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Saturday, May 16, 2020

चातुर्मास्य, विष्णु तत्व क्या है ? हरिशयनी एकादशी से चातुर्मास्य का प्रारंभ,चातुर्मास्य में आत्मसंयम व त्याग का महत्व,चातुर्मास्य में उपवास, स्वाध्याय व भजन-कीर्तन, स्कंदपुराण में चातुर्मास्य

          ●●● चातुर्मास्य,  विष्णुतत्व क्या है ?  ●●●
वर्षाकाल के चार महीने ( श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक )
का समय भगवान विष्णु का योगनिद्रा काल कहलाता है।भगवान विष्णु सर्वव्यापक परमात्मा हैं ।वैदिक पुरुषसूक्त में जिस परमात्मतत्व का निरूपण किया गया है, वह विष्णु तत्व ही है।
ऋग्वेद, श्री हरि की महिमा का गुणगान करते हुए कहता है -- न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ।अर्थात-- ' हे विष्णु देव ! कोई ऐसा प्राणी न तो उत्पन्न हुआ है और न होने वाला है , जिसने आपकी महिमा का अंत पाया हो।'

भगवान विष्णु निर्गुण हैं और सगुण भी ।वैचारिक दृष्टि में जो परमेश्वर निराकार-निर्गुण है , भाव दृष्टि से वही साकार- सगुण बन जाता है।अव्यक्त ईश्वर भक्तों की भक्ति के वशीभूत होकर व्यक्त भी हो जाता है।धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने के लिए भगवान विष्णु अपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करते हैं ।उनके सर्वाधिक लोकप्रिय 'ध्यान ' में उन्हें क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रालीन दर्शाया गया है ।

   ●●● हरिशयनी एकादशी से चातुर्मास्य का प्रारंभ●●●

भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से भगवान विष्णु की योगनिद्रा प्रारंभ होती है ।इसीलिए इस तिथि को  'हरिशयनी एकादशी ' भी कहते हैं ।वैष्णव मन्दिरों में इस तिथि को श्री हरि ( विष्णु भगवान) का शयनोत्सव अत्यन्त श्रद्धा के साथ मनाया जाता है ।श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और रात्रि में भगवान के नाम का स्मरण करने  के साथ जागरण करते हैं ।

आषाढ़ शुक्ल एकादशी, द्वादशी, अथवा पूर्णिमा को चातुर्मास्य उपवास का प्रारंभ किया जाता है ।जब सूर्य कर्क राशि में प्रविष्ट होता है , तब चातुर्मास्य का आरंभ होता है ।आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरु हुई श्री हरि की योगनिद्रा कार्तिक शुक्ल दशमी तक रहती है।इस चार मास के शयन काल को " चातुर्मास्य " कहा जाता है । 

प्रत्येक मांगलिक कार्य के शुभारंभ के समय पूजन करते समय भगवान विष्णु को साक्षी मानकर ' संकल्प '  किया जाता है । चातुर्मास्य में श्री हरि के योगनिद्रालीन होने के कारण विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत, शिलान्यास, नवगृह प्रवेश व अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं ।

    ●●● चातुर्मास्य, आध्यात्मिक साधना काल ●●●

सनातन संस्कृति में चातुर्मास्य का काल आध्यात्मिक साधना काल कहलाता है।भारतीय ऋषि-मुनियों ने चातुर्मास्य में सांसारिक कार्यों का निषेध करके इस काल को आध्यात्मिक साधना हेतु आरक्षित कर दिया है।साधु-महात्मा इन दिनों एक ही स्थान पर रहकर आध्यात्मिक क्रियाओं जैसे भजन , तप आदि में संलग्न रहते हैं ।सनातन धर्मावलंबी चातुर्मास्य के समय का सदुपयोग आध्यात्मिक ऊर्जा एवं पुण्य को अर्जन करने के लिए करते हैं ।

धर्म शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास्य में किसी एक वस्तु को त्यागना अवश्य चाहिए ।श्रावण में शाक, भाद्रपद में दही , आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल, चना , मटर के त्याग का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट है।इसके अतिरिक्त श्रद्धालु किसी अन्य वस्तु का भी त्याग कर सकते हैं ।जिस वस्तु को त्यागें, उसका दान जरूर करें, तभी उसका पुण्यफल प्राप्त होता है ।इस नियम का पालन करने से व्यक्ति में आत्मसंयम व त्याग की भावना का विकास होता है।

शास्त्रों के अनुसार-- चातुर्मास्य में जिस किसी भी नियम का पालन आस्था के साथ किया जाता है, उसका अनंत फल प्राप्त होता है ।जो लोग आर्थिक परेशानी में हों , वे चातुर्मास्य में लक्ष्मी पति श्री हरि की आराधना करते हुए, केवल फलाहार कर सकते हैं ।

● चातुर्मास्य में उपवास, स्वाध्याय व भजन-कीर्तन का महत्व ●

चातुर्मास्य में श्रद्धालु, संत-महात्मा अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार व्रत-उपवास रखते हैं ।सामान्य व्यक्ति चातुर्मास्य में सात्विक भोजन के साथ यथायोग्य धर्माचरण करते हैं, तो भी उन्हें भगवान विष्णु की प्रसन्नता प्राप्त होती है ।

चातुर्मास्य में प्रतिदिन तारों को देखने के उपरांत मात्र एक बार भोजन करने वाला धनवान, रूपवान और माननीय होता है ।जो एक दिन के अंतराल में भोजन करते हुए चातुर्मास्य बिताता है, वह देहावसान के पश्चात सद्गति प्राप्त करता है।भगवान विष्णु के शयन करने पर निरंतर पाँच दिन उपवास करके जो व्यक्ति छठे दिन भोजन ग्रहण करता है , उसे राजसूय, अश्वमेध जैसे महायज्ञों का फल मिलता है।

 जो श्रद्धालु तीन रात उपवास करके चौथे दिन भोजन ग्रहण करते हुए चातुर्मास्य बिताता है, वह भवबंधन से मुक्त होता है ।जो भक्त हरि के श्रवण काल में अयाचित अन्न का सेवन करता है , उसका अपने प्रियजनों से कभी वियोग नहीं होता।

चातुर्मास्य में धर्मग्रंथों के स्वाध्याय द्वारा भगवान विष्णु की अर्चना करने वाला विद्यार्थी महाविद्वान बन जाता है।श्री हरि के सामने बैठकर ' पुरुष-सूक्त' का पाठ करने से बुद्धि का विकास तथा विद्या की प्राप्ति होती है ।जो अपने हाथ में फल लेकर मौन रहते हुए श्रीविग्रह की 108 बार परिक्रमा करता है,वह निष्पाप हो जाता है। 
जो श्रद्धालु चातुर्मास्य में भगवान के मंदिर में भाव-भक्ति से भजन-कीर्तन व नृत्य करते हैं वे श्री हरि की कृपापात्र बनते हैं ।चातुर्मास्य में प्रतिदिन विष्णुसूक्त के मंत्रों द्वारा तिल और चावल की आहुति देने से साधक रोग मुक्त हो जाता है ।क्षीरसागर में योगनिद्रा में अवस्थित जगदीश्वर की उपासना से भक्त के समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं ।

