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Thursday, February 6, 2020

मीरा-- मीरा का कृष्ण प्रेम

    <<<<<<  मीरा का बचपन , मीरा का कृष्ण प्रेम  >>>>>>
लगभग चार- पाँच वर्ष की मीरा कुछ समझ पाती इससे पहले ही उसकी माँ ने शरीर त्याग दिया था। उसके सिर पर अब पिता रतन सिंह और उसके प्यारे राव दादू का हाथ था।पिता सारे दिन कामकाज में रहते और मीरा अपना अधिक समय अपने दादू के संग व्यतीत करती। एक बात जिससे उसका बाल मन अत्यन्त प्रभावित था, वह था उसका कृष्ण प्रेम ।यह कृष्ण प्रेम उसको अपनी माँ से विरासत में मिला था।मीरा की माँ भी कृष्ण की उपासक थीं ।


मीरा का जब भी मन करता, अपने भगवान मुरलीधर के सामने खड़ी हो जाती, और मूर्ति से बहुत सी बातें करती। मीरा के दादू यह देखकर महसूस करते कि यह कृष्णोपासना उसकी माँ के गुण हैं ।मीरा को जब अपनी माँ की याद आती तो वह कृष्ण से पूछती कि मेरी माँ मुझे छोड़कर कहाँ गई है।कभी -कभी रोती हुई कृष्ण की मूर्ति से कुछ बोलने का आग्रह करती।माँ की याद में छलकते हुए आँसू देखकर दादू का मन दुखी हो जाता ।
 
कुछ दन बाद दादू नन्ही मीरा को साथ लेकर मेड़ता आ गए ।मीरा अपने मुरली मनोहर और उनके सामान को लाना नहीं भूली।मीरा का माता की याद में दुखी देखकर , उसके दादू उसको साथ ही रखते ।तरह- तरह से उसका दुःख भुलाने की कोशिश करते।उसके मन को बाँटने का हर सम्भव प्रयास करते।कभी उसे जलाशय में स्फटिक से स्वच्छ जल में झिलमिलाती तारकावल्लियों को दिखाते।ज्योत्सना पूर्ण रात्रि होती तो जल में पड़ते, चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को दिखाते।

दादू के अगाध प्रेम में पल-बढ़कर और कृष्ण की भक्ति करती हुई  मीरा अब ग्यारह वर्ष की हो गई।मीरा के अंतर्मन से कृष्ण के प्रति शब्दावलियाँ स्वतः ही फूट पड़तीं।यह देखकर दादू प्रसन्न होते ।ऐसा लगता, कि अब तो मीरा बहुत समझदार हो गई है।एक दिन दादू से बोली कि दादू वचन दो- कि मैं कभी कृष्ण भक्ति से विमुख न होऊँ।दादू भी उसका कृष्ण अनुराग देखकर बोले कि " तुम्हें तो हम कृष्णार्पिता कर चुके हैं ।आगे मीरा बोली कि विवाह और भक्ति दोनों साथ-साथ निभाना मेरे लिए कठिन होगा।दादू ने उसकी जिद देखकर उस समय उसकी बात को मान लिया।
 अब कृष्ण भक्ति ही मीरा का ध्येय था।मीरा चतुर्भुज मंदिर की ओर हाथ जोड़कर खड़ी हो गई ।

राव दादू सोचने लगे कि भक्ति का मार्ग सरल भी है और कठिन भी।कठिन इसलिए है कि भक्ति के मार्ग में घर-संसार, स्वजन-परिजन सब एक-एक करके खोते चले जाते हैं और अंत में हृदय में केवल भगवान बच जाते हैं ।मीरा के भाग्य में क्या है, रह सोचकर उनका मन काँप जाता ।इस संसार में भक्ति नहीं है और भक्ति में संसार वास नहीं करता ।मीरा को संसार में रहकर भक्ति साधनी है।
                               दादू की उम्र भी अस्सी वर्ष की थी और मीरा की चिन्ता भी रहती थी इस कारण वह अस्वस्थ रहने लगे।एक दिन प्रातः जब मीरा को पता चला कि दादू अधिक अस्वस्थ हैं, वह दादू की शय्या के पास पहुँची ।मीरा को देखकर उनकी आँखों में हल्की चमक आई , और उनके मुख से अस्पष्ट शब्दों में निकला -- 'मीरा'।मीरा रोने लगी कि माँ भी मुझे छोड़कर चली गई और अब तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगी ? दादू  के ओंठ हिले , उन्होंने कहा कि--" जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है।मुरली मनोहर तुम्हारा ध्यान रखेंगे।वही तुम्हारे सगे-सम्बन्धी होंगे।तुम उनको नहीं भूलना।वे तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।

दादू के साथ मीरा का संबन्ध भावनात्मक ही नहीं, आध्यात्मिक भी था। दादू को मीरा का कृष्ण के प्रति लगाव देखकर ऐसी अनुभूति होती थी कि --" मीरा भक्ति के क्षेत्र में किसी क्रान्ति को जन्म देने के लिए ही अवतरित हुई है।इसीलिए दादू ने जो मीरा को अन्तिम समय में जो कहा , वह था तो साधारण परंतु उसका प्रभाव व्यापक हुआ मीरा ने अब पूर्ण रूप से अपने मन में यह बात बिठा ली कि -
  "मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरा न कोई 
जाके सिर मोरमुकुट मेरो पति सोई।"

                        मीरा ने निश्चय कर लिया कि भगवान कृष्ण के अतिरिक्त न तो वह किसी को अपना मानेगी और न ही किसी और को समर्पित होगी।  मीरा कृष्ण के गीत गाती रहती।धीरे-धीरे मीरा और उसके कृष्ण, जैसे एक ही व्यक्तित्व हो गए।ऐसा लगा कि अब मीरा अविवाहित ही रहेगी, परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन वह समय भी आया , जब मीरा को विवाह के बंधन में बँधना पड़ा ।मेवाड़ की राजरानी मीरा  " वीरों के वीर राणा संग्राम सिंह की कुलवधू बनीं ।

विवाह के बाद उसके कृष्ण प्रेम में कोई कमी नहीं आई।घर - परिवार में उसका मन नहीं लगता ।वह हर समय अपने कृष्ण के ध्यान में ही रहती ।इस बात से नाराज होकर उसके ससुराल वालों ने उसको मारने की कई बार कोशिश की।कक्ष में जहरीला साँप छोड़ा, एक बार बिष का प्याला दिया । भक्त की रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भगवान की होती है।मीरा के सामने जितनी बार कष्ट आए , उतनी ही बार उनसे रक्षा के साधन भी।परिवार वालों ने
मीरा को भक्ति के मार्ग से विचलित करने के अनेक प्रयास किए।पर मीरा की भक्ति में कोई कमी नहीं आई। 

 मीरा ने कठिन समय में अपने दादू को बहुत याद किया। मीरा ने अपने मन की व्यथा संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी को लिख भेजी ।गोस्वामी तुलसीदास स्वयं भक्ति की परिभाषा थे ।उनका जीवन भगवान श्री राम की भक्ति और उनके प्रति अनन्य प्रेम की अभिव्यक्ति में गुजरा।तुलसीदास भक्ति की राहों से परिचित थे और उस राह पर मिलने वाले कष्टों से भी।तुलसीदास दास जी ने मीरा को उत्तर भेजा--
" जाके प्रिय न राम वैदेही ।तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जदपि परम सनेही ।

मीरा के लिए इतना उत्तर पर्याप्त था।उन्होंने घर- परिवार छोड़ दिया।मीरा का शेष जीवन कृष्ण भक्ति में ही बीता ।ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपना काफी समय वृजमंडल क्षेत्र में गुजारा।
वृज में उन्हें हर समय कृष्ण की निकटता की अनुभूति होती थी।
वृज का समूचा क्षेत्र, यहाँ के रज- कण , यमुना के जल-कण उन्हें बार-बार अपनी ओर खींचा करते थे।अब तो उन्हें यह भी समझ नहीं आता था कि वृज उनके मन में रमा है या उनका मन ही वृज में रम चुका है।

अक्सर ही वे अपनी भाव समाधि में कृष्ण के दर्शन करतीं।कभी कृष्ण के संग होली खेलतीं। यमुना किनारे बैठीं मीरा को यमुना के जल में अपना कृष्ण प्रेम प्रवाहित होता दीखता।वे भाव समाधि में डूब जातीं ।उनके साथ रहने वाली मीणल जानती थी कि रानी सा ( मीरा) समाधि में चली  जाती हैं, जहाँ वे अपने कान्हा के साथ होती हैं ।मीरा के इस समाधि सत्य को वह जानती थी।

जीव गोस्वामी परम विद्वान एवं महान तपस्वी थे।मीरा से मिलने के बाद उन्होंने सच्ची भक्ति का स्वाद चख लिया था।एक बार वे अपनी भाव-समाधि में कान्हा के संग होली खेल रही थीं ।तब जीव गोस्वामी जी ने पूछा --- " किन भाव अनुभूतियों में खोई हुईं थीं आप ?"  मीरा ने कहा -- बस अपने कान्हा के संग होली खेल रही थी।"  गोस्वामी जी ने कहा कि "यह तो बस आपके लिए ही संभव है।" इस पर मीरा ने कहा--" कि आपके लिए भी संभव है।देखिए वृजभूमि को , यहाँ की प्रकृति को ।उत्सव ही उत्सव है।नाद ही नाद है।सब तरह के साज बज रहे हैं ।पक्षियों में, पर्वतों में, वृक्षों में, सागरों में ।सब ओर  विभिन्न रूपों में कन्हाई होली खेल रहा है, कितने रंग औल गुलाल फेंक रहा है।वे गाने लगीं---
" होली खेलत है गिरधारी 
चंदन केसर छिड़कत मोहन , अपने हाथ बिहारी।

