, ध्यान एवं सूर्योपासना आदि किया करते थे।

<<<<<< बदलती आधुनिक जीवनशैली >>>>>>

आज की बदलती जीवनशैली में हम देर से सोने और देर से उठने को ही आधुनिक जीवनशैली का एक हिस्सा मानने लगे हैं ।हमेशा से ही जल्दी सोना और जल्दी उठने को ही महत्व दिया गया है।इसके विपरीत देर से सोना और देर से उठना , ये दोनों ही आदतें स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं हैं ।

                        आधुनिक जीवन में अनेक कारण ऐसे भी हैं, जिनकी वजह से व्यक्ति चाहकर भी जल्दी सो नहीं सकता।महा नगरों में दूर-दूर काम पर जाना, रात्रि के समय में नौकरी करना।शहरों में तो आजकल देर रात पार्टियाँ बहुत होने लगी हैं, जिनके कारण न तो लोग जल्दी सो पाते और न उठ पाते।इसके अलावा अनेक ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से जीवनशैली अप्राकृतिक हो  गई है ।

  अप्राकृतिक जीवनशैली के कारण रोगों में भी वृद्धि हो रही है ।देर से सोना और देर से उठने के कारण खान-पान भी व्यवस्थित नहीं रह पाता। देर रात भोजन ग्रहण करने से पाचन क्रिया भी मंद पड़ जाती है ।आजकल बहुत कम उम्र में ही लोग अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं । कभी-कभी किसी कारणवश देर तक जागना और उठना , इतना नुकसानदेह नहीं होता लेकिन इस क्रम को हम अपने जीवन में निरंतर के क्रम में शामिल कर लें तो इसके विपरीत परिणाम भी भुगतने पडेंगे।

आजकल हमारे देश में देर से उठने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है।कारण चाहे जो भी हों, सुबह देर से उठना एक तरह से लोगों ने अपना अधिकार समझ लिया है।आज की जीवनशैली में पहले टीवी और अब मोबाइल फोन पर इंटरनेट एक बहुत बड़ा कारण है।लोग देर रात तक इनमें व्यस्त रहते हैं, बडों की देखा- देखी बच्चे भी देर तक जगते हैं ।यह सब देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले 10 - 15 सालों में भारत के घरों में सुबह जल्दी उठने वाले लोग कम ही रहेंगे।
 
  आजकल विदेशों ने  हमारे देश की ऋषि-मुनियों की परम्परा ( वैदिक परम्परा) का महत्व समझ लिया है और वे इन परम्पराओं का पालन करके स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं लेकिन हम भारतीय अपनी वैदिक परम्पराओं से दूर होते जा रहे थे।  गत कुछ वर्षों से हमारे देश में योग क्रान्ति शुरु हुई है तब से हम भारतीयों ने अपनी योग पद्धति का महत्व समझना शुरू किया है और अब बहुत से भारतीय ब्रह्म मुहूर्त में उठकर योग - ध्यान आदि यौगिक क्रियाओं के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ उठा रहे हैं ।

समय रहते हम सभी को प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व समझ लेना चाहिए । बच्चों में भी जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत अभी से डालें ।हमारी संस्कृति के अनुसार प्राकृतिक जीवनशैली हमारे स्वास्थ्य के लिए वरदान है।अब से हम कोशिश करें- - जल्दी सोने और ब्रह्म मुहूर्त में उठने की।

 उठ जाग मुसाफिर भोर भई ,अब रैन कहाँ तू सोवत है।
जो  सोवत  है सो  खोवत है ,  जो जागत है सो पावत है ।।


  

Tuesday, February 4, 2020

संगीत- भारतीय संस्कृति और संगीत, मधुर संगीत की सामर्थ्य एवं संगीत चिकित्सा

                          <<<<< संगीत >>>>>
संगीत का मानव जीवन को सरस बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।हम सभी के जीवन में संगीत किसी न किसी रूप में विद्यमान है ।संगीत की ध्वनि सभी के मन को तरंगित करती है।एक नन्हा बच्चा भी मधुर संगीत को सुनकर आनंदित होकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।कुछ लोग मनोरंजन के लिए संगीत सुनते हैं कुछ स्वयं को तनावमुक्त करने के लिए तो कुछ लोग अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए संगीत का सहारा लेते हैं ।