जैन धर्म के अनुयायी चातुर्मास्य को बहुत महत्व देते हैं ।बस , अंतर इतना है कि सनातन धर्म में आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल दशमी तक चातुर्मास्य माना जाता है; जबकि जैन धर्म में आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक चातुर्मास्य काल माना जाता है ।जैन मतावलंबी इन तिथियों को 
चौमासी चौदस कहते हैं ।

           ●●● स्कंद पुराण में चातुर्मास्य ●●●

स्कंद पुराण में चातुर्मास्य के दौरान  'पुरुषोत्तम क्षेत्र'  में आवास का अतिशय माहात्म्य वर्णित है।श्री जगन्नाथ पुरी के समुद्र के पवित्र जल में स्नान करके पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ( जगन्नाथ जी ) का दर्शन करते हुए, चातुर्मास्य व्रत का पालन मुक्ति का साधन माना गया है ।जो आस्तिक जन चातुर्मासपर्यंत  'पुरुषोत्तम क्षेत्र' में  रह सकते हों , उन्हें जीवन में कम-से-कम एक बार यह अनुष्ठान  (चातुर्मास व्रत ) अवश्य संपन्न करना चाहिए ।पुरी में रहकर जगन्नाथ मंदिर के दर्शन से भी कृपा प्राप्त होती है ।

चौमासे में अन्नदान को रत्न, आभूषण, वस्त्र, चाँदी , सोने के दान से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है ।जो साधक सात्विक आहार -विहार एवं व्रत-उपवास के साथ चातुर्मास्य व्यतीत करता है उसका जीवन सुख, शांति एवं समृद्धि से भर जाता है ।अतः अपनी क्षमता व सामर्थ्य के अनुसार चातुर्मास्य में आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़ने  से भगवत्कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

पुराने समय में आधुनिक विद्युत संसाधन नहीं होते थे और चौमासा बिशेष रूप से बरसात का मौसम होता है ।इन दिनों में बहुत बरसात होती है ।इसलिए चातुर्मास्य के शुरू होने के पहले ही जीवन-यापन की जरूरी वस्तुओं का संग्रह कर लिया जाता था ।
और शायद इसी कारण  चातुर्मास्य  का समय भगवद्भक्ति , स्वाध्याय एवं भजन-कीर्तन में संलग्न रहने का विधान बना होगा ; क्योंकि बरसात के मौसम में कहीं आना-जाना और व्यापार आदि करना आसान नहीं होता होगा।आजकल हममें से ज्यादातर लोग चातुर्मास्य अर्थात बरसात का मौसम-- बस इतना ही समझते हैं ।

           " गाऊँ प्रभु तेरा नाम, भजूँ प्रभु तेरा नाम "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।



Thursday, May 14, 2020

पंचतत्वों में संतुलन,पंचतत्वों के असंतुलन से स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव,पंचतत्वों के असंतुलन से पर्यावरण प्रदूषित,जलतत्व के संरक्षण से सभी तत्वों में संतुलन संभव ।

       
        ●●● पंचतत्वों में संतुलन जरूरी ●●●
गोस्वामी तुलसीदास जी कृत श्रीरामचरितमानस के अनुसार----
छिति जल पावक गगन समीरा।पंच रचित अति अधम सरीरा।।
अर्थात् पृथ्वी, जल , अग्नि, आकाश और वायु-- इन पाँच तत्वों से यह शरीर रचा गया है।हमारी प्रकृति व पर्यावरण में भी ,ये पाँच तत्व मुख्य रूप से घुले हुए हैं ।यदि इन तत्वों में प्रदूषण होता है तो इससे न केवल हमारा पर्यावरण दूषित होता है , बल्कि हमारे शरीर व मन भी अस्वस्थ बनते हैं ।

प्रकृति में घुले हुए ये पंचतत्व आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं ।इनमें से किसी भी तत्व में आया संतुलन अथवा असंतुलन दूसरे तत्व को प्रभावित करता है।किसी भी तत्व में प्रदूषण व्याप्त होने पर वह अन्य दूसरे तत्व को प्रभावित करता है।ठीक इसी प्रकार यदि हमारे शरीर में पंचतत्वों में से किसी भी तत्व में कमी या वृद्धि होती है तो उससे संबंधित रोग शरीर में पनप जाते हैं।

  ●●●पंचतत्वों के असंतुलन के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव ●●●
 
शरीर में वायु तत्व की अधिकता से वातरोग पनपते हैं व वायु तत्व के असंतुलन से शरीर की क्रियाविधि में गड़बड़ी पैदा होती है।अग्नि तत्व की अधिकता से अम्लता या एसिडिटी होती है व अग्नि तत्व की कमी से मंदाग्नि होने से भोजन ठीक से नहीं पचता।पृथ्वी तत्व की अधिकता से मोटापा हो जाता है और पृथ्वी तत्व की कमी से शरीर दुर्बल हो जाता है । 

जल तत्व की अधिकता से शरीर के किन्हीं अंगों में पानी भर जाता है व जल तत्व की कमी से शरीर में सूखापन प्रतीत होता है ।आकाश तत्व की अधिकता से शरीर के अंगों में दर्द की शिकायत हो सकती है व आकाश तत्व की कमी से बहरापन एवं  हड्डियों के जोड़ के लचीलेपन में कमी आ सकती है।

इस तरह पंचतत्वों में संतुलन बहुत जरूरी है, चाहे वह शरीर की बात हो या हमारे पर्यावरण की।वर्तमान समय की यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि हमारा शरीर व हमारा पर्यावरण --- दोनों ही इस समय प्रदूषण की मार को झेल रहे हैं, जिसके कारण प्रकृति व पर्यावरण में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं ।

      
  ●●● पंचतत्वों के असंतुलन से पर्यावरण प्रदूषित ●●●

इस समय पृथ्वी पर सबसे बड़ा संकट जलसंकट है, जलसंकट के कारण भूगर्भ का जलस्तर बहुत कम हो गया है, इसके साथ ही वर्षा ऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में नदी-तालाबों व झरनों में भी जल का स्तर बहुत कम हो गया है ।वर्तमान में अधिकांश नदियों का जल भी प्रदूषित हो गया है ।ज्यादातर कुँए , तालाब आदि सूख गए हैं ।

जलसंकट के साथ ही ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का जो तापमान बढ़ रहा है , उससे ध्रुवों में जमी हुई बरफ धीरे-धीरे पिघल रही है, इससे समुद्र का जलस्तर अगर एक निश्चित मानदंड से बढ़ेगा, तो उससे समुद्रतट पर बसे हुए शहर जलमग्न हो जाएँगे ।
वातावरण में ऊष्मा बढ़ने से ग्रीष्म ऋतु में प्रायः जंगलों में आग लग जाती है , जो अत्यंत भयंकर होती है जिससे कि हमारी बहुत सारी वनस्पतियाँ, जीव-जंतु जलकर नष्ट हो जाते हैं ।