इस प्रकार मीरा वृज में अनेक बार भाव समाधि में  कृष्ण के साथ होतीं ।यह अनूठी अवस्था होती , उनका विरह मिलन में परिवर्तित होने लगता। बाद में वे द्वारका में भी रहीं । अन्त में उनकी आत्मा कृष्ण में समा गई।उन्होंने अपनी भक्ति के बल पर कृष्ण को पा लिया।

" हरि नाम में खुद को डुबाया, हरि गुण गाके प्रभु को पाया
      लोक लाज बिसराकर मीरा ,  हर पल तुम्हें पुकारे।"

भक्ति मार्ग की राह में मीरा ने स्वयं को सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ किया ; क्योंकि मीरा ने स्वयं को कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया था।जिस तरह प्रभु अनंत हैं, वैसे ही उनकी भक्ति के मार्ग अनंत हैं और उन अनंत मार्गों पर चलने वाले पथिक अनंत हैं लेकिन उन पथिकों के बीच यदि कहीं 'रत्न' चमकता है तो वह मीरा की भक्ति का ही है।मीरा की भावपूर्ण शब्दों से प्रारम्भ हुई वह यात्रा भक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर ही सम्पन्न हुई।

मीरा की वाणी सबके हृदय को इसलिए झंकृत कर सकी थी ; क्योंकि उसमें से हृदय के भाव , जीवन के प्रखर प्राण निस्सृत हो रहे थे।मीरा के गीत आज भी भावप्रवण हैं ।
 
"भक्ति भाव में हुई मतवाली, रंग गई मोहन में अलबेली
    चहुँ ओर छवि निरखै मीरा , हर पल तुम्हें पुकारे।"

 कृष्ण भक्त आज भी बड़ी भक्ति भाव से मीरा के पदों को गाकर कृष्ण की भक्ति करते हैं ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Wednesday, February 5, 2020

स्वास्थ्य---- ब्रह्म मुहूर्त में उठना ( प्रातःकालीन जागरण) क्यों है लाभदायक, बदलती आधुनिक जीवनशैली । जानें इस पोस्ट में---



       <<<<<ब्रह्म मुहूर्त में उठना लाभदायक >>>>>
ब्रह्म मुहूर्त यानी रात्रि के अन्तिम प्रहर या सूर्योदय से लगभग डेढ़ दो घंटे पहले का समय ।हमारी प्राचीन परम्पराओं में ' ब्रह्म मुहूर्त '
में उठने का समय तय किया गया है।हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवनशैली के सभी नियम स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए ही बनाए थे।प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है।

 हमारे शास्त्रों में भी ब्रह्म मुहूर्त में जागने को ही सही बताया है, तभी तो प्राचीन काल में ब्रह्म मुहूर्त में, गुरुकुलों में गुरुजन अपने शिष्यों को वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करवाते थे।ऋग्वेद के अनुसार-- जो मनुष्य सुबह जल्दी उठता है , उसकी आयु लम्बी होती है।ब्रह्म मुहूर्त में रजोगुण एवं तमोगुण की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए इस समय में बुरे मानसिक विचार भी शान्त हो जाते हैं ।

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार--- सुबह जल्दी उठने से हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं ।जिससे हमारी स्मरण शक्ति भी अच्छी बनी रहती है।अनेक शोध अध्ययनों ने यह भी प्रमाणित किया है कि ब्रह्म मुहूर्त के समय हमारा वायुमंडल काफी हद तक प्रदूषण रहित होता है।इस समय वातावरण में प्राणवायु ऑक्सीजन की मात्रा भी अधिक रहती है।

आयुर्वेद के अनुसार-- ब्रह्म मुहूर्त में प्रवाहित होने वाली वायु, चन्द्रमा से प्राप्त अमृत कणों से युक्त होने के कारण हमारे स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान होती है, यह वीरवायु कहलाती है।जब हम ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठते हैं, तो यही अमृतमयी वायु हमारे शरीर को स्पर्श करती है।इसके स्पर्श से हमारे शरीर में तेज, बल, शक्ति, स्फूर्ति एवं मेधा का संचार होता है, जिससे मन प्रसन्न व शांत होता है।इससे हमारे फेफड़ों की शक्ति भी बढ़ती है, जिससे रक्त शुद्ध होता है।यही कारण है कि इस समय की गई सैर और व्यायाम, योग और प्राणायाम हमारे शरीर को निरोगी रखते हैं ।

सुबह जल्दी उठना हमारे लिए किसी औषधि से कम नहीं है।इससे हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति ( इम्यून सिस्टम) मजबूत होती है जिससे हम बीमार नहीं पड़ते ।प्रातःकाल टहलने से शरीर में शक्ति का संचार होता है और शरीर कांतियुक्त हो जाता है।

प्रातःकाल पक्षी भी जाग्रत होकर चहचहाने लगते हैं ।इसके साथ विभिन्न तरह के पशु भी प्रातःकाल में ही अधिक सक्रिय रहते हैं , मानो हमें भी संदेश देते हैं- कि अब जाग जाओ।पशु- पक्षियों की नियमित दिनचर्या उन्हें स्वस्थ व सक्रिय बनाए रखती है और हमें भी यह प्रेरणा देती है कि प्रकृति के नियमों का पालन किया जाए।

 सूबह जब व्यक्ति प्रातःकालीन उगते सूर्य का दर्शन करता है , अर्ध्य समर्पित करके सद्प्रार्थनाएँ करता है , तो मन में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होती है  और सूर्य की स्वर्णिम किरणें भी व्यक्ति के शरीर व अंतर्मन में प्रवेश कर उसे लाभान्वित करती हैं ।प्रातःकालीन सूर्योदय व उसके पूर्व- पश्चात का समय आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी उपयुक्त होता है, इसीलिए  हमारी संस्कृति में सुबह के समय जप, पूजा, ध्यान, प्राणायाम व व्यायाम का बहुत महत्व है।

यदि हम रामायण पढें, श्री मद्भागवत महापुराण पढें तो इन शास्त्रों के अनुसार--  ईश्वर रूप श्रीकृष्ण व श्री राम भी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जप, ध्यान एवं सूर्योपासना आदि किया करते थे।

<<<<<< बदलती आधुनिक जीवनशैली >>>>>>

आज की बदलती जीवनशैली में हम देर से सोने और देर से उठने को ही आधुनिक जीवनशैली का एक हिस्सा मानने लगे हैं ।हमेशा से ही जल्दी सोना और जल्दी उठने को ही महत्व दिया गया है।इसके विपरीत देर से सोना और देर से उठना , ये दोनों ही आदतें स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं हैं ।

                        आधुनिक जीवन में अनेक कारण ऐसे भी हैं, जिनकी वजह से व्यक्ति चाहकर भी जल्दी सो नहीं सकता।महा नगरों में दूर-दूर काम पर जाना, रात्रि के समय में नौकरी करना।शहरों में तो आजकल देर रात पार्टियाँ बहुत होने लगी हैं, जिनके कारण न तो लोग जल्दी सो पाते और न उठ पाते।इसके अलावा अनेक ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से जीवनशैली अप्राकृतिक हो  गई है ।

  अप्राकृतिक जीवनशैली के कारण रोगों में भी वृद्धि हो रही है ।देर से सोना और देर से उठने के कारण खान-पान भी व्यवस्थित नहीं रह पाता। देर रात भोजन ग्रहण करने से पाचन क्रिया भी मंद पड़ जाती है ।आजकल बहुत कम उम्र में ही लोग अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं । कभी-कभी किसी कारणवश देर तक जागना और उठना , इतना नुकसानदेह नहीं होता लेकिन इस क्रम को हम अपने जीवन में निरंतर के क्रम में शामिल कर लें तो इसके विपरीत परिणाम भी भुगतने पडेंगे।

आजकल हमारे देश में देर से उठने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है।कारण चाहे जो भी हों, सुबह देर से उठना एक तरह से लोगों ने अपना अधिकार समझ लिया है।आज की जीवनशैली में पहले टीवी और अब मोबाइल फोन पर इंटरनेट एक बहुत बड़ा कारण है।लोग देर रात तक इनमें व्यस्त रहते हैं, बडों की देखा- देखी बच्चे भी देर तक जगते हैं ।यह सब देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले 10 - 15 सालों में भारत के घरों में सुबह जल्दी उठने वाले लोग कम ही रहेंगे।
 
  आजकल विदेशों ने  हमारे देश की ऋषि-मुनियों की परम्परा ( वैदिक परम्परा) का महत्व समझ लिया है और वे इन परम्पराओं का पालन करके स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं लेकिन हम भारतीय अपनी वैदिक परम्पराओं से दूर होते जा रहे थे।  गत कुछ वर्षों से हमारे देश में योग क्रान्ति शुरु हुई है तब से हम भारतीयों ने अपनी योग पद्धति का महत्व समझना शुरू किया है और अब बहुत से भारतीय ब्रह्म मुहूर्त में उठकर योग - ध्यान आदि यौगिक क्रियाओं के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ उठा रहे हैं ।

