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Monday, April 13, 2020

गुरू पूर्णिमा ( व्यास पूर्णिमा) भारतीय संस्कृति में गुरु का महत्व, शिष्यत्व का अर्थ, गुरू व शिष्य का मिलन

     ●●●●● गुरु पूर्णिमा, ( व्यास पूर्णिमा) ●●●●●
                   आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया जाता है । गुरु पूर्णिमा सद्गुरु की पूर्णता की अनुभूति का महोत्सव है।आकृति में वे भी हम सब की भाँति सामान्य लगते हैं, परंतु उनकी प्रकृति सदा ही दैवी और दिव्य होती है।गुरू पूर्णिमा के दिन गुरुचेतना अंतरिक्ष में सघन होकर शिष्यों के अंतस में बरसती है।गुरू पूर्णिमा अपने प्रभु के स्मरण एवं समर्पण का महापर्व है।इस अवसर पर शिष्य अपने अधूरेपन को , अपने अनगढ़ जीवन को पूर्णता में समर्पित करता है और सद्गुरु भी अपनी पूर्णता शिष्य में उढ़ेलता है ।यही मधुर पल-क्षण होते हैं गुरू पूर्णिमा महोत्सव के, जिन्हें शिष्य एवं सद्गुरु की चेतना समन्वित रूप से मनाती है।

इस पावन धरा पर इसी दिन  ऋषि भगवान वेद व्यास का अवतरण हुआ था।भगवान वेद व्यास ने ज्ञान के प्रकाश को प्रचारित- प्रसारित किया ।एक द्वीप में उनका आविर्भाव हुआ था, इसलिए उन्हें द्वैपायन भी कहते हैं ।उन्होंने वेद का वर्गीकरण कर चार भागों में विभक्त किया ।उन्होंने वेद के अखंड एवं एकांत ज्ञान का सरलीकरण करके उसको चार भागों में ( ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेद के रूप में) ज्ञान को वर्गीकृत किया।वेद का अर्थ ज्ञान होता है।

भगवान वेद व्यास को गुरु के रूप में वरेण्य किया जाता है ; क्योंकि उन्होंने सबके अंतर में आवृत अज्ञान को , अंधकार को मिटाकर ज्ञान का आलोक फैलाया ।गुरु स्वरूप भगवान वेद व्यास ने इस अपौरुषेय एवं अप्रतिम ज्ञान को प्रकाशित किया ।ज्ञान के मूल स्वरूप को सर्वसामान्य के मध्य प्रसारित किया, इसलिए उनको भगवान वेदव्यास कहा जाता है और उनके जन्मदिवस को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है ।

वेदव्यास जी ने वेदों के अलावा अठारह पुराण , महापुराण और ब्रह्मसूत्र आदि आर्ष ग्रंथों का सृजन किया-- जो संपूर्ण मानवता के लिए पथ प्रदर्शन का कार्य करते हैं ।भगवान वेदव्यास ने ज्ञान के दिव्य प्रकाश को सबके अंतर में प्रज्ज्वलित किया ।इसलिए गुरू के रूप में उनका वंदन किया जाता है ।शिष्य की जडवत् चेतना को पारस बनाने का कार्य गुरु के करुणामय एवं स्नेहिल हाथों से होता है।

गुरु को साक्षात् परब्रह्म का स्वरूप माना जाता है ।भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य के संबंध को सर्वश्रेष्ठ एवं दिव्य संबंध कहा गया है। गुरु पूर्णिमा के आगमन का अनुभव कुछ ऐसा अजब होता है कि शिष्यों के मन को बरबस सद्गुरु की चेतना की ओर खींच लेता है।गुरु कृपा भी इस अवसर पर सद्विचार, सद्विवेक, एवं सद्ज्ञान बनकर अवतरित होती है।शिष्य के समर्पण के अनुरूप गुरु की चेतना उसके जीवन में बोध बनकर प्रकट होती है।समर्पण जितना समग्र होता है , बोध उतना ही संपूर्ण होता है।

जिस तरह से शिष्य ढूँढता है सद्गुरु को , ठीक उसी भाँति सद्गुरु भी खोजते हैं अपने सत्पात्र शिष्य को। सच्चे शिष्य अपने आराध्य की परिचेतना की उस अपूर्व वृष्टि को अनुभव करते हैं और कृतकृत्य होते हैं ।गुरु की स्मृति मात्र से ही शिष्य की आँखें छलक उठती हैं , भाव भीगने लगते हैं ।गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है , अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चलता है और मृत्यु से मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

       ●●● भारतीय संस्कृति में गुरु का महत्व ●●●

भारतीय संस्कृति में गुरु की महिमा अवर्णनीय एवं अपरंपार है ।गुरु ज्ञान का प्रकाश पुंज है ।गुरु सबसे पहले होता है , माता-पिता तो उसके पश्चात होते हैं ।गुरु स्वयं वेद के समान होता है।वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है ।ज्ञान की कोई सीमा नहीं है ।ज्ञान अनंत है, इसका कोई अंत नहीं है।वेद का ज्ञान गुरु कृपा से ही पाया जा सकता है ।

गुरु ज्ञान का दिव्यपुंज है, ऊर्जा का स्वरूप है, करुणा और दया का स्रोत है।गुरु हमारी चेतना को परिष्कृत एवं परिमार्जित करता है और उसे दिव्य व पावन बनाता है।गुरु हमारे अन्दर आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करके, सत्य से, शिव से साक्षात्कार कराता है।गुरु ही आत्मचेतना को विकसित कर परमात्मचेतना में विलय- विसर्जन करने के लिए शिष्य को समग्र रूप से तैयार करता है।

अमूर्त ब्राह्मी चेतना जब रूपाकार होती है तो वह सद्गुरु के रूप में मूर्त होती है। शिष्य तो अमूर्त की कल्पना नहीं कर सकता है ।वह तो सहज- सरल साकार स्वरूप की कल्पना कर सकता है ।समस्त मानवता से प्रेम करना संभव नहीं है उसके लिए ।इसलिए शिष्य मूर्त रूप से गुरु को समर्पण करता है और सद्गुरु उसे समष्टि चेतना के स्वरूप परमात्मा तक पहुँचा देता है।

             ●●●   शिष्यत्व का अर्थ ●●●

शिष्यत्व का अर्थ है-- एक गहन विनम्रता ।शिष्य वही है, जो अपने को झुकाकर स्वयं के हृदय को पात्र बना लेता है। शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है , जिसका एक ही अर्थ है-- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन ।शिष्य तो वह है , जो जीवन के तत्व को सीखने के लिए तैयार व तत्पर है ; इसके सत्य को समझने के लिए प्रतिबद्ध है।शिष्य का मन लालसाओं के लिए नहीं ललकता, उसकी चेतना कामनाओं के लिए कीलित नहीं होती।