पेड़-पौधों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा ऋतु में मिट्टी का कटाव होने से भूमि बंजर हो रही है, वह वर्षा ऋतु के जल को अवशोषित नहीं कर पा रही है ।पेड़-पौधों की कमी होने से समय पर बारिश नहीं हो रही है ; क्योंकि पेड़-पौधे ही बादलों को बारिश करने के लिए आकर्षित करते हैं ।इसके साथ ही हरियाली में कमी होने से वातावरण में प्रदूषक तत्वों की वृद्धि हो रही है ; क्योंकि पेड़-पौधों
की हरियाली वातावरण के प्रदूषक तत्वों को सोख लेती हैं और उसे स्वच्छ बनाती हैं ।

● जल तत्व के संरक्षण से अन्य सभी तत्वों में संतुलन संभव ●

जल ही जीवन है ।इस तरह यदि हमें अपने पर्यावरण को बचाना है, तो इसकी शुरुआत जल तत्व से करनी होगी ; क्योंकि यदि हमारे पर्यावरण में जल नहीं होगा तो जीवन भी नहीं बचेगा ।किसी भी ग्रह में जीवन की खोज करने के लिए वहाँ सबसे पहले जलतत्व को खोजा जाता है।यदि वहाँ जल तत्व की मौजूदगी है , तो वहाँ  जीवन संभव होने के आसार होते हैं ।

जल तत्व के कारण ही हमारी विभिन्न संस्कृतियाँ व सभ्यताएँ प्रायः नदियों के किनारे ही पुष्वित-पल्लवित हुईं और इसीलिए यदि हमें अपने पर्यावरण को बचाना है, उसे सुरक्षित करने में योगदान देना है , तो सबसे पहले हमें अपनी प्रकृति व पर्यावरण में मौजूद जल तत्व को संरक्षित करना होगा और स्वच्छ करना होगा।

जल तत्व से ही भूमि में नमी आएगी, इससे भूमि में वृक्ष-वनस्पतियाँ पनपेंगी , हरियाली बढ़ेगी ।हरियाली बढ़ने से वातावरण में निरंतर बढ़ती हुई ऊष्मा व अन्य प्रदूषक तत्व पेड़-पौधों में अवशोषित होंगे,पेड़-पौधों की पत्तियों के भूमि पर गिरने से व खाद-पानी से पृथ्वी की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी, वातावरण में हरियाली बढ़ने से व जल तत्व के संतुलन से अग्नि व आकाश तत्व भी संतुलित हो जाएँगे। 

  इस तरह पर्यावरण की रक्षा हेतु  सभी तत्वों में संतुलन आवश्यक है और सभी तत्वों में संतुलन बनाने के लिए सबसे पहले जल तत्व को बचाना होगा , प्रकृति के जल तत्व को बचाने की ओर अधिक ध्यान देना होगा । जल तत्व से पृथ्वी में हरियाली बढ़ेगी और हरियाली बढ़ने से अन्य तत्व स्वयं ही संतुलित हो जाएँगे , बस , हमें इसमें अपना सहयोग देना होगा।

पेड़-पौधों की यदि सुरक्षा की जाए तो वे भी हमारे जीवन को सुरक्षित करेंगे व हमें स्वस्थ रखने में अपना सहयोग देंगे ।इस तरह पंचतत्वों का संतुलन ही पर्यावरण को संतुलित व मानव स्वास्थ्य की रक्षा  का कार्य संपन्न कर सकता है ।

पंचतत्वों में संतुलन आवश्यक है।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Saturday, May 9, 2020

श्रावणी पूर्णिमा, रक्षाबंधन , रक्षाबंधन का इतिहास, रक्षाबंधन का आधुनिक रूप

             ●●● श्रावणी पूर्णिमा रक्षाबंधन ●●●
रक्षाबंधन अर्थात रक्षा के लिए बँध जाना।रक्षाबंधन भाई और बहन के मध्य एक अटूट विश्वास का प्रतीक है ।इसका वास्तविक अर्थ स्नेह है।रक्षाबंधन पर्व से जुड़े कई आख्यान हैं ।रक्षाबंधन केवल एक सूत्र का नाम नहीं, बल्कि इसका एक प्रतीक भी है , जो एक उत्तरदायित्व से बँधा हुआ है ।जिसमें सम्मान भी है और जिम्मेदारी भी।

            ●●● रक्षाबंधन का इतिहास ●●●

मान्यता है कि देवासुर संग्राम में जब देवता पराजित होने लगे , तो देवगुरु बृहस्पति ने आक के रेशों का धागा बनाकर इंद्र की कलाई पर बाँध दिया था।यह रक्षाकवच वरदान साबित हुआ।इस प्रकार मानव संस्कृति में प्रथम रक्षासूत्र बाँधने वाले वृहस्पति देवगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हुए ।इस घटना से रक्षासूत्र बाँधने का प्रचलन शुरु हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार वामन ने राजा बलि को इसी दिन रक्षासूत्र बाँधकर दक्षिणा ली थी।

रक्षाबंधन का इतिहास काफी पुराना है , जो सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है ।वस्तुतः रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने डाली थी , जो सगी नहीं थीं ।इसलिए इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्यौहार की शुरुआत 6,000 साल पहले हुई-- ऐसा माना जाता है ।इसके कई साक्ष्य हैं ।

रक्षाबंधन का साक्ष्य रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ का भी है। मध्यकालीन युग में राजपूत और मुसलिमों के बीच संघर्ष चल रहा था , तब चित्तौड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख हुमायूँ को राखी भेजी थी।तब हुमायूँ ने रानी कर्णावती की रक्षा करके उन्हें अपनी बहन का दरजा दिया था।

                                      एक बार भगवान कृष्ण पांडवों के साथ पतंग उड़ा रहे थे ।उस समय धागे से कृष्ण की उँगली कट गई ।तब उँगली से निकले खून को रोकने के लिए द्रोपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर कृष्ण की उँगली पर बाँध दी थी।द्रोपदी के इस प्रेम से भगवान इतने भावुक हुए और द्रोपदी को जीवन- भर सुरक्षा का वचन दिया ।भरी सभा में जब द्रोपदी का वस्त्र हरण हो रहा था तब भगवान ने अपने वचन को निभाते हुए द्रोपदी की साड़ी को अक्षय एवं असीमित कर दिया ।