समय रहते हम सभी को प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व समझ लेना चाहिए । बच्चों में भी जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत अभी से डालें ।हमारी संस्कृति के अनुसार प्राकृतिक जीवनशैली हमारे स्वास्थ्य के लिए वरदान है।अब से हम कोशिश करें- - जल्दी सोने और ब्रह्म मुहूर्त में उठने की।

 उठ जाग मुसाफिर भोर भई ,अब रैन कहाँ तू सोवत है।
जो  सोवत  है सो  खोवत है ,  जो जागत है सो पावत है ।।


  

Tuesday, February 4, 2020

संगीत- भारतीय संस्कृति और संगीत, मधुर संगीत की सामर्थ्य एवं संगीत चिकित्सा

                          <<<<< संगीत >>>>>
संगीत का मानव जीवन को सरस बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।हम सभी के जीवन में संगीत किसी न किसी रूप में विद्यमान है ।संगीत की ध्वनि सभी के मन को तरंगित करती है।एक नन्हा बच्चा भी मधुर संगीत को सुनकर आनंदित होकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।कुछ लोग मनोरंजन के लिए संगीत सुनते हैं कुछ स्वयं को तनावमुक्त करने के लिए तो कुछ लोग अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए संगीत का सहारा लेते हैं ।

मानव की कोमल भावनाओं को झंकृत, तरंगित करने में और उसमें देवत्व का उदय करने में गायन- वादन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।प्रकृति के विभिन्न जीवों के स्वर में, बहती हुई नदियों के कल-कल में, बहने वाली हवाओं की लहरों में प्राकृतिक संगीत ही तो है। हमरी प्रकृति में सब ओर संगीत ही संगीत है।जिसका हम आनन्द लेते हैं ।

प्रोफेसर जी.एन.रामचन्द्रन के अनुसार विज्ञान, आध्यात्म, साहित्य और संगीत एक ही परम तत्व के विभिन्न नाम हैं ।संगीत पूजा है, संगीत आराधना है,संगीत ईश्वर से मिलने का साधन है एवं संगीत आत्मसाक्षात्कार का साधन है। संगीत के स्वर को नाद कहते हैं ।कोई भी उत्सव हो संगीत के बिना अधूरा है।

गायन नर्तन देखने में सुख है, पर जो सुख स्वयं गायन एवं नर्तन से है- उस सुख और आनन्द का क्या कहना ; क्योंकि स्वयं के भीतर हो रहे गायन की अनुभूति ही कुछ और है। संगीत जब आत्मा से उठता है , उसमें अद्भुत आकर्षण होता है और यह आकर्षण किसी भी जीव की आत्मा को आकर्षित करने में समर्थ है।संगीत के सात सुरों में अनोखा जादू है।सात स्वरों में ही ब्रह्माण्ड का समूचा संगीत समाया हुआ है।
"सुर के बिना अधूरा जीवन, सात सुरों की है अगणित धुन "

संगीत की देवी माता सरस्वती है।किसी उत्कृष्ट कलाकार की प्रस्तुति से प्रभावित होकर मन अनायास ही बोल उठता है, कि इस पर माता सरस्वती की महान कृपा है ।आध्यात्मिक साधक भक्ति भावना से ईश्वर के साथ एकाकार की अनुभूति करते हुए माँ शारदे से विनती करता है---
सुर को ईश्वर से मिला दे, शारदे माँ शारदे 
प्रेम की    वीणा   बजादे, शारदे माँ शारदे 

<<<<< भारतीय संस्कृति और संगीत >>>>>

भारतीय संस्कृति के समानांतर, संगीत विधा भी अति प्राचीन है।
संगीत के जनक भगवान शिव माने जाते हैं ।भगवान शिव का डमरू संगीत का , जाग्रति का एवं प्रसन्नता का प्रतीक है ।आर्ष वांग्मय में सर्वप्रथम नाद रूप में इसका उल्लेख हुआ है नाद का अर्थ है-- ध्वनि या स्वर।सामवेद तो संगीत का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

 भारतीय संगीत की आत्मा-- राग रागनियों के निर्माण के पीछे व्यक्ति में अन्तर्निहित सूक्ष्म शक्तियों, भावनाओं और विशिष्टताओं एवं ।हृदय के प्रत्येक तार को झंकृत करने का सिद्धांत हुआ करता था।संगीत में अपरिमित शक्ति सामर्थ्य है।मीरा ने , चैतन्य महाप्रभु ने , नरसी मेहता व अन्य भक्तों ने संगीत के बल पर ही भगवान से एकाकार की अनुभूति की।

 सामूहिक गान व संकीर्तन द्वारा वातावरण में सौम्यता , सात्विकता और शान्ति उत्पन्न होने को प्रमाणित किया जाता है।अक्सर हम देखते हैं कि हमारे देश  के आध्यात्मिक व धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों में जब भक्त जन आदरणीय संत जनों के साथ संकीर्तन की मधुर ध्वनि में डूब जाते हैं तो वातावरण में अद्भुत शान्ति छा जाती है ।

 स्वर तरंगें संगीत का रूप लेकर जीवनदायनी सामर्थ्य उत्पन्न करती हैं ।हमारी संस्कृति में मंत्र जप का अत्यन्त महत्व है  और जब हम इन मन्त्रों का सस्वर अर्थात संगीत के साथ जाप करते हैं तो ये और भी प्रभावशाली हो जाते हैं ।संगीत ने तो इस पृथ्वी को ही स्वर्ग बना दिया है।संगीत से जीवनीशक्ति , संकल्प शक्ति और आत्मशक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि होती है ।
 
हमारे भारत के तीर्थ स्थलों में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से लेकर रात्रि तक संगीत की सुमधुर लहरियाँ सदैव गुंजायमान रहती हैं ।तीर्थ स्थानों में  श्रीरामायण पाठ, श्री मद्भागवत महापुराण के पाठ, भजन , आरतियाँ आदि चलते ही रहते हैं ।सभी संगीत प्रधान हैं ।
 विदेशी लेखकों, कवियों, एवं संगीतकारों सभी ने भारतीय संगीत की प्रशंसा की है।

संगीत हमारे जीवन , धर्म, संस्कृति और वैभव की अमूल्य विरासत है।आधुनिकता के प्रभाव में भारतीय संगीत का मौलिक स्वरूप एवं लक्ष्य अनेक भ्रान्तियों से ग्रस्त दिखाई देता है।आज के समय में संगीत का भी व्यापक व्यापार शुरु हो गया है।शब्द बिकते हैं, धुनें बिकती हैं और आवाज़ भी बिकती है।ईश्वर प्रदत्त स्वर को भी मनुष्यों ने धन कमाने का साधन बना लिया है।
 
भगवान श्री कृष्ण का बाँसुरी बजाना , गोपियों के संग नाचना-- यह सब संगीत का महत्व ही तो प्रतिपादित करता है।हमारे देश के अनेक संगीत कलाकार विदेशों में जाकर भी अपनी सुन्दर संगीत कलाओं का प्रदर्शन करके भारतीय संस्कृति का मान बढ़ाते हैं ।

भारतीय मनीषियों द्वारा प्रतिपादित यह तथ्य पूर्णतया सत्य ही है कि भारतीय संगीत में प्राणिजगत को प्रभावित करने की असीमित क्षमता विद्यमान है।भारतीय संगीत में गूढ़ रहस्य समाए हुए हैं ।आज भारतीय संगीत के माध्यम से विश्व संस्कृति को मूल्यों का शिक्षण और जीवन जीने की नई विधा का पोषण किया जा रहा है।

भारतीय संस्कृति के विश्व व्यापी प्रसार में संगीत की महती भूमिका है।भारतीय सांस्कृतिक चेतना का उत्थान संगीत द्वारा किया जा सकता है।

         <<<<< मधुर संगीत की सामर्थ्य >>>>>

मधुर संगीत की लहरें  का शरीर, मन व भाव संस्थान पर अच्छा असर डालती हैं ।शोधकर्ताओं की मान्यता में नादयोग ( स्वर योग)
विश्रान्ति का एक प्रमुख घटक साबित होता है।आध्यात्मिक साधनाओं में ॐकार साधना या सस्वर मंत्र जाप इस तथ्य के उदाहरण हैं ।जब हम ॐ का श्रद्धा भावना से दीर्घ जप या किसी  अन्य  मंत्र का सस्वर जप करते हैं तब परम शान्ति का अनुभव करते हैं ।
 
मधुर संगीत का समूचे वातावरण पर असर  पड़ता है ।संगीत से वृक्ष- वनस्पतियों, फसलों और पशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव को अब सर्वत्र वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है।नाद (स्वर) की लहरियाँ मनुष्य के मस्तिष्क हृदय एवं स्नायु तंत्र पर आश्चर्य जनक प्रभाव डालती हैं ।यह प्रसुप्त निष्क्रिय माँस-पेशियों को जाग्रत व सक्रिय करती हैं ।शान्ति का वातावरण प्रदान करती है।

वैज्ञानिक वी.वी. गार्डनर ने अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति " म्यूज़िक थेरेपी " में लिखा है कि संगीत का प्रभाव नाड़ी तन्त्र , श्वास- प्रश्वास, रक्तदाब एवं अंतःस्रावी ग्रन्थियों पर पड़ता है।आज हमारे देश की हजारों शब्द-रचनाओं को मनीषियों व संगीतज्ञों द्वारा विभिन्न स्वरों से सजाया गया है। दिनों दिन और भी नई- नई धुनें बनती रहती हैं ।सुनियोजित संगीत का प्रभाव गायक के शरीर व मन पर पड़ता है ।सुनने वाले भी भावतरंगित होकर हर्षोल्लास का अनुभव करते हैं ।

