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Sunday, February 16, 2020

पर्यावरण की रक्षा --- जहाँ चाह वहाँ राह, पर्यावरण की कैसे सुरक्षा करते हैं--- झारखंड के "साइमन उरांव"

<<<<<<< पर्यावरण की रक्षा -- जहाँ चाह वहाँ राह >>> >>>>
    मानव जीवन को सुखी व समृद्ध करने के लिए पर्यावरण में संतुलन अति आवश्यक है।वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण व अन्य सभी प्रदूषणों को दूर करने में पेड़-पौधों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है।लेकिन आज मानव जीवन की जरूरतें बढ़ रही हैं इसलिए पेड़-पौधों को समाप्त करके भवन निर्माण कार्य अधिक हो रहे हैं ।परिणामस्वरूप पर्यावरण दिन पर दिन अधिक प्रदूषित होता चला जा रहा है।

आज हम चाहकर भी पर्यावरण संतुलित नहीं कर पा रहे हैं या शायद हम उतने जागरुक नहीं हो पा रहे जितना होना चाहिए ।हमारे भविष्य की पीढ़ियों के सुखों के लिए जलवायु संतुलित करना अति आवश्यक है ।

            जहाँ चाह वहाँ राह--- यदि व्यक्ति कुछ अच्छा करने की ठान ले  तो मार्ग में कितनी भी वाधाएँ हों , उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकतीं ।ऐसे व्यक्ति कोई न कोई मार्ग अपने लिए तलाश ही लेते हैं ।वर्तमान समय में कुछ लोग पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे रहे हैं ।पेड़- पौधों से अपनी प्रकृति का श्रंगार कर रहे हैं ।

<<<<< पर्यावरण की कैसे सुरक्षा करते हैं,"साइमन उरांव" >>>>>

हर्ष की बात यह है कि हमारे देश के कुछ प्रकृति पुजारियों में एक 
हैं-- झारखंड प्रदेश के 85 वर्षीय  "साइमन उरांव" । ये पर्यावरण अंसंतुलन के दुष्प्रभावों को समझ रहे हैं ।और अपनी कठिन मेहनत और लगन से पेड़-पौधों का पालन-पोषण कर रहे हैं।

साइमन उरांव आज 85 वर्ष की उम्र होते हुए भी प्रातः साढे चार बजे उठकर अपने आस-पास के पेड़- पौधों और जंगलों की देख- भाल करने के लिए निकल जाते हैं और दोपहर तक घर लौटकर आते हैं ।इस उम्र में भी वे हर साल एक हजार पेड़ लगाने के लक्ष्य को पूरा करते हैं ।इनका मानना है कि पेड़- पौधे हमारे बच्चों की तरह ही हैं और उनकी अच्छी देख-भाल जरूरी है ।उन्हें खाद-पानी देना पड़ता है ।बीमार पड़ने पर उनका इलाज करना पड़ता है ।
तभी वे अच्छी तरह से फलते-फूलते हैं ।

वे अपने पूर्वजों की यह बात सदा याद रखते हैं, कि--- " बिना जरूरत के अगर किसी पेड़ की एक डाली भी काट ली जाए तो वनदेवी नाराज हो जाती हैं ।" वे किसी को बिना जरूरत एक पेड़ भी नहीं काटने देते।लगभग 28 वर्ष की आयु में ही ये खेती के काम में लग गए थे।

साइमन उरांव के पिता जी और चाचा जी , खेतों में धान रोपने के बाद मजदूरी के लिए चले जाते थे।एक बार धान की फसल सूख जाने के कारण गाँव में खाने का भी अकाल पड़ने लगा।लोगों का मानना था कि किसी माफिया ग्रुप के लकड़ी काटे जाने के कारण गाँव में सूखा पड़ रहा है , अतः वन का दोबारा पनपना जरूरी है।
  
साइमन उरांव  ने सभी गाँव वालों को इकट्ठा किया और मन में ठान लिया कि अब किसी को पेड़ नहीं काटने देंगे और अधिक से अधिक पेड़ लगाकर पूरे इलाके को हरा-भरा करेंगे, तभी सूखे का संकट दूर होगा।हालाँकि लकड़ी माफियाओं से टकराना आसान नहीं था, लेकिन वे गाँव वालों की एकता देखकर पीछे हट गए।

इसके बाद से तो साइमन उरांव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार अपनी लगन और मेहनत से पेड़-पौधे लगाकर प्रकृति की सेवा करके पर्यावरण को संतुलित करने में महाभूमिका निभा रहे हैं ।पेड़- पौधों की सेवा के साथ-साथ उन्होंने पेड़-पौधों की सिंचाई के लिए जगह-जगह पर कुँए और तालाब भी खुदवाए ,
जिससे जलसंकट भी दूर हुआ।इन कुओं और तालाबों का लाभ उनके ब्लाॅक के लगभग पचास गाँवों को मिलता है।

                               उन्होंने पानी रोकने के लिए कच्चे बाँध बनवाए , लेकिन जब वे टिक न सके तो सरकार से मदद लेकर फिर वहाँ पक्के बाँध बनवाए ।उसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर उन बाँधों को कुओं और तालाबों के साथ जोड़ दिया जिसके फल स्वरूप-- पहले जिस खेत में एक साल में एक फसल लग पाती थी , आज वहाँ वे लोग एक साल में तीन फसल उपजा लेते हैं ।

आज देश में तो क्या सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण बहुत प्रदूषित हो चुका है जिसके कारण मानव जीवन में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं ।सबका हल है -- अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाना।

आज हमें जरूरत है " साइमन उरांव "  के प्रयासों से प्रेरणा लेने की।सचमुच ऐसे लोगों का जीवन धन्य है जो पेड़-पौधे लगाकर पर्यावरण को शुद्ध व संतुलित कर रहे हैं ।सभी प्रकृति प्रेमियों को सादर नमन। आओ हम सब भी साइमन उरांव की तरह प्रकृति की सेवा करें, 
         "प्रकृति सेवा ही ईश्वर की आराधना है।"

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Saturday, February 15, 2020

मुस्कराने की आदत से लाभ ही लाभ, वैज्ञानिकों के अनुसार मुस्कराहट के प्रभाव ।

  <<<<<<<  मुस्कराने की आदत से लाभ ही लाभ >>>>>>>
मुस्कराहट  व्यक्तित्व की शान होती है।मुस्कराता हुआ चेहरा सबको आकृष्ट करता है।मुस्कराहट अजनबियों से भी दोस्ती के तार जोड़ देती है।चेहरे पर छाने वाली एक मुस्कराहट थोड़ी देर के लिए हर तरह के तनावों से दूर कर देती है।मुस्कराहट से हमारे आस-पास का वातावरण भी खुशनुमा बन जाता है।मुस्कराता चेहरा सभी के लिए सदा आकर्षण का केन्द्र होता है।