        ●●● रक्षाबंधन का आधुनिक रूप ●●●

आधुनिक युग में रक्षाबंधन एक पर्व के रूप में मनाया जाता है ।
इस दिन बहनें भाई की कलाई में धागा ( राखी ) बाँधती हैं और भाई अपनी-अपनी बहनों को उपहार भेंट करते हैं ।घर-घर पकवान बनाए जाते हैं ।रक्षाबंधन के एक महीने पहले से ही बाजारों में तरह- तरह की सुन्दर राखियाँ मिलने लगती हैं ।आज तकनीकी युग में इंटरनेट के माध्यम से भी राखियाँ भेजने का प्रचलन हो गया है। विवाह के बाद बहनें दूर होती हैं तो डाक के द्वारा अपने-अपने भाइयों को राखी भेजती हैं । अब तकनीकी युग में वीडियो काॅल करके भी भाई- बहन एक-दूसरे को बधाई दे देते हैं ।

सनातन संस्कृति में सबसे पहले मंदिर में भगवान को रक्षासूत्र समर्पित करते हैं । वर्तमान में यह पर्व केवल प्रतीतात्मक बनकर रह गया है इसका अर्थ और उद्देश्य कहीं खो गए हैं ।इतना अवश्य है कि इस बहाने लोग एक-दूसरे से मिल लेते हैं । आज व्यस्तता के युग में लोग एक ही शहर में रहते हुए भी मिल नहीं पाते ।ऐसे में रक्षाबंधन परिवार को समीप लाने और संबंधों को मजबूत करने का काम करता है।

पुराने समय में और आज के समय में भाई- बहन के रिश्तों की परिभाषा में परिवर्तन हो गया है ।पुराने समय में -- जब बहन के सुख-दुःख में भाई ही सहायता करता था , लेकिन अब बहनें भी भाइयों की मदद करने को तत्पर रहती हैं ।आज समाज में लड़के और लड़की को बराबरी का सम्मान प्राप्त है ।उनकी परिवरिश में अब कोई अन्तर नहीं किया जा रहा ।वे कंधे-से-कंधा मिलाकर चलना जानती हैं ।अब यह रिश्ता बराबरी का हो गया है ।

आज दिखावे का युग है , भावनाओं को भी अब मँहगे उपहारों में नापा जाने लगा है ।फिर भी रस्मों -रिवाजों से बँधा राखी का पर्व - स्नेह के बंधन से संसार को निरंतर जोड़े हुए है।यह निश्चित रूप से लड़कियों के प्रति समाज के बदलते नजरिए को दर्शाता है।हमारे पारंपरिक मूल्य अब भी जीवित हैं ।

       " राखी धागों का त्यौहार, राखी धागों का त्यौहार 
         इस धागे में बँधा हुआ है, भाई -बहन का प्यार "

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Thursday, May 7, 2020

फ्रांस के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नाॅस्त्रेदेमस, जीवन परिचय ,भविष्यवाणियों का संग्रह व लेखन विधि, प्रसिद्ध भविष्यवाणियाँ , भविष्यवक्ता ' कीरो ' ( विलियम वार्नर )

        ●●●  नाॅस्त्रेदेमस का जीवन परिचय ●●●
 विश्व इतिहास में ऐसे अनेक भविष्यवक्ता हुए हैं, जिनकी भविष्यवाणियों की सत्यता समय ने प्रमाणित की।ऐसे ही भविष्यवक्ताओं में फ्रांस के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नाॅस्त्रेदेमस का नाम आता है। इनका जन्म 14 दिसम्बर 1503 को रेमी दे प्रोवे नामक कस्वे में हुआ था। नाॅस्त्रेदेमस किशोरावस्था से ही भविष्यवाणियाँ करने लगे थे । किशोरावस्था से ही इनकी भविष्यवाणियाँ ख्याति प्राप्त करने लगी थीं ।

नाॅस्त्रेदेमस के पिता क्षेत्र के प्रसिद्ध चिकित्सक थे ,इसलिए 15 वर्ष की उम्र में नाॅस्त्रेदेमस को एविनिऑन विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान के पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया गया ।एक दिन उन्होंने अपने मित्र से बातचीत के दौरान कहा कि मैं इस विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाऊँगा।उनकी यह बात सच साबित हुई और शहर में प्लेग फैल जाने के कारण उनको माॅटेपियेर विश्वविद्यालय जाकर अपनी शिक्षा पूर्ण करनी पड़ी ।यहीं से उनके भविष्य दर्शन के दौर की शुरुआत हुई ।

●● नाॅस्त्रेदेमस की भविष्यवाणियों का संग्रह, लेखन विधि●●

नाॅस्त्रेदेमस की प्रथम पुस्तक "अल्मेनक"  रातोंरात प्रसिद्ध हो गई ।अल्मेनक की सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने अपनी दूसरी पुस्तक "ले प्राॅफीसे" लिखी , जिसमें 6338 प्राॅफिसिज या भविष्यवाणियों का संकलन है।कालांतर में इनमें से कई भविष्यवाणियाँ लुप्त या नष्ट हो गईं, पर जितनी भी भविष्य वाणियाँ उपलब्ध हैं, वे सभी समय-समय पर विश्व भर में उत्सुक लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं ।

माना जाता है कि नाॅस्त्रेदेमस ध्यान की चरम अवस्था में स्थित होकर जो दृश्य देखते थे , उन्हें ही लिपिबद्ध कर लेते थे और वे कथन ही भविष्यवाणियों के नाम से विख्यात हुए।नाॅस्त्रेदेमस के लेखन में चार से ज्यादा भाषाओं का समावेश होने के कारण एवं लिखने का तरीका अत्यन्त रहस्यमय होने के कारण उनकी भविष्यवाणियों का सीधा अर्थ निकाल पाना संभव नहीं हो पाया है। आज नाॅस्त्रेदेमस की पुस्तक पर विश्व भर में 2000 से ज्यादा टिप्पणियाँ उपलब्ध हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि उनके एक कथन के कितने अलग-अलग अर्थ निकाले जा सकते हैं।

       ●●●नाॅस्त्रेदेमस की प्रसिद्ध भविष्यवाणियाँ●●●
नाॅस्त्रेदेमस द्वारा की गईं प्रसिद्ध भविष्यवाणियों में लंदन की भीषण आगजनी , नैपोलियन के उत्थान और पतन , हिटलर की मृत्यु, प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्धों से लेकर 11 सितंबर को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले सम्मिलित हैं ।नास्त्रेदेमस की भविष्यवाणियों का अध्ययन करने पर अनेक विशेषज्ञों का मत है कि नाॅस्त्रेदेमस ने 21वीं सदी में भारत के पुनरुत्थान की एवं विश्वशक्ति बनने की घोषणा की है, जिस संभावना को कदापि नकारा नहीं जा सकता ।

नाॅस्त्रेदेमस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में घोषणा की कि 21वीं सदी नई सदी होगी और इस सदी में यूरोप अपने पुराने धर्म को त्यागकर नए धर्म को अंगीकार करेगे तथा एक आध्यात्मिक नेता सम्पूर्ण विश्व का नेतृत्व करेगा ।कौन जाने कि कल का सूर्य यही समाचार लेकर आ रहा हो।