  संगीत का मतलब ही है कि, ऐसी धुन या लहर , जो कर्णप्रिय हो, लय में हो , स्वरयुक्त व मधुर हो और मन को भाए ।संगीत का स्वास्थ्य पर प्रभाव भी बहुचर्चित है।संगीत शास्त्र में शरीर- मन की विभिन्न अवस्थाओं को प्रभावित करने के लिए विभिन्न राग-रागनियों का निर्धारण है।प्रयोगों में पाया गया कि  द्रुतिगति व तीव्र स्वर से बजती धुनों के प्रयोग से निम्न रक्तचाप वाले रोगियों तथा हल्के स्वर में बजती धुनों से उक्त रक्तचाप वाले वाले रोगियों को लाभ होता है।

संगीत भावनात्मक आवेग को भी नियंत्रित रखता है।संगीत से मानसिक रोगों को भी ठीक किया जा सकता है।संगीत के माध्यम से थाॅइराइड ग्रन्थि से होने वाले थाॅयरोक्सिन नाम हार्मोन के स्राव को भी नियंत्रित किया जा सकता है ।संगीत सुनते समय मन में स्फूर्ति आती है तथा रक्त में उपस्थित कार्टिसोल हाॅर्मोन का स्तर घट जाता है, जिससे तनाव में कमी आती है तथा मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
 
तानसेन ने दीपक राग गाकर दीपक जलने का चमत्कार दिखाया और मेघमल्हार गाकर वर्षा होने का चमत्कार दिखाया।वर्तमान संगीत इस प्रकार के चमत्कार नहीं दिखा सकता ।

<<<<< संगीत चिकित्सा >>>>>

संगीत द्वारा चिकित्सा की बात उतनी ही पुरानी है, जितना कि संगीत स्वयं है।सामवेद में रोगों के निवारण के लिए राग-गायन का विधान मिलता है।अश्विनी कुमार के भैषज तंत्र में प्रत्येक रोग के लिए चार प्रकार के भैषज कहे गए हैं -- पवनौकस, जलौकस, वनौकस एवं शाब्दिक ।यहाँ शाब्दिक भैषज का तात्पर्य है-- मंत्रोच्चारण एवं लयबद्ध गायन।

कुर्णक प्रभा एवं मैंद ऋषि द्वारा रचित -- शब्द कुतूहल में रोगी के शब्द से रोग निदान , शाब्दिक औषधि , वीणा तंत्री, पणव, शंख, भेरी, मृदंग, मंजीर , वंशी आदि वाद्ययंत्रों को भैषज से ही बनाने और उनको सुनाकर रोगापहरण का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है ।प्रत्येक रोग के लिए पृथक-पृथक वाद्यों के शब्द और कौन किसके लिए उपयुक्त है, आदि का उल्लेख किया गया है ।

अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार शास्त्रों में वर्णित संगीत की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि अब इसे विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है।

                            वर्तमान समय में जाने-माने चिकित्सक भी संगीत की महत्ता को स्वीकारने लगे हैं , 2014 में संगीत उपचार पद्धति का पहला शब्दकोष आया है, जिसे प्रसिद्ध संगीत शास्त्री टी.वी.साईराम ने तैयार किया है।संगीत उपचार पद्धति पर वर्षों से काम कर रहे डाॅक्टर साईराम का कहना है कि संगीत का मन पर असाधारण प्रभाव पड़ता है।अगर सही निदान कर उपयुक्त स्वर लहरियों का व्यक्तियों के लिए चयन कर उन्हें सही तरीके से सुनाया जाए तो उन्हें  सभी प्रकार के मनोरोगों से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

  प्राचीन काल में भिन्न-भिन्न  रोगों के लिए भिन्न-भिन्न राग- रागनियों का निर्धारण था।जैसे-- मानसिक अस्थिरता एवं क्रोध शमन के लिए ' राग मल्हार', श्वास सम्बन्धी समस्या, खाँसी, दमा, तपेदिक आदि में राग 'भैरव' , रक्त अशुद्धि की स्थिति में राग 'आसावरी' तथा मेदा', यकृत- प्लीहा वृद्धि में राग हिंडोल', का प्रावधान था।संगीत की स्वर लहरियाँ व्यक्ति को तनाव मुक्त करती हैं ।राग-रागनियाँ विविध मनोदशाओं के द्योतक होते हैं और इसी कारण वे अपनी भावदशा के अनुरूप व्यक्ति में रसानुभूति का संचार कराने में समर्थ होते हैं ।

         संगीत में शरीर, मन और आत्मा को बलवान बनाने एवं निरोगता प्रदान करने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं ।इसी कारण चिकित्सा जगत में इसका मान्यता मिल रही है।रूस का क्रीमिया स्वास्थ्य केंद्र भी संगीत उपचार के लिए प्रसिद्ध है ।यहाँ पर मानसिक रोगों का सफलता पूर्वक संगीतोपचार किया जाता है।इसके प्रभाव से हिंसक प्रवृत्तियों का भी शमन किया जाता है ।

                         पिट्सबर्ग अमेरिका में आर फोर आर अर्थात, रिकार्डिंग फाॅर रिलेक्सेशन , रिफ्लेक्शन , रिस्पाॅन्स एंड रिकवरी नामक संस्था है , जिसमें संगीत के माध्यम से रोगियों का उपचार किया जाता है ।इसके संस्थापक हैं--- सुप्रसिद्ध वायलिन वादक लारेन्स और उनकी पत्नी ग्रेश्चेन। इस संस्था ने अब तक यूरोप अमेरिका में फैली अपनी शाखाओं द्वारा अनेक रोगियों का सफल उपचार किया है।विश्वभर में फैली संगीत चिकित्सा की इन शाखाओं का संचालन न्यूयॉर्क में बने एक आश्रम से होता है।यह संगीत चिकित्सा का शोध केंद्र भी है।

वस्तुतः संगीत में असाधारण जीवनदायी सत्ता विद्यमान है ।यदि उसका सम्यक उपयोग किया जा सके तो मानव चेतना  प्रगति- पथ पर अग्रसर हो सकती है।
  
सत्य ही है ---  मधुर  संगीत में जादुई सामर्थ्य है ।जो हमारे मन को प्रसन्न रखती है ।आजकल इसका चिकत्सा जगत में भी प्रयोग हो रहा है।हम सभी के जीवन में सदा संगीत की स्वर लहरियाँ गूँजती रहें ।हम सदा प्रसन्न होकर गाते रहें, गुनगुनाते रहें ।
   " संगीत जिसे सारे जग ने, अपने सुख की भाषा मानी "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।
 





Monday, February 3, 2020

श्री कृष्ण जन्माष्टमी- श्री कृष्ण के विविध रूप


            ●●●●● श्री कृष्ण जन्माष्टमी ●●●●●
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात्रि बारह बजे मथुरा के कारावास में  वसुदेव और देवकी के पुत्र  श्री कृष्ण का अवतार हुआ। रोहिणी नक्षत्र का समय था। चारों दिशाओं में शुभ संकेत हो रहे थे।सुहानी हवा बहने लगी,पक्षी भी खुश होकर चहचहाने लगे ।बागों में सुन्दर फूल खिल रहे थे।क्योंकि जग के पालनहार पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।देवता भी प्रसन्न होने लगे।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सदियों से भारतवर्ष में मनाई जा रही है।यह अष्टमी कई अर्थों को स्वयं में समेटे हुए लोगों के जीवन में उत्साह का संचार करती है।भगवान का जन्म अष्टमी के दिन हुआ यानी वे आध्यात्मिक और भौतिक संसार, दोनों में संपूर्ण थे।वे दिखने में जितने सुन्दर थे , उनके अन्दर उतना ही सुन्दर ऐश्वर्य था।

शास्त्रानुसार यह मान्यता है कि  जब मथुरा का राजा  कंस अपनी बहन  देवकी को विदा कराके ले जा रहा था तभी आकाश वाणी हुई कि "जिस बहन को तू विदा करने जा रहा है उसी की आठवीं सन्तान तेरा काल बनेगी । कंस यह सुनकर डर गया, इस डर से कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया था और जब भी देवकी की कोई सन्तान जन्म लेती , वह उसको मार देता।लेकिन जब कृष्ण के रूप में देवकी की आठवीं सन्तान हुई तो रात्रि में ही चुपचाप वसुदेव कृष्ण को नन्दगाम जाकर यसोदा के घर छोड़ आए और यसोदा के गर्भ से  उत्पन्न हुई कन्या को ले आए।कंस ने उस कन्या को भी मार दिया और वह अब निश्चिंत हो गया , कि मैंने देवकी की आठवीं सन्तान को भी मार दिया ।लेकिन ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। ईश्वर जब अवतार लेते हैं तब अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए ही लेते हैं ।
आज ब्रह्म यसोदा घर आया, यसोदा के मन आनन्द छाया ।
सब कहें यसोदा धन्य हुई, वृज में अति जयजयकार हुगई
देवों ने पुष्प को बरसाया, यसोदा के मन आनन्द छाया ।
 
 कृष्ण जैसी सुन्दर सन्तान पकर माता यसोदा और नन्द बाबा तो अपार खुशी से झूम उठे। उन्होंने कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया ।ब्राह्मणों को व वृजवासियों को खूब दान दिया ।कृष्ण जन्म की खुशी में पूरे वृजमंडल में बहारें छा गईं ।वे सभी कृष्ण के दर्शन करने नन्द महल आते और दर्शन पाकर खुशी से फूले न समाते ।सारा जगत जानता है कि वृजमंडल में भगवान श्री कृष्ण ने विविध प्रकार की लीलाओं से वृजमंडल को धन्य किया।

कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ दिवस पर पूरे देश में वृत- उपवास किए जाते हैं । भजन संध्या का आयोजन होता है । मन्दिरों में अनेक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ।आधी रात को बारह बजे तक श्रद्धालु मन्दिरों में भगवान के जन्मोत्सव के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं ।कुछ लोग तो रात्रि के बारह बजे के बाद मन्दिर का प्रसाद ग्रहण करके ही आहार ग्रहण करते हैं ।इस दिन मन्दिरों
को विशेष सजाया जाता है।

आजकल तकनीकी युग है, देश के सभी बड़े कृष्ण मन्दिरों से सीधा प्रसारण भी किया जाता है ।श्रद्धालु रात्रि के बारह बजे भगवान के दर्शन घर से भी कर सकते हैं ।सनातन संस्कृति में इस पर्व पर घरों में भी विशेष पूजा की जाती है।शहर व गाँव के हर मन्दिर को इस दिन सजाया जाता है।रात्रि को सभी मन्दिरों में भारी भीड़ होती है।कुछ श्रद्धालु इस दिन मथुरा जाकर भगवान के दर्शन करते हैं ।सभी भगवान का जन्मदिन बड़ी प्रसन्नता व दिव्य भावों के साथ मनाते हैं ।

 <<<<< श्री कृष्ण के विविध रूप >>>>>

                         भगवान श्री कृष्ण ने इस धरा पर अवतरित होकर अपने विविध रूपों से संसार का परिचय कराया।कृष्ण अपने में सर्वस्व हैं ।सब कुछ कृष्ण में समाहित है।कृष्ण शब्द का सामान्य अर्थ है - अत्यन्त आकर्षक अर्थात जो सबको अपनी ओर आकर्षित करे।कृष्ण का एक अर्थ है - श्याम रंग।कृष्ण एक दर्शन हैं ।कृष्ण द्रष्टा भी हैं और दृश्य भी।कृष्ण प्रेम हैं, प्रेम के रस हैं ।कृष्ण सौन्दर्य हैं और सौन्दर्यानुभूति भी।कृष्ण अपने आप में एक दिव्य एवं पावन अनुभूति हैं, जिस अनुभूति को हर कोई अपने-अपने ढंग से अनुभव करता है।

सांसारिक रूप से कृष्ण देवकी- वसुदेव के आठवें पुत्र हैं, नंद - यसोदा के पोषित पुत्र हैं ।वे बलराम के छोटे भाई, महाराजा उग्रसेन के दौहित्र, रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के प्रिय पति हैं । वृषभानु दुलारी राधा के प्रियतम हैं, 
गोप- गोपियों, ग्वाल- बालों, अर्जुन एवं द्रोपदी के सखा हैं ।

                                 कृष्ण एक हैं, उनके रूप अनेक हैं ।श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं ।उन्होंने माखन भी चुराया।गायों को भी वन में चराया।कृष्ण ने बाँसुरी के मधुर स्वर से वृजवासियों को मोहित किया।वृज गोपियों के साथ रास रचाया ।कृष्ण ने तरह- तरह की बाल- लीलाओं से माता यसोदा और नन्द बाबा को ब्रह्मानंद समान सुख पहँचाया। कृष्ण का व्यक्तित्व रंगारंग मयूरनी जैसा है ,जिसमें अनेक रंग समाहित हैं ।कृष्ण अपने सम्पूर्ण ईश्वरत्व को विसर्जित कर राधा भाव में स्थित होते हैं ।कृष्ण अखंड, अव्यक्त,शाश्वत प्रेम की स्थापना करते हैं ।कृष्ण को शब्द में उतार पाना कैसे संभव हो सकता है , परन्तु उनकी कृपा दृष्टि से सब कुछ संभव है।
  
कृष्ण का जीवन जितना बाहर दिखता है , उससे कहीं अनंत गुना अदृश्य में व्याप्त है ।वे विराट हैं, अनंत हैं, किसी में न समा पाने वाले हैं ।दृश्य तो उस अदृश्य की एक लीला मात्र है।कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं, जहाँ सब कुछ पूर्ण है, दृश्य भी पूर्ण है और अदृश्य भी पूर्ण है।वे अणु में भी व्याप्त हैं और विराट में भी व्याप्त हैं ।कृष्ण एक टेर हैं, प्रार्थना हैं ।जो जिस रूप में उन्हें पुकारता है, उसी रूप में वे प्रकट होकर वे उसको कृतार्थ करते हैं ।

 कृष्ण बाँसुरी के दिव्य स्वर में संगीत के मधुर स्वर बनकर झरते हैं तो पांचजन्य के उद्घोष से महाभारत के महायुद्ध का आरंभ करते हैं ।कृष्ण विनाश के भीषण स्वर में समाहित हैं और विकास के स्वर्णिम सूर्य बनकर प्राची से उदीयमान होते हैं ।कृष्ण सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं , अंतर मात्र अनुभव का है।
 
कृष्ण के साकार स्वरूप को सगुण प्रेम के रूप में  चैतन्य महाप्रभु, मीरा तुकाराम कृष्ण ने  अपने प्रेम से जगाया।मीरा प्रेम में मतवाली होकर  हर पल कृष्ण को पुकारने लगी तो कृष्ण मीरा के सामने संपूर्ण रूप में खड़े थे।चैतन्य कृष्ण कीर्तन करने लगे ।कृष्ण तुकाराम की भक्ति के वश में होकर तुकाराम के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते थे।कृष्ण संपूर्ण प्रेम के प्रतीक हैं ।जो कृष्ण को प्रेम करेगा , कृष्ण उसे मिलेंगे।

कृष्ण एक साथ कई आयामों में कुशलतापूर्वक कार्य करते हैं ।वे माता यसोदा का पयपान करते हुए भी आनंदित रहते हैं और यमुना में कालिया नाग के फन पर नृत्य भी करते हैं ।वे परंपरा के अनुसार नहीं , बल्कि परंपराएँ उनके अनुसार निर्मित होती हैं ।कृष्ण इन्द्र का मान भंग करने के लिए गोवर्धनलीला करते हैं ।कृष्ण कभी  मिट्टी खाते हैं , मुँह खोलते हैं तो माता को ब्रह्माण्ड के दर्शन कराते हैं ।कृष्ण कभी ओखल से बँध जाते हैं ।

   कृष्ण ने गांधारी के शाप को जिस गौरव व शालीनता से आशीर्वाद रूप में वरण करते हैं उससे स्वयं गांधारी भी करुणाद्र हो उठती है।कृष्ण अपने आँसुओ से  मित्र सुदामा के पग पखारते हैं ।दुर्योधन के मिष्ठान्न छोड़कर विदुर के घर साग ग्रहण करने में आनंदित होते हैं ।भरी सभा में जब द्रोपदी का अपमान होता है तो उसका चीर ( वस्त्र) बढ़ाते हैं ।कृष्ण के भाई ने हल चलाया और कृष्ण ने गौ पालन किया --- यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा भारतीय समाज को दिया गया भौतिक उन्नति का मूल मंत्र है।

  श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं ।उनका व्यक्तित्व उत्कृष्टता का पर्याय है।कृष्ण के विविध रूप हैं उन्होंने संसार के लोगो को नए ढंग से जीवन जीना सिखाया है।संघर्षों में भी उन्होंने मुस्कराना नहीं छोड़ा ।श्री कृष्ण की पूर्णता और पारंगतता अद्भुत थी।श्री कृष्ण का समूचा जीवन सांसारिकता और आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
         सादर अभिवादन व धन्यवाद ।



  

Sunday, February 2, 2020

श्री कृष्ण जन्माष्टमी- सोलह कलाओं से पूर्ण कृष्णावतार , शरद पूर्णिमा पर महारास लीला

         <<<<< सोलह कलाओं से पूर्ण कृष्णावतार >>>>>
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को महानिषीथकाल के वृष लग्न में हुआ था।उस समय चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में था।रात्रि के ठीक बारह बजे क्षितिज पर चन्द्रमा वृष लग्न में विराजित थे।बुध पंचम भाव कन्या में विराजित थे ।उस घड़ी में छठे भाव तुला में शुक्र व शनि विराजित थे।भाग्य भाव मकर में मंगल विराजमान थे व लाभ स्थान मीन में वृहस्पति विराजित थे।मूलतः श्री कृष्ण चन्द्रमा प्रधान अवतार थे , इसी कारण उन्हें कृष्ण चंद्र के नाम से जाना जाता है तथा उनकी वंशावली के अनुसार भी उन्हें चन्द्रवंशी ही कहा जाता है ।

" मथुरा में कन्हैया आया, गोकुल में उत्सव छाया "

  भगवान श्री कृष्ण का अवतार सोलह कलाओं से परिपूर्ण था।ब्रह्म उपनिषदों के अनुसार सोलह कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्वर तुल्य हो जाता है ।चन्द्रमा की सोलह कलाओं  अर्थात सोलह तिथियों के नाम हैं----- अमृता, मानदा, पूषा , पुष्टि, तुष्टि, रति, धृति, शशिनी ,चन्द्रिका , कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीतिरंगा, पूर्णा, पूर्णामृता और स्वरजा। इन्हीं तिथियों को प्रतिपदा, दूज, , एकादशी, पूर्णिमा आदि कहा जाता है।बोध की अवस्था के आधार पर प्रतिपदा से पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की पन्द्रह अवस्थाएँ ली गई हैं ।यहाँ अमावस्या अज्ञान का और पूर्णिमा ज्ञान का प्रतीक माना गया है।