मानव की कोमल भावनाओं को झंकृत, तरंगित करने में और उसमें देवत्व का उदय करने में गायन- वादन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।प्रकृति के विभिन्न जीवों के स्वर में, बहती हुई नदियों के कल-कल में, बहने वाली हवाओं की लहरों में प्राकृतिक संगीत ही तो है। हमरी प्रकृति में सब ओर संगीत ही संगीत है।जिसका हम आनन्द लेते हैं ।

प्रोफेसर जी.एन.रामचन्द्रन के अनुसार विज्ञान, आध्यात्म, साहित्य और संगीत एक ही परम तत्व के विभिन्न नाम हैं ।संगीत पूजा है, संगीत आराधना है,संगीत ईश्वर से मिलने का साधन है एवं संगीत आत्मसाक्षात्कार का साधन है। संगीत के स्वर को नाद कहते हैं ।कोई भी उत्सव हो संगीत के बिना अधूरा है।

गायन नर्तन देखने में सुख है, पर जो सुख स्वयं गायन एवं नर्तन से है- उस सुख और आनन्द का क्या कहना ; क्योंकि स्वयं के भीतर हो रहे गायन की अनुभूति ही कुछ और है। संगीत जब आत्मा से उठता है , उसमें अद्भुत आकर्षण होता है और यह आकर्षण किसी भी जीव की आत्मा को आकर्षित करने में समर्थ है।संगीत के सात सुरों में अनोखा जादू है।सात स्वरों में ही ब्रह्माण्ड का समूचा संगीत समाया हुआ है।
"सुर के बिना अधूरा जीवन, सात सुरों की है अगणित धुन "

संगीत की देवी माता सरस्वती है।किसी उत्कृष्ट कलाकार की प्रस्तुति से प्रभावित होकर मन अनायास ही बोल उठता है, कि इस पर माता सरस्वती की महान कृपा है ।आध्यात्मिक साधक भक्ति भावना से ईश्वर के साथ एकाकार की अनुभूति करते हुए माँ शारदे से विनती करता है---
सुर को ईश्वर से मिला दे, शारदे माँ शारदे 
प्रेम की    वीणा   बजादे, शारदे माँ शारदे 

<<<<< भारतीय संस्कृति और संगीत >>>>>

भारतीय संस्कृति के समानांतर, संगीत विधा भी अति प्राचीन है।
संगीत के जनक भगवान शिव माने जाते हैं ।भगवान शिव का डमरू संगीत का , जाग्रति का एवं प्रसन्नता का प्रतीक है ।आर्ष वांग्मय में सर्वप्रथम नाद रूप में इसका उल्लेख हुआ है नाद का अर्थ है-- ध्वनि या स्वर।सामवेद तो संगीत का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

 भारतीय संगीत की आत्मा-- राग रागनियों के निर्माण के पीछे व्यक्ति में अन्तर्निहित सूक्ष्म शक्तियों, भावनाओं और विशिष्टताओं एवं ।हृदय के प्रत्येक तार को झंकृत करने का सिद्धांत हुआ करता था।संगीत में अपरिमित शक्ति सामर्थ्य है।मीरा ने , चैतन्य महाप्रभु ने , नरसी मेहता व अन्य भक्तों ने संगीत के बल पर ही भगवान से एकाकार की अनुभूति की।

 सामूहिक गान व संकीर्तन द्वारा वातावरण में सौम्यता , सात्विकता और शान्ति उत्पन्न होने को प्रमाणित किया जाता है।अक्सर हम देखते हैं कि हमारे देश  के आध्यात्मिक व धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों में जब भक्त जन आदरणीय संत जनों के साथ संकीर्तन की मधुर ध्वनि में डूब जाते हैं तो वातावरण में अद्भुत शान्ति छा जाती है ।

 स्वर तरंगें संगीत का रूप लेकर जीवनदायनी सामर्थ्य उत्पन्न करती हैं ।हमारी संस्कृति में मंत्र जप का अत्यन्त महत्व है  और जब हम इन मन्त्रों का सस्वर अर्थात संगीत के साथ जाप करते हैं तो ये और भी प्रभावशाली हो जाते हैं ।संगीत ने तो इस पृथ्वी को ही स्वर्ग बना दिया है।संगीत से जीवनीशक्ति , संकल्प शक्ति और आत्मशक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि होती है ।
 
