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Friday, May 29, 2020

मानस पूजा अर्थात मन से भगवान की पूजा , भाव के भूखे हैं भगवान

 ●●● मानस पूजा अर्थात मन से भगवान की पूजा ●●●
शास्त्रों में ईश्वर की पूजा-आराधना के विविध विधि-विधान बताए गए हैं ।उन्हीं में से एक है " मानस पूजा " । मानस पूजा अर्थात मन से भगवान की पूजा ।कहते हैं कि पूजन के विधि-विधानों में मानस पूजा सर्वश्रेष्ठ व सबसे अधिक प्रभावशाली है ।भौतिक सामग्रियों से की गई पूजा की अपेक्षा मन से की गई ईश्वर की पूजा को करोड़ों गुना अधिक फलदायी व प्रभावकारी बताया गया है ।मन की कल्पना से एक पुष्प भी चढ़ा दिया जाए तो वह एक पुष्प भी करोड़ों बाह्य पुष्पों के बराबर होता है।

ईश्वर सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और सर्वसमर्थ भी ।संसार में जो भी कुछ है , वह सब ईश्वर की ही देन है ।यह सारा संसार, यह समस्त सृष्टि भी स्वयं ईश्वर की ही रचना है ।जब सब कुछ ईश्वर का ही है , तब हम ईश्वर की पूजा-आराधना भला किस प्रकार और किन सामग्रियों से करें ; क्योंकि वे सारी सामग्रियाँ, जैसे --- पुष्प, विल्वपत्र , फल आदि तो ईश्वर को स्वतः ही समर्पित हैं ।

पूजन की प्रचलित विधियों में जहाँ भगवान को भोग व अन्य वस्तुएँ अर्पित करने का विधान है ।जिन्हें जुटाने में समय भी लगता है , हरेक के लिए कभी-कभी संभव भी नहीं होता, वहीं मानस पूजा में कल्पना शक्ति के द्वारा ही पल भर में सब कुछ संपन्न हो जाता है।मानस पूजा में सिर्फ भक्ति और भावना के साथ कल्पना शक्ति की जरूरत होती है ।भगवान पदार्थ से परे हैं और फिर सामान्य पूजन में भी तो विविध सामग्रियों को अर्पित करके भक्ति भाव का ही तो प्रदर्शन किया जाता है ।मानस पूजा में न तो सामग्री जुटाने हेतु न तो धन की जरुरत होती है और न ही समय की ।

                   मानस पूजा में पल भर में ही ब्रह्माण्ड की सैर कर आते हैं और इससे भी परे सभी लोकों तक पहुँच अपने आराध्य की आराधना कर आते हैं ।इस प्रक्रिया में हमारा मन निश्चित ही संसार से दूर ईश्वर के चरणों में एकाग्र होने लगता है।इस तरह आराधक जब अपने आराध्य के चरणों में प्रार्थना करता है तब मन को जो आनंद और शान्ति मिलती है इसकी तो बस कल्पना ही की जा सकती है ।

इस मनःस्थिति में आराधक को सृष्टि के कण-कण में अपने आराध्य की ही छवि दिखने लगती है।मानस पूजा के सर्वश्रेष्ठ व प्रभावशाली रूप के कारण ही आचार्य शंकर ने आध्यात्म -पिपासुओं के मार्गदर्शन हेतु शिवमानस पूजा स्रोत की रचना की ।जिसमें से कुछ भावानुवाद-- 

हे दयानिधे ! हे पशुपते ! यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान , नाना रत्नावलिविभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरी की गंध से समन्वित चंदन, जूही, चंपा और विल्पत्र से रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप यह सब मानसिक ( पूजोपहार ) ग्रहण कीजिए।

हे शंभो ! मेरी आत्मा आप हैं, बुद्धि पार्वती जी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मंदिर है, संपूर्ण विषय-भोग की रचना आपकी पूजा है , निद्रा समाधि है , मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा संपूर्ण शब्द आपके स्रोत हैं, इस प्रकार मेरे जो-जो कर्म हैं, वे सब आपकी आराधना ही है।

           ●●● भाव के भूखे हैं भगवान ●●●

वस्तुतः भगवान को किसी वस्तु अथवा पदार्थ की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं, पदार्थ के नहीं ।यदि वे भाव के भूखे न होते तो शबरी के झूठे बेरों को स्वीकार कर उसे नवधा भक्ति भला क्यों प्रदान करते ? फिर वे सूरदास की बाँह भी क्यों पकड़ते ? दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर विदुर की पत्नी के हाथों केले के छिलके का भोग भला क्यों स्वीकारते ।

शास्त्रों में ऐसे अनेक भक्तों के उदाहरण हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि भगवान तो भाव के भूखे हैं, पदार्थ के नहीं ।मानस पूजा में भक्त अपने आराध्य को मुक्तामंडित से सजाकर , स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान करता है ।स्वर्गलोक की मंदाकिनी गंगा के शीतल जल से अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौ के दुग्ध से पंचामृत का निर्माण करता है ।पृथ्वी रूपी गंध का अनुलेपन करता है ।कुबेर की पुष्पवाटिका से स्वर्णकमल पुष्पों का चयन करता है ।

साधक अपने आराध्य से प्रेम की अनंत गहराइयों में उतरकर भावपूर्वक कहता है - हे प्रभु ! मैं संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करत हूँ ! हे प्रभु ! अब मेरा   अपना  कुछ भी नहीं, मैंने अपना सब कुछ आपको ही समर्पित किया है ।हे प्रभु! आप इसे स्वीकार करें ।

हृदय से निकले ये एक-एक शब्द हमारे अंतस को प्रभुप्रेम की पराकाष्ठा तक पहुँचाते हैं ।चित्त एकाग्र व सरस हो जाता है , इससे बाह्य पूजा में भी आनंद की अनुभूति होने लगती है, साथ ही मन ध्यान व समाधि में डूबने लगता है और इस प्रकार भक्त और भगवान, आराधक और आराध्य, दोनों में एकात्म स्थापित हो जाता है।

कहते हैं कोई भी शुभ कर्म बारह वर्ष तक नियमित करने पर अपना फल अवश्य प्रदान करता है ।अतः प्रचलित पूजन विधि के साथ-साथ उसमें पहले या बाद में मानसिक पूजा भी नियमित करते रहें तो उसका फल मिलता अवश्य है।मानस पूजा में प्रेम, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, ध्यान व समाधि स्वयं ही घटित होने लगते हैं व आराधक को आराध्य के आनंदलोक तक पहुँचा देते हैं, साथ ही आध्यात्म के उच्च शिखर पर भी।

हम कहीं भी हों , जब हमें ईश्वर का स्मरण हो , तभी हम मानस पूजा करके स्वयं को ईश्वर से जोड़ सकते हैं ।मानस पूजा से साधक के अन्दर दिव्य ऊर्जा की वृद्धि होती है, उसका अंतर्मन प्रकाशित होने लगता है, साधक को अलौकिक अनुभूतियाँ होने लगती हैं और अंततः वह समाधि की ओर अग्रसर होने लगता है ।अतः सचमुच बड़ी अद्भुत है , बड़ी अलौकिक है मानस पूजा।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Thursday, May 28, 2020