जिस प्रकार चन्द्रमा के प्रकाश की सोलह अवस्थाओं से सोलह श्रंगारों का चलन शुरू हुआ उसी प्रकार मानवीय मन की भी सोलह मनोदशाएँ कही गई हैं ।श्री कृष्ण की तरह प्रत्येक मनुष्य में ये सोलह कलाएँ होती हैं, भले ही ये सुषुप्त हों।इन कलाओं का सम्बन्ध यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है।शास्त्रानुसार इन सोलह अवस्थाओं के नाम हैं---- अन्नमया , प्राणमया , मनोमया , विज्ञानमया , आनंदमया , अतिशयनी , विपरिनाभिमी , संक्रमिनी,
प्रभवि, कुथिनी , विकासिनी , मर्यादिनी , सन्हालादनी,आह्लादिनी,
परिपूर्ण एवं स्वरूपवस्थित ।

   जन्माष्टमी धरती में महाभाव रूपी प्रेम का संचार करती है।प्रेम से सराबोर ।हृदय भगवान कृष्ण का पावन मन्दिर है।हृदय मंदिर को पवित्र पावन करके ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी को सार्थक रूप प्रदान किया जा सकता है।श्री कृष्ण जीवन का यही संदेश है कि हमारे जीवन की प्रत्येक संभावना एक कला के रूप में निखरकर आए।विष्णु के दस अवतारों में से सिर्फ कृष्ण ही सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं ।

<<<<< शरद पूर्णिमा पर महा रास >>>>>

   शरद पूर्णिमा ( आश्विन पूर्णिमा) की रात चन्द्रमा अपनी पूरी कलाओं में खिलता है।आश्विन पूर्णिमा को चन्द्रमा की कलाएँ समग्र होती हैं ।भक्ति और प्रेम के गीत गाने वाले कवियों ने समवेत स्वर में गाया है कि इस रात चन्द्रमा अपनी सभी कलाओं के साथ प्रकट होता है।इस रात चन्द्रमा अपनी शांत , स्निग्ध छवि से  सारे जगत को सराबोर कर देता है।वर्ष भर की सबसे समृद्ध रात है -
शरद पूर्णिमा की रात ।

  चन्द्रमा को मन का कारक एवं भाव- संवेदनाओं का अधिपति ग्रह माना गया है।इसलिए यह दिन भक्त और भगवान के मध्य संबंध के लिए भी सबसे ज्यादा उपयुक्त है।वल्लभाचार्य तथा हितहरिवंश आदि महात्माओं ने जब रास लीला का प्रचलन किया था , तो इसमें राधा- कृष्ण के दिव्य क्रीड़ाकल्लोल का ही सात्विक प्रदर्शन था।इसमें अध्यात्म और आनंद की ही प्रधानता रहती थी 

  शरद पूर्णिमा की रात को वाणी, व्यवहार व उत्सव को महानाट्य के रूप में प्रस्तुत करने का नाम है --'महारास'। रास के स्वरूप को सभी जानते हैं ।सोलहवीं शताब्दी में प्रचलित हुआ इस लोक नाट्य में धर्म के साथ नृत्य संगीत और श्रंगारप्रधान सख्यभाव की प्रधानता रहती है।रास की अंतर्कथा यह है कि गोपियों ने एक बार भगवान कृष्ण से पति रूप में उन्हें पाने की इच्छा की।उन्होंने गोपियों की यह कामना पूरी करने का वचन दिया।इसके लिए श्री कृष्ण के आह्वान पर शरद पूर्णिमा की रात गोपियाँ दिव्य श्रंगारों से सुशोभित होकर यमुना तट पर पहुँच गईं ।

  यमुना के तट पर भगवान श्री कृष्ण ने रास करना शुरु किया तब भगवान ने महारास के दौरान गोपियों को एक अद्भुत लीला दिखाई ।जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही भगवान श्री कृष्ण के प्रतिरूप प्रकट हो गए।सभी गोपियों को उनका कृष्ण मिल गया और दिव्य नृत्य एवं प्रेमानंद शुरु हुआ।

स्वर्ग की दुन्दुभियाँ अपने आप बज उठीं ।स्वर्गीय पुष्पों की वर्षा होने लगी।यमुना जी की रमणरेती पर वृजगोपियों के बीच में भगवान श्री कृष्ण की बड़ी अनोखी शोभा हुई।ऐसा जान पड़ता था मानो , अनगिनत पीली-पीली दमकती हुई सुवर्ण-मणियों के बीच में ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो। रासलीला में हास्य का पुट और श्रंगार का प्राधान्य रहता है ।उसमें कृष्ण गोपियों, सखियों के साथ अनुराग पूर्ण वृत्ताकार नृत्य करते हैं ।
 
"आई है रास की रात, गगन पूनम का चन्दा चमके
बरसे है प्रेम बरसात, गगन पूनम का चन्दा चमके "

    ये गोपियाँ और कोई नहीं, जन्म जन्मांतर से तप-साधना कर रहीं तत्वज्ञानी आत्माएँ थीं ।उन्हें मालूम था कि गोप नंद के नंदन श्री कृष्ण परमात्मा के साकार विग्रह हैं ।गोपियाँ श्री कृष्ण के सत्य स्वरूप को जानतीं थीं, उनकी भक्ति में परमात्मा को जीवात्मा द्वारा किए जाने वाले समर्पण का भाव था ।वासना,तृष्णा, अहंता, का भगवत् चेतना में समर्पण , विसर्जन एवं विलय मोक्ष के द्वार खोलता है।  "श्री कृष्ण के मन में गोपियों के प्रति जो प्रेम था , वह परमात्मा का जीवात्माओं के प्रति सहज प्रेम था।"

रासलीला के इस रूप पर आक्षेप करने वाले अबोध, नादान लोग जो इस महारास के प्रतीक से अन्जान हैं, वे कहते हैं कि रासलीला से लोगों में अधोगामी उच्छृंखल प्रवृत्तियों को बल मिलता है ।यह तथ्य निराधार है। एक बार  महात्मा गाँधी जी के अनुयायी ने भी रासलीला पर इस प्रकार का आक्षेप किया तो इसके प्रत्युत्तर में गाँधी जी ने कहा------ " रासलीला जैसे आयोजन से ही संसार में कृष्ण प्रेम का संचार संभव है , अन्यथा यह संसार पूर्णरूपेण शुष्क और नीरस हो जाएगा।

भगवान के समान गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानन्दमयी ही हैं । उनकी दृष्टि में केवल चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण हैं , उनके हृदय में श्री कृष्ण को तृप्त करने वाला प्रेमामृत है।गोपियाँ दिव्य जगत की भगवान की स्वरूपभूता अन्तरंगशक्तियाँ हैं ।अतः भगवान और गोपियों का सम्बन्ध भी दिव्य ही है।गोपियों के साथ भगवान का जो रमण हुआ वह सर्वथा दिव्य भगवत् राज्य की लीला है, लौकिक काम क्रीणा नहीं ।
  
भगवान श्री कृष्ण धीर ललित नायक हैं, जो समस्त कलाओं के अवतार माने जाते हैं ।श्री राधा उनकी अनुरंजक शक्ति के रूप में दिखाई जाती हैं ।श्री राधा समस्त गुणों एवं कलाओं की खान नायिका बनती हैं ।गोपियाँ व सखियाँ भाव प्रगल्भा होती हैं ।उनमें 
शोभा, विलास, माधुर्य, कांति , दीप्ति, विच्छित, प्रागल्भ्य , औदार्य , लीला , हाव, हेला ,भाव आदि सभी अलंकार समाहित हो जाते हैं ।

" शरद पूनम की है रात, करत कान्हा महा रास 
 भूल गईं सब संसार, ओढ़ी श्याम चूनर आज"

सादर अभिवादन व जय श्री कृष्ण 



Friday, January 31, 2020

संत रविदास जयन्ती--- "हरि को भजे सो हरि का होय"

                      {{{{{संत रविदास जयन्ती }}}}}
संत रविदास जी का जन्म वाराणसी में सं० 1456 विक्रमी में बनारस के दक्षिणी छोर पर स्थित सीर गोवर्धन में हुआ था । उनके पिता का नाम रघु जी और माता का नाम विनिया था। रविदास जी के पिता चमड़े का व्यापार करते थे और जूते बनाते थे। बचपन से ही रविदास ( रैदास ) का मन भगवान की भक्ति की ओर मुड़ता जा रहा था।जब उनके पिता ने उनका विवाह करना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया लेकिन माता- पिता के बार- बार आग्रह करने पर उन्होंने विवाह कर लिया।उनका विवाह एक समृद्ध परिवार की कन्या लोणा के साथ संपन्न हुआ ।