जो लोग मुस्कराकर हर समस्या का समाधान ढूँढने में विश्वास करते हैं वे सफलता प्राप्त करके ही रहते हैं ।मुस्कराहट स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छी औषधि है।हाँ , बस मुस्कान कृतिम या बनावटी न होकर स्वाभाविक होनी चाहिए ।मुस्कराहट एक व्यायाम की तरह है , जो व्यक्ति के चेहरे पर चमक बनाए रखने में सहायक होती है। मुस्कराहट से न केवल दूसरों को आकर्षित किया जा सकता है बल्कि खुद को भी एक सुखद एहसास से भरा  जा सकता है क्योंकि मुस्कराहट से स्फूर्ति व ऊर्जा का संचार होता है ।
 
<<<<<<मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मुस्कराहट के प्रभाव >>>>>

मनुष्य के चेहरे के भावों पर मनोवैज्ञानिक शोध करते रहते हैं ।मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मुस्कराने की आदत न सिर्फ स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती है ; बल्कि जीवन और खुशियों के बीच सामंजस्य बैठाने में भी सहायक होती है।

कहा जाता है कि जन्म लेते ही शिशु रोता है, चार-पाँच सप्ताह बाद मुस्कराता है तथा चौथे-पाँचवें महीने में हँसने लगता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार-- हमारे मस्तिष्क में माइनर न्यूरॉन पाया जाता है , जो मुस्कान पैदा करता है।मुस्कान भी हमारी बाॅडी लेंग्वेज का एक हिस्सा है।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रमुख डॉक्टर विलियम फ्रेंक का कहना है कि मुस्कराते चेहरे वाले लोग दूसरे लोगों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ रहते हैं ।उनकी रोगप्रतिरोधक शक्ति भी औरों से अधिक होती है।वे निर्णय भी जल्दी लेते हैं ।वे छोटी-छोटी बातों में तनाव नहीं लेते।

मनोवैज्ञानिक केल्टर का मानना है कि  " सच्ची प्रेममय मुस्कान का अभ्यास जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।"  मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक रूप से सच्ची मुस्कान व्यक्ति के मस्तिष्क तक यह संदेश पहुँचाती है कि वह सुरक्षित है।मुस्करा कर बात करने वाले से सभी लोग जल्दी प्रभावित हो जाते हैं ।

                              मनोवैज्ञानिकों का यह मानना है कि जब व्यक्ति जान-बूझकर कोई झूठ बोलता है तो वह सामान्य से कम मुस्कराता है।झूठी मुस्कान सच्ची मुस्कान से अधिक नकली होती है इसलिए दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता कम रखती है।मुस्कान के छह प्रकार हैं-- बंद ओठों की मुस्कान, तिरछी मुस्कान,
बंद जबड़ों की मुस्कान, ऊर्ध्व स्मित मुस्कान, खुले मुँह की मुस्कान
और स्थाई मुस्कान ।

हमारी मुस्कराहट से हमारे आस-पास के लोगों पर हमारे व्यक्तित्व का उत्साहवर्द्धक असर पड़ता है।कहते हैं- कि डॉक्टर के हँसते  हुए चेहरे से मरीज की आधी बीमारी ठीक हो जाती है।मुस्कराहट व्यक्ति के जीवन में एक जादुई असर दिखाती है।मुस्कराहट का यह जादू हर कोई कर सकता है और सबके चेहरे पर मुस्कराहट ला सकता है।इसलिए सभी को मुस्कराने की आदत डालनी चाहिए ।

यदि लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों के मध्य अपनी स्वाभाविक मुस्कान को बनाए रख सकेंगे, तो पाएँगे कि कुछ ही समय में उनकी समस्याएँ भी समाधान सरलता से दे देंगी।मुस्कराकर किसी को सिर्फ खुश ही नहीं करते बल्कि दूसरों की पीड़ा भी कुछ देर के लिए कम कर सकते हैं ।

मुस्कराने में कुछ खर्च नहीं होता, यह सिर्फ मन की प्रेरणा और अधरों की हरकत होती है।ऐसा लगता है कि मुस्कराना सिर्फ एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं; क्योंकि जब तक व्यक्ति के मन में उल्लास, खुशी, शांति, संतोष का भाव न हो तब तक अधरों पर मुस्कान नहीं आती।मुस्कराने से हमारे मन की नकारात्मक भाव दूर हो जाते हैं ।

मानव प्रकृति पर शोध करने वाले मनोवैज्ञानिकों का यह कहना है कि मुस्कराहट की 19 किस्में होती हैं और हर मुस्कराहट का अपना अलग अंदाज होता है।मुस्कराते हुए चेहरे जल्दी ही कहीं भी अपनी पहचान बना लेते हैं ।कोई भी चीज बाँटने से कम नहीं होती इसलिए आज से ही हम मुस्कान बाँटने की आदत बनाएँ ।

      "मुस्कराहट से जीवन में अमृत वर्षा होती है। आओ हम सब मूस्कराएँ।:

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Friday, February 14, 2020

महामंत्र "राम-नाम" का महत्व एवं महामंत्र " राम-नाम " से मोक्ष प्राप्ति

  <<<<<<<<  महा मंत्र " राम-नाम " का महत्व  >>>>>>>>
राम नाम महामंत्र है, प्रभु का पावन मंत्र है ।इस मंत्र को भगवान शिव भी जपते हैं ।राम-नाम का जप करने में अमृत सा स्वाद है और यही स्वाद मोक्ष रूपी परिणाम प्रकट करता है।जिह्वा से राम नाम का उच्चारण होते ही जीवन का परिदृश्य बदल जाता है, जीवन के बाहरी और भीतरी क्षेत्र में प्रकाश ही प्रकाश भर उठता है।राम नाम के उच्चारण से शरीर और मन दोनों ज्योतिर्मय होने लगते हैं ।

राम -नाम का उच्चारण जीभ से होता है, देह से होता है, स्वरों से होता है परन्तु उसमें लीन होते हैं-- प्राण और मन। राम-नाम के उच्चारण से मन रूपांतरित होने लगता है और हृदय के द्वार खुलने लगते हैं ।राम- नाम नेत्र है अर्थात बोध कराने वाला है, अनुभव प्रदान करने वाला है।जिस ज्ञान से राम न दिखे , राम की अनुभूति न हो , जिस ज्ञान से परमात्मा साक्षात और साकार न हो , वह ज्ञान निरर्थक है।राम ज्ञान का नेत्र है इसलिए हमें भटकने से बचाता है, हमारे जीवन को सही राह दिखाता है।राम नाम के द्वारा हम परमात्मा से साक्षात्कार कर सकते हैं ।

    राम-नाम अनमोल रतन है , जप लो इसको प्राणी।
    ऋषि मुनि सब जपते इसको, है ये अमृत वाणी ।।

 राम नाम भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है।राम नाम के बिना हम अधूरे भारतीय हैं ।राम- नाम के दो अक्षर मधुर हैं, मनोहर हैं ।मधुरता जिह्वा का स्वाद होती है और मनोहरता , मन की लीनता।जीवन में राम नाम से अधिक और कुछ नहीं है।राम-नाम में स्वाद है, अमृत है , इसमें तृप्ति, तुष्टि, सुगति और मोक्ष भी है।राम नाम से जो तरंगें एवं लहरें उठती हैं वे अत्यन्त आनन्ददायी होती हैं ।