श्रीमद्भगवद्गीता---अर्जुन के श्री कृष्ण के सखा से शिष्य बनने के क्षण

   ●● अर्जुन के श्री कृष्ण के सखा से शिष्य बनने के क्षण ●●
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के सम्बन्धी व अच्छे मित्र थे ।भगवान श्री कृष्ण को भी अर्जुन से विशेष लगाव था ।श्री कृष्ण के दिव्य व्यक्तित्व के बारे में अर्जुन ने सुना था , कुछ अनुभव उन्होंने स्वयं भी किए थे ।विश्वास था उन्हें अपने सखा श्री कृष्ण पर।लेकिन जब श्री मद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान ने अर्जुन को विश्व रूप का दर्शन दिखाया ।तब उनका संशय , विश्वास में बदल गया , अर्थात अब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि  श्री कृष्ण ही सम्पूर्ण सृष्टि के अधिष्ठाता हैं ।सृष्टि के कण-कण में, समय के क्षण-क्षण में श्री कृष्ण की ही सत्ता है।उन्होंने भगवान की महिमा का स्तवन करते हुए कहा --- 

"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।।"

"हे भगवन ! आप वायु, यम ,अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं ।आपके लिए हजारों बार नमस्कार हो ।आपके लिए फिर-फिर , बार-बार नमस्कार ।"  अर्जुन अपने इस स्तवन में भगवान श्री कृष्ण को जीवन के अधिष्ठाता के रूप में नमन करते हैं ।अर्जुन कहते हैं-- हे अनंत सामर्थ्य वाले ! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार । हे सर्वात्मन ! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार ; क्योंकि अनंत पराक्रमशाली आप सब संसार को व्याप्त किए हुए हैं ।इस तरह आप ही सर्वरूप हैं ।

अब अर्जुन ने सम्पूर्ण को जान लिया था ।अर्जुन को यह लगने लगा कि मैं तो भगवान को सखा मानकर बिना सोचे समझे  कुछ भी कहता रहता था।साथ खाता था , खेलता था , घूमता था । कहीं अनजाने में मुझसे कुछ भूलें तो नहीं हो गईं।ऐसा विचार करके अर्जुन भगवान से क्षमा माँगने लगे ।

   सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं , हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
     अजानता महिमानं तवेदं, मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।।
    यच्चावहासार्थमसत्कृसोऽसि , विहारशय्यासनभोजनेषु ।
   एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं , तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।। 

अर्थात-- हे परमेश्वर ! आपके इस प्रभाव को न जानते हुए , आप मेरे सखा हैं, ऐसा मानकर , प्रेम से अथवा प्रमाद से भी , हे कृष्ण ! हे यादव !  हे सखे ! जो कुछ बिना सोचे समझे मैंने कहा है।हे अच्युत ! जो मेरे द्वारा विनोद में, विहार , शय्या, आसन और भोजनादि के समय में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने  भूल वश कोई अपराध किए गए हैं । वे सब अप्रमेय स्वरूप अर्थात अचिंत्य प्रभाव वाले अपराधों के लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ ।

श्रीमद्भगवद्गीता में, अर्जुन के द्वारा कहे हुए ये दो श्लोक बड़े विलक्षण हैं ।अर्जुन क्षमा माँग रहे हैं श्री कृष्ण से ।इससे पहले तक
श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन अपने संशय प्रकट कर रहे थे ।उनके विषाद से शुरू हुई थी यह यात्रा ।उनका यह विषाद मोह से प्रारंभ हुआ था ।पितामह भीष्म व आचार्य द्रोण , जिनकी वह पूजा करते थे , जिनसे उन्हें प्यार व अपनत्व मिला था , उनसे वह युद्ध कैसे करें  ? शंकाओं से घिरे उनके किंकर्तव्यविमूढ़ मन ने श्री कृष्ण से समाधान की याचना की।कहा --

यत्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नं ।।"

अर्थात   जो निश्चित कल्याण करने वाली हो , वह बात मुझे कहिए,  मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ ।आप मुझे शिक्षा दें।

यहीं से प्रारंभ हुई थी गीताकथा , श्री कृष्ण के उपदेश व अर्जुन के कथन । श्री कृष्ण के दिव्य व्यक्तित्व को उन्होंने सुना और कभी-कभी अनुभव भी किया था ।वैसे भी पांडुपुत्रों का सम्पूर्ण जीवन विकट संकटों से गुजरा था ।सदा ही आपदाएँ-विपदाएँ उनके जीवन की परिभाषाएँ बनती रही थीं ।उन आपदाओं में श्री कृष्ण उनके सहयोगी बने थे ।इस पूरे विपदाओं से परिपूर्ण जीवनकाल में उन्हें पितामह भीष्म व आचार्य द्रोण का निश्छल स्नेह व अपनत्व मिला था ।

अब युद्ध भूमि में उन्हीं के साथ युद्ध, ऐसे में कहाँ पाएँ समाधान ? तो श्री कृष्ण को उन्होंने युद्ध भूमि में गुरू रूप में वरण किया ।भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का श्रवण करते रहे ।बुद्धि की उलझनें शान्त होती गईं ।अंतःकरण के उद्वेग,आवेग भी शान्त होते गए ।इस शांत मनःस्थिति में उन्होंने अनुभव किया कि जिन्हें ( अपने सखा को ) उन्होंने गुरू रूप में वरण किया था , वे तो साक्षात परमेश्वर हैं ।

और तब श्रीमद्भगवद्गीता में, अर्जुन की चेतना में एक नया आयाम प्रकट हुआ ।उन्होंने श्रवण किया श्री कृष्ण की विभूतियों को ।अद्भुत था यह सब अपूर्व व अश्रुतपूर्ण, परंतु अभी भी श्री कृष्ण कह रहे थे और अर्जुन सुन रहे थे ।ईश्वरीयता का साकार होना , इसका साक्षात्कार होना अभी भी बाकी था ।हालाँकि इस दौरान विश्वास दृढ़ हुआ था , आस्था मजबूत हुई थी , शंकाकुल मन शान्त हुआ था , पर स्पष्ट अनुभूति नहीं हुई थी , और अंतर्मन कुछ गहरे में कहने लगा था कि श्री कृष्ण कुछ विशेष हैं ।तब आखिर कौन हैं ये ? और तब अर्जुन का मन आखिर पूछ ही बैठा--- 

'आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो ? इस उग्र रूप में आप हैं कौन ? 