    संत रविदास जी बचपन से ही बड़े उदार स्वभाव के थे।वे प्रतिदिन एक जोड़ा जूता अपने हाथ से बनाकर जरूरत मंदों को दान करते थे। उनका परिवार आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध नहीं था इसलिए उनका दान करने का स्वभाव उनके पिता को पसन्द नहीं था।इस कारण उनके पिता ने उनको उनकी पत्नी के साथ अलग कर दिया और उन्हें रहने के लिए छप्पर का एक बाड़ा दे दिया ।इस बात से रविदास को जरा भी दुःख नहीं हुआ ।अब वे और भी परिश्रम व मनोयोग से बढ़िया जूते बनाकर अपना गुजारा भी कर लेते थे और जरूरत मन्दों को जूते दान भी दे देते थे।गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि  " संत हृदय नवनीत समाना " अर्थात संत का हृदय मक्खन की तरह होता है।

        अपने पारिवारिक जीवन को उन्होंने इस तरह संयमित, सुव्यवस्थित बनाया कि उनके पारिवारिक जीवन में कभी सुख- शान्ति की कमी नहीं हुई और उनकी आत्मोन्नति में भी कोई बाधा नहीं आई।उनकी धर्पमत्नी  लोणा ने सदा उनका साथ दिया।संत रविदास जी का कहना था कि सच्ची साधना तो मनोनिग्रह है और यदि मन को नियंत्रण में रखा जाए तो घर- बाहर सर्वत्र वैराग्य ही वैराग्य है।

  उच्चस्तरीय जीवात्माएँ कहीं भी जन्म ले लें उनके सद्गुणों की सुगन्ध चारों ओर स्वतः ही बिखर जाती है।संत रविदास जी भी ऐसे ही अनुपम उदाहरण थे।उन्होंने यह सिद्ध किया कि जाति से कोई महान नहीं होता , व्यक्ति यदि महान बनता है तो अपने कर्म व गुणों से।संत रविदास जी के समकालीन अनेक संत- महात्मा हुए , जैसे-- गुरू गोविन्द सिंह, रामानंद, कबीर, तुकाराम, मीरा आदि।

  यवन काल के उत्पातों से जनता किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो रही थी ।
 आंतरिक फूट के कारण बहुसंख्यक जनता मुठ्ठी भर विदेशी आततायियों द्वारा बुरी तरह पददलित की जा रही थी।ऐसी परिस्थितियों में आशा की नवज्योति के रूप में भारत में 'संत मत'
का प्रादुर्भाव हुआ, जिसने धर्म और ईश्वर पर डगमगाती हुई जनता की आस्था को पुनः सजीव करने की सफल कोशिश की।संत रविदास जी भी इसी माला का एक मनका थे।

संत रविदास जी का जीवन गृहस्थों के लिए ही नहीं, वरन संतों के लिए भी आदर्श है।संत व्यक्ति वह है जिसकी भावनाएँ आकाश की तरह विशाल व गंगा की तरह निर्मल होती हैं ।ऐसे व्यक्तियों का जीवन ही परोपकारी हो जाता है। इनके लिए अपना कुछ नहीं होता, सब कुछ भगवान का होता है।भर्तृहरि संतों के बारे में कहते हैं-- " संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः ।" अर्थात संत सदा स्वयं को परहित में लगाए रहते हैं और इस प्रकार ये सतत परोपकार में लगे रहते हैं ।

 {{{{{ हरि को भजे सो हरि का होए }}}}}

 उस समय हरिजन जातियों को सवर्णों से दबकर रहना पड़ता था।उन्हें अछूत माना जाता था।लेकिन संत रविदास ने अपने जीवन से एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया  कि  " जाति- पाँति पूछे नहीं कोय, हरि को भजे सो हरि का होए " ।

 'निम्न जाति के लोगों को भक्ति का अधिकार नहीं है ' ऐसी धारणा वाले लोगों ने संत रविदास को प्रारंभ से ही यातना देना शुरू  कर दिया ।उनके इस अनुचित दबाव का लाभ अन्य धर्मों के लोगों को मिलता था।वे बहकाकर ऐसे पीड़ित लोगों का धर्म- परिवर्तन करा देते थे।संत रविदास जी एक ओर अपने लोगों को समझाते--- " तुम सब हिन्दू जाति के अभिन्न अंग हो , तुम्हें अपने मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए " । तो दूसरी ओर वे कुलीनों से टक्कर लेते और कहते -- " वर्ण-विभाजन"  का संबंध धर्म से नहीं, मात्र सामाजिक व्यवस्था से है।संत रविदास जी ने      आदर्शों का प्रतिपादन करते हुए धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों से   कहा---
    हरि सा हीरा छाड़ि कै , करै आन की आस।
    ते नर नरकै जाहिंगे ,    सत भाषै रैदास ।।

   संत रविदास जी का जीवन संघर्षों में ही बीता ।लेकिन इससे वे कभी निराश नहीं हुए और सदा सत्य की राह पर ही चले।विधर्मियों की पराधीनता की भर्त्सना करते हुए भारतीय समाज के लोगों को ललकारते हुए कहा ---
       पराधीन का दीन क्या,  पराधीन वेदीन ।
       पराधीन परदास को , सब ही समझें दीन।।

              संत रविदास की सच्चाई में कितनी निष्ठा है यह परख करते हुए रामानंद जैसे महान संत एक दिन स्वयं उनकी कुटिया में पधारे।और उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।माना जाता है कि  उन्होंने  यह परम्परा मीरा को अपनी शिष्या बनाकर आगे बढ़ाई ।

संत रविदास गुरु प्रदत्त मंत्र और उपदेशों के सहारे आत्मोन्नति करने लगे।वे  कथाओं के माध्यम से लोगों को धर्मोपदेश देते थे। उनकी सीधी, सच्ची, मधुर वाणी में अमृत वचन सुनने के लिए हजारों लोग इकठ्ठे होते , उनमें से अधिकांश अन्य जातियों के होते।उनके जीवन में अनेक चमत्कारी घटनाओं के प्रसंग घटित हुए।इनकी ख्याति से प्रभावित होकर तात्कालिक बादशाह सिकंदर लोदी ने उन्हें दिल्ली आने का आमंत्रण भेजा था।वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करके भावविभोर होकर सुनाते।


इस प्रकार धर्म प्रचार से जहाँ एक ओर उनकी प्रसिद्धि बढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर उनके विरोधी भी बढ़ते जा रहे थे।लोग उनसे मन ही मन ईर्ष्या करने लगे । और ईर्ष्या  भावना के कारण उनकी निंदा करते,व्यंग्य और उपहास करते और तरह-तरह के लांछन भी 
लगाते।इस पर वह हँस देते और कहते कि -- " हाथी अपने रास्ते चला जाता है, उसे किसी के धूलि फेंकने या चिढ़ाने से विचलित होने की जरुरत नहीं होती।" जो साहसी, धैर्यवान और सच्चा होता है ,  सारा संसार विरोधी होकर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस तरह निडर होकर संत रविदास ने अपना धर्मप्रचार जारी रखा ।

  संत रविदास जी के बारे में कबीर कहते हैं ---'
  साधुन में रविदास संत हैं, सुपच ऋषि सौ मानिया।
  हिंदू तुर्क दुई दीन बने हैं,  कछु नहीं पहचानिया  ।।


  सिक्खों के प्रथम गुरू नानक ने भी अपने काव्य में कहा है---कि संतई केवल किसी जाति विशेष का व्यक्ति ही नहीं  कर सकता , बल्कि वह हर व्यक्ति कर सकता है , जिसका मन पाक साफ है।
सिक्खों के धर्म ग्रन्थ "गुरु ग्रन्थ साहिब" में भी  संत रविदास जी के 40 पद सम्मिलित किए गए हैं ।उनकी विद्वता को बड़े-बड़े विद्वान भी स्वीकार कर उन्हें प्रणाम करते हैं ।

रैदास ने अपनी काव्य रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी , राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है।उनको उपमा, रूपक अलंकार विशेष प्रिय थे।इन्होंने सीधे सादे पदों में अपने हृदय के भाव बड़ी स्पष्टता से प्रकट किए हैं ।इनका आत्मनिवेदन,दिव्य भाव और सहज भक्ति पाठकों के हृदय को उद्वेलित करते हैं ।

   संत रविदास ( रैदास ) जी ने तत्कालीन पाखंडों और अंधविश्वासों का काफी विरोध किया ।उन्होंने घृणा का बदला घृणा से नहीं अपितु प्रेम से किया , इसलिए वे सभी के लिए प्रेरणास्रोत बन सके।वे कहते थे ---" अहंकार त्यागने पर ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।" संत रविदास जी के पास भगवान की एक चतुर्भुजी मूर्ति थी।जब वे श्रहरि की ओर निहारते , तब उनके मुख से यही निकलता----


अब कैसे छूटे नाम- रट लागी ।।
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी ।
जाकी अंग-अंग बास समानी ।।
प्रभु जी ! तुम दीपक, हम बाती ।
जा की जोत  बरै दिन - राती ।।
प्रभु जी ! तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।।

 संत रैदास जी के लगभग 200 पद मिलते हैं, जिनकी भाषा सरल है, किंतु भाव की तन्मयता के कारण प्रभावशाली हैं ।संत रविदास जी गुरु-भक्ति, नाम-स्मरण , प्रेम, कर्तव्य-पालन तथा सत्संग को महत्व देते थे।

 संत रविदास जी का कहना था -- यदि ऊँचे बनना चाहते हो , तो बड़े कर्म करो , जाति से महानता नहीं मिलती ।जो जाति- पाँति 
और ऊँच- नीच का भेदभाव करते हैं, वे ईश्वर के प्रिय नहीं हो सकते ; क्योंकि सभी ईश्वर की रचना हैं ।उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उस समय जाति-पाँति को मानने वाले समाज ने भी उन्हें संत की पदवी दी तथा उनकी महानता को स्वीकार कर लिया।