 सारे विश्व का भविष्य देखन वाले नाॅस्त्रेदेमस की मृत्यु भी उनकी स्वयं की भविष्यवाणी से हुई ।कहते हैं कि 2 जुलाई, 1566 की रात को उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त साथी एवं शिष्य शेविनी को कहा कि कल सुबह हमारी-तुम्हारी मुलाकात नहीं हो पाएगी।अगली सुबह नाॅस्त्रेदेमस अपने कक्ष में मृत पाए गए ।

 ●● आयरिश भविष्यवक्ता 'कीरो' ( विलियम वार्नर )

प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं में एक नाम आयरिश भविष्यवक्ता विलियम वार्नर का आता है, जो कीरो के नाम से प्रसिद्ध हुए।सर्वविदित है कि कीरो का हस्तरेखा ज्ञान भारत देश में ही विकसित हुआ जहाँ उन्होंने कोंकणी विद्वान "श्री नारायण जोशी " 
से हस्तरेखा विज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया ।लेटिन भाषा में "कीरो" शब्द का अर्थ हाथ की रेखाओं का ज्ञान है।

भविष्यवक्ता कीरो ने अनेक भविष्यवाणियाँ कीं ,जो सच निकलीं ।कीरो की भविष्यवाणियों से लाभान्वित लोगों की कड़ी में विख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन, जासूस माताहारी, ऑस्कर वाइल्ड, प्रसिद्ध वैज्ञानिक थाॅमस एडीसन से लेकर इंग्लैंड के राजा एडवर्ड सप्तम का नाम आता है , जिनके सम्राट बनने की एकदम सही घोषणा भविष्यवक्ता कीरो ने की थी ।

                                  आचार्यों के अनुसार भूत और भविष्य का ज्ञान और कुछ नहीं, वरन् मनुष्य के कर्मों और संस्कारों का सम्यक ज्ञान है ।चित्त का परिष्कार करते हुए जब मनुष्य उस अवस्था में पहुँचता है , जहाँ उसे अपने एवं अन्य के द्वारा किए गए शुभ-अशुभ कर्मों का पूर्ण ज्ञान हो जाता है तो उसी गणना के आधार पर उस व्यक्ति के अतीत और भविष्य का सही आंकलन कर पाना संभव हो पाता है ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

भविष्यवदृष्टाओं की विलक्षणता ( भारतीय ज्योतिष के प्रथम प्रवक्ता महर्षि भृगु ) , हमारा भाग्य हमारे ही कर्मों से निर्मित

            ●●●भविष्यदृष्टाओं की विलक्षणता  ●●●
मानव मन में अज्ञात के प्रति सदा से ही आकर्षण रहा है । हर मनुष्य के मन में यह जिज्ञासा जन्म लेती रहती है कि आने वाले कल में क्या सम्भावनाएँ हो सकती हैं ।सामान्यतः यह संभव नहीं है कि मनुष्य अपना भविष्य जान सके ।शायद परमात्मा ने मनुष्य की इस जिज्ञासा के समाधान के लिए कुछ व्यक्तियों को भविष्यदर्शिता की  विलक्षण क्षमता से सम्पन्न करके पृथ्वी पर भेजा है ।जो मनुष्य की भविष्य जानने की जिज्ञासा का समाधान कर सकें ।

           जब हम भविष्य वक्ताओं की भविष्यवाणियों को सत्य होता देखते हैं, तब हम यह सोचने पर भी मजबूर हो जाते हैं कि भविष्य- वक्ताओं में ऐसा क्या होता है , जो उनके अंदर भविष्य को देखने की सामर्थ्य प्रदान करता है , यह बात पता लगाना कठिन है लेकिन कुछ भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों का अध्ययन करने से यह अवश्य पता चलता है कि परमात्मा ने मनुष्य को अनेक दिव्य संभावनाओं से समृद्ध करके भेजा है । 

विश्व के इतिहास का हर दृष्टि से अध्ययन करने पर यह ज्ञात हो ही  जाता है कि भविष्य को पढ़ने, जानने, समझने, देखने और आँकने की क्षमता समय-समय पर विभिन्न रूपों में, विभिन्न देशों में विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से प्रकट होती रही है।हमारे देश भारत में प्राचीन काल से ही ज्योतिष शास्त्र को महत्व दिया गया है।   प्रसिद्ध ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाताओं में व्यक्ति के तीनों कालों ( भूत, वर्तमान, भविष्य) को देखने की क्षमता होती है।

 ●●● भारतीय ज्योतिष के प्रथम प्रवक्ता महर्षि भृगु ●●●

भारतीय ज्योतिष के प्रथम प्रवक्ता महर्षि भृगु त्रिकालदृष्टा के नाम 
से जाने जाते हैं ।पौराणिक काल से ही भविष्य को देख पाने में सक्षम व्यक्तियों में महर्षि भृगु का नाम सर्वप्रथम आता है ; क्योंकि उनके द्वारा रचितृ "भृगु संहिता" ज्योतिष का आदिग्रंथ है और ऐसा माना जाता है कि वर्तमान संवत्सर में ऐसा  कुछ भी घटित नहीं  होता, जिसका  पूर्वानुमान महर्षि भृगु ने न किया हो।

भृगु संहिता वास्तव में महर्षि भृगु एवं उनके पुत्र शुक्राचार्य के मध्य हुए वार्तालाप के रूप में है; जिसमें महर्षि भृगु ,उनके पुत्र शुक्राचार्य के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का क्रमानुसार देते प्रतीत होते हैं ।
भृगु संहिता में अनेक स्थानों पर महर्षि भृगु  उतर देते समय अपने वक्तव्य में 'दृशेत् ' शब्द का उपयोग करते हैं, जिससे यही समझा जा सकता है कि वे भविष्य का आंकलन अपनी दिव्य दृष्टि से देखते हुए ही कर रहे थे।
भृगु संहिता अत्यन्त विलक्षण है ; क्योंकि उसमें उन सभी व्यवसायों, पदों, विधाओं का वर्णन है , जो कि उस काल में विकसित ही नहीं हुईं थीं । उनके विषय में पढ़कर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि ऐसा कैसे सम्भव हुआ ? 