यहाँ पर गीता के उपदेश ने और अर्जुन की चेतना ने फिर से नए आयाम का स्पर्श किया ।अर्जुन ने अनुभव की -- श्री कृष्ण की ईश्वरीयता ।उनका ईश्वर रूप ।बड़ी सुस्पष्ट, सर्वथा प्रकट , संपूर्ण रूप से सघन हुई यह अनुभूति ।अब कोई शंका नहीं रही ।सभी शंकाएँ भगवत्ता में विलीन होतीं गईं ।अनुभूतियाँ बदलती हैं, तो अभिव्यक्ति भी बदलती है।

अब अर्जुन को अपना व्यक्तित्व, अपना अस्तित्व श्री कृष्ण में समाता हुआ लगा ।यह सब कुछ ऐसा था कि उससे इन्कार नहीं किया जा सकता था ।इसे स्वीकार किए बिना कोई अन्य उपाय न था ।साक्षात परमेश्वर सम्मुख खड़े होकर अपना परिचय दे रहे थे ।
वही  श्री कृष्ण, जिन्हे वे अब तक  अपने मित्र के रूप में, संबंधी के रूप में समझते थे ।उन्हीं मित्र को अब अर्जुन साक्षात ईश्वर के रूप में अनुभव कर रहे थे ।


           "सारथी बनकर पार्थ को ज्ञान गीता का दिया
           विश्व का दर्शन दिखाकर धन्य अर्जुन को किया"

धन्य है अर्जुन, जिन्होंने  अपने जीवन में  साक्षात परमेश्वर का   सान्निध्य प्राप्त किया । 

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Wednesday, May 27, 2020

ज्योतिष शास्त्र में जन्म के क्षण का विशेष महत्व क्यों है ?

  ●●ज्योतिष में जन्म के क्षण का विशेष महत्व क्यों है  ?●●
जीवन का हर पल अपने आप में महत्वपूर्ण है लेकिन जन्म का क्षण व्यक्ति को जीवनभर प्रभावित करता रहता है। जब कभी हम किसी ज्योतिषी से अपनी ग्रह-दशा के बारे मे पूछते हैं तो वे हमारे नाम आदि जानकारियों के साथ ।।जन्म स्थान व जन्म के समय का विवरण अवश्य माँगते हैं ।

ज्योतिष को लोग एक धर्मशास्त्र के रूप में देखते हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि यह एक महाविज्ञान है।ज्योतिष के मर्मज्ञ एवं आध्यात्मिक ज्ञान के विशेषज्ञ, दोनों ही एक स्वर से इस सत्य को स्वीकारते हैं कि मनुष्य जैसे उच्चस्तरीय प्राणी की स्थिति में परिवर्तन उसके कर्मों, विचारों, भावों एवं संकल्पों के अनुसार होता है।इसीलिए जन्म का क्षण विशेष महत्व रखता है।

 ●-  जन्म के क्षण का विशेष महत्व क्यों है ? इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि प्रत्येक क्षण में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विशिष्ट शक्तिधाराएँ किसी-न-किसी बिन्दु पर किसी विशेष परिमाण में मिलती हैं ।मिलन के इन्हीं क्षणों में मनुष्य का जन्म होता है ।इस क्षण में यही निर्धारित हो पाता है कि ऊर्जा की शक्तिधाराएँ भविष्य में किस क्रम में मिलेंगी और जीवन पर अपना क्या प्रभाव डालेंगी।

मनुष्य के जन्म का क्षण सदा ही उसके साथ रहता है।जन्म के क्षण का विशेष महत्व है ; क्योंकि यह क्षण बताता है कि जीवात्मा किन कर्मबीजों , प्रारब्धों व संस्कारों को लेकर किन और कैसे ऊर्जा-प्रवाहों के मिलन बिंदु के साथ जन्मी है ।

जन्म का क्षण इस विराट ब्रह्मांड में मनुष्य को व उसके जीवन को एक विशेष स्थान देता है।यह कालचक्र में ऐसा स्थान होता है , जो सदा अपरिवर्तनीय है।इनके मिलन के क्रम के अनुरूप ही सृष्टि, व्यक्ति, जन्तु, वनस्पति, पदार्थ, घटनाक्रम इत्यादि जन्म लेते हैं ।इसी क्रम में उनका विलय-विसर्जन भी होता है , जिसे सामान्य भाषा में इन सभी की मृत्यु अथवा स्वरूप का विसर्जन भी कह सकते हैं ।

ज्योतिर्विज्ञान के अन्वेषक महर्षियों ने इस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा-प्रवाहों को चार चरणों वाले सत्ताइस नक्षत्रों, बारह राशियों एवं नवग्रहों में वर्गीकृत किया है ।इनमें होने वाले परिवर्तन-क्रम को उन्होंने विंशोत्तर , अष्टोत्तर एवं योगिनी नक्षत्रों के क्रम में देखा है ।इनकी अंतर एवं प्रत्यंतर दशाओं के क्रम में इन ऊर्जा-प्रवाहों के परिवर्तन क्रम की सूक्ष्मता समझी जाती है ।

ज्योतिर्विज्ञान को यदि अच्छी तरह समझ लिया जाए तो मनुष्य अपनी मौलिक क्षमताओं को पहचान सकता है और उन्हें पहचान कर अपने स्वधर्म की खोज भी कर सकता है ।उस स्थिति में वह कालचक्र में अपनी स्थिति को प्रभावित करने वाले ऊर्जा-प्रवाहों के क्रम को पहचान कर ऐसे अचूक साधना विधान को अपना सकता है, जिससे कालक्रम के अनुसार परिवर्तित होने वाले ऊर्जा-प्रवाहों के क्रम से उसे क्षति न पहुँचे।ज्योतिष के ज्ञान का यही विशेष महत्व है ।

महादशाओं ,अंतर्दशाओं एवं प्रत्यंतरदशाओं में ग्रहों के मंत्र, दान की विधियों, मणियों, औषधियों का प्रयोग करके ग्रहों की दशाओं के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है और जीवन में सफलता अर्जित की जा सकती है ।ज्योतिष ज्ञान की अनभिज्ञता होने पर भी गायत्री मंत्र एवं महामृत्युंजय मंत्र की निरंतर उपासना व्यक्ति को जीवन के शिखर पर पहुँचा कर रहती है।

यदि हम ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान नहीं समझ सकते तो गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र की निरंतर उपासना से अपने जीवन को श्रेष्ठ
बना सकते हैं ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Friday, May 22, 2020

ज्योतिष शास्त्र का अर्थ, सौर जगत में रहने वाले सात ग्रह, महाभारत में शिव के अनुसार ज्योतिष, आधुनिक युग में ज्योतिषशास्त्र का परिवर्तित रूप,

                ●●● ज्योतिष शास्त्र का अर्थ  ●●●
"ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्"  -- अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध करानेवाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है ।ज्योतिष शास्त्र में मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार , परिभ्रमण काल , ग्रहण और स्थिति से सम्बन्धित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है । नभमंडल में स्थित ग्रह-नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं ।