शिष्य यथार्थ में जिज्ञासु होता है और अपनी अनगढ़ प्रकृति को।सुगढ़ एवं सुसंस्कृत करना चाहता है।जो शिष्य अपने गुरूके दिव्य रूप को पहचानता है , वही शिष्य होने के योग्य है।स्वार्थ और अहंकार का विलय और विसर्जन किए बिना शिष्य में शिष्यत्व का उदय संभव नहीं ।जब शिष्य को लगने लगता है कि उसका सर्वस्व गुरु है, उसे ही यह अनुभव होता है कि गुरु का सब कुछ शिष्य का है।सद्गुरु भी शिष्य के सच्चेपन एवं पक्केपन को कई ढंगों से परखते हैं ।

शिष्य को सुपात्र बनने के लिए कड़ी परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है ।शिष्य इन परीक्षाओं को भी अपने गुरू का अनुदान मानते हैं ।यही सच्चाई है ; क्योंकि प्रत्येक परीक्षा के बाद शिष्य की चेतना में एक नया निखार आता है, एक नई चमक एवं आत्मविश्वास पैदा होता है।ये परीक्षाएँ शिष्य को अधिक सुयोग्य एवं सुपात्र बनाती हैं ।

सद्गुरु के प्रति असीम त्याग और सर्वस्व समर्पण के द्वारा ही इन दोनों से मुक्त हुआ जा सकता है।गुरु के प्रति यह समर्पित भाव एवं श्रद्धा-सुमन ही हमारे अंदर सच्चे शिष्यत्व को जन्म देगा।गुरु द्वार है उससे तो जाना है , गुजर जाना है , परंतु हम द्वार से भी गुजरने को तैयार नहीं, तो हम परमात्मारूपी मंदिर में कैसे पहुचेंगे।

            ●●● गुरु व शिष्य का मिलन ●●●

                        शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण जन्म-जन्म की साधना का प्रतिफल होता है।गुरु व शिष्य का मिलन तो सामान्य परिचय से होता है।इस प्रारंभिक परिचय में ही सद्गुरु अपने शिष्य की चेतना का मैल हटाना शुरु कर देते हैं ।धीरे-धीरे शिष्य में सद्गुरु के व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण बढ़ता है।फिर भी उसके मन में कुछ शंकाएँ रहती हैं ।ऐसे में वह स्वयं को बचाते हुए, अपनी कुछ मान्यताओं के साथ गुरु से जुड़ता है।

परिचय के बाद यह अनुबंध की अवस्था है।जब शर्तें, मान्यताएँ , प्रतिबंध विलीन होते हैं, तब अनुबंध संबंध बनता है।संबंध में बाहरी नहीं आंतरिक प्रगाढ़ता अधिक होती है। गुरु, शिष्य के अंतर्मिलन के द्वार इसी अवस्था में खुलते हैं ।परिचय अब प्रेम में बदल जाता है।गुरु के द्वारा दी गई जीवन की प्रत्येक अवस्था शिष्य को स्वीकार होती है।तब समर्पण की यात्रा शुरू होती है।इसी के अनुरूप प्रारंभ होता है , बोध का क्रम ।इस अनुभव में सद्गुरु एवं परमेश्वर घुले-मिले महसूस होते हैं ।

             सद्गुरु शिष्य को प्रेम करना सिखाते हैं।सद्गुरु सिखाते हैं समर्पण । वे कहते हैं कि 'मैं' मैं नहीं हूँ , बल्कि साकार रूप में उस निराकार का प्रतिनिधि हूँ और तुम्हें साकार से होकर निराकार में समा जाना है।तुम आकार में निराकार को खोजो , तभी तुम्हारा निराकार से मिलन हो पाएगा।सद्गुरु नानक ने अपने मंदिरों को गुरुद्वारा कहा है ।गुरुद्वारा अर्थात गुरु का द्वार।

   गुरुदेव के प्रति यह समर्पित भाव एवं श्रद्धा- सुमन ही हमारे अंदर सच्चे शिष्यत्व को जन्म देगा।हमें अपने सद्गुरु के प्रति अपने अंदर के शिष्यत्व को जाग्रत करने का कार्य इस पर्व पर करना चाहिए ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद 

Wednesday, April 8, 2020

" एकांत " में अंतर्मुखी होकर सृजनात्मक शक्ति का उदय करें , सृजनात्मक शक्ति क्या है ?, एकांत के लाभों के पीछे छिपा विज्ञान

 ● एकांत में अंतर्मुखी होकर सृजनात्मक शक्ति का उदय करें ●
अंतर्मुखी होने का अर्थ है-- अपनी वास्तविकता के साथ , अपने वर्तमान के साथ , अपनी संभावनाओं के साथ , अपनी संपूर्णता के साथ होना।

प्रायः लोग अंतर्मुखता को एक अवगुण समझते हैं ; क्योंकि उन्हें अंतर्मुखी होने का वास्तविक अर्थ ही पता नहीं ।लोग अंतर्मुखी होने का मतलब यह समझते हैं कि किसी से बात न करना, अपनी अभिव्यक्ति न देना , शांत व मौन रहना , सामाजिक क्रियाकलापों में भाग न लेना ।जबकि अंतर्मुखी होने का वास्तविक अर्थ है -- अपने साथ होना, और यह तभी संभव है , जब व्यक्ति भीड़ का हिस्सा न हो , भीड़ से दूर एकांत व शान्त हो।

यह सच है कि अंतर्मुखी होकर हम संपूर्ण रूप से एकाग्र हो सकते हैं, अपनी क्षमताओं व शक्तियों का सही आंकलन करके उनका सही उपयोग कर सकते हैं और अपनी अंतश्चेतना का विकास कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए सबसे पहले उपयुक्त मनोभूमि तैयार करना आवश्यक है।बिना उपयुक्त मनोभूमि के एकांत वास व्यर्थ की समस्याओं के विषय में सोचने का माध्यम बन जाएगा और उसके कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाएँगे।

हमें धीरे-धीरे एकांत वास का अभ्यास करना चाहिए और प्रारंभ में दिन के कुछ मिनटों से बढ़ाकर अपनी क्षमता के अनुसार उसे एक निर्धारित अवधि तक ले जाना चाहिए ।अवधि बढ़ाने के साथ एकांत वास में अंतर्मुखी चिंतन को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि
उस समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया जा सके ।