हमारे भारत के तीर्थ स्थलों में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से लेकर रात्रि तक संगीत की सुमधुर लहरियाँ सदैव गुंजायमान रहती हैं ।तीर्थ स्थानों में  श्रीरामायण पाठ, श्री मद्भागवत महापुराण के पाठ, भजन , आरतियाँ आदि चलते ही रहते हैं ।सभी संगीत प्रधान हैं ।
 विदेशी लेखकों, कवियों, एवं संगीतकारों सभी ने भारतीय संगीत की प्रशंसा की है।

संगीत हमारे जीवन , धर्म, संस्कृति और वैभव की अमूल्य विरासत है।आधुनिकता के प्रभाव में भारतीय संगीत का मौलिक स्वरूप एवं लक्ष्य अनेक भ्रान्तियों से ग्रस्त दिखाई देता है।आज के समय में संगीत का भी व्यापक व्यापार शुरु हो गया है।शब्द बिकते हैं, धुनें बिकती हैं और आवाज़ भी बिकती है।ईश्वर प्रदत्त स्वर को भी मनुष्यों ने धन कमाने का साधन बना लिया है।
 
भगवान श्री कृष्ण का बाँसुरी बजाना , गोपियों के संग नाचना-- यह सब संगीत का महत्व ही तो प्रतिपादित करता है।हमारे देश के अनेक संगीत कलाकार विदेशों में जाकर भी अपनी सुन्दर संगीत कलाओं का प्रदर्शन करके भारतीय संस्कृति का मान बढ़ाते हैं ।

भारतीय मनीषियों द्वारा प्रतिपादित यह तथ्य पूर्णतया सत्य ही है कि भारतीय संगीत में प्राणिजगत को प्रभावित करने की असीमित क्षमता विद्यमान है।भारतीय संगीत में गूढ़ रहस्य समाए हुए हैं ।आज भारतीय संगीत के माध्यम से विश्व संस्कृति को मूल्यों का शिक्षण और जीवन जीने की नई विधा का पोषण किया जा रहा है।

भारतीय संस्कृति के विश्व व्यापी प्रसार में संगीत की महती भूमिका है।भारतीय सांस्कृतिक चेतना का उत्थान संगीत द्वारा किया जा सकता है।

         <<<<< मधुर संगीत की सामर्थ्य >>>>>

मधुर संगीत की लहरें  का शरीर, मन व भाव संस्थान पर अच्छा असर डालती हैं ।शोधकर्ताओं की मान्यता में नादयोग ( स्वर योग)
विश्रान्ति का एक प्रमुख घटक साबित होता है।आध्यात्मिक साधनाओं में ॐकार साधना या सस्वर मंत्र जाप इस तथ्य के उदाहरण हैं ।जब हम ॐ का श्रद्धा भावना से दीर्घ जप या किसी  अन्य  मंत्र का सस्वर जप करते हैं तब परम शान्ति का अनुभव करते हैं ।
 
मधुर संगीत का समूचे वातावरण पर असर  पड़ता है ।संगीत से वृक्ष- वनस्पतियों, फसलों और पशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव को अब सर्वत्र वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है।नाद (स्वर) की लहरियाँ मनुष्य के मस्तिष्क हृदय एवं स्नायु तंत्र पर आश्चर्य जनक प्रभाव डालती हैं ।यह प्रसुप्त निष्क्रिय माँस-पेशियों को जाग्रत व सक्रिय करती हैं ।शान्ति का वातावरण प्रदान करती है।

वैज्ञानिक वी.वी. गार्डनर ने अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति " म्यूज़िक थेरेपी " में लिखा है कि संगीत का प्रभाव नाड़ी तन्त्र , श्वास- प्रश्वास, रक्तदाब एवं अंतःस्रावी ग्रन्थियों पर पड़ता है।आज हमारे देश की हजारों शब्द-रचनाओं को मनीषियों व संगीतज्ञों द्वारा विभिन्न स्वरों से सजाया गया है। दिनों दिन और भी नई- नई धुनें बनती रहती हैं ।सुनियोजित संगीत का प्रभाव गायक के शरीर व मन पर पड़ता है ।सुनने वाले भी भावतरंगित होकर हर्षोल्लास का अनुभव करते हैं ।