ज्योतिष शास्त्र के कर्म विश्लेषण में अतीत यानी कि पूर्वजन्म , वर्तमान अर्थात यह जन्म एवं भविष्य अर्थात भावी जन्म-- सभी सम्मिलित हैं ।जीवन के दृश्य-अदृश्य सभी आयामों की जितनी सम्यक व्याख्या ज्योतिष में है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है।अनगिनत वैज्ञानिक प्रयोगों- परीक्षणों से यह प्रमाणित हो चुका है कि खगोल के प्रभाव भूगोल पर पड़ते हैं और यह खगोल-भूगोल एवं प्रकृति के सभी दृश्य-अदृश्य कारक मिलकर मानव-जीवन पर अपना प्रभाव डालते हैं ।

ज्योतिष शास्त्र में व्यक्तित्व को विचार, क्रिया और अनुभव के रूप में निरूपित किया गया है।इसी को दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप भी कहा गया है ।मानव जीवन के बाह्य व्यक्तित्व एवं आंतरिक व्यक्तित्व के तीन-तीन रूप एवं एक अंतःकरण-- इन सात के प्रतीक सौर जगत में रहने वाले सात ग्रह माने गए हैं ।व्यक्तित्व के ये सात आयाम सभी प्राणियों में समान नहीं होते ।कर्मानुसार इनकी स्थिति और परिस्थितियाँ होती हैं ।

ग्रह, नक्षत्र, तारे, राशियाँ, मंदाकिनियाँ , निहारिकाएँ , मनुष्य, अन्य प्राणी, वृक्ष, चट्टानें आदि विश्व ब्रह्माण्डीय घटक---  प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से एक-दूसरे को प्रभावित एवं आकर्षित करते हैं ।इन ग्रह नक्षत्रों का मानव जीवन पर सम्मिलित प्रभाव पड़ता है ।ये कभी कष्ट देते हैं तो सभी कष्ट दूर करते हैं ।हालाँकि यह सब होता है हमारे ही शुभ व अशुभ कर्मों के अनुसार, पर होता अवश्य है।ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन एवं उपयोग से दैवज्ञ को मानव जीवन के सभी क्षेत्रों के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाती है।

     ●●● सौर जगत में रहने वाले सात ग्रह ●●●

●बाह्य व्यक्तित्व के तीन रूप -- बृहस्पति, मंगल और चन्द्रमा●

● बृहस्पति -----बाह्य रूप के तीन रूपों में प्रथम रूप विचार का प्रतीक बृहस्पति है।यह ग्रह प्राणिमात्र के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है और शरीर संचालन के लिए रक्त प्रदान करता है।शारीरिक रूप से यह पैर , जंघा, जिगर, पाचन-क्रिया , रक्त एवं नसों का प्रतिनिधित्व करता है।कार्य व्यापार में बृहस्पति का संबंध धर्म और कानून से है।यह पुजारी, मंत्री, न्यायाधीश, दान आदि से संबंधित है ।आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह सौन्दर्य, प्रेम, शक्ति, भक्ति, व्यवस्था, बुद्धि, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र आदि को बढ़ावा देता है।

● मंगल --- बाह्य रूप के द्वितीय रूप का प्रतीक मंगल है ।मनुष्य में जितने भी उत्तेजक और संवेदनशील आवेग हैं, वे सभी इसी से नियंत्रित होते हैं ।यह मुख्य रूप से इच्छाओं का प्रतीक है ।कार्यक्षेत्र में मंगल --- सैनिक, चिकित्सक, प्रोफेसर, इंजीनियर, रसायनविद् , मशीन कार्य करने वाले , खेल , कारीगर आदि क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है ।इसके कारण व्यक्तित्व में साहस, दृढ़ता, आत्मविश्वास, क्रोध, एवं अधिकार भाव पैदा होते हैं ।

● चन्द्र ----  बाह्य व्यक्तित्व का तृतीय रूप चंद्रमा है।चंद्रमा शारीरिक चेतना पर प्रभाव डालता है तथा मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों को नियंत्रित करता है।शारीरिक रूप से इसका संबंध पेट, पाचन शक्ति, आँत , स्तन, गर्भाशय, आँखों से है।चंद्रमा श्वेत रंग , जल , नसों, भोजन पर प्रभाव डालता है।आत्मिक दृष्टि से यह संवेदना, आंतरिक इच्छा, उतावलेपन, भावनाओं, कल्पनाओं एवं सतर्कता में अभिवृद्धि करता है।
 
        ●आंतरिक व्यक्तित्व के तीन रूप-- शुक्र, बुध, सूर्य●

● शुक्र ----- आंतरिक व्यक्तित्व के प्रथम रूप का प्रतीक शुक्र है।   शुक्र -- सूक्ष्म मानव चेतना को प्रभावित करता है ।शुक्र निस्स्वार्थ भाव से जीवमात्र के प्रति मातृत्व भावना का विकास करता है।इसका संबंध नृत्य, गायन, वादन,कलात्मक वस्तुओं व भोगरूपी साधन-सुविधाओं से है।शारीरिक रूप से शुक्र -- गले, गुरदे , आकृति, वर्ण , केश आदि से संबंधित है।यह सौन्दर्य का प्रतिनिधित्व करता है ।आत्मिक रूप से यह व्यक्ति को स्नेह, सौन्दर्य, ज्ञान,आनंद, विशेष प्रेम , स्वच्छता, कुशाग्र बुद्धि,कार्य क्षमता प्रदान करता है ।

● बुध -- आंतरिक व्यक्तित्व के द्वितीय रूप का प्रतिनिधि बुध है ।यह मुख्य रूप से मस्तिष्क, स्नायु क्रिया, जिह्वा, वाणी , भुजाएँ व अन्य अंगों पर प्रभाव डालता है।कार्य व्यापार में यह शिक्षा,विज्ञान, साहित्य संपादन, बुद्धिजीवी भाव एवं व्यापार को बढ़ाता है।यह  समझ, स्मृति, तर्क, विश्लेषण से सम्बन्धित है।

● सूर्य ----आंतरिक व्यक्तित्व के तृतीय रूप का प्रतिनिधि सूर्य है। यह पूर्ण देवत्व की चेतना का प्रतीक है ।यह पूर्ण इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, सदाचार, विश्राम, शांति, जीवन की उन्नति एवं विकास का द्योतक है।यह राजा, मंत्री, सेनापति, आविष्कारक, पुरातत्ववेत्ता बनाता है।सूर्य --- शरीर में हृदय , रक्त संचालन, नेत्र, दाँत, कान, आँख आदि अंगों का प्रतिनिधित्व करता है ।आध्यात्मिक रूप से यह प्रभुता, ऐश्वर्य,प्रेम, उदारता, महत्वाकांक्षा, आत्मविश्वास, विचारों एवं भावनाओं के संतुलन का प्रतीक है।
            