                                                पुराणों  में  कथा आती है कि अपना प्रथम ग्रंथ " ज्योतिष संहिता " पूर्ण करने के उपरांत महर्षि भृगु त्रिदेव से मिलने पहुँचे।उनके आगमन का उद्देश्य यह परखना भी था कि कौन से देवता को क्रोध दिला पाना संभव नहीं है? कथा के अनुसार, महर्षि भृगु  ने भगवान शिव और ब्रह्मा जी को तो तुरंत क्रोधित कर दिया।
 
                               तदुपरांत जब वे भगवान विष्णु के पास पहुँचे तो भगवान क्षीरसागर पर निद्रामग्न थे।उन्हें क्रोध दिलाने के उद्देश्य से महर्षि भृगु ने उनकी छाती पर जोर से पैर मारा , जिसका निशान आज भी भगवान के हृदयस्थल पर अंकित माना जाता है । भगवान विष्णु आँख खुलते ही महर्षि भृगु के चरणों को हाथ में लेकर बोले -- "ऋषिवर ! मेरा हृदय तो पत्थर के समान कठोर है पर आपके चरणों को चोट पहुँची होगी ।लाइए मैं आपकी पीड़ा दूर कर दूँ " । भगवान विष्णु को शान्त रूप में देखकर महर्षि भृगु, भगवान विष्णु को नमन करते हुए बोले --  " प्रभु ! आप ही सृष्टि के अधिपति हैं ।आपको ही क्रोध दिला पाना संभव नहीं है ।" कहते हैं कि उसी समय भगवान विष्णु ने महर्षि भृगु को तीनों कालों को देख पाने का ज्ञान दिया था , उसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने दूसरे ग्रंथ " भृगु संहिता " की रचना की एवं त्रिकालदृष्टा के नाम से विख्यात हुए।

    ●●● हमारा भाग्य हमारे ही कर्मों से निर्मित ●●●

विश्वभर के सभी भविष्यवक्ताओं के आंकलन का सार भी यही है कि-- मनुष्य का भाग्य उसके किए कर्मों से ही निर्मित होता है।
महाभारत के अनुशासन पर्व -- 145 में महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं कि----     केवलं ग्रह नक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् ।
                 सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ।।
अर्थात केवल नक्षत्र किसी का शुभ व अशुभ नहीं करते ।उसके अपने किए हुए कर्मों को ही लोग ग्रहों का नाम दे देते हैं ।

अपना भविष्य जानने में सबको रुचि हो सकती है , पर मनुष्य को यह जानना भी आवश्यक है कि हमारा भाग्य हमारे कर्मों से ही बनता है।यदि हमारी भावनाएँ शुभ होंगी तो हमारे कर्म भी शुभ होंगे और यदि हमारे कर्म शुभ होंगे तो हमारा भविष्य भी श्रेष्ठ बनेगा।अच्छे भविष्य की आकांक्षा रखने वालों को मात्र अच्छे कर्म करने पर विश्वास रखना चाहिए ; क्योंकि कर्मबीज से ही भविष्य का वृक्ष जन्म लेता है।

महर्षि पतंजलि  " योगसूत्र " के तृतीय अध्याय में कहते  हैं---
"परिणाम त्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।" अर्थात संस्कारों या कर्मों के परिणामों का संयम करने से योगी को अतीत तथा अनागत का साक्षात्कार हो जाता है ।जिन वक्तव्यों को हम भविष्यवाणियों के रूप में जानते हैं उनमें से अनेक अपने चित्त के परिष्कार से प्राप्त ज्ञान का परिणाम है।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।




Tuesday, May 5, 2020

धरती के गर्भ से निकले प्राकृतिक गरम जल के स्रोत, बदरीनाथ, केदारनाथ,यमुनोत्री,गंगोत्री, शिमला, मणिकर्ण घाटी, मनाली,लद्दाख व सिक्किम इन सभी क्षेत्रों के गरम जलस्रोतों का वर्णन

●● धरती के गर्भ से निकले प्राकृतिक गरम जल के स्रोत●●
                       धरती के गर्भ से निकले प्राकृतिक गरम जल के स्रोत प्रकृति द्वारा मानव के लिए विशिष्ट उपहार हैं,खासकर ठंडे-बरफीले क्षेत्रों के लिए, जहाँ तापमान माइनस में चला जाता है ।ठन्डे क्षेत्रों में गरम जल के स्रोत दैवी उपहार जैसे प्रतीत होते हैं, जो पहाडों पर रहने वालों का जीवन आसान कर देते हैं ; क्योंकि पहाड़ों पर अत्यधिक ठन्ड होने के कारण वहाँ का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में कई प्राकृतिक गरम जल के स्रोत हैं ।भारत के लगभग हर क्षेत्र में ऐसे जलस्रोत न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध हैं ।

●● बदरीनाथ में अलकनंदा के किनारे गरम जल स्रोत ●●

बदरीनाथ तीर्थ क्षेत्र में अलकनंदा नदी के किनारे ऐसे गरम जल का प्राकृतिक स्रोत है , जिसे एक कुंड में संगृहीत किया गया है, बाहर पाइपों के माध्यम से यह नलकों में प्रवाहित होता है।दूर-दूर से लंबी यात्रा से आए थके यात्री इसमें स्नान करके तरोताजा अनुभव करते हैं फिर बदरी-विशाल के दर्शन करते हैं ।हाँलाकि शुरुआत में कुंड का जल थोड़ा गरम प्रतीत होता है , लेकिन थोड़ी देर में सहने योग्य हो जाता है ।

 ●●● केदारनाथ के गौरीकुंड में गरम जल के स्रोत ●●●

केदारनाथ धाम की यात्रा के शुरुआती पड़ाव गौरीकुंड में भी ऐसे गरम जल के स्रोत विद्यमान हैं, हालाँकि 2013 की प्राकृतिक त्रासदी में ये तहस-नहस हो गए थे , लेकिन अभी भी यहाँ से जल निस्सृत हो रहा है।हलका गरम जल शरीर के लिए सहनीय होता था , जिनके स्नान से पावन होकर तीर्थयात्री केदारनाथ धाम की
आगे की यात्रा करते थे ।ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता पार्वती ने अपने आराध्य शिव के लिए तप किया था।

●●● यमुनोत्री धाम में गरम जल का स्रोत (तप्तकुंड)●●●

यमुनोत्री धाम में भी तप्तकुंड है ,जिसे सूर्यकुंड के नाम से जाना जाता है ।इस कुंड में खौलता हुआ पानी रहता है।इसमें चावल या आलू डालने पर पक जाते हैं और इन्हें प्रसाद रूप में तीर्थयात्री उपयोग करते हैं ।

  ●● गंगोत्री के मार्ग में गंगनानी में गरम जल का स्रोत ●●

उत्तराखंड के चारधामों में से एक गंगोत्री धाम के रास्ते में गंगनानी स्थान पर गरम जल का स्रोत है ।श्रद्धालु एवं पर्यटक इसका आनंद उठाते हैं ।जोशीमठ के आगे मलांग के रास्ते में तपोवन स्थान पर भी ऐसा गंधकयुक्त गरम जल का स्रोत है ।

 ●मुन्स्यारी,मदकोट में गौरीगंगा नदी के किनारे गरमजल स्रोत●

कुमायूँ के मुनस्यारी क्षेत्र में शहर से 20 किमीo दूर मदकोट स्थान पर गौरीगंगा नदी के बाएँ तट पर गरम जल का स्रोत हैं, जिनका जल गंधक व चूने का विशेष अंश लिए होता है , जिसकी झलक यहाँ के जलस्रोत की तह में सफेद एवं लाल-भूरे रंग के अवशिष्ट एवं चट्टानों को देखकर पाई जा सकती है।इसका जल त्वचा रोगों में विशेष रूप से उपयोगी बताया जाता है।