राम-नाम भक्त और भगवान के बीच का सेतु है, दोनों को जोड़ता है।प्रभु से जुड़ाव के मिलन का यह आनंद होता है और इससे जो प्रसन्नता होती है , यही तो परम मोक्ष है।राम नाम किसी भी अवस्था में जपा जाए इसका परिणाम सदा सुखद ही होता है ; क्योंकि राम-नाम सार्वजनिक एवं सर्वकालिक है।इसे कोई कहीं मी , किसी भी समय में जप सकता है।इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं---
 
 भायँ  कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।।

राम- नाम रूपी महामंत्र पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है ।अन्य  मंत्रों के लिए तिथि, मुहूर्त, घड़ी, स्थान एवं काल आदि निर्धारित होते हैं ।राम-नाम सभी का मंत्र है। राम नाम के जप से सम्पूर्ण ज्ञान प्रकट हो जाता है।

    राम नाम की ज्योति जलाकर, जीवन को चमकाओ।
     राम नाम जप करो निरन्तर,  परम धाम को पाओ ।।

राम-नाम जिस वर्णमाला से लिखा जाता है, वह उसकी देह है।वर्णमाला देह है और राम-नाम उसके नेत्र हैं ।सारा ज्ञान वर्णमाला में ही समाहित होता है।वर्णमाला के बिना हम आपने ज्ञान को अभिव्यक्त नहीं कर सकते, अपने ज्ञान को आकार नहीं दे सकते।
तुलसीदास जी कहते हैं कि ' बरन विलोचन '  ।वरन् अर्थात वर्णमाला और लोचन अर्थात नेत्र ।राम- नाम वर्णमाला के नेत्र हैं ।

 <<<<<<< महामंत्र " राम-नाम" से मोक्ष प्राप्ति >>>>>>>>

राम-नाम के जप से जन्म-जन्मांतर की सारी गाँठें खुल जाती हैं ।ये गाँठें हमने अपने कर्मो के कारण ही बाँध रखी हैं ।शरीर से प्राण का जुड़ाव है, प्राण से मन जुड़ा है और मन से जीवात्मा जुड़ी है।शरीर में बड़ी सूक्ष्म ग्रन्थियाँ हैं ।ये ग्रन्थियाँ खुलते ही मनुष्य जीवनमुक्त होने लगता है।राम- नाम के निरन्तर जप से इन ग्रन्थियों का भेदन होता है।राम-नाम ऐसी कुंजी है, जो सभी ग्रन्थियों का भेदन करती है।

मुख्य रूप से तीन सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं-- ब्रह्म ग्रन्थि, रुद्र ग्रन्थि, और विष्णु ग्रन्थि।इन ग्रन्थियों का भेदन करके जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त की जा सकती है ।जीवन्मुक्त अवस्था के बारे में उपनिषद् का मंत्र कहता है---
         भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया ।
       क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ।।--- मुंड.2/2/8
अर्थात अंत में हृदय की गाँठ खुल जाती है और जीवात्मा मुक्त हो जाती है।राम-नाम के जप से ऐसा दिव्य प्रकाश उत्पन्न होता है कि
मन में कोई संशय नहीं रहता।और न ही कोई प्रश्न उठता है।राम-नाम के जप से कर्म का अंधकार मिट जाता है और फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है।

   राम नाम है मुक्ति दाता , भव से पार कराए  ।
  इसके बिना कोई न जग में, सुख शान्ति को पाए ।।

अन्तर्राष्ट्रीय फूल दिवस, फूल प्रकृति का श्रंगार, भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम, फूलों के रासायनिक प्रभाव एवं औषधीय महत्व अर्थात सुगंध चिकित्सा ।

 ●●● अन्तर्राष्ट्रीय फूल दिवस, फूल प्रकृति का श्रंगार ●●●
 19 जनवरी अन्तर्राष्ट्रीय फूल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस सृष्टि में प्रकृति ने जब से विस्तार पाया तभी से फूलों की भी उत्पत्ति हुई होगी। फूल प्रकृति का श्रंगार हैं, ये प्रकृति का उपहार हैं ।फूलों के माध्यम से प्रकृति अपना श्रंगार करके वातावरण में अपनी सुगंध , सुन्दरता व विशेषता बिखेरती है।

परमेश्वर की अद्भुत कृति हैं- फूल।इस सृष्टि में फूलों की हजारों जातियाँ हैं ।प्रकृति के अद्भुत रहस्य व उसकी गूढ़ता का एहसास फूलों की विविधता भरी खुशबुओं और रंगों को देखकर लगाया जा सकता है।फूल प्रकृति की चेतनता , उर्वरता, सजीवता, व जीवंतता के प्रतीक हैं ।प्रकृति के साथ-साथ समूची पृथ्वी फूलों से शोभायमान होती है।

प्रकृति फूलों के माध्यम से अपनी प्रसन्नता व्यक्त करती है अर्थात जब फूल खिलते हैं तो प्रकृति भी इनके साथ मुस्कराती है।फूल वातावरण को न केवल सुगंधित व स्वच्छ करते हैं वरन् प्रकृति का सौन्दर्य भी बढ़ा देते हैं ।स्पष्ट है कि फूलों का मनुष्य समाज से सदियों पुराना रिश्ता है।फूल प्रसन्नता के प्रतीक हैं ।फूल समर्पण, सम्मान, सौंदर्य, संवेदना, सुकोमल भावनाओं व शुभकामनाओं के प्रतीक हैं ।

                मनुष्य व फूलों का रिश्ता आदिकाल से ही रहा है।मानव जीवन के विकास क्रम के साथ-साथ मनुष्य ने विभिन्न-विभिन्न फूलों की पहचान की और उन्हें अपने आस-पास उगाया, विकसित किया और उनका उपयोग भी किया।पूरी दुनिया में लगभग पैंसठ  (65) हजार प्रजातियाँ पाई जातीं हैं ।यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि वनस्पतियों की विविधता के अलावा धरती पर किसी भी दूसरी प्रजाति की इतनी प्रजातियाँ नहीं पाईं जातीं ।

                      फूल शब्द का पर्याय ही मानो सौन्दर्य है।अनेक बार सौन्दर्य की उपमा फूलों से की जाती है।जैसे- कमल नयन, फूल जैसा बच्चा, गुलाब जैसा मुखड़ा इत्यादि-इत्यादि ।फूलों की सुन्दरता सहज ही सबको आकर्षित करती है और इनकी खुशबू  वातावरण में बिखरकर सुगंध बिखेरती है एवं वातावरण को पवित्र एवं ऊर्जावान भी बनाती है ; क्योंकि फूलों के समान सुंदर , पवित्र और सुगंधित और कुछ नहीं होता।इसीलिए फूलों से तरह-तरह के इत्र भी बनाए जाते हैं ।

 ●●● फूल हैं भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम ●●●

फूल मानव मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति का अति सुन्दर माध्यम हैं ।ईश्वर की पूजा हो, किसी भी प्रकार का उत्सव हो, किसी को बधाई देनी हो , किसी के प्रति प्रेम दर्शाना हो-- सभी अवसरों पर फूलों के द्वारा भावनाएँ अभिव्यक्त की जाती हैं ; क्योंकि फूल अपनी सुगंध, अपनी पवित्रता व अपने सौन्दर्य से वह सब बयान कर देते हैं जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता।फूल दिलों के बीच की दूरियाँ भी कम कर देते हैं ।