जब व्यक्ति अपनी संपूर्णता के साथ होता है और इसके आधार पर अपने लक्ष्य का निर्धारण करता है, अपनी समस्याओं का समाधान ढूँढता है तो इसके परिणाम चमत्कारी होते हैं ।जब व्यक्ति एकांत में शान्त होता है तो वह अपनी संपूर्णता के साथ होता है।तब उसमें सृजनात्मक शक्ति का उदय होता है।

          ●●●सृजनात्मक शक्ति क्या है ?●●●

सृजनात्मक शक्ति वह है , जो नए समाधान देने में सक्षम है ।यही कारण है कि श्रेष्ठ व महान आत्माएँ अपने जीवन का अधिकांश समय एकांत में व्यतीत करती हैं ।जीवन में सफल होना है, कुछ श्रेष्ठ व कुछ नया करना है तो अंतर्मुखी होना होगा अर्थात अपने साथ, अपने वर्तमान के साथ, अपनी वास्तविकता के साथ, अपनी संपूर्णता के साथ होना होगा और इसके लिए आवश्यकता है एकांत व शान्ति की।

सामान्य जीवन से कुछ अलग कुछ देर अपने साथ समय बिताना अद्भुत एहसासों से भरा होता है।प्रतिदिन कुछ समय एकांत में बिताने से हमारा संपर्क हमारी उन शक्तियों से होता है ,जो हमें सफलता के नजदीक ले जाती हैं ।व्यक्ति जैसे ही आधुनिक संसार के बंधनों से बाहर निकलकर प्रकृति में हरियाली के बीच कुछ समय गुजारना शुरू करता है , मस्तिष्क सामान्य विचारों की बेड़ियों से मुक्त होने लगता है व उसमें रचनात्मकता जन्म लेने लगती है।

   ●●● एकांत के लाभों के पीछे छिपा विज्ञान ●●●

             एकांत में रहने के लाभों के पीछे छिपा विज्ञान बड़ा ही विलक्षण है ।एकांत स्व-आलोचना करने वाले मस्तिष्क को शान्त कर देता है और नैसर्गिक प्रतिभा के अब तक के दबे हिस्सों को सक्रिय कर देता है ।इसे अंग्रेजी में " ट्रांजिएंट हाइपोफ्रंटैलिटी " कहते हैं ।इस तरह व्यक्ति जीवन की चुनौतियों के लिए सही मायने में तैयार हो जाता है ।

       जब कोई व्यक्ति एकांत में होता है, तो उसके मस्तिष्क की बीटा तरंगें धीमी होकर अल्फा में बदल जाती हैं ।एकांत पाते ही जब ऐसा होता है , तो स्व-आलोचना , चिंता, द्वंद आदि के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क का हिस्सा निष्क्रिय पड़ने लगता है ।इसके आगे की प्रक्रिया में ही एकांत का अभ्यास करने का लाभ छिपा है।

एकांत, शांत व प्रसन्न मनःस्थिति की अवस्था में व्यक्ति की न्यूरोकेमिस्ट्री भी बदल जाती है ।ऐसी अवस्था में प्रसन्नता, आनंद और चेतना जगाने वाले न्यूरोकेमिकल तेजी से बनने लग जाते हैं और नए रचनात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं; रचनात्मकता बढ़ने लगती है ।ऐसी-ऐसी समस्याओं के समाधान मिलते हैं; जिनके समाधान निकालना साधारणतया संभव नहीं हो पाता है ।इसलिए ऋषियों का यह कथन है कि शांत व प्रसन्न मनःस्थिति में दिव्य चेतना अवतरित होती है ।

        आज के समय में छोटे परिवार होते हैं, काम के सिलसिले में सबको अलग-अलग जाना आना पड़ता है अतः इस कारण से कुछ व्यक्तियों को काफी समय अकेले भी रहना पड़ता है , कभी नकारात्मक विचार भी सताने लगते हैं ।इसलिए ऐसे लोग एकांत के समय को सकारात्मक कार्यों में व्यस्त रहते हुए एकांत में अपनी सृजनात्मक शक्ति का उदय कर सकते हैं ।जीवन को खुशहाल बना सकते हैं ।एकांत में उत्पन्न होने वाले भय से भी बच सकते हैं ।
 
एकांत के पलों का समुचित उपयोग करके सृजनात्मक शक्ति का उदय करें ।

     सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Tuesday, April 7, 2020

"एकांत" में ही आत्मसाक्षात्कार संभव, एकांत में ही जीवन की व सत्य की खोज संभव

       ●●● एकांत में ही आत्मसाक्षात्कार संभव ●●●
एकांत में ही आत्मसाक्षात्कार संभव है।एकांत में ही हम परम शान्त और मौन हो सकते हैं और एकांत में ही हम उस द्वार को खोज सकते हैं, जो परमात्मा का द्वार है।सभी ज्ञानी महात्मा, संत , साधक एवं सिद्ध अपनी साधना एकांत में ही पूर्ण कर सके।फिर ये ज्ञानी चाहे बुद्ध हों, चाहे महावीर हों , चाहे मोहम्मद या फिर महर्षि रमण, श्री अरविन्द ।ये सभी परमात्मा की अनुभूति पाने के लिए पहले एकांत में चले गए थे ।

भगवान बुद्ध छह वर्ष तक निरंजना नदी के किनारे जंगल में एकांत में रहे।उनके साथ कोई नहीं था और न ही उन्होंने किसी का साथ खोजा।तीर्थंकर महावीर स्वामी बारह वर्ष तक एकांत में रहकर गहन मौन रहे।मोहम्मद की कथाओं में आता है कि वे तीस दिनों तक एक पर्वत पर एकांत में रहे।ईसा मसीह तीस वर्ष एकांत में रहे।

आधुनिक युग में महर्षि रमण की एकांत साधना की कथा कही जाती है ।उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय तिरुवन्नामलाई के अरुणाचलम् पर्वत की विरुपाक्षी गुफा में एकांत में गुजारा।एकांत में मौन रहकर उन्होंने अपनी समस्त साधनाओं को संपन्न किया।महर्षि अरविन्द सन् 1910 में पांडिचेरी गए थे ।वहाँ उन्होंने सन् 1950 ईo में शरीर त्याग किया।इन चालीस वर्षों में वे प्रायः एकांत में ही रहे।