  ● शिमला में  सतलुज के किनारे ततापानी में  गरमजलस्रोत ●

हिमाचल के पहाड़ी राज्य में गरम जल के कई स्रोत हैं, जो सैलानियों की यात्रा को सरल व रोचक बनाते हैं ।शिमला के समीप सतलुज नदी के किनारे, ततापानी स्थान पर नदी के तट पर गरम जल के स्रोत हैं-- जहाँ खुली हवा में यात्री स्नान का आनंद उठाते हैं ।एक ओर सतलुज का बरफीला जल बह रहा होता है ,तो दूसरी ओर इसी के साथ तट पर गरम जल उफन रहा होता है।इस कुंड का जल औषधीय गुणों से भरपूर है।यह त्वचा रोगों में लाभकारी है ।

●● मणिकर्णघाटी में खीरगंगास्थल पर गरम जल का स्रोत●●

मणिकर्ण घाटी में, खीरगंगा स्थल पर गरम जल का एक अनोखा कुंड है ।प्रकृति की गोद में, ऊँचे पहाड़ों के बीच खुली जगह में स्थित यह कुंड पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों को बहुत आकर्षित करथा है। यहाँ समीप में ही शिवमंदिर है ।इस तीर्थ स्थल को शिव- पार्वती नंदन कार्तिकेय से सम्बन्धित माना जाता है ।

                                        मणिकर्ण गाँव गरम जल स्रोतों के लिए प्रख्यात है।यहाँ के गुरुद्वारे एवं राममंदिर परिसर में कई गरम जल के कुंड हैं ।यहाँ मन्दिर व गुरुद्वारे , दोनों ही स्थलों पर कुंड बने हुए हैं, साथ ही दोनों जगह खौलते पानी के कुंड भी हैं। जिनमें तीर्थयात्रियों को आलू, आटा व चावल आदि को पोटली में बाँधकर पकाते हुए देखा जा सकता है ।जो बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है ।मणिकर्ण गाँव के घरों में पाइपों से इसी गरम जल की आपूर्ति होती है।

     ●●● मनाली के समीप गरम जल के स्रोत ●●●

मनाली के समीप वशिष्ठ गाँव में भी ऐसे ही गरम जल के स्रोत हैं ।यहीं ऋषि वशिष्ठ एवं भगवान राम को समर्पित मंदिर भी हैं ।यहाँ के जल को भी औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है ।मनाली के 6- 7 किमीo पहले क्लाथ नामक स्थान पर भी ऐसे ही गरम जल के स्रोत हैं , हालाँकि पिछले दिनों बाढ़ में नदी के किनारे इन स्रोतों को काफी क्षति हुई है ।

 ●●● लद्दाख व सिक्किम क्षेत्र में गरम जल के स्रोत ●●●

हिमालय के लद्दाख क्षेत्र में पनामिक स्थान पर नुब्रा घाटी में भी ऐसे गरम जल के स्रोत हैं ।यहाँ का पानी इतना गरम होता है कि कोई इसको छू नहीं सकता ।इसी तरह पूर्वोत्तर क्षेत्र में भी कई ऐसे गरम पानी के जलस्रोत हैं ।

सिक्किम के 15,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित यूमेसमडोग स्थान पर गंधकयुक्त जल के दर्जन से अधिक स्रोत हैं, जिनका ताप 59 डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है।इसके अलावा सिक्किम में रेशि, बोरोंग, रेलोंग व यूमथंग स्थान पर गरम जल के स्रोत हैं, जो अपने औषधीय गुणों के कारण प्रसिद्ध हैं ।

इनके अतिरिक्त भारत में अन्य राज्यों में भी ऐसे अनेक जलस्रोत हैं, जो औषधीय गुणों के साथ अपना धार्मिक महत्व भी रखते हैं ।इन सभी स्थलों के भौगोलिक कारण तो पृथ्वी की कोख में सुलग रहे मेग्मा में देखे जा सकते हैं, जो पृथ्वी की सतह पर विद्यमान जल को गरम करता है व दबाव के कारण धरती पर गरम जलस्रोत के रूप में फूटता है।

सभी गरम जल के स्रोतों से जुड़े आध्यात्मिक प्रसंग इन्हें आस्था का केंद्र बनाते हैं ।साथ ही अधिक ठन्ड के दिनों में ये गरमजल के स्रोत मनुष्यों के लिए ही नहीं अन्य जीवधारियों के लिए भी राहत पहुँचाते हैं ।इनमें स्नान करके सहज ही हमें अपनी प्रकृति की उदारता स्मरण हो उठती है और मन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के भाव से भर जाता है।

 सचमुच हमारी प्रकृति हमें बहुत कुछ प्रदान करती है।हम भी उसका आदर करना सीखें और सदा अपनी प्रकृति को हरा-भरा रखें ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।

Saturday, May 2, 2020

भारतीय गुफा मंदिरों का अद्भुत व रोचक संसार, बाराबर गुफाएँ, एलीफेंटा गुफाएँ, उदयगिरि एवं खंडागिरि गुफाएँ, कान्हेरी गुफाएँ, बादामी गुफा मंदिर, भाजा गुफाएँ, राॅक कट मंदिर काँगड़ा, महाबलीपुरम पंचरथ मंदिर, कार्ला गुफाएँ, अजंता गुफाएँ, ऐलोरा गुफाएँ ।

 ●●●भारत के गुफा मंदिरों का अद्भुत व रोचक संसार●●●
विश्व में चट्टानों को काटकर या तराशकर बनाई गई गुफाओं की कमी नहीं ।भारत में भी  अनेक गुफा मंदिर हैं। राॅक कट स्थापत्य जितना भारत में प्रचलित रहा है, उतना शायद ही विश्व के किसी कोने में रहा हो।भारतीय गुफा मंदिर आध्यात्मिक, ऐतिहासिक व    कलात्मकता की दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं ।भारत के गुफा मंदिर भारत के प्राचीन कलाकारों की अविश्वसनीय उपलब्धियों का  प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन यूनेस्को द्वारा भारत के कई गुफा मंदिरों को वैश्विक सांस्कृतिक धरोहरों के रूप में सम्मानित किया गया है ।
निस्संदेह भारत के गुफा मंदिरों का संसार अद्भुत, रोचक व रोमांचकारी है।जिनका राॅक कट स्थापत्य विविधतापूर्ण एवं अत्यन्त समृद्ध है।हमारे लिए बड़े गर्व का विषय है कि हमारे गुफा मंदिर विश्व भर की प्राचीन संस्कृतियों की आश्चर्यजनक उपलब्धियों में शुमार हैं ।