  संगीत का मतलब ही है कि, ऐसी धुन या लहर , जो कर्णप्रिय हो, लय में हो , स्वरयुक्त व मधुर हो और मन को भाए ।संगीत का स्वास्थ्य पर प्रभाव भी बहुचर्चित है।संगीत शास्त्र में शरीर- मन की विभिन्न अवस्थाओं को प्रभावित करने के लिए विभिन्न राग-रागनियों का निर्धारण है।प्रयोगों में पाया गया कि  द्रुतिगति व तीव्र स्वर से बजती धुनों के प्रयोग से निम्न रक्तचाप वाले रोगियों तथा हल्के स्वर में बजती धुनों से उक्त रक्तचाप वाले वाले रोगियों को लाभ होता है।

संगीत भावनात्मक आवेग को भी नियंत्रित रखता है।संगीत से मानसिक रोगों को भी ठीक किया जा सकता है।संगीत के माध्यम से थाॅइराइड ग्रन्थि से होने वाले थाॅयरोक्सिन नाम हार्मोन के स्राव को भी नियंत्रित किया जा सकता है ।संगीत सुनते समय मन में स्फूर्ति आती है तथा रक्त में उपस्थित कार्टिसोल हाॅर्मोन का स्तर घट जाता है, जिससे तनाव में कमी आती है तथा मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
 
तानसेन ने दीपक राग गाकर दीपक जलने का चमत्कार दिखाया और मेघमल्हार गाकर वर्षा होने का चमत्कार दिखाया।वर्तमान संगीत इस प्रकार के चमत्कार नहीं दिखा सकता ।

<<<<< संगीत चिकित्सा >>>>>

संगीत द्वारा चिकित्सा की बात उतनी ही पुरानी है, जितना कि संगीत स्वयं है।सामवेद में रोगों के निवारण के लिए राग-गायन का विधान मिलता है।अश्विनी कुमार के भैषज तंत्र में प्रत्येक रोग के लिए चार प्रकार के भैषज कहे गए हैं -- पवनौकस, जलौकस, वनौकस एवं शाब्दिक ।यहाँ शाब्दिक भैषज का तात्पर्य है-- मंत्रोच्चारण एवं लयबद्ध गायन।

कुर्णक प्रभा एवं मैंद ऋषि द्वारा रचित -- शब्द कुतूहल में रोगी के शब्द से रोग निदान , शाब्दिक औषधि , वीणा तंत्री, पणव, शंख, भेरी, मृदंग, मंजीर , वंशी आदि वाद्ययंत्रों को भैषज से ही बनाने और उनको सुनाकर रोगापहरण का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है ।प्रत्येक रोग के लिए पृथक-पृथक वाद्यों के शब्द और कौन किसके लिए उपयुक्त है, आदि का उल्लेख किया गया है ।

अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार शास्त्रों में वर्णित संगीत की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि अब इसे विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है।

                            वर्तमान समय में जाने-माने चिकित्सक भी संगीत की महत्ता को स्वीकारने लगे हैं , 2014 में संगीत उपचार पद्धति का पहला शब्दकोष आया है, जिसे प्रसिद्ध संगीत शास्त्री टी.वी.साईराम ने तैयार किया है।संगीत उपचार पद्धति पर वर्षों से काम कर रहे डाॅक्टर साईराम का कहना है कि संगीत का मन पर असाधारण प्रभाव पड़ता है।अगर सही निदान कर उपयुक्त स्वर लहरियों का व्यक्तियों के लिए चयन कर उन्हें सही तरीके से सुनाया जाए तो उन्हें  सभी प्रकार के मनोरोगों से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

  प्राचीन काल में भिन्न-भिन्न  रोगों के लिए भिन्न-भिन्न राग- रागनियों का निर्धारण था।जैसे-- मानसिक अस्थिरता एवं क्रोध शमन के लिए ' राग मल्हार', श्वास सम्बन्धी समस्या, खाँसी, दमा, तपेदिक आदि में राग 'भैरव' , रक्त अशुद्धि की स्थिति में राग 'आसावरी' तथा मेदा', यकृत- प्लीहा वृद्धि में राग हिंडोल', का प्रावधान था।संगीत की स्वर लहरियाँ व्यक्ति को तनाव मुक्त करती हैं ।राग-रागनियाँ विविध मनोदशाओं के द्योतक होते हैं और इसी कारण वे अपनी भावदशा के अनुरूप व्यक्ति में रसानुभूति का संचार कराने में समर्थ होते हैं ।