एकांत एवं मौन ही जीवन के रहस्य को समझने एवं अपने लक्ष्य तक पहुँचने का एकमात्र साधन एवं समाधान है।जो एकांत प्रिय हैं वे एकांत में ही प्रसन्न रहते हैं, आनंदित रहते हैं ।वे एकांत में ही आनंद को जान पाते हैं ; क्योंकि अकेले में ही स्वयं को परखा और पहचाना जा सकता है ।भीड़ में भला कोई स्वयं की पहचान कैसे कर सकता है।

जो आत्मसाक्षात्कार करने की चाह रखते हैं वे एकांत मिलते ही धयान का अभ्यास करते हैं, आपनी श्वास के प्रति सजग रहते हैं और आध्यात्मिक साधनाएँ करते हैं ।मंत्र, स्वाध्याय का भी सहारा लेते हैं ।ये सभी प्रक्रियाएँ एकांत में ही अच्छी तरह से हो पाती हैं ।अपनी लगन से साधक आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति करके ही रहते हैं ।

 ●●● एकांत में ही जीवन की व सत्य की खोज संभव●●●

एकांत में जीवन को अच्छे से जाना जा सकता है।जीवन के आनंद को एकांत में ही सही से अनुभव किया जा सकता है ।एकांत में जो रस है , उस रस की अनुभूति का आस्वासन केवल एकांत में रहकर ही किया जा सकता है ।जो अकेला रहता है, स्वयं के बारे में चिंतन मनन करता है , स्वयं को जानने का प्रयास करता है , वही इस जीवन की सच्चाई को समझ पाता है।

भीड़ में हम दूसरों को पाते हैं, दूसरों को खोजते हैं और दूसरों के साथ खो जाते हैं ।हमारा मन भीड़ में रचने- बसने का अभ्यस्त हो गया है।इसीलिये हम एकांत में काल्पनिक भय से ग्रसित हो जाते हैं और भीड़ में अपने आप को सुखी महसूस करने लगते हैं ; जब कि सुख तो एकांत में है, भीड़ में नहीं ।

मानवीय मन को शान्ति और स्थिरता की जरूरत होती है ।जब मन शान्त और स्थिर होता है तो ही वह अपने विषय में सोच-विचार कर पाता है।तभी वह विचार करता है कि उसे यह जीवन क्यों मिला , किन संस्कारों के कारण वह इस जीवन के सुख और दुःख भोग रहा है , किन संस्कारों के कारण उसे अपने माता-पिता, स्वजन-संबंधी मिले हैं ।

संसार का आकर्षण हमें अपनी ओर खींचता है ।और मन संसार की इच्छाओं में आसक्त रहता है जिसके कारण हम एकांतसेवन का लाभ नहीं उठा पाते ।न हम महत्वपूर्णं सत्य को जान पाते न ही तत्व का संधान कर पाते। यदि हम शान्त होकर अपने पूरे दिन की बातों का विश्लेषण करें तो यह सच्चाई अपने आप प्रकट हो जाएगी कि हम भीड़ में रहना ज्यादा पसंद करते हैं ।भीड़ न मिलने पर हम परेशान हो जाते हैं ।

जीवन की खोज , जीवन के उद्देश्य एवं समझ की पहचान, जीवन रस का आस्वादन कभी भी भीड़ में संभव नहीं है।भीड़ में भला कोई जीवन और जीवन से जुड़े सत्य  की खोज कैसे की जा सकती है।सांसारिक जीवन में भी हम अपने सांसारिक कार्यों को करते हुए भी कुछ समय एकांत में व्यतीत करते ही हैं बस जरूरत है उस एकांत के समय का महत्व समझने की।

एकांत का प्रभाव कितना विलक्षण है, इसे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की भावांजलि में इन शब्दों के द्वारा गहनता से अनुभव किया जा सकता है--
       बैठ लें कुछ देर
      आओ , एक पथ के पथिक से 
       प्रिय, अंत और अनंत के,
       तम गहन जीवन घेर।

"एकांत" एक वरदान , सामान्य व्यक्ति एकांत को वरदान कैसे बनाएँ -

            ●●● एकांत एक वरदान●●●
एकांत एक वरदान है ।एकांत हमारे मन की प्रकृति के अनुरूप परिभाषित होता है ।एकांत हमें आनंदित भी करता है और डराता भी है।एक साधक एवं योगी के लिए एकांत के पल ध्यान एवं समाधि का सोपान है, एक भक्त के लिए भगवान से मिलन का मधुर अनुभव और एक वैज्ञानिक एवं चिंतक के लिए ये ही शोध एवं विचार के पल हैं परंतु कुछ लोगों के लिए ये पल अकेलेपन के बोझ की तरह हो जाते हैं ।

मन यदि मजबूत हो तो एकांत में ही सर्वश्रेष्ठ कार्य का संपादन किया जा सकता है ।इतिहास गवाह है कि विश्व के श्रेष्ठतम कार्य एकांत में संपन्न हुए हैं, जिस एकांत से लोग डरते हैं, उसी एकांत में महान विचारकों ने आश्चर्यचकित करने वाले आविष्कार एवं अनुसंधान संपन्न किए हैं ।

जीवन को गंभीरता से समझने वाले संत, महात्मा जीवन को ही सर्वोच्च ग्रंथ मानते हैं, जिसके पन्नों में रहस्य- रोमांच के अद्भुत सूत्र समाहित हैं ।जीवन सूत्रों की विवेचना , विश्लेषण एवं व्याख्या लोगों की भीड़ में संभव नहीं, केवल एकांत में ही की जा सकती है।इसीलिये तो कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने " एकला चलो रे " का नारा दिया।

स्वामी विवेकानंद ने अकेले रहने का उपदेश देते हूए कहा - कि अकेले रहो ।जो अकेला रहता है, न तो वह दूसरों को परेशान करता है और न दूसरों से परेशान रहता है।जीवन में अकेलेपन को वरदान बनाओ न कि अभिशाप।अतः हमें श्रेष्ठ विचार, पवित्र भाव एवं सदाचरण के द्वारा अकेलेपन को दूर कर उसे बहुमूल्य क्षण में परिवर्तित करना चाहिए ।

लौकिक जगत में किए गए वैज्ञानिक आविष्कार हों अथवा अलौकिक जगत में संपन्न की गई साधनाएँ , ये सभी एकांत के दुर्लभ क्षणों में ही सम्भव हैं ।जिन क्षणों में सामान्य व्यक्ति घबराए और चिंतातुर हो, उन क्षणों को प्रभु का वरदान मानकर उन्हें साधना की अनुभूति में बदल लेने का कार्य महान तपस्वियों द्वारा ही संभव है।