फूलों में भावनात्मक प्रगाढ़ता उत्पन्न करने का गुण है।एक अमेरिकी वैज्ञानिक पीयर्सन ने वर्षों  फूलों का अध्ययन किया और पाया कि फूल अपने चारों ओर के वातावरण में एक ऐसी ऊर्जा बिखेरते हैं जो व्यक्ति के मन में न केवल ताजगी भरती है, बल्कि इससे दिमाग को एक विशेष प्रकार की विश्रांति भी मिलती है।यही कारण है कि वातावरण को सजीव, सुगन्धित व सुसज्जित बनाने में ताजे फूलों को विशेष प्राथमिकता दी जाती है ।

दुनिया के किसी भी मनुष्य को कभी किसी ने यह नहीं सिखाया कि फूलों को पूजा में उपयोग करना चाहिए  या फूलों द्वारा प्रेम अभिव्यक्ति करनी चाहिए ।किसी ने कभी यह भी नहीं कहा कि फूलों को देखकर उल्लासित होना चाहिए ।फूलों के द्वारा जो कुछ भी व्यवहार शुरु हुआ है वह स्वतः ही हुआ है।दुनिया की हर संस्कृति व हर समाज में फूलों का महत्व है।दुनिया का हर समाज अपने इष्ट को फूल समर्पण करता है ,अपने प्रेम की अभिव्यक्ति  व श्रद्धांजलि भी फूलों के द्वारा करता है।

प्राकृतिक फूलों की भीनी खुशबू  वातावरण में सुगंध बिखेरती है व फूलों की अद्भुत छटा किसी का भी मन मोह लेती है और मन को तरोताजा कर देती है।फूलों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक, फूलों से पैदा होने वाले भावनात्मक आकर्षण को देखकर आश्चर्य चकित हैं ।दुनिया के कोने-कोने में बसे हुए लोगों के मन में फूलों के प्रति जो भाव है , उसमें काफी समानता पाई जाती है।

         ●●● फूलों के रासायनिक प्रभाव ●●●

                फूलों के अत्यन्त  सकारात्मक प्रभाव होते हैं ।वैज्ञानिकों ने पाया है कि फूलों के व्यापक प्रभाव हैं ।ॠतुराज वसंत के आते ही जब प्रकृति में सब ओर फूल खिल  जाते हैं तो इन्सान का मन भी प्रसन्नता का अनुभव करता है।रंग-बिरंगे फूलों को देखने मात्र से व इनकी सुरभित सुगंध से लोगों के मन में ऐसी पुलकन पैदा होती है , जिसकी तुलना संभव नहीं है।

जापान के एक वैज्ञानिक कास्टूरा कौमूरा ने अपने अनुसंधान में पाया कि वसंत ऋतु में चारों तरफ खिले हुए फूल शरीर में ऐसे रसायन बनाते हैं जो हमारी भावनाओं को सुदृढ़ करते हैं।रसायन शास्त्रियों ने अपने अध्ययनों द्वारा प्रमाणित किया है कि ताजे फूलों की खुशबू वातावरण में मौजूद कार्बन- डाइऑक्साइड के असर को कम करती हैं ।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि फूलों का संपर्क हर तरह के स्वभाव वालों की संवेदनाएँ जगाने की क्षमता रखता है।फूलों से हरे-भरे उपवन को देखकर अपराधी स्वभाव वाले मनुष्य भी एक बार ठहरकर फूलों को देखते जरूर हैं ।फूलों का यह रासायनिक प्रभाव ही है जिसके कारण फूल हर तरह के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं ।रंग व सुगंधों के रसायन विज्ञान की इतनी उन्नति के बावजूद विज्ञान फूलों की विविधतापूर्ण खुशबुओं और रंगों की अनंतता देखकर आश्चर्यचकित है।

फूलों का यह रासायनिक प्रभाव ही है , जो लोगों को मुग्ध करता है और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है।
 
●●● फूलों का औषधीय महत्व , सुगंध चिकित्सा ●●●

                         मनुष्य व फूलों का सम्बन्ध आदिकाल से ही रहा है।प्राकृतिक फूलों की अपनी महत्ता है ।प्राचीन काल से ही अलग-अलग तरह के फूलों की पहचान करके एवं उनका महत्व समझकर बड़े पैमाने पर फूलों को उगाया जाता रहा है और उनका प्रयोग भी किया जाता रहा है।फूलों की विशेष सुगन्ध के माध्यम से चिकित्सापद्धति विकसित की गई, जिसे आधुनिक भाषा में एरोमाथेरेपी ( सुगंध चिकित्सा ) कहते हैं ।फूलों का औषधीय महत्व भी है।

आधुनिक शोधों में पाया गया है कि फूलों की भिन्न-भिन्न किस्में और अलग-अलग गन्धें विभिन्न रोगों के उपचार में काम आ सकती हैं ।मानसिक तनाव जैसी परेशानियों से इन सुगंधों से लाभ मिलता है।वस्तुतः सुगंध चिकित्सा का प्रचलन प्राचीन काल से ही चला आ रहा है।गेलेन एवं सेल्सस प्रभृति चिकित्सा विज्ञानियों ने  सुगंध  चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष ख्याति अर्जित की।वे शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों के उपचार में विविध प्रकार के सुगंधित पुष्पों एवं जड़ी-बूटियों का उपयोग करते थे।

पिछले दिनों तत्कालीन सोवियत संघ में गंध चिकित्सा द्वारा रोग-निवारण के लिए वाक नगर ( रशियन फेडरेशन ) में एक अस्पताल खोला गया। उसमें रोगों के अनुसार रोगियों को अलग-अलग गंध वाले पुष्पों के गमलों के बीच बिठा दिया जाता है और उन्हें गहरी साँस लेकर सुगंध खींचने के लिए कहा जाता है।किस रोगी को कितनी देर तक , किस समय , किस फूल की गंध सूँघनी चाहिए-- यह उसके रोगनिदान के आधार पर किया जाता है।भिन्न-भिन्न फूलों में भिन्न-भिन्न रोगों के निवारण की क्षमता खोजी गई है और उस आधार पर गंध चिकित्सा पद्धति विकसित की गई है ।
 
आजकल वातावरण को खुशबू दार बनाने के लिए कृतिम खुशबू के भी उत्पाद मिलने लगे हैं ।यह कृतिम खुशबू वातावरण में मौजूद कार्बन-डाॅइऑक्साइड को कम करने के बजाय उसे और ज्यादा बढ़ा देती है कृतिम खुशबुओं के अधिक संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी हो सकती हैं ।

प्राकृतिक फूलों में विशेषताएँ ही विशेषताएँ हैं ।इसलिए मानव जीवन में फूलों का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है।और आज भी मानव जीवन फूलों से सुशोभित हो रहा है।

हम सभी सदा फूलों की तरह मुस्कुराते रहें ।




Thursday, February 13, 2020

अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस-- बच्चों को खुश रहना कैसे सिखाएँ