         संगीत में शरीर, मन और आत्मा को बलवान बनाने एवं निरोगता प्रदान करने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं ।इसी कारण चिकित्सा जगत में इसका मान्यता मिल रही है।रूस का क्रीमिया स्वास्थ्य केंद्र भी संगीत उपचार के लिए प्रसिद्ध है ।यहाँ पर मानसिक रोगों का सफलता पूर्वक संगीतोपचार किया जाता है।इसके प्रभाव से हिंसक प्रवृत्तियों का भी शमन किया जाता है ।

                         पिट्सबर्ग अमेरिका में आर फोर आर अर्थात, रिकार्डिंग फाॅर रिलेक्सेशन , रिफ्लेक्शन , रिस्पाॅन्स एंड रिकवरी नामक संस्था है , जिसमें संगीत के माध्यम से रोगियों का उपचार किया जाता है ।इसके संस्थापक हैं--- सुप्रसिद्ध वायलिन वादक लारेन्स और उनकी पत्नी ग्रेश्चेन। इस संस्था ने अब तक यूरोप अमेरिका में फैली अपनी शाखाओं द्वारा अनेक रोगियों का सफल उपचार किया है।विश्वभर में फैली संगीत चिकित्सा की इन शाखाओं का संचालन न्यूयॉर्क में बने एक आश्रम से होता है।यह संगीत चिकित्सा का शोध केंद्र भी है।

वस्तुतः संगीत में असाधारण जीवनदायी सत्ता विद्यमान है ।यदि उसका सम्यक उपयोग किया जा सके तो मानव चेतना  प्रगति- पथ पर अग्रसर हो सकती है।
  
सत्य ही है ---  मधुर  संगीत में जादुई सामर्थ्य है ।जो हमारे मन को प्रसन्न रखती है ।आजकल इसका चिकत्सा जगत में भी प्रयोग हो रहा है।हम सभी के जीवन में सदा संगीत की स्वर लहरियाँ गूँजती रहें ।हम सदा प्रसन्न होकर गाते रहें, गुनगुनाते रहें ।
   " संगीत जिसे सारे जग ने, अपने सुख की भाषा मानी "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।
 





Monday, February 3, 2020

श्री कृष्ण जन्माष्टमी- श्री कृष्ण के विविध रूप


            ●●●●● श्री कृष्ण जन्माष्टमी ●●●●●
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात्रि बारह बजे मथुरा के कारावास में  वसुदेव और देवकी के पुत्र  श्री कृष्ण का अवतार हुआ। रोहिणी नक्षत्र का समय था। चारों दिशाओं में शुभ संकेत हो रहे थे।सुहानी हवा बहने लगी,पक्षी भी खुश होकर चहचहाने लगे ।बागों में सुन्दर फूल खिल रहे थे।क्योंकि जग के पालनहार पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।देवता भी प्रसन्न होने लगे।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सदियों से भारतवर्ष में मनाई जा रही है।यह अष्टमी कई अर्थों को स्वयं में समेटे हुए लोगों के जीवन में उत्साह का संचार करती है।भगवान का जन्म अष्टमी के दिन हुआ यानी वे आध्यात्मिक और भौतिक संसार, दोनों में संपूर्ण थे।वे दिखने में जितने सुन्दर थे , उनके अन्दर उतना ही सुन्दर ऐश्वर्य था।

शास्त्रानुसार यह मान्यता है कि  जब मथुरा का राजा  कंस अपनी बहन  देवकी को विदा कराके ले जा रहा था तभी आकाश वाणी हुई कि "जिस बहन को तू विदा करने जा रहा है उसी की आठवीं सन्तान तेरा काल बनेगी । कंस यह सुनकर डर गया, इस डर से कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया था और जब भी देवकी की कोई सन्तान जन्म लेती , वह उसको मार देता।लेकिन जब कृष्ण के रूप में देवकी की आठवीं सन्तान हुई तो रात्रि में ही चुपचाप वसुदेव कृष्ण को नन्दगाम जाकर यसोदा के घर छोड़ आए और यसोदा के गर्भ से  उत्पन्न हुई कन्या को ले आए।कंस ने उस कन्या को भी मार दिया और वह अब निश्चिंत हो गया , कि मैंने देवकी की आठवीं सन्तान को भी मार दिया ।लेकिन ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। ईश्वर जब अवतार लेते हैं तब अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए ही लेते हैं ।
आज ब्रह्म यसोदा घर आया, यसोदा के मन आनन्द छाया ।
सब कहें यसोदा धन्य हुई, वृज में अति जयजयकार हुगई
देवों ने पुष्प को बरसाया, यसोदा के मन आनन्द छाया ।
 