 ●●● सामान्य मानस एकांत को वरदान कैसे बनाएँ ●●●

मनोविज्ञान भी कहता है कि यदि हम सकारात्मक कार्यों में व्यस्त रहें तो बहुत सी चिन्ताओं और तनाव से बचे रह सकते हैं ; क्योंकि यदि हम खाली बैठे रहने की आदत बना लें तो मन में अक्सर नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगते हैं ।अतः हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपने आवश्यक कार्यों को करने के अलावा हमें जो खाली समय मिले उसका सदुपयोग करने की कोशिश करनी चाहिए ।

एकांत को वरदान बनाने के लिए सकारात्मक सोच, रचनात्मक चिंतन एवं सदाचरण की आवश्यकता है।सकारात्मक सोच से हम सदा स्वयं के प्रति सावधान एवं जागरूक बने रहते हैं ।इसके लिए हमें अपनी रुचि के अनुसार किसी भी कार्य में व्यस्त रहने की आदत बनानी चाहिए ।जैसे-- किसी को संगीत में, किसी को चित्रकला में, किसी को लेखन में, किसी को पढ़ने में, किसी को खेल में आदि-आदि अर्थात अकेलेपन से जन्मी समस्याओं से बचने के लिए हमें स्वयं को रचनात्मक एवं अच्छे कार्यों में नियोजित करना चाहिए ।

                          हमें अपने मन को उस कार्य में व्यस्त रखना चाहिए, जिसे हम पसन्द करें,हमारा मन उसमें रम जाए।हमें अच्छे व रचनात्मक कार्यों की सूची रखनी चाहिए; ताकि मन को कभी अनियंत्रित होने का अवसर न मिले।व्यस्त रहने से हम कुछ नया सृजन कर पाएँगे ।जिससे हमारा मन भी प्रफुल्लित रहेगा।रचनात्मक सृजन से हम जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ भी हासिल कर सकते हैं ।

अपने एकांत के प्रति जागरूक रहने से हम अपने नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में परिवर्तित कर सकते हैं ।यदि हमें स्वाध्याय में रुचि हो तो हमको अपने एकांत के पलों में स्वाध्याय करना चाहिए ।स्वाध्याय मन का स्नान है जिससे नकारात्मक विचार मिटते रहते हैं ।अच्छी पुस्तकें अकेलेपन की सच्ची मित्र होती हैं ।जिनकी मित्रता अच्छी किताबों से हो गई, समझो वे कभी अकेले हो ही नहीं सकते ; क्योंकि उनका मन सदा सद्विचारों से भरा रहता है।

यदि हमारा मन स्वस्थ, सुदृढ़ एवं शान्त होता है तो एकाकीपन हमारा सबसे बड़ा मित्र एवं शुभेच्छु बन जाता है ।जो धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं वे अकेले में हर्षविभोर होकर कीर्तन करते हैं और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहते हैं ।योगी, महात्मा एवं संत अपने जीवन में कभी अकेलेपन का एहसास नहीं करते ।वे अकेले हो ही नहीं सकते।

यदि एकांत के क्षणों का सम्यक उपयोग किया जा सके तो उन्हें सामान्य व्यक्ति भी जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में परिवर्तित कर सकते हैं और सदा सकारात्मक चिंतन बनाए रख सकते हैं ।आवश्यक है कि सामान्य मनुष्य भी एकांत के इन बहुमूल्य क्षणों का महत्व समझे और उन्हें सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील हो।

हम अपने समय का सदुपयोग करते हुए, रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहते हुए एकांत को वरदान बना सकते हैं ।एकांत में व्यस्त रहकर हम स्वयं को बहुत सी समस्याओं से बचा सकते हैं ।
              "  एकांत को वरदान बना लें "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Saturday, April 4, 2020

स्वास्थ्य-- प्राणों का संतुलन, श्वास में असंतुलन रोगों का कारण , प्राणायाम विधि द्वारा प्राणों के संतुलन से लाभ, श्वास के संतुलन के लिए प्राणायाम के मुख्य तीन अंग

                  ●●●प्राणों का संतुलन ●●●
हम सभी का जीवन श्वास की डोर से बँधा हुआ है।जन्म से ही हम अनवरत श्वास लेते और छोड़ते रहते हैं और जीवन भर यह प्रक्रिया चलती रहती है।शरीर व मन का संतुलन प्राण के द्वारा होता है।

श्वास का संतुलन ही प्राणायाम कहलाता है।योग शास्त्रों में प्राणायाम की कई तरह की विधियाँ हैं, जिनके माध्यम से प्राणवायु ग्रहण किया जाता है और इसका आश्चर्यजनक प्रभाव हमारे शरीर में देखने को मिलता है।प्राण हमारे शरीर में विभिन्न केन्द्रों में उपप्राण के रूप में निवास करता है और शरीर की कई गति- विधियों के संचालन में अपनी भूमिका भी निभाता है।

      ●● श्वास में असंतुलन रोगों का कारण ●●

शारीरिक कष्ट-परेशानी होने पर अथवा मन में विक्षोभ होने पर श्वास की लय में भी व्यतिरेक उत्पन्न हो जाता है ।आजकल अस्वस्थता बहुत बढ़ गई है; क्योंकि आज शरीर, प्राण व मन में संतुलन व सामंजस्य नहीं रहा है।शरीर में ऊर्जाओं के आवर्तन हैं ।ऊर्जा की किरणों को श्वास-प्रकिया समृद्ध बनाती है।आज हमें श्वास लेने का सही तरीका नहीं मालूम है।

प्राणों का संतुलन बनाए रखने के लिए श्वास का सधा रहना बहुत आवश्यक है।जब भी हमारे शरीर में कष्ट होता है तो हमारे श्वास की लय स्वतः ही गड़बड़ा जाती है ।ऐसी स्थिति में हमारा प्राण दूषित हो जाता है और इस प्राण को परिष्कृत करने के लिए व मन के विक्षोभों को दूर करने के लिए श्वास को सँभालना सुधारना जरूरी होता है।इस दृष्टि से देखा जाए तो शरीर , मन व प्राण की डोर श्वास के साथ गहराई से जुड़ी है।

शरीर स्थूल है तो मन सूक्ष्म ।शरीर दृश्य है , पर मन अदृश्य ।इन दोनों में सही तारतम्य न होने के कारण ही शरीर में रोग व मन में शोक होता है तथा प्राण का स्तर प्रदूषित होता है।वर्तमान समय में शारीरिक- मानसिक अस्वस्थता का एक बड़ा कारण शरीर, मन व प्राण में असंतुलन व असामंजस्य है।