                ●अंतःकरण का एक रूप -- शनि●
●शनि ---- शनि अंतःकरण का प्रतीक है ।यह बाह्य चेतना एवं अंतश्चेतना से सम्बन्धित है।मूख्य रूप से यह अहं भावना का प्रतीक है, जो विचार एवं कार्य के बीच संतुलन पैदा करता है ।यह जीवन के विविध रहस्यों को अभिव्यक्त करता है।जन्म स्थान का शनि विचारों एवं भावों को सुदृढ़ करता है।शनि व्यक्ति को कृषक, मठाधीश, कृपण, पुलिस अधिकारी, साधु-संन्यासी बनाता है।शनि --- चट्टानी प्रदेश ,बंजर भूमि, चौरस मैदान का प्रतिनिधित्व करता है ।
आध्यात्मिक दृष्टि से शनि तत्त्वज्ञान , विचार ज्ञान, नेतृत्व क्षमता, कार्यपरायणता , आत्मसंयम, धैर्य, दृढ़ता, गंभीरता, चरित्र, सामर्थ्य आदि का प्रतीक है ।शारीरिक दृष्टि से शनि हड्डियों, नीचे के दाँतों, बड़ी आँतों, मांसपेशियों एवं स्नायुतंत्रों आदि को प्रभावित करता है ।शनि कभी किसी पर कृपा नहीं करता है , वह तो मात्र कर्मफल देता है।सृष्टि में ऐसा कोई नहीं है, जो इसके न्याय से बच पाता हो।
इस प्रकार मानव जीवन के साथ ग्रहों का अभिन्न संबंध है।

●राहु --- राहु में शनि के सूक्ष्म प्रभाव अंतर्निहित हैं ।

● केतु -- इसमें मंगल की सूक्ष्मताएँ समाहित हैं ।

  ●●महाभारत, में ज्योतिषशास्त्र के बारे में  शिव कहते हैं-●●

ज्योतिष शास्त्र में वर्णित ग्रह-नक्षत्र किसी के सुख-दुःख का कारण नहीं हैं ।ये तो बस , इनकी सूचना देते हैं ।इस सम्बन्ध में भगवती पार्वती के प्रश्न पूछने पर स्वयं भगवान शिव ने पार्वती के संशय का निवारण किया--

भगवान शिव कहते हैं-- " हे देवि ! तुम्हारा संशय व प्रश्न उचित है ।इस विषय में जो ज्योतिष का सिद्धांत है उसे सुनो। महाभागे ! ग्रह और नक्षत्र मनुष्यों के शुभ और अशुभ की सूचना भर देते हैं ।वे स्वयं कुछ नहीं करते ।मनुष्यों के हित के लिए ज्योतिषचक्र द्वारा भूत और भविष्य के शुभाशुभ कर्मफल का बोध कराया जाता है ।उनके शुभ कर्मों की सूचना शुभ ग्रहों के द्वारा होती है और बुरे कर्मों के फल की सूचना अशुभ ग्रहों के द्वारा ।ग्रह-नक्षत्र किसी को शुभ या अशुभ फल नहीं देते ।सारा अपना ही किया हुआ कर्म , शुभ व अशुभ फल का उत्पादक होता है ।ग्रहों ने कुछ किया है - यह कथन तो लोगों का मिथ्याप्रवाद है।" ऐसा निश्चित जानकर ज्योतिष के प्रकाश में सदा शुभ कर्मों के लिए तत्पर रहना चाहिए।

यह सत्य है कि भारत में प्रादुर्भाव होकर ज्योतिर्विज्ञान विश्वभर में 
प्रसारित हुआ ।इस महान विज्ञान के विकास के प्रमाण भारत में ही नहीं, विश्व के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न भाषाओं में लिपिबद्ध हैं, जो ज्योतिर्विज्ञान की महान गरिमा का बोध कराते हैं ।मनुष्य की प्रकृति एवं उसके स्वभाव का गहरा संबंध ज्योतिर्विज्ञान से है जिसके अंतर्गत पिंड एवं ब्रह्माण्ड, व्यष्टि एवं समष्टि, आत्मा और परमात्मा के संबंधों का अध्ययन सम्मिलित रूप से किया जाता है।

पुरातन अतीत में ज्योतिर्विद्या का न केवल सैद्धान्तिक ज्ञान-विज्ञान दुनिया के कोने-कोने में लोकप्रिय हुआ , बल्कि अनेक स्थानों पर अंतरिक्षीय गतिविधियों के अध्ययन-पर्यवेक्षण के लिए विलक्षण वेधशालाओं का निर्माण भी हुआ, जिनकी निर्माण-प्रक्रिया और उनमें सन्निहित विशेषताएँ अभी भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्यमय बनी हुई हैं ।

  ●● आधुनिक युग में ज्योतिषशास्त्र का परिवर्तित रूप ●●

जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे ज्योतिष शास्त्र का रूप भी बदलता रहा , ज्योतिष शास्त्र की विद्या व विज्ञान पर अनेक आघात हुए।अल्पज्ञ तथा निहित स्वार्थी लोगों के हाथ में पहुँच जाने पर इसकी घोर अवनति हुई।ज्योतिषशास्त्र के मूल सिद्धांत कर्मफल विधान एवं इसके आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन से अपरिचित लोगों ने इसके रूप को ही परिवर्तित कर दिया ।

आजकल तो फलित ज्योतिष लोगों को डराने-धमकाने और उन्हें अकर्मण्य बनाने का माध्यम बन गया है।ज्योतिषशास्त्र एक व्यवसाय बनकर रह गया है ।यह प्रचलन आज ज्योतिर्विज्ञान का परिहास कर रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत की संतानें इस गौरवपूर्ण विज्ञान की वैज्ञानिकता को पुनर्जीवित एवं पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास करें ।
     
      ग्रह-नक्षत्र किसी का शुभ व अशुभ नहीं करते हैं ।हमारा किया हुआ कर्म ही , शुभ व अशुभ फल का उत्पादक होता है ।


सादर अभिवादन व धन्यवाद ।




Thursday, May 21, 2020

समय बड़ा बलवान, महाराज बलि का सुशासन,राजा बलि महान दानी, महाराज बलि के जीवन में समय की विपरीतता (वामन अवतार)


                 ●●● समय बड़ा बलवान ●●●
समय बड़ा बलवान है।समय की महिमा से जो अवगत होते हैं, वे उसको प्रणाम करके समय के अनुकूल स्वयं को ढाल लेते हैं ।काल का साथ होता है तो सब कुछ अनुकूल हो जाता है और जब समय साथ छोड़ देता है तो सब कुछ प्रतिकूल और विपरीत हो जाता है ।समय जब साथ छोड़ता है तो बड़े-बड़े भी धराशायी हो जाते हैं ।

बड़े-बड़े साम्राज्य, जिनकी कहीं कोई सीमा तक नजर नहीं आती है , जिनका सूर्य कभी ढलता नहीं है , इतने बड़े एवं व्यापक साम्राज्य को भी समय क्षण-भर में धूल- धूसरित कर देता है।समय ही है , जो बड़े से बड़े बलशाली को पराजित कर निर्बल कर देता है।समय , समय ही होता है , इससे बड़ा कुछ नहीं ।समय उठाता है तो एक तिनका भी पहाड़ बन जाता है , एक असहाय निर्बल भी समृद्ध एवं सम्पन्न हो जाता है ।