 कृष्ण जैसी सुन्दर सन्तान पकर माता यसोदा और नन्द बाबा तो अपार खुशी से झूम उठे। उन्होंने कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया ।ब्राह्मणों को व वृजवासियों को खूब दान दिया ।कृष्ण जन्म की खुशी में पूरे वृजमंडल में बहारें छा गईं ।वे सभी कृष्ण के दर्शन करने नन्द महल आते और दर्शन पाकर खुशी से फूले न समाते ।सारा जगत जानता है कि वृजमंडल में भगवान श्री कृष्ण ने विविध प्रकार की लीलाओं से वृजमंडल को धन्य किया।

कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ दिवस पर पूरे देश में वृत- उपवास किए जाते हैं । भजन संध्या का आयोजन होता है । मन्दिरों में अनेक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ।आधी रात को बारह बजे तक श्रद्धालु मन्दिरों में भगवान के जन्मोत्सव के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं ।कुछ लोग तो रात्रि के बारह बजे के बाद मन्दिर का प्रसाद ग्रहण करके ही आहार ग्रहण करते हैं ।इस दिन मन्दिरों
को विशेष सजाया जाता है।

आजकल तकनीकी युग है, देश के सभी बड़े कृष्ण मन्दिरों से सीधा प्रसारण भी किया जाता है ।श्रद्धालु रात्रि के बारह बजे भगवान के दर्शन घर से भी कर सकते हैं ।सनातन संस्कृति में इस पर्व पर घरों में भी विशेष पूजा की जाती है।शहर व गाँव के हर मन्दिर को इस दिन सजाया जाता है।रात्रि को सभी मन्दिरों में भारी भीड़ होती है।कुछ श्रद्धालु इस दिन मथुरा जाकर भगवान के दर्शन करते हैं ।सभी भगवान का जन्मदिन बड़ी प्रसन्नता व दिव्य भावों के साथ मनाते हैं ।

 <<<<< श्री कृष्ण के विविध रूप >>>>>

                         भगवान श्री कृष्ण ने इस धरा पर अवतरित होकर अपने विविध रूपों से संसार का परिचय कराया।कृष्ण अपने में सर्वस्व हैं ।सब कुछ कृष्ण में समाहित है।कृष्ण शब्द का सामान्य अर्थ है - अत्यन्त आकर्षक अर्थात जो सबको अपनी ओर आकर्षित करे।कृष्ण का एक अर्थ है - श्याम रंग।कृष्ण एक दर्शन हैं ।कृष्ण द्रष्टा भी हैं और दृश्य भी।कृष्ण प्रेम हैं, प्रेम के रस हैं ।कृष्ण सौन्दर्य हैं और सौन्दर्यानुभूति भी।कृष्ण अपने आप में एक दिव्य एवं पावन अनुभूति हैं, जिस अनुभूति को हर कोई अपने-अपने ढंग से अनुभव करता है।

सांसारिक रूप से कृष्ण देवकी- वसुदेव के आठवें पुत्र हैं, नंद - यसोदा के पोषित पुत्र हैं ।वे बलराम के छोटे भाई, महाराजा उग्रसेन के दौहित्र, रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के प्रिय पति हैं । वृषभानु दुलारी राधा के प्रियतम हैं, 
गोप- गोपियों, ग्वाल- बालों, अर्जुन एवं द्रोपदी के सखा हैं ।

                                 कृष्ण एक हैं, उनके रूप अनेक हैं ।श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं ।उन्होंने माखन भी चुराया।गायों को भी वन में चराया।कृष्ण ने बाँसुरी के मधुर स्वर से वृजवासियों को मोहित किया।वृज गोपियों के साथ रास रचाया ।कृष्ण ने तरह- तरह की बाल- लीलाओं से माता यसोदा और नन्द बाबा को ब्रह्मानंद समान सुख पहँचाया। कृष्ण का व्यक्तित्व रंगारंग मयूरनी जैसा है ,जिसमें अनेक रंग समाहित हैं ।कृष्ण अपने सम्पूर्ण ईश्वरत्व को विसर्जित कर राधा भाव में स्थित होते हैं ।कृष्ण अखंड, अव्यक्त,शाश्वत प्रेम की स्थापना करते हैं ।कृष्ण को शब्द में उतार पाना कैसे संभव हो सकता है , परन्तु उनकी कृपा दृष्टि से सब कुछ संभव है।
  