योगाचार्य बताते हैं कि हमारी बहुत सी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्राणायाम यानी श्वास साधने से ही ठीक हो सकती हैं ।आज मनुष्य क्रोध , अनिद्रा , मानसिक उद्वेगों आदि विकारों से परेशान है ; क्योंकि उसका अपने श्वास पर नियंत्रण नहीं है।यदि श्वास संतुलित हो जाएगा , तो व्यक्ति की अन्य समस्याएँ भी आसानी से सुलझ जाएँगी।गहरे श्वास के अनेक शारीरिक व मानसिक लाभ भी हैं ।
गहरे श्वास से हम अधिक ऊर्जा या ऑक्सीजन ग्रहण कर पाते हैं ।

     ●●प्राणायाम विधि द्वारा प्राणों के संतुलन से लाभ●●

जीवन जीने की कला का प्रथम चरण श्वास सही ढंग से लेने के तरीके से तय होना चाहिए ।यदि मनुष्य ने लयबद्ध, तालबद्ध ढंग से श्वास लेना सीख लिया तो उसे शारीरिक और मानसिक, दोनों ही प्रकार के विकार नहीं होंगे।अन्य समस्याएँ भी दूर हो सकती हैं ।जो अपनी श्वास के प्रति सजग रहते हैं, वे स्वयं को बहुत से रोगों से दूर रखते हैं ।

जब मनुष्य श्वास के आने-जाने के प्रति सजग होता है तो न केवल शारीरिक क्रियाएँ संतुलित होती हैं, वरन मनुष्य का मन इधर-उधर भटकने के स्थान पर उस क्षण विशेष के लिए वर्तमान में आबद्ध हो जाता है, जिसके कारण उसके व्यक्तित्व में समग्र रूप से एकाग्रता का समावेश हो जाता है ।

योगियों ने श्वास पर गहन , गंभीर प्रयोग किए और यह निष्कर्ष निकाला कि प्राण को साध लेने पर सब कुछ साधा जा सकता है।प्राण के नियंत्रण द्वारा मन पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है और मन के सध जाने से शरीर स्वतः ही संतुलित हो जाता है।श्वास के हमारे अस्तित्व में इतना अधिक महत्व होने के कारण ही हिंदू, बौद्ध व सूफी आदि अन्य सभी मतों में श्वास को साधने की विधियाँ, आध्यात्मिक प्रकियाओं का अनिवार्य अंग रही है।

  ●●श्वास के संतुलन के लिए प्राणायाम के मुख्य तीन अंग●●

श्वास के संतुलन के लिए यों तो अनेक विधियाँ प्रचलित हैं, परंतु इसका सबसे सहज व सुलभ तरीका प्राणायाम ही है।प्राणायाम के तीन अंग होते हैं-- पूरक ( श्वास लेना ), कुंभक ( श्वास रोकना ), रेचक (श्वास बाहर निकालना)। इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण क्षण , श्वास के रुकने का क्षण कुंभक है ।कुंभक भी दो प्रकार का होता है --- बाह्य कुंभक ( श्वास को बाहर रोकना ) और अंतः कुंभक ( श्वास को अंदर रोकना )।कुछ दिनों के नियमित अभ्यास से हम बड़ी आसानी से प्राणायाम कर पाते हैं ।जैसे-जैसे हमारे श्वास में संतुलन होने लगता है वैसे-वैसे हमारा मन शान्त होने लगता है।

यह आवश्यक है कि शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूप से स्वस्थ रहने के लिए शरीर में स्थित प्राण का परिष्कार किया जाए, उच्च स्तरीय प्राण को ग्रहण किया जाए ।यह प्रक्रिया मंत्र जप, प्राणायाम, उच्च चिंतन व भावमयी पुकार के आधार पर संभव है ।इसके साथ ही शरीर, मन व प्राण इन तीनों में संतुलन सामंजस्य जरूरी है ।ऐसा करके ही हम मानव-जीवन को सही अर्थों में समझ पाएँगे , अपने शरीर, मन और प्राण का सही उपयोग कर पाएँगे, अपनी समस्याओं को सुलझा पाएँगे।

 स्वस्थ और शान्त जीवन के लिए स्वास में संतुलन होना अति आवश्यक है ।इसके लिए प्राणायाम की कोई भी विधियाँ अपनाई जा सकती हैं ।जब भी खाली बैठे हों तो अपनी श्वास को सुनने का अभ्यास करें ।आजकल हमारे देश में योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और लोग श्वास के संतुलन का महत्व भी समझ रहे हैं ।कोई भी यौगिक क्रिया सदा अपनी क्षमता के आधार पर ही करें ।
          " प्राणायाम से जीवन सधता, प्राणायाम करें "
                           'स्वस्थ हमेशा रहें'
सादर अभिवादन व धन्यवाद । 



Friday, April 3, 2020

स्वास्थ्य- जीवन में नमक की उपयोगिता, नमक का प्रादुर्भाव, नमक के प्रकार ( सामान्य नमक, सेंधा नमक, काला नमक), नमक ऊर्जा का स्रोत

   <<<<<<<<< जीवन में नमक की उपयोगिता >>>>>>>>
नमक का स्वाद न केवल भोजन में जरूरी है, बल्कि यह हमारे जीवित रहने के लिए भी अनिवार्य है।नमक की न्यून ( अल्प) मात्रा से हमारे मस्तिष्क में अतिसूक्ष्म विद्युत-प्रक्रियाओं का संचालन होता है।इसके अलावा, हमारे शरीर में जलसंचय-संतुलन बनाए रखने में यह निर्णायक भूमिका निभाता है।नमक सिर्फ स्वाद प्रदान करने वाला तत्व ही नहीं बल्कि चीनी की तरह बेहतरीन कुदरती संरक्षक भी है।

स्वाद के मामले में नमक का संतुलित मात्रा में होना आवश्यक है ।भोजन में यदि नमक कम हो या ज्यादा हो , दोनों ही स्थितियों में यह स्वाद को बिगाड़ता है , लेकिन भोजन में ठीक-ठीक नमक की मात्रा भोजन के स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है।संतुलित मात्रा में नमक का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी व आयु में वृद्धि करने वाला होता है , वहीं नमक का कम या अधिक मात्रा में सेवन स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाला व आयु को घटाने वाला होता है।