समय जब साथ देता है तो कठिन-से-कठिन परिस्थितियाँ अत्यन्त सहज व सरल हो जाती हैं, लगता है जैसे कुछ हुआ ही न हो।समय का साथ सबसे बड़ा साथ है और समय की विपरीतता सबसे बड़ा दंड है।विपरीत समयमें कोई ज्ञान, कोई तप, कोई साधन काम नहीं आता है।
           ●●● महाराज बलि का सुशासन ●●●

महाराज बलि , वैभव-विलास के प्रतीक स्वर्ग में इंद्र के पद को सुशोभित कर रहे थे इंद्रासन पर दैत्यकुल के महाराजा बलि प्रतिष्ठित थे।यह बात देवताओं को प्रीतिकर तो कदापि नहीं थी , परंतु सत्य यही था कि बलि, इंद्र के पद को सुशोभित कर रहे थे।राजा का आचरण जैसा होता है , उसी के अनुरूप उसके मंत्रीगण आचरण करते हैं ।प्रजा भी उसी के अनुसार अपनी जीवनशैली का निर्वहन करती है।

इंद्रासन पर आसीन महाराज बलि की सभा में कई नवीनताएँ ऐसी थीं, जिनकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।इंद्र की सभा में राग-रंग, हास-विलास, भोग-विलास के साधन उपलब्ध थे , जहाँ त्रैलोक्य सुंदरी अप्सराओं के नर्तन से दसों दिशाएँ गुंजायमान रहती थीं, अब उनकी जगह सत्संग होता था।महाराज बलि इंद्रासन पाकर भी विचलित नहीं हुए थे और उनकी सभा में तप एवं ज्ञान अजस्र धारा बहने लगी थी।

महाराज बलि महान तपस्वी थे ।दीर्घकालिक अखंड तपस्या का उनको अभ्यास था ।महाराज बलि के शासन-काल में मादक द्रव्यों की गंध के स्थान पर यज्ञधूम्र की पवित्र सुगंध फैलने लगी थी।सभी देवता अपने-अपने कर्तव्य में संलग्न रहते थे ।सम्पूर्ण प्रकृति संतुलित होकर सुचारु रूप से चल रही थी ।प्रकृति के संतुलन में ही मानव कल्याण एवं उसकी समस्त संभावनाएँ सम्मिलित होती हैं, अतः महाराज बलि प्रकृति के शोषण में नहीं, पोषण में विश्वास रखते थे और प्रकृति के पोषण के लिए यज्ञानुष्ठानों का आयोजन करते रहते थे।

महाराज बलि का हर पल, हर क्षण -- श्रेष्ठ कर्मों में नियोजित रहता था ।वे एक पल भी खाली नहीं रहते थे ।उनके पास अपार शक्ति थी , अपरिमित बल था , तप की ऊर्जा से वे ऊर्जान्वित थे , उनकी भक्ति भी असाधारण थी ।

       ●●● महाराज बलि महान दानवीर ●●●

महाराज बलि महान दानवीर थे , उनके द्वार से कभी कोई याचक निराश होकर नहीं लौटता था। उनकी दानवीरता की ख्याति समस्त जगत में फैली हुई थी ।एक बार भगवान विष्णु वामन के भेष में बलि के द्वार पर आए  और कहा --- " बलि ! मुझे तीन पग जमीन  दान में दे दो।  दान में मुझे सिर्फ तीन पग जमीन ही चाहिए ।क्या मुझ ब्राह्मण के लिए तुम्हारे पास तीन पग जमीन नहीं है।"

बलि का हृदय निश्छल और निष्पाप था , परंतु भगवान विष्णु वामन के भेष में बलि को छलने आए थे।बलि को उनके गुरू शुक्राचार्य ने इस छल के प्रति बलि को आगाह भी किया, परंतु बलि ने कहा-- " हे गुरुवर ! स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर , हाथ फैलाकर कुछ माँगने आए हैं, मैं इन्हें मना कैसे कर सकता हूँ ? मैं तो अपना दान देने का कर्तव्य अवश्य पूरा करूँगा।"
और महाराज बलि ने वामन भगवान से कहा -- "मैं आपको तीन पग जमीन दान देता हूँ ।तब भगवान विष्णु ने वामन रूप से विराट रूप में परिवर्तित होकर धरती-आसमान को नाप लिया और तीसरे पग से बलि को पाताल भेज दिया।

●●● महाराज बलि के जीवन में समय की विपरीतता ●●●

जब भगवान ने विराट रूप में आकर राजा बलि का सारा साम्राज्य ले लिया और बलि को पाताल भेज दिया तब बलि ने समझ लिया कि यह कालचक्र  ( समय ) की विपरीतता ही है जो ऐसी अवस्था का सामना करना पड़ रहा है ।वे अब एक साधारण इन्सान बनकर पाताललोक में रहने लगे ।वे इस अवस्था में भी अत्यन्त प्रसन्न थे , उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं थी ।वे एक सच्चे भक्त थे और एक भक्त को भक्ति के अलावा और क्या चाहिए ? 

महाराज बलि का साधारण जीवन- यापन करना उनके परिजनों को मंजूर नहीं था। उनके परिजन कहने लगे -- " महाराज आपने एक घूँसे से इंद्र के ऐरावत को मूर्च्छित कर दिया था।आपमें अपरिमित बल है ।आप अब भी एक महान तपस्वी हैं ।आप ज्ञानी भी हैं और काल के चक्र को समझते हैं तो फिर क्यों ऐसी साधारण स्थिति में रह रहे हैं ।

महाराज बलि ने अपने परिजनों को सांत्वनापूर्ण बातों से समझाया ।उन्होंने काल की महत्ता को स्पष्ट किया कि कैसे काल का साथ होता है तो सब कुछ अनुकूल हो जाता है और काल जब साथ छोड़ता है तो सब कुछ विपरीत हो जाता है ।महाराज बलि ने काल के विषय को भली-भाँति समझाया और आगे बोले -- " आज काल हमारे साथ नहीं खड़ा है, अतः ऐसे विपरीत समय में कोई ज्ञान, कोई तप , कोई साधन काम नहीं आता है ।सब कुछ धरा -का-धरा रह जाता है ।"

महाराज बलि ने कहा -- "काल की इस विपरीत दशा में हमें शांत एवं स्थिर बने रहना चाहिए, जो कि स्थिर रहना असंभव है, इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।प्रभु द्वारा निर्धारित स्थान पर रहकर और अपनी भक्ति के सहारे आने वाले अनुकूल समय की प्रतीक्षा के अलावा और कोई विकल्प नहीं है ।कोई प्रयास-पुरुषार्थ काम नहीं आता है ।इस समय कोई अपना भी साथ नहीं देता है।केवल भगवान ही सुनता है और साथ देता है , अतः इस कठिन समय में भगवान की भक्ति के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा हूँ ।यही सत्य है।"    ऐसा सुनकर परिजनों को बलि की ईश्वरभक्ति का भाव समझ में आ गया था।