कृष्ण का जीवन जितना बाहर दिखता है , उससे कहीं अनंत गुना अदृश्य में व्याप्त है ।वे विराट हैं, अनंत हैं, किसी में न समा पाने वाले हैं ।दृश्य तो उस अदृश्य की एक लीला मात्र है।कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं, जहाँ सब कुछ पूर्ण है, दृश्य भी पूर्ण है और अदृश्य भी पूर्ण है।वे अणु में भी व्याप्त हैं और विराट में भी व्याप्त हैं ।कृष्ण एक टेर हैं, प्रार्थना हैं ।जो जिस रूप में उन्हें पुकारता है, उसी रूप में वे प्रकट होकर वे उसको कृतार्थ करते हैं ।

 कृष्ण बाँसुरी के दिव्य स्वर में संगीत के मधुर स्वर बनकर झरते हैं तो पांचजन्य के उद्घोष से महाभारत के महायुद्ध का आरंभ करते हैं ।कृष्ण विनाश के भीषण स्वर में समाहित हैं और विकास के स्वर्णिम सूर्य बनकर प्राची से उदीयमान होते हैं ।कृष्ण सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं , अंतर मात्र अनुभव का है।
 
कृष्ण के साकार स्वरूप को सगुण प्रेम के रूप में  चैतन्य महाप्रभु, मीरा तुकाराम कृष्ण ने  अपने प्रेम से जगाया।मीरा प्रेम में मतवाली होकर  हर पल कृष्ण को पुकारने लगी तो कृष्ण मीरा के सामने संपूर्ण रूप में खड़े थे।चैतन्य कृष्ण कीर्तन करने लगे ।कृष्ण तुकाराम की भक्ति के वश में होकर तुकाराम के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते थे।कृष्ण संपूर्ण प्रेम के प्रतीक हैं ।जो कृष्ण को प्रेम करेगा , कृष्ण उसे मिलेंगे।

कृष्ण एक साथ कई आयामों में कुशलतापूर्वक कार्य करते हैं ।वे माता यसोदा का पयपान करते हुए भी आनंदित रहते हैं और यमुना में कालिया नाग के फन पर नृत्य भी करते हैं ।वे परंपरा के अनुसार नहीं , बल्कि परंपराएँ उनके अनुसार निर्मित होती हैं ।कृष्ण इन्द्र का मान भंग करने के लिए गोवर्धनलीला करते हैं ।कृष्ण कभी  मिट्टी खाते हैं , मुँह खोलते हैं तो माता को ब्रह्माण्ड के दर्शन कराते हैं ।कृष्ण कभी ओखल से बँध जाते हैं ।

   कृष्ण ने गांधारी के शाप को जिस गौरव व शालीनता से आशीर्वाद रूप में वरण करते हैं उससे स्वयं गांधारी भी करुणाद्र हो उठती है।कृष्ण अपने आँसुओ से  मित्र सुदामा के पग पखारते हैं ।दुर्योधन के मिष्ठान्न छोड़कर विदुर के घर साग ग्रहण करने में आनंदित होते हैं ।भरी सभा में जब द्रोपदी का अपमान होता है तो उसका चीर ( वस्त्र) बढ़ाते हैं ।कृष्ण के भाई ने हल चलाया और कृष्ण ने गौ पालन किया --- यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा भारतीय समाज को दिया गया भौतिक उन्नति का मूल मंत्र है।

  श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं ।उनका व्यक्तित्व उत्कृष्टता का पर्याय है।कृष्ण के विविध रूप हैं उन्होंने संसार के लोगो को नए ढंग से जीवन जीना सिखाया है।संघर्षों में भी उन्होंने मुस्कराना नहीं छोड़ा ।श्री कृष्ण की पूर्णता और पारंगतता अद्भुत थी।श्री कृष्ण का समूचा जीवन सांसारिकता और आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
         सादर अभिवादन व धन्यवाद ।