हमारी लोक संस्कृति में भी नमक से जुड़े हुए कई तरह के मुहावरे प्रचलित हैं , जो नमक के साथ भोजन का संबंध बताने के साथ-साथ मानवीय संबंधों को भी दर्शाते हैं । जैसे -- नमक का कर्ज अदा करना , नमक हलाली करना आदि।नमक के साथ सौन्दर्य का अंतरंग संबंध  ' सूरत के नमकीन होने ' , ' रूप लावण्य 'जैसे प्रचलित मुहावरों से भी स्पष्ट होता है।

          <<<<<<<< नमक का प्रादुर्भाव >>>>>>>>>

वैज्ञानिकों का यह मानना है कि धरती पर जीवन नमकीन जल वाले महासागर में हुआ था ।इसलिए धरती पर जो भी खाद्य पदार्थ व साग-सब्जियाँ हैं, उनमें भी नमक की अल्प मात्रा घुली मिली है, जो हमारे शरीर के संपोषण के लिए जरूरी है ।स्पष्ट है कि नमक का प्रादुर्भाव समुद्र से ही हुआ है।

नमक हमें सागर के जल के वाष्पीकरण से प्राप्त होता है।इसे जहाँ चट्टान से काटकर निकाला जाता है , वहाँ कभी समुद्र या खारे जल का भारी संग्रहण रहा होगा। सदियों से नमक का व्यापार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व संबंधों को प्रेरित करता रहा है।

             <<<<<<< नमक के प्रकार >>>>>>>>
नमक कई प्रकार के होते हैं; जैसे सेंधा नमक( पहाड़ी नमक) समुद्री नमक, काला नमक , सामान्य नमक।

●● सामान्य नमक -- आमतौर पर भोजन में जो नमक प्रयोग होता है वही सामान्य नमक है।भोजन में प्रयोग किए जाने वाले इस नमक में प्रायः सोडियम होता है।सोडियम हमारे शरीर में उच्च रक्तचाप को जन्म देता है तो पोटेशियम उसे कम करता है।इसके अलावा इसमें कुछ अन्य तत्व व रसायन भी होते हैं। आजकल बाजार में यही रिफाइंड आयोडाइज्ड के नाम से मिलता है।इस नमक के अनेक ब्रांड मिलते हैं ।

आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार-- रिफाइंड नमक में सोडियम व अन्य रसायन अधिक मात्रा में होते हैं, इसलिए यह स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं है।व्रत- उपवास के दिनों में नमक से परहेज करने का विधान है।

●● सेंधा नमक ( पहाड़ी नमक) -- सेंधा नमक साधारण नमक से थोड़ा भिन्न है और यह शाकाहार के लिए उपयुक्त समझा जाता है।सेंधा नमक में कैल्सियम, आयरन, मैग्नीशियम, काॅपर जैसे लगभग 94 तरह के खनिज तत्व पाए जाते हैं, इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से यह नमक अच्छा माना जाता है ।इसे ही पहाड़ी या हिमालयन नमक भी कहते हैं ।

सेंधा नमक हृदय व पेट के लिए अच्छा माना जाता है और कई तरह की बीमारियों से बचाता है, जैसे-- ब्लडप्रेशर, त्वचा रोग, आर्थराइटिस, ऑस्टियोपोरोसिस, डिप्रेशन , स्ट्रेस आदि।इस नमक के स्तेमाल से मांसपेशियों के खिंचाव व जकड़न में भी राहत मिलती है।व्रत-उपवास में भी इस नमक का प्रयोग किया जाता है ।

●● काला नमक-- काला नमक लौहतत्व से भरपूर होता है।ठन्डी व रेचक प्रकृति के इस नमक से कब्ज, एसिडिटी, पाचन समस्याएँ, गैस, सीने में जलन , हिस्टीरिया, मंददृष्टि , हाई ब्लडप्रेशर, रक्त की कमी व अन्य कई बीमारियों के इलाज में लाभ मिलता है।आयुर्वेद में कई पाचक चूर्णों में काला नमक इस्तेमाल होता है ।

काला नमक के अन्य औषधीय उपयोग भी हैं ।दही  या छाछ में भी काला नमक डालते हैं ।गंधक की गंध वाले काले नमक का इस्तेमाल भोजन का स्वाद बढ़ान के लिए भी किया जाता है।बाजार में साबित व पिसा हुआ- दोनों ही रूपों में काला नमक  उपलब्ध होता है।

       <<<<<<<<< ऊर्जा का स्रोत नमक>>>>>>>>>>

नमक केवल एक खाद्य पदार्थ ही नहीं है, बल्कि ऊर्जा का एक अच्छा स्रोत भी है।नमक हमारे शरीर के लिए आवश्यक तत्व है, जो रक्तशोधक के रूप में काम करता है और शरीर के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके होने वाली बीमारियों से हमारी रक्षा भी करता है ।यदि लम्बे समय तक नमक का सेवन न किया जाए तो शरीर में दुर्बलता आ जाती है, लेकिन नमक का अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक है ।हर दिन चार ग्राम मात्रा तक नमक का सेवन एक सामान्य शरीर के लिए पर्याप्त माना जाता है ।

गरमी के मौसम में डीहाइड्रेशन  ( शरीर में पानी की कमी) की समस्या में, नमक-चीनी के मिश्रण द्वारा ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी के माध्यम से उपचार किया जाता है ।हालाँकि रक्तचाप के रोगियों या क्षतिग्रस्त गुरदे वालों को नमक से परहेज करना पड़ता है या उन्हें कम सोडियम वाले ( पोटेशियम जनित) नमक का नुस्खा अपनाना पड़ता है।
 
नमक कुदरती संरक्षक है इसलिए दुनिया में पिछले कई वर्षों से अचार, जैम आदि बनाने में नमक का इस्तेमाल किया जाता रहा है।सभी साग- सब्जियाँ, फल व अन्य खाद्य पदार्थ इत्यादि में कुदरती तौर पर नमक की अल्प मात्रा रहती है इसी कारण जो व्यक्ति बिना नमक का ( अस्वाद ) भोजन लेते हैं उनके शरीर में नमक की आपूर्ति इन फल, सब्जियाँ व खाद्य पदार्थों से किसी न किसी रूप में हो जाती है।इसलिए वे सामान्य जीवन जी पाते हैं ।

नमक के बारे में जानकारी प्राप्त करने के बाद हम कह सकते हैं  कि नमक की जीवन में बहुत उपयोगिता है ।इसलिए हमें अपने भोजन में  सभी प्रकार के नमक संतुलित मात्रा में ग्रहण करने चाहिए ।जिस तरह भोजन में नमक की मात्रा संतुलित होनी चाहिए, उसी तरह हमें अपने जीवन के हर आयाम में संतुलन बैठाना चाहिए और अतिवाद या न्यूनवाद से बचना चाहिए ।