इतिहास में व हमारे शास्त्रों में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि समय बड़ा बलवान है, समय के आगे किसी का वश नहीं चलता ।
सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Wednesday, May 20, 2020

योग का लक्ष्य "कैवल्य" , कैवल्य क्या है ?, अंतर्यात्रा का आरंभ, "कैवल्य" अंतस की आनंद अवस्था

        ●●●   योग का लक्ष्य  कैवल्य ●●●
कैवल्य का अर्थ है-- स्वतंत्र होना, संपूर्ण होना ।अकेले होना , अकेले होने की परम स्वतंत्रता ।किसी वस्तु, किसी व्यक्ति अथवा किसी घटनाक्रम या परिस्थिति पर निर्भरता नहीं ।अपने में, अपने आप से पूरी तरह से संतुष्ट, यही योग का लक्ष्य है ।योगसूत्र में इसी के लिए विधियाँ हैं, विज्ञान हैं, प्रक्रियाएँ हैं ।इन सबका सम्मिलित परिणाम कैवल्य है।

महर्षि पतंजलि ने अपने योगदर्शन को चार अध्यायों में विभाजित किया है ।सूत्रकार ऋषि ने योगसूत्र को चार चरणों या चार पादों में वर्गीकृत किया है ।कैवल्य पाद इनमें से चौथा पाद है इसे चतुर्थ अध्याय भी कह सकते हैं ।पहले के तीन अध्याय-- समाधिपाद, साधनपाद एवं विभूतिपाद -- ये कैवल्यपाद में स्वतः ही समाविष्ट हो जाते हैं ।

 ●●● कैवल्य क्या  है ? महर्षि पतंजलि के अनुसार ●●●

एक बार महर्षि पतंजलि ने अपने आश्रम में साधनारत शिष्यों को प्रश्नों के लिए आमंत्रित किया ।शिष्य उनसे अपनी जिज्ञासा के अनुरूप तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगे , इस पर ऋषि पतंजलि ने कहा -- " वही प्रश्न पूछो , जो तुम्हें तुम्हारे स्वरूप का परिचय दे।वही प्रश्न पूछो , जो स्वयं के केन्द्र के निकट हो।"  तब एक शिष्य ने प्रश्न पूछा कि स्वयं के केन्द्र के निकट का प्रश्न पूछने का क्या अर्थ है ? उसकी जिज्ञासा के समाधान हेतु महर्षि पतंजलि ने कहा--- 

   " दूर देखने के पहले अपने निकट देखो ।वर्तमान क्षण के प्रति सचेत रहो ; क्योंकि वर्तमान अपने में भविष्य और अतीत के उत्तर लिए रहता है।अभी तुम्हारे मन में कौन सा विचार आया ? अभी तुम मेरे सामने विश्रांत अवस्था में बैठे हो या तुम्हारा शरीर तनावपूर्ण है ? अभी तुम्हारा ध्यान पूरी तरह से मेरी ओर है या थोड़ा-बहुत ही है ? इस तरह के प्रश्न पूछकर स्वकेन्द्र के निकट आओ । निकट के प्रश्न ही दूर के उत्तरों तक ले जाते हैं ।स्वकेन्द्र की निकटता ही स्वकेन्द्र का परिचय कराती है और स्वकेन्द्र का परिचय ही स्वकेन्द्र में प्रतिष्ठा प्रदान करता है ।"स्वकेन्द्र में हुई यही प्रतिष्ठा कैवल्य है।"

           ●●●अंतर्यात्रा का आरंभ ●●●


योग अंतर्यात्रा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का साधन है।योग ही जीवन में एक विशिष्ट दृष्टिकोण विनिर्मित करता है।प्रचलित अर्थों में योग, दार्शनिक ज्ञान तक सीमित नहीं है।योग दूर के , सुदूर के प्रश्नों की फिक्र नहीं करता।योग का संबंध स्वकेन्द्र के निकट के प्रश्नों से है।जितने निकट का प्रश्न होता है , उतनी ही अधिक संभावना उसे सुलझाने की होती है।जब हम निकट के प्रश्न का उत्तर पा लेते हैं तो पहला कदम अपने आप उठ जाता है।तब समझो कि अंतर्यात्रा का आरंभ हो गया।

अंतर्यात्रा के आरंभ होने पर धीरे-धीरे वे प्रश्न भी सुलझने लगते हैं, जो दूर के होते हैं।योगसूत्र में अंतर्यात्रा के दौरान गुजरने वाली अवस्थाओं में कैवल्य, समाधिपाद में वर्णित सभी तरह की समाधियों का शिखर अनुभव है।कैवल्य, दूसरी अवस्था साधनपाद में वर्णित सभी साधनाओं का शिखर परिणाम है।यह कैवल्य तृतीय अवस्था अर्थात विभूतिपाद में वर्णित सभी विभूतियों के मध्य शिखर विभूति है।इसके सर्वोच्च शिखर कैवल्यपाद में सभी कुछ अंतर्निहित है।

    ●●● कैवल्य अंतस् की आनंद अवस्था ●●●
अंतस् की आनंद अवस्था के लिए सब लालायित रहते हैं, लेकिन केवल केंद्रस्थ व्यक्ति ही आनंदित हो सकता है, भीड़ भला कैसे आनंदित हो सकती है।भीड़ का कोई व्यक्तित्व नहीं होता।आनंद का अर्थ है -- एक परम मौन और ऐसा मौन तभी संभव है , जब भीतर लयबद्धता हो।जब सारे बेमेल टुकड़ों का मेल हो जाए , वे एक बन जाएँ ।जब हमारे अंदर कोई न हो , बस हम अकेले हों ।तब अपने आप हम आनंदित हो जाएँगे।

कैवल्य शब्द में प्रेरणा है, सचेतना है ।कैवल्य शब्द में केवल समाविष्ट है।इसमें अकेलापन है।अभी तक हम भीड़ की तरह जिए हैं ।कैवल्य की ओर बढ़ने का मतलब यह हुआ कि अब लयबद्ध होने लगे ।भीड़ से अकेलेपन की ओर बढ़ने लगे ।अनेक से एक होने लगे।हमारा एकजुट होना , हमारा केन्द्रीकृत होना हमारी नैसर्गिक आवश्यकता है और जब तक हम केन्द्र को नहीं पा लेते, तब तक हमारे प्रयास व्यर्थ हैं ।इसलिए पहली आवश्यकता है-- केन्द्रबिंदु पर होना और जिसके पास यह केन्द्र है वही अंतस की आनंद अवस्था का अनुभव कर सकता है।

महर्षि पतंजलि के सारे निर्देश, सारे अनुशासन अंतस की आनंद अवस्था के लिए ही हैं ।सभी का हेतु यही कैवल्य है।अंग्रेजी का डिसिप्लिन शब्द भी अनुशासन की भाँति ही सुन्दर है।इसकी जड़, इसका उद्गम वही है , जहाँ डिसाइपल यानी कि शिष्य -- सीखने के लिए प्रतिबद्ध ।