    
          <<<<<<< अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस >>>>>>>        20 मार्च 2013 से अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाने की परंपरा शुरु हुई है। प्रसन्नता को लेकर दुनिया भर में अनेक शोधकार्य चल रहे हैं ।इन्हीं में से एक शोध के अनुसार-- प्रसन्नता में बाहरी कारकों का सिर्फ 10 प्रतिशत योगदान रहता है ; जबकि 90 प्रतिशत प्रसन्नता स्वयं व्यक्ति पर निर्भर रहती है।शोध में यह बात भी सामने आई है कि इन खुशियों का उसकी जमीन जायदाद या उपलब्ध संसाधनों से कोई लेना-देना नहीं होता ।

प्रसन्नता के पल जीवन में हर पल मौजूद रहते हैं, बस जरूरत है उन तक पहुँचने की।जिसने प्रसन्नता को अपने जीवन में पाना सीख लिया , उसके लिए यह जीवन अनेक सुखद संभावनाओं का द्वार बन जाता है ।जीवन उसके लिए स्वर्ग समान हो जाता है।कहते हैं कि प्रसन्नता का कोई तय समीकरण नहीं होता ।व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को किस तरह लेता है , उन्हें किस तरह समझता है --  ये तथ्य ही खुश रहने की राह दिखाते हैं ।

   यह सत्य है कि जीवन में सदा सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं हो सकता, इसके बावजूद भी ऐसा बहुत कुछ है जिससे हम अपने मन को समझाकर खुशियाँ हासिल कर सकते हैं ।यदि ऐसी छोटी-छोटी बातें बचपन से ही समझा दी जाएँ तो खुश रहने की आदत बन सकती है।

<<<<<<< बच्चों को खुश रहना कैसे सिखाएँ >>>>>>>>

खुशियों की पौध उगानी है तो इसके लिए बच्चों का मन बेहतर मनोभूमि है, क्योंकि उनकी मनोभूमि अभी उर्वर है ।यदि माता-पिता बच्चों को खुशमिजाजी की विरासत दे सकें तो बच्चों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ उपहार होगा। हर अभिभावक की इच्छा यही होती है कि उनके बच्चे सदा हँसते-मुस्कराते रहें ।इसके लिए उनकी परवरिश ही इस तरीके से की जाए , जिससे वे हर परिस्थिति में खुश रहना सीख जाएँ ।उन्हें यह मंत्र शुरु से ही सिखाया जाए कि--
" मन के हारे हार है मन के जीते जीत "। उन्हें घर-परिवार में खुशनुमा माहौल मिले ताकि वे बड़े होकर स्वयं भी खुश रहें और दूसरों को भी खुशियाँ प्रदान करें ।

बच्चे बेहद संवेदनशील होते हैं, उनका मन कोमल होता है ।अतः उनके साथ जैसा व्यवहार किया जाता है , वह उनके मन को गहराई से स्पर्श करता है।अच्छा व्यवहार उनके व्यक्तित्व को निखारता है।इस तरह घर परिवार में बच्चों का व्यक्तित्व एक साँचे में ढलता है , जो उनके सम्पूर्ण जीवन की आधारशिला बनता है।

इसलिए यदि अभिभावक अपने बच्चों को खुशमिज़ाज बनाना चाहते हैं तो वे स्वयं खुश रहें और बच्चों को खुश रहने का तरीका सिखाने के लिए कुछ और बातों पर भी ध्यान दें--

विशेषज्ञों का  मानना है कि ज्यादातर बच्चे अपने बडों का अनुसरण करते हैं ।परिवार में वे जो कुछ भी देखते हैं, जीते हैं, उसी को वे जीवनभर अपने व्यवहार में दोहराते हैं ।बच्चों को इस बात के लिए तैयार करना भी जरूरी है कि जीवन में सब कुछ हमारी मर्जी से नहीं होता।इसलिए हर परिस्थिति को स्वीकारना सीखें ।कभी जीत भी मिलती है तो कभो हार भी स्वीकारनी पड़ती है ।इसलिए उन्हें सकारात्मकता का महत्व समझाएँ।

विशेषज्ञों का यह मानना  है कि खुशी की बड़ी वजह यह है कि व्यक्ति जो है वही बना रहे दूसरों के जैसा बनने की कोशिश न करे।
इसलिए बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि उन्हें दूसरों की देखादेखी खुद को नहीं बदलना है, जो है उसे स्वीकार करना है और हर क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना है ।और प्रसन्नता से हर कार्य करना है।

            बच्चों की प्रसन्नता के लिए अभिभावकों को बच्चों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना है।इसके साथ ही बच्चों को जीवन जीने के कुछ व्यावहारिक सूत्र भी सिखाएँ जैसे-- स्वयं सही निर्णय लेना, अपने छोटे-छोटे काम स्वयं करना , अपनी गलतियों से सीखना, सभी के साथ अच्छा व्यवहार करना , व्यस्त रहना । जिस बच्चे की जिस कला या किसी अन्य क्षेत्र में रुचि हो तो उसको उस दिशा में आगे बढ़ने को प्रेरित करना चाहिए ।

बच्चों को बताएँ कि अपने जीवन की खुशियाँ उन्हें खुद तलाशनी हैं और अपने जीवन में हँसी-खुशी के विविध रंग बिखेरने हैं कि यदि जीवन में कोई दुख भी आए तो उन खुशियों में विलीन हो जाएँ ।आज के समय में थोड़ा योगाभ्यास भी बचपन से ही जरूरी है।भविष्य की अत्यधिक चिंता भी खुशियाँ छीन लेती है अतः बच्चों को भी वर्तमान में जीना सिखाएँ ।

कभी भी बच्चों की पढ़ाई या जीवनशैली की अन्य बच्चों से तुलना न करें ; क्योंकि ऐसा करने से बच्चों में कभी-कभी हीनभावना भी आ जाती है, वे उदास रहने लगते हैं और चिड़चिड़े स्वभाव के भी हो जाते हैं ।यदि बच्चे अधिक देर तक गुमसुम रहें तो उनसे प्यार से वजह जानने की कोशिश करें और उनकी उदासी दूर करके उनके साथ समय बिताएँ।

कई बार देखने में आता है कि बच्चों के मन में कम उम्र में ही बुराई, ईर्ष्या, गुस्सा और बदला लेने की भावना बैठ जाती है , अक्सर ऐसे व्यवहार का कारण उनमें किसी कारण नकारात्मकता
का होना दर्शाता है।अभिभावकों को चाहिए कि प्यार के साथ उन्हें समझाकर नकारात्मता दूर करने का प्रयास करें ताकि वे खुश रह सकें ।

     अभिभावक बच्चों को  बताएँ कि वे जीवन में प्रगति करने के लिए ,आगे बढ़ने के लिए अपने मन की सुनें, अपने अंदर से आने वाली आवाज़ को सुनकर उस पर चलें , खुद को कभी किसी से कम न समझें ।बच्चों को यह भी सिखाएँ कि वे जरूरतमन्दों की मदद करें, बुजुर्गों की सेवा व सम्मान करें ।दूसरों में अच्छाइयाँ देखें और प्रशंसा करें ।जब बच्चों में ऐसे गुण विकसित होने लगेंगे तो वे प्रसन्नता व उत्साह से भरपूर दिखेंगे।

मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि असल में खुशी हमारी सुविधाओं और वस्तुओं में नहीं होती, बल्कि हमारी आदतों में होती है।इसलिए यदि हम अपने  बच्चों को अच्छी आदतें सिखाएँगे तो वे खुद भी प्रसन्न रहेंगे और अपने जीवन को सुन्दर बनाएँगे।

संत जन भी यही कहते हैं कि जो अच्छी बातें  हम अपने  बच्चों को सिखाएँ, तो पहले खुद भी उन बातों पर अमल करें तो हमारा और हमारे बच्चों का जीवन स्वर्ग बन जाएगा।

 सादर अभिवादन व धन्यवाद ।



Wednesday, February 12, 2020

अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस ---- खुश रहना एक मानसिक दशा , हम कैसे खुश रहें ?