 आज जो देश का माहौल है इस माहौल में रविदास जी के उपदेश प्रेरणादायक हो सकते हैं ।संत रविदास जी  का जीवन मानवता के लिए एक ऐसी मिसाल है जो सदैव स्मरणीय है ।संत रविदास जी का जीवन केवल गृहस्थों के लिए ही नहीं, वरन संतों के लिए भी आदर्श है। 120 वर्ष की दीर्घायु पाकर वे ब्रह्मलीन हुए।उनके पंथ के अनुयायी अपने को 'रैदासी' कहते हैं ।आज भी संत रविदास जी इस संसार में रवि ( सूर्य ) के समान प्रकाशित हैं ।संत रविदास के विचारों की छाप भारतीय मन-मस्तिष्क पर अमिट बनी रहेगी।

माघ पूर्णिमा के अवसर पर हर वर्ष बनारस के सीर गोवर्धन में संत रविदास जी की स्मृति में बड़ा आयोजन होता है, जिसमें पूरे भारत से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं ।

सब एक हों, सब नेक हों, चाहे धर्म उनके अनेक हों ।
हे जगत के पालक जगत में,   शांति की धारा बहा  ।।

  संत रविदास जी के विचारों को जानकर हम यह कह सकते हैं--

"जाति-पाँति पूछे नहीं कोय , हरि को भजे सो हरि का होए"


सादर अभिवादन व धन्यवाद । 




 
     

Thursday, January 30, 2020

श्री रामनवमी महोत्सव,परब्रह्म श्री राम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एवं रामराज्य

                {{{{ श्री रामनवमी महोत्सव }}}}
 श्री रामनवमी महोत्सव भगवान श्री राम के जन्म के उपलक्ष्य में पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ।चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्री राम अवतरित हुए थे।चैत्र मास की यह नवमी तिथि जगन्माता आदिशक्ति के नवम् रूप ' सिद्धिदात्री' 
( नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता: ।-- श्री दुर्गासप्तशती)
की सम्पूर्ण शक्तियों को प्रकट करती है।
  
   पवित्र चैत्र का महीना था , नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और अभिजित मुहूर्त था।दोपहर का समय था।शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा बह रही थी, देवगण हर्षित हो रहे थे।फूल खिल रहे थे।पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सभी नदियाँ अमृत की धारा बहा रहीं थीं ।निर्मल आकाश देवताओं के समूहों से भर गया ।नाग, मुनि और देवगण सभी स्तुति करने लगे----  समस्त लोकों को शक्ति देने वाले, जगदाधार प्रभु ने  कौशल्या के गर्भ से मनुष्य रूप में अवतार लिया।

                                   ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया ।राजा दशरथ पुत्र जन्म का शुभ समाचार सुनकर ब्रह्मानंद में समा गए ।भगवान के अवतरित होने की खुशी में घर- घर मंगलगान होने लगे।कैकेयी-सुमित्रा ने भी सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया।अवधपुरी को फूलों से सजाया गया।सभी राजकुमारों के जन्मोत्सव की खुशी में राजा ने नगर में मिठाइयाँ, गहने व कपड़े बँटवाए।पूरे महीने तक अवधपुरी में 
उत्सव का माहौल रहा।

आज अवध आनन्द हुआ रे, लिया जन्म राम ने।
    रघुकुल में आनन्द हुआ रे,  लिया जन्म राम ने ।

  रामनवमी के पावन पर्व पर मन्दिरों में व अनेक धार्मिक संस्थाओं में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।जन- जन के आराध्य 
भगवान श्री राम के  जन्मोत्सव पर श्रद्धालुओं के मन में बहुत उमंग होती है।इन दिनों में ही नवरात्र उत्सव की भी धूम रहती है।
नवें दिन दुर्गा पूजा के साथ- साथ भगवान राम की भी पूजा- आराधना की जाती है।सभी आपस में एक-दूसरे को श्री रामनवमी की शुभकामनाएँ व बधाइयाँ देते हैं ।

{{{{ परब्रह्म श्री राम }}}}

श्री रामायण में भगवान श्री राम के दो रूप हैं ।भगवान श्री राम का परब्रह्म रूप तो मन- वाणी से अगोचर है, उसके विषय में तो वेदों ने भी 'नेति- नेति'  कहा है।उसका अनुभव तो योगीजन समाधि में करते हैं ।श्री राम का परब्रह्म रूप विचार का विषय नहीं ; अनुभव का विषय है।
 राम नाम अमृत की धारा ,  है ये  मीठी  वाणी ।
ऋषि मुनि सब जपते इसको, जपते हैं सब ज्ञानी ।

{{{{ मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम }}}}

                        मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम मनुष्य चरित्र का सर्वोत्तम आदर्श हैं ।भगवान श्री राम के जीवन में कितनी भी विषम परिस्थिति आईं लेकिन मर्यादाओं का पालन करने में वे कभी चूके नहीं । भगवान श्री राम ने सदैव गुरुजनों व माता-पिता की आज्ञा का दृढता के साथ पालन किया।श्री राम सबका सदैव आदर करते थे इसलिए वे महान कहलाए।

             पिता की आज्ञा से ही वह महर्षि विश्वामित्र के साथ वन गए।वन में महर्षि के आश्रम में श्री राम- लक्ष्मण ने उनके यज्ञों की रक्षा की और यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों का संहार किया ।भगवान श्री राम ने अपने जीवन में तप को बहुत महत्व दिया।वन में रहते हुए उन्होंने तपस्वी जीवन को अंगीकार किया और राजा बनकर भी प्रजा के हितों के लिए एक तपस्वी की तरह कष्ट सहते रहे।

                          मर्यादाओं का पालन करने की बात जहाँ भी आती है, वहीं अयोध्या के राजा श्री राम स्वतः स्मरण हो आते हैं      वाल्मीकि रामायण के अनुसार--- " भगवान श्री राम चन्द्रमा के समान अति सुन्दर, समुद्र के समान गम्भीर और पृथ्वी के समान अत्यन्त धैर्यवान थे।भगवान श्री राम इतने शील संपन्न थे  कि किसी भी परिस्थिति में किसी को कटु वचन नहीं बोला।उन्होंने अपने माता-पिता, गुरुजनों, भाइयों, सेवकों, प्रजाजनों अर्थात हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह किया।

    यदि भगवान श्री राम के संपूर्ण जीवन पर एक दृष्टि डाली जाए तो उसमें कहीं भी अपूर्णता दृष्टिगोचर नहीं होती श्री राम रीति, नीति, प्रीति सभी के संपूर्ण ज्ञाता व मर्मज्ञ रहे हैं ।इसी कारण श्री राम परिपूर्ण हैं और आदर्श हैं ।उन्होंने मर्यादा का घोर उल्लंघन करने वाले रावण से भी युद्ध किया और उसे पराजित करके मर्यादाओं की पुनः स्थापना की।

    वनवास जाने की ख़बर सुनकर वे दुःखी नहीं हुए , बल्कि प्रसन्न हुए कि वन में उन्हें ऋषियों का सान्निध्य मिलेगा ।वन में उनके साथ उनकी भार्या सीता व अनुज लक्ष्मण भी गए।वन में  14        वर्ष तक  राजकीय वैभव से दूर सामान्य वनवासी की तरह जीवन जिया और वन में निवास करने वाले राक्षसों व असुरों का संहार करके वह क्षेत्र ऋषियों के लिए सुरक्षित किया।

                 भगवान श्री राम अत्यन्त धैर्यवान, पराक्रमी, ज्ञानी, मधुर- भाषी , सत्यभाषी , नीतिकुशल साहसी आदि समस्त गुणों की खान हैं, उनके गुणों की महिमा अनन्त है।जब उनके समक्ष छलपूर्वक किया गया सीता- हरण का महासंकट उपस्थिति हुआ तब भी श्री राम ने धैर्यपूर्वक आगे की रणनीति का निर्धारण करके, लंका पर विजय प्राप्त की।

{{{{ राम राज्य }}}}

रामराज्य का अर्थ ही है--- ऐसा राज्य जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते ।सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति ( मर्यादा ) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं 

             भगवान श्री राम  ने एक पिता की भाँति अपनी प्रजा का पालन किया , उनके राज्य में प्रजा को किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं था इसलिए उनके राज्य को " रामराज्य " कहा जाता है।आज भी मनुष्य जाति  भगवान श्री राम को " राजा राम " के रूप में याद करती है ; क्योंकि भगवान श्री राम ने केवल अयोध्या में  ही नहीं बल्कि सभी के हृदयों पर राज्य किया था।

  राजा बनने के उपरांत भी उन्होंने राजपद का निर्वहन इतनी श्रेष्ठता से किया अतः आज भी श्रेष्ठ राज नेतृत्व की तुलना रामराज्य से की जाती है ।इस तरह भगवान श्री राम में आदर्श लोकनायक के सभी गुण मौजूद थे और इसीलिए वे सदियों से जन- जन के आराध्य बने हुए हैं ।

                 श्री राम नवमी का पर्व हम सभी भगवान श्री राम के जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं वह हमें संदेश देता है कि हम सभी श्री राम की तरह आदर्श जीवन शैली का निर्वाह करें, मर्यादित  आचरण करें और " श्री राम " नाम की भक्ति से अपने जीवन को सफल बनाएँ ।
" श्री राम श्री राम गाते चलें, जीवन सफल बनाते चलें "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।