●● कैवल्य का बोध कराने वाली एक प्रेरक बुद्ध कथा ●●

एक बार एक समाज सुधारक भगवान बुद्ध के पास आया ।उसने भगवान से कहा-- " संसार बहुत दुःख में है , आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ ।" बुद्ध ने कभी यह कहा ही नहीं कि" संसार दुःख में है।"  बुद्ध का तो वचन है -- " तुम दुःख में हो , संसार नहीं ।जीवन दुःख में है ,संसार नहीं ।लेकिन उस समाज सुधारक ने कहा--"संसार बड़ी पीड़ा में है ।मैं आपसे सहमत हूँ ।अब मुझे बताइए कि मैं क्या कर सकता हूँ  ? बड़ी गहरी करुणा है मुझमें और मैं मानवता की सेवा करना चाहता हूँ ।"
भगवान बुद्ध उसकी ओर देखकर मौन ही रहे ।बुद्ध के शिष्य आनंद ने कहा-- " भगवान यह व्यक्ति सच्चा जान पड़ता है ।इसे राह दिखाइए ।"तब  बुद्ध ने उससे कहा--- तुम संसार की सेवा करना चाहते हो , लेकिन तुम हो कहाँ ?  मैं तुम्हारे भीतर किसी को नहीं देख रहा ।मैं देखता हूँ और वहाँ कोई नहीं है ।तुम्हारा कोई केन्द्र नहीं ।और जब तक तुम्हारे भीतर कोई ठोस केन्द्र नहीं बनता , तब तक तुम्हें कार्य में सफलता नहीं मिलेगी।"  

कह सभी रहे हैं कि संसार बड़े दुःख में है , किंतु वे जो कर रहे हैं, उससे यह दुःख बढ़ रहा है , लेकिन सभी आदत से मजबूर हैं ।दुःख को मिटाने के लिए कैवल्य मंदिर में प्रवेश करना होगा ।स्वयं में, स्वयं को प्रतिष्ठित करना होगा । महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के चतुर्थ अध्याय में इसी कैवल्य के सत्य की स्पष्टता है।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।





Sunday, May 17, 2020

सूर्य नमस्कार एक पूर्ण यौगिक अभ्यास , सूर्य नमस्कार के तीन आवश्यक अंग

   ●●●सूर्य नमस्कार एक पूर्ण यौगिक अभ्यास ●●●
सूर्य नमस्कार संपूर्ण स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला एक विशिष्ट यौगिक अभ्यास है , जिसमें बारह आसनों का समावेश है , साथ ही श्वसन प्रक्रिया एवं मंत्र विज्ञान भी इसके साथ जुड़ा है।सूर्य नमस्कार में आसन, प्राणायाम और मंत्रयोग तीनों ही सम्मिलित हैं।
इसका न्यूनतम बीस मिनट का अभ्यास भी संपूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाला माना गया है ।

भारतीय योगाचार्यों के अनुसार- सूर्य नमस्कार स्वयं में एक पूर्ण यौगिक अभ्यास है।मात्र सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से व्यक्ति सम्पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकता है।इस यौगिक अभ्यास को करने में समय भी कम लगता है और इस अभ्यास की प्रक्रिया भी सरल है।इससे शरीर व मन तो स्वस्थ बनते ही हैं, साथ ही व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है।

वैज्ञानिकों की दृष्टि में सूर्य हमारी पृथ्वी के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है ।प्रातःकाल सूर्य नमस्कार करने से सूर्य की किरणें प्रचुर मात्रा में शरीर में प्रवेश करती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभदायक हैं ।योगशास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि सूर्य नमस्कार मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।इसके नियमित अभ्यास से मस्तिष्क में एक प्रकार की शक्ति आती है , जो मनुष्य को बुद्धिमान बना देती है तथा मनुष्य अपने तनाव , चिंता , द्वंदों का निराकरण करने में सक्षम हो जाता है ।

सूर्य नमस्कार से मनुष्य की सुप्त क्षमताओं का विकास होता है साथ ही अनेक रोगों के निवारण में भी सहायता मिलती है ।'सूर्य नमस्कार'  मन की स्थिरता व आत्मनियंत्रण अथवा आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न तनाव से मुक्ति दिलाने में भी सहायक होता है।वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य नमस्कार में आसनों से शारीरिक स्तर पर, श्वसन से प्राणिक स्तर पर तथा मंत्र ( बीज मंत्रों) से सूक्ष्म सुप्त ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं , चक्रों पर प्रभाव पड़ता है।

     ●●● सूर्य नमस्कार के तीन आवश्यक अंग ●●●

       सूर्य नमस्कार के तीन आवश्यक मुख्य अंग हैं--- (1) आसन, (2) श्वसन , (3 ) मंत्र ।

● आसन --- सूर्य नमस्कार में बारह आसनों को सम्मिलित किया गया है, जिनका संबंध सूर्य की खगोलीय यात्रा में पड़ने वाली बारह राशियों से बताया गया है ।इन बारह आसनों के क्रमशः नाम हैं----
प्रणामासन , हस्तोत्थानासन , पादहस्तासन , अश्वसंचालनासन , 
पर्वतासन, अष्टांगासन , भुजंगासन , पर्वतासन , अश्वसंचालनासन,
पादहस्तासन, हस्तोत्थानासन, प्रणामासन ।

● श्वसन --- सूर्य नमस्कार की समस्त गतिविधियाँ श्वसन प्रक्रिया के नियंत्रण के साथ संपन्न की जाती हैं ।प्रत्येक आसन का संबंध पूरक, रेचक, और कुंभक में से किसी एक के साथ निर्धारित है।

● मंत्र---   सूर्य नमस्कार के बारह आसनों में प्रत्येक के साथ एक बीजाक्षर युक्त मंत्र संबद्ध है ।आसनों की स्थिति के अनुरूप ही अभ्यास कर्ता को मंत्रों का उच्चारण एवं मंत्र भावना को आत्मसात् करना होता है । योगाचार्य इन मंत्रों की विवेचना के साथ ही इनकी प्रक्रिया एवं लाभों को भी समझाते हैं ।

अनेक प्रसिद्ध योगकेन्द्रों में सूर्य नमस्कार पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किए जाते हैं  ।सूर्य नमस्कार के रूप में योग की विशिष्ट तकनीक के द्वारा शरीर के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की वृद्धि की विधियों पर शोध अध्ययन किया जाता है ।

अतः यह कहा जा सकता है कि सूर्य नमस्कार एक संपूर्ण यौगिक अभ्यास है।जो नियमित सूर्य नमस्कार का अभ्यास करते हैं वे इस यौगिक प्रक्रिया से अवश्य ही लाभान्वित होते हैं ।

       ॐ सूर्याय नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ सूर्याय नमः 

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।