          <<<<<<अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस >>>>>>
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 मार्च का दिन अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस घोषित किया है।भूटान के प्रधानमंत्री "जिग्मे वाई थिनले" की पहल पर 20 मार्च 2013 से ही यह दिवस मनाना शुरू किया गया है।
खुशी मनुष्य के जीवन का आधार है ।इसी कारण खुशी को विकास के पैमाने के तौर पर स्वीकारा गया है और दुनिया भर के कई देश इस पर नीतियाँ बनाकर उस पर अमल करने में लगे हैं ।संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व भर के संगठनों और लोगों से शिक्षा और जागरूकता अभियानों के जरिए प्रसन्नता दिवस मनाने की अपील की है ।

            क्यों कोई खुश रहता है और कोई क्यों खुश नहीं रह पाता-- मनोवैज्ञानिक आज भी इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाए हैं ।एक सर्वेक्षण के आधार पर--- फिनलैंड के लोग विश्व में सबसे ज्यादा खुश लोग हैं ।डेनमार्क, आइसलैंड, स्विटजरलैण्ड और नाॅर्वे उस सूची में शीर्ष देशों में शामिल हैं ; जबकि 155 देशों की उस सूची में भारत 133 वें स्थान पर है। इस सूची में सम्मिलित देशों में लगभग हजार लोगों से कुछ सवाल पूछे जाते हैं जिनके आधार पर यह सूची प्रतिवर्ष अन्तर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस ( वर्ल्ड हैप्पीनैस डे) 20 मार्च को जारी की जाती है।

  <<<<<<< खुश रहना एक मानसिक दशा है >>>>>>>

खुश रहना एक मानसिक दशा है, खुश रहने के लिए दौलतमन्द होना जरुरी नहीं है ।लगभग सभी अध्ययनों ने यह साबित किया है कि खुश रहने वाले लोग कुटुंब में रहते हैं ।उनकी अपने परिवार वालों से व दोस्तों से अच्छी निभती है।जनरल ऑफ सोशियो - इकोनाॅमिक्स के आँकड़ों के अनुसार खुश रिश्ते बहुत कीमती होते हैं ।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हैप्पीनैस विशेषज्ञ डैनियल गिल्बर्ट के अनुसार- जीवन में जो भी चीजें हमें प्रसन्नता दे रही होती हैं, वे सब किसी न किसी रूप में परिवार व दोस्तों के माध्यम से ही आ रही होती हैं ।वर्षों तक इस विषय का अध्ययन करने वाले जाॅर्ज वैलंट के अनुसार--हमारे जीवन को जो सबसे अधिक प्रभावित करते हैं -
वे हैं दूसरों के प्रति हमारे सम्बन्ध ।इसलिए जीवन में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं ।

दूसरों से जुड़ाव, लगाव,अपनत्व हमें बहुत सारी खुशियाँ देता है।
जो व्यक्ति दूसरों के साथ बड़ी आसानी से सहज रहते हैं, सामंजस्य बिठा लेते हैं, अपनत्व जोड़ लेते हैं, वे खुशियाँ पाते हैं और खुशियाँ बिखेरते है।आत्मीयता का विस्तार ही हमारी खुशियों को असीम बनाता है।

आधुनिक जीवनशैली में बाहरी समृद्धि को अधिक महत्व दिया जाता है इस समृद्धि के कारण मनुष्य अन्दर से खोखला हो गया है अर्थात उसकी सच्ची प्रसन्नता कहीं खो गई है।तनाव और चिन्ताएँ बढ़ गई हैं ।स्वाभाविक खुशी न जाने कहाँ खो गई है।समृद्ध होकर भी खुश नहीं रह पाते लोग।

खुशियाँ तो कभी किसी दराज के भीतर किसी पुरानी किताब के पन्नों में मिल जाती हैं तो कभी अपने पकाए बेस्वाद भोजन के स्वाद में भी महसूस होती हैं ; जबकि कभी-कभी पाँचसितारा होटल के मैन्यू में वह ढूँढने से नहीं मिलतीं ।कभी-कभी किसी बेकार बर्तन में चिड़ियों के लिए आधा गिलास पानी रखकर भी व्यक्ति सारा दिन खुश रह सकता है और कभी मन्दिर में 500 का प्रसाद चढ़ाकर भी खुश नहीं रह पाता ।

इस तरह देखा जाए तो खुशी का सम्बन्ध मन को संतोष व सूकून देने वाली भावनाओं से होता है। क्योंकि जो भावनाएँ मन को कचोटती हैं, असंतुलित करती हैं, वे कभी भी खुशियों से जुड़ी नहीं हो सकतीं ।
 
              <<<<<<< खुश कैसे रहें >>>>>>>

खुशी के पल जीवन को खिलखिला देते हैं, महका देते हैं, एक नई  ऊर्जा व उमंग से भर देते हैं,  इसलिए ऊर्जावान और प्रेरित बने रहने के लिए खुश रहना बहुत जरूरी है। खुशी के बिना जीवन में नीरसता छा जाती है लेकिन खुशी से हमारे जीवन में प्रकाश की तरंगें छा जाती हैं ।   

●●●  हम खुश कैसे रहें----- हमारे आस-पास ही खुश रहने के  ऐसे बहुत से साधन हैं लेकिन हम उनसे अनभिज्ञ हैं-------

1--- हम जिस वातावरण में रहते हैं, प्रकृति ने उसमें अपनी भरपूर कला व सुंदरता का समावेश किया है।बस, खुश रहने के लिए हमें हमारे आस-पास के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने की जरूरत है ।

● 2--- हम हम हर पल अपने दोष और कमियों पर ही ध्यान देंगे तो उदास ही रहेंगे।इसकी जगह यदि हम अपने गुणों में वृद्धि करें और अपनी विशेषताओं का भरपूर उपयोग करें तो हमारी खुशी में वृद्धि होगी।

● 3--- अपनी रुचि व क्षमता के अनुसार  जीवन में एक लक्ष्य बनाएँ, और उस ओर प्रयासरत रहें ; क्योंकि वे व्यक्ति जीवन में अधिक खुश रहते हैं, जिनके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है।जीवन को उद्देश्य पूर्ण बनाना खुशियों को हासिल करना है।