भोजन में नमक का संतुलन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Thursday, April 2, 2020

शंख - भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का महत्व, शंख के प्रकार, शंख स्थापना एवं शंख ध्वनि ,शंख के विभिन्न लाभ

●●●●● भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का महत्व●●●●●
भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान है।मंदिरों एवं मांगलिक कार्यों में शंखध्वनि का प्रचलन है।माना जाता है कि शंख का प्रादुर्भाव समुद्रमंथन से हुआ था।समुद्रमंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में शंख भी एक है।विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है।अतः यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है , वहीं लक्ष्मी का वास होता है ।स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है।भगवान विष्णु इसे अपने हाथों में धारण करते हैं ।

शंख निधि का प्रतीक है ।इस मंगल चिन्ह को घर में पूजास्थल पर रखने से स्वयमेव अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है ।धार्मिक कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है ।प्राचीनकाल में प्रत्येक घर में शंख की स्थापना की जाती थी।शंख को देवता का प्रतीक मानकर पूजन करते एवं इसके माध्यम से अभीष्ट की प्राप्ति करते थे।पूजा-आराधना, अनुष्ठान-साधना , आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का आयुर्वेदिक व वैज्ञानिक महत्व भी है।शंख की विशिष्ट पूजन पद्धति एवं साधना का विधान भी है।

            <<<<<<<< शंख के प्रकार >>>>>>>>>

                                         शंख की आकृति के आधार पर इसके प्रकार माने जाते हैं ।मुख्यतः शंख तीन प्रकार के होते हैं--- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख, वामावृत्ति शंख।जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है , वह दक्षिणावृत्ति शंख कहलाता है।जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है , वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बाएँ हाथ से पकड़ा जाता है, वह वामावृत्ति शंख कहलाता है।

                             मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृत्ति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं ।इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं ।इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख , राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि अनेक प्रकार पाए जाते हैं ।उच्च श्रेणी के शंख कैलास मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह , श्री लंका एवं भारत में पाए जाते हैं ।

महाभारत में सभी योद्धाओं ने युद्घ घोष के लिए अलग-अलग शंख बजाए थे।श्री मद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 15 - 19  में इसका वर्णन मिलता है--
श्री कृष्ण भगवान ने पांचजन्य नामक, अर्जुन, देवदत्त और भीमसेन ने पौंड्र शंख बजाया ।कुंती -पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख , नकुल ने सुघोष एवं सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंखनाद किया। इसके अलावा काशीराज, शिखंडी , धृष्टद्युम्न , राजा विराट , सात्यिक , राजा द्रुपद , द्रोपदी के पाँचों पुत्रों और अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंखनाद किया।

       <<<<<<<< शंख स्थापना और शंख ध्वनि >>>>>>>>>>


घर में पूजा वेदी पर शंख की स्थापना की जाती है ।निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली, होली , महाशिवरात्रि, नवरात्र, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित किया जाता है ।विष्णु शंख को दुकान, ऑफिस, फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तुदोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय में लाभ होता है।रुद्र , गणेश, भगवती, विष्णु भगवान आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल, दूध, घी , शहद, गुड़, पंचद्रव्य आदि से अभिषेक किया जाता है ।इसका धूप दीप नैवेद्य से नित्य पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित करना चाहिए ।

शंखराज सबसे पहले वास्तुदोष दूर करते हैं ।मान्यता है कि शंख में कपिला ( लाल) गाय का दूध भरकर भवन में छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं ।परिवार के सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख - दुर्भाग्य दूर होते हैं ।

                        शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है । वैदिक अनुष्ठानों में विभिन्न प्रकार के शंख का प्रयोग किया जाता है ।पारद शिवलिंग, पार्थिव शिवलिंग एवं मन्दिरों में शिवलिंगों पर रुद्राभिषेक करते समय शंख ध्वनि की जाती है।आरती में, धार्मिक उत्सव में, हवन-क्रिया में, राज्याभिषेक , गृहप्रवेश, वास्तुशान्ति आदि शुभ-अवसरों पर शंख ध्वनि से लाभ मिलता है ।पितृ तर्पण में शंख की अहम् भूमिका होती है ।

           <<<<<<<<<<शंख के विभिन्न लाभ >>>>>>>>>>

पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है।इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख का जोड़ा होना चाहिए ।स्वयं लक्ष्मी माता कहती हैं कि शंख जहाँ होगा वहाँ पर वे भी होंगी।देव प्रतिमा के चरणों में शंख को रखा जाता है।

अन्नपूर्णा शंख की व्यापारी व सामान्य वर्ग द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न, धन,लक्ष्मी, वैभव की उपलब्धि होती है।मणिपुष्पक एवं पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तुदोषों का निराकरण होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार शंखध्वनि से वातावरण का परिष्कार होता है ।इसकी ध्वनि के प्रसार-क्षेत्र तक सभी कीटाणुओं का नाश हो जाता है ।इस संदर्भ में अनेक प्रयोग- परीक्षण भी हुए हैं ।पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी हमेशा शंख बजाएँ तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं ।दूध का आचमन कर कामधेनु शंख को कान के पास लगाने से " ॐ " की ध्वनि का अनुभव किया जा सकता है ।यह सभी मनोरथों को पूर्ण करता है।

वर्तमान समय में वास्तुदोष के निवारण के लिए जिन चीजों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से यदि शंख आदि का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं ।यह न केवल वास्तुदोषों को दूर करता है बल्कि आरोग्य वृद्धि भी करता है।

आज विज्ञान का युग है इसलिए कभी-कभी हमें यह संदेह होता है कि क्या यह अन्धविश्वास तो नहीं ।लेकिन यह भी सच है कि हमारी वैदिक परम्परा अत्यन्त श्रेष्ठ है।हमारे ऋषि-मुनियों ने पूजा पद्धति में प्रयोग होने वाली सभी वस्तुओं पर शोध की है ।इसलिए हमें संदेह नहीं करनी चाहिए ।

आज भी हम देखते हैं कि हवन और पूजन में शंखध्वनि का प्रचलन है ।घरों में पूजा स्थान पर शंख स्थापित किए ही जाते हैं ।
वैज्ञानिक इन विषयों पर अनुसंधान भी करते रहते हैं ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।