● 4--- जीवन में हर पल कुछ नया सीखने की कोशिश करें ।नया सीखने से हमारी खुशियों में वृद्धि होती है और हमारी योग्यता भी बढ़ती है ।

● 5--- खुश रहने के लिए हमें सदा सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए ; क्योंकि नकारात्मता हमारी खुशी छीन लेती है।इसलिए हर काम उत्साह के साथ करने की आदत रखनी चाहिए, जिससे 
नकारात्मकता हमसे दूर रहे।

● 6--- जीवन में बहुत सी ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब हम प्रयास करके भी असफल रहते हैं ।ऐसे समय पर हमें घबराना नहीं चाहिए और फिर से संघर्ष करने के लिए तैयार रहना चाहिए जिससे कि हमारे मन में निराशा न हो और हमारी खुशी बरक़रार रहे।

● 7--- दूसरों की मदद करना, उनकी यथा संभव सहायता करना भी हमें आंतरिक खुशी देता है।इससे हमें सच्ची आंतरिक प्रसन्नता मिलती है।

● 8--- हमारे शरीर और मन का सम्बन्ध परस्पर एक - दूसरे से जुड़ा है।यदि शरीर स्वस्थ है तो मन भी स्वस्थ होगा।इसलिए खुश रहने के लिए शरीर और मन दोनों का ही स्वस्थ रहना जरूरी है अन्यथा हम खुशियों के पल को महसूस नहीं कर पाएँगे।

● 9--- खुश रहने के लिए अपने परिवार, मित्र, पड़ोसी व दैनिक जीवन में जो भी हमारे संपर्क में आते हों उन सभी से अच्छा व्यवहार रखना चाहिए ।यदि हम खुशियाँ देंगे तो पाएँगे भी।

● 10--- अपने भविष्य को अपार संभावनाओं व खुशियों से भरपूर निहारें ; क्योंकि उज्ज्वल भविष्य की संभावना व्यक्ति के अन्दर सकारात्मकता का बीजारोपण करती है और उसके भविष्य को सुंदर बनाती है।

खुशी पर हर व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है कोई इसे हमसे छीन नहीं सकता ।हमारी खुशी हमारे स्वभाव पर ही निर्भर है।जीवन का हर पल हमें खुशियों से भर सकता है, यदि हम इसे खुशियों से निहारें ।आधुनिक जीवन में तनाव मुक्त रहना है तो हमें खुश रहने की आदत बनानी होगी।

"परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना कि सभी के जीवन में सदा खुशियाँ हों, प्रसन्नता हो।"
सादर अभिवादन व धन्यवाद ।
 



 

Sunday, February 9, 2020

वायु प्रदूषण एक ज्वलंत समस्या , वायु प्रदूषण के कारण, वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव , बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के उपाय ।

1  <<<<<<<<  वायु प्रदूषण एक ज्वलंत समस्या  >>>>>>>
वायु प्रदूषण आज विश्व की एक ज्वलंत समस्या है।जीवित रहने के लिए श्वास लेना अनिवार्य प्रक्रिया है और यदि श्वास लेने वाली वायु में जहर घुला हो तो यह जीवन के अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है।दुनिया में बढ़ता हुआ वायु-प्रदूषण कई तरह से स्वास्थ्य संबन्धी चुनौतियों को प्रस्तुत कर रहा है।वायु में घुलता जहर आज हमारे जीवन में तरह-तरह की बीमारियों के रूप में संकट के बादल लेकर आ गया है।

आज देश के छोटे बड़े अधिकांश शहरों में वायुप्रदूषण के कारण लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ता चला जा रहा है।हम सोचते हैं कि हम विकास कर रहे हैं लेकिन सच तो यह है इसी विकास के कारण ही हवा ज्यादा प्रदूषित होती चली जा रही है।आज प्रदूषण फैलाने वाले लोग अपने त्वरित लाभ को हासिल करने के लिए अन्य लोगों को परेशानियों में डाल रहे हैं ।

चिकित्सकीय पत्रिका ' दि लेंसेट ' के अनुसार हर साल वायुप्रदूषण से उत्पन्न बीमारियों से 10 लाख से ज्यादा भारतीयों की मृत्यु हो जाती है।दुनिया के सबसे प्रदूषित 100 शहरों में 13 शहर भारत में हैं । "विश्व स्वास्थ्य संग़ठन"  की एक रिपोर्ट के अनुसार 25 प्रतिशत लकवे तथा 19 प्रतिशत कैंसर से पीड़ित व्यक्तियों की बीमारियों के पीछे पर्यावरण प्रदूषण ही मुख्य कारण है। 
  
एक शोध के अनुसार वायुप्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के जो भी कारण हैं वे परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ।वायु प्रदूषण सभी प्रकार के प्रदूषणों में घातक बनकर उभरा है।एक नए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण से मनुष्य में गुर्दे की बीमारियों की संभावना बढ़ सकती है।वायु प्रदूषण हमारे पर्यावरण के लिए हर तरह से नुकसान दायक है।

   2    <<<<<< वायु प्रदूषण के कारण >>>>>>

1 -  वायु - प्रदूषण बढाने में सबसे अहम् भूमिका है - यातायात में प्रयोग होने वाले डीजल पैट्रोल से चलने वाले वाहनों की ।जैसे -जैसे जनसँख्या वृद्धि हो रही है वैसे ही वैसे सभी प्रकार के वाहनों में भी वृद्धि हो रही है।वाहनों से निकलने वाला धुँआ वातावरण में घुलकर हवा को अशुद्ध कर रहा है।सड़कों पर प्रतिदिन दौड़ते लाखों वाहनों से हर रोज काॅर्बन-मोनोऑक्साइड , हाइड्रोकार्बन,
नाइट्रोजन ऑक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक, सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे कण निकल रहे हैं ।

             पिछले पन्द्रह वर्षों में दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में निजी वाहनों की संख्या में 82 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।वैज्ञानिकों के अनुसार, इन गाड़ियों से निकलने वाले धुँए का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा वातावरण में घुलकर अदृश्य रहता है।इनमें से हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश और उच्च तापक्रम से क्रिया करके ग्राउंड लेवल ओजोन का निर्माण करते हैं ।यह ग्राउंड लेवल ओजोन साँस की बीमारियाँ पैदा करता है और फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचाता है।

2 - वायु प्रदूषण का दूसरा मुख्य कारण औद्योगिक कारखाने हैं; क्योंकि कारखानों के द्वारा जहरीली गैसें छोड़ी जाती हैं ।इन कारखानों से लाभ तो उद्योग पतियों को अथवा अन्य प्रभावी वर्ग को होता है लेकिन कई गुना नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है ।

3 -  वायु प्रदूषण का तीसरा कारण भवन निर्माण ( बिल्डिंग कन्सट्रक्शन) भी है । इसमें अत्यधिक मात्रा में पत्थरों की कटाई आदि के कारण धूल उड़ती है जो हवा में मिलकर हवा को प्रदूषित करती है।  भवन निर्माण से लाभ तो बिल्डरों को होता है लेकिन हानि लाखों परिवारों को होती है।जैसा कि सभी जानते हैं शहरों में अनेक बहुमंजिला इमारतों का निर्माण कार्य निरंतर चलता ही रहता है।

4 - वायु प्रदूषण का एक कारण कोयला आधारित बिजली प्लांट भी है।इसके द्वारा काॅर्बन डाइऑक्साइड के साथ- साथ सल्फर तथा नाइट्रोजन के हानिकारक रसायन वायु में छोड़े जाते हैं ।ये रसायन भी हवा को प्रदूषित करते हैं ।

 5 - वायु प्रदूषण का एक कारण खेतों में जलाई जाने वाली पराली है।किसानों द्वारा धान की बाल को ऊपर से काट लिया जाता है ।शेष पराली को खेत में ही जला दिया जाता है; क्योंकि इसका दूसरा कोई लाभप्रद उपयोग नहीं है। विगत दिनों दिल्ली एवं हरियाणा में स्मोग के रूप में कुख्यात हुआ वायु-प्रदूषण इसी पराली के जलाने से उत्पन्न हुआ था।

6 - हमारे देश में विवाहोत्सवों व दीपावली पर जलाए जाने वाले पटाखे भी वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं ।पटाखों से उत्सर्जित होने वाली गैसें तथा धातु के कण बड़े जहरीले होते हैं पटाखों में मुख्यतः पोटेशियम नाइट्रेट, चारकोल और सल्फर भरा जाता है।पटाखों की रोशनी को अधिक चमकीला तथा असरदार बनाने के लिए उसमें एल्युमिनियम, मैग्नीशियम,स्ट्रान्शियम, सोडियम, ताँबा, बेरियम जैसे धातु तत्व भी मिलाए जाते हैं ।पटाखे चलाने पर ये धातु कणों के रूप में हवा में बिखर जाते हैं और हमारी साँसों के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं ।

अलग-अलग देशों में वायुप्रदूषण के अलग-अलग कारण हैं ।चीन में इसका कारण कोयला जलाने से निकलने वाले महीन कण हैं ।हमारे देश में खाना बनाने में गीली लकड़ी, खरपतवार और दूसरी चीजों को जलाने से भी वायु प्रदूषण होता है।यूरोप, ब्रिटेन, फ्रांस, नार्वे आदि सभी देश वायुप्रदूषण की समस्या झेल रहे हैं । ये सभी देश बिजली चालित वाहनों की शुरूआत कर रहे हैं जिससे वायुप्रदूषण के स्तर में कुछ सुधार हो।

3  <<<<<<< वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव >>>>>>>

वायु प्रदूषण हर तरह से हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है; क्योंकि जिस हवा में हम श्वास लेते हैं, श्वास के साथ ही वायु में घुले हुए खतरनाक कण हमारे शरीर में प्रवेश करके हमारे स्वास्थ्य को खराब कर रहे हैं ।एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वायुप्रदूषण से मनुष्यों में गुरदे की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
हाँलाकि बहुत पहले से ही वायु प्रदूषण को हृदयरोग, स्ट्रोक, कैंसर,अस्थमा से जोड़ा जाता रहा है।शोध कर्ताओं ने शरीर की बीमारियों में वायुप्रदूषण का पता लगाने के लिए करीब साढ़े आठ साल तक अध्ययन किया और पाया कि वायुप्रदूषण और शरीर की बीमारियों के बीच स्पष्ट सम्बन्ध है।

प्रदूषित वायु मनुष्यों के साथ-साथ पशु- पक्षी व अनेक जीवों के लिए खतरा बनती चली जा रही है। वायु प्रदूषण ऐसे ही बढ़ता रहा तो मानव जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।भारत में हर दिन दो मृत्यु वायु प्रदूषण से हो जाती हैं ।दिल्ली में तो अब वायु प्रदूषण के कारण कई- कई दिन स्कूल बन्द करने पड़ते हैं ।
प्रदूषित हवा के कारण बच्चों में साँस लेने सम्बन्धी बीमारियाँ तथा डायरिया जैसे रोग पाए जा रहे हैं ।

वाॅशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोo अली के अनुसार-- वायु प्रदूषण के कारण फेफड़ों को नुकसान होता है, इसके अलावा वह हृदय और गुरदों जैसे अन्य अंगों को भी नुकसान पहुँचाता है ।इस तरह दुनिया में बढ़ता हुआ वायु-प्रदूषण कई तरह से जीवन व स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को प्रस्तुत कर रहा है ।

4  <<<<<<< बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के उपाय >>>>>>>

       आज बढ़ते प्रदूषण की ज्वलंत समस्या के समाधान के प्रयास किए जाएँ, जिससे हमारा समस्त पर्यावरण सुरक्षित व स्वच्छ हो।
बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के लिए पहला - - वायु प्रदूषण की वृद्धि करने वाले कारणों पर रोक लगाई जाए  और दूसरा वायु प्रदूषण को सोखने वाले पेड़- पौधों की संख्या में वृद्धि की जाए।समस्त वन- जंगल और पेड़-पौधे वातावरण में स्थित कार्बन-डाइऑक्साइड ग्रहण कर लेते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं ।जिससे हमारा पर्यावरण संतुलित होता है।

पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की जगह इलैक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग शुरु कर देना चाहिए । भारत समेत कुछ अन्य देश भी धीरे-धीरे इलैक्ट्रिक वाहन शुरु करने की पहल कर रहे हैं, इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास जारी हैं ।ध्वनि व वायुप्रदूषण बढाने वाले पटाखों के निर्माण व बिक्री पर पाबंदी लगाई जाए और प्रचार माध्यमों से समाज को पटाखों से होने वाले नुकसान बताकर पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जाए।

                विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यू एच ओ ) के अनुसार वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य के खतरे को मापने के लिए पीएम - 2.5 सबसे सटीक पैमाना है।पर्टीकुलेट मैटर यानी पीएम- 2.5 पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित ठोस या तरल पदार्थ के छोटे ऐसे कण हैं, जिनका आकार महज 2.5 माइक्रोग्राम से भी कम होता है ।ये कण बड़ी आसानी से हमारे नाक व मुँह के जरिए शरीर के अन्दर तक पहुँचकर हमें बीमार बना सकते हैं ।

                    डब्ल्यूएचओ ने समय- समय पर सभी देशों को  निर्देश जारी किया है कि पर्टीकुलेट मैटर ,ओजोन, नाइट्रोजन, मोनो ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं ।अतः इन हानिकारक पदार्थों के लिए एक सीमा तय करनी चाहिए ।

 सभी किसानों को भी प्रदूषण के प्रति जागरूक किया जाए।जिससे वे भी पराली जलाना बन्द कर दें ।सरकार को चाहिए कि-
फसल के अवशेष ( पराली ) के अन्य उपयोग के लिए बाजार में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे किसानों को पराली न जलानी पड़े और फायदा भी हो।

पर्यावरण संतुलन का  मानव जीवन में बहुत महत्व है।आओ हम सब अपनी धरती माता का पेड़-पौधों से श्रंगार करके वायु प्रदूषण 
की रोकथाम करें ।और वायु प्रदूषण वृद्धि के  कारणों पर भी  रोक लगाएँ ।  
" हम प्रकृति के बनें पुजारी "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।