     ●●●  भारतीय प्रसिद्ध गुफा मंदिरों का वर्णन  ●●●

          1--   ●●●  बिहार की बाराबर गुफाएँ-●●●
बिहार की बाराबर गुफाएँ भारत की सबसे प्राचीन राॅक कट गुफाएँ हैं। ये बिहार में गया से 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित हैं।इन गुफाओं का निर्माण तीसरी सदी ईसा पूर्व प्रारंभ हो गया था , जिन्हें अधिकांशतः 322 से 185 ईसा पूर्व मौर्यकाल में पूरा किया गया।वृहत् ग्रेनाइट चट्टानों से तराशी गईं इन गुफाओं को देखकर लगता है कि जैसे ये लेजर से तराशी गईं हों।

ये गुफाएँ बौद्ध धर्म से जुड़ी रहीं, लेकिन जैन धर्म की गुफाएँ भी यहाँ विद्यमान हैं, जो उस काल की धार्मिक सहिष्णुता को उजागर करती हैं ।कुछ गुफाओं में अशोक के शिलालेख भी निहित हैं ।इन्हें बौद्ध भिक्षुओं एवं जैन साधकों द्वारा पूजा एवं आवास केंद्र के रूप में प्रयुक्त किया गया है।

       2--  ●●● एलीफेंटा गुफाएँ मुंबई  ●●●

मुंबई के इंडिया गेट से दस किमी दूर टापू पर स्थित एलीफेंटा गुफाएँ भी स्वयं में उल्लेखनीय हैं, जो प्रमुखतया भगवान शिव को समर्पित हैं, जिन्हें हिंदू कालाचुरी राजाओं द्वारा छठी शताब्दी के मध्य तक तैयार किया गया था।इन गुफाओं में अधिक जानकारियाँ नहीं हैं, लेकिन इन गुफाओं की विलक्षण कलात्मकता देखकर प्राचीन कलाविदों की अद्भुत प्रतिभा का परिचय मिलता है।

इस टापू का नाम मूलतः धारापुरी था, जिसे पुर्तगालियों द्वारा एलीफेंटा नाम दिया गया ; क्योंकि उन्हें यहाँ पहुँचने पर पत्थर के बने हुए बड़े हाथी दिखे थे।इस टापू में पाँच हिन्दू तथा दो बौद्ध मंदिर हैं ।इसमें सबसे रोचक एवं प्रभावशाली महान गुफा है, जिसमें कलात्मक गुणवत्ता से भरपूर कई संरचनाओं के बीच 6.1 मीटर ऊँची भगवान शिव की प्रख्यात त्रिमूर्ति उल्लेखनीय एवं दर्शनीय है।साथ ही यहाँ अर्द्धनारीश्वर, रावण द्वारा कैलाश पर्वत को ले जाते हुए तथा नटराज शिव की उल्लेखनीय छवियाँ दिखाई गई हैं ।

3-●● उड़ीसा में उदयगिरि व खंडागिरि पहाड़ी की गुफाएँ●●

उदयगिरि एवं खंडागिरि के पास दो पहाडियों में 27 राॅक कट जैन मंदिर बने हुए हैं, जिन्हें पहली सदी ईसा पूर्व की मानी जाती हैं ।इनमें से कुछ गुफाएँ तो प्राकृतिक हैं और कुछ तराशी गईं हैं ।ये गुफाएँ ऐतिहासिक,धार्मिक एवं स्थापत्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।ये दो पहाड़ियाँ पूर्वी भारत के स्थापत्य, कला एवं धर्म-क्षेत्र में जैन राॅक कट स्थापत्य के सबसे प्राचीन समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं ।

इन गुफाओं के अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि ये गुफाएँ कलिंग के प्रसिद्ध राजा खारवेल द्वारा सर्वप्रथम तराशी गईं थीं और उसके बाद प्रथम ईसापूर्व काल में उसके जैनभक्त शासकों द्वारा आगे बढ़ाया गया ।इनमें से आज कुछ हिंदू मंदिर हैं । इन गुफाओं में सबसे अधिक प्रभावी है रानी गुफा ( नं .1 ), जो अद्भुत नक्काशी वाली दो मंजिला संरचना है। व्याघ्र गुफा ( नं.10)
का द्वार अद्भुत एवं दर्शनीय है। हाथी गुफा ( नं. 14 ) राजा खारवेल के शासन की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारियों से भरी हैं ।
         4--  ●●● कान्हेरी गुफाएँ मुंबई ●●●

कान्हेरी गुफाएँ, मुंबई शहर के बाहर स्थित संजय गाँधी राष्ट्रीय पार्क के जंगल में स्थित अद्भुत एवं दर्शनीय 109 गुफाओं का समूह है, जिन्हें बौद्ध मंदिर एवं मठ के रूप में प्रथम सदी ईसा पूर्व से नौवीं ईसवी तक तराशा गया ।आज तो ये मुंबई शहर के छोर पर स्थित हैं, लेकिन 2000 वर्ष पहले वीरान जंगलों का क्षेत्र रहा होगा। जब बौद्ध भिक्षुओं ने वीरान जंगलों में बनी इन गुफाओं में रहना शुरू किया, तो व्यापारियों को राहत मिली और उन्होंने फिर वसाल्ट चट्टानों को काटकर कमरे तराशने शुरु किए ।

कान्हेरी गुफाओं में सबसे महत्वपूर्ण कार्य यहाँ पाँचवीं एवं छठी शताब्दी के मध्य हुए , जब इन गुफाओं को मौर्य एवं कुशाणकाल में शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया गया ।यहाँ की गुफा नं 3 में सात मीटर ऊँची बुद्ध भगवान की प्रतिमा दर्शनीय    है। यहाँ की अधिकांश गुफाएँ मठ का हिस्सा रही होंगी  ; जहाँ रहने , अध्ययन करने व ध्यान करने की व्यवस्था थी।पूजा के लिए यहाँ चट्टानों को काटकर बनाए गए स्तूप भी हैं ।

      5---  ●●● बादामी गुफा मंदिर कर्नाटक ●●●

बादामी गुफा मंदिर, चालुक्य राजाओं द्वारा छठी-सातवीं सदी में अपनी सत्ता की शक्ति के प्रतीक के रूप में बनाए गए थे।ये गुफा मंदिर कर्नाटक के उत्तरी हिस्से में जिला बागलकोट में हैं ।यहाँ चार गुफा मंदिर हैं, जिनमें तीन हिंदू तथा एक जैन मंदिर है।सौन्दर्य से भरपूर ये गुफाएँ भारतीय कला एवं वास्तु शिल्प में चालुक्य शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

बादामी गुफा मंदिरों के भित्तिचित्रों में की गई बारीक नक्काशी इस काल की संस्कृति का परिचय देती है।बादामी गुफाएँ शासकों की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाती हैं, जिसमें हिंदू , बौद्ध एवं जैन धर्म साथ-साथ पनपे ।गुफा नं. 1 भगवान शिव के लिए समर्पित है, गुफा 2 और 3 भगवान विष्णु के लिए तथा गुफा नं. 4 में जैन मंदिर हैं ।
        
          6--  ●●● भाजा गुफाएँ, महाराष्ट्र ●●●

भाजा गुफाएँ 22 गुफाओं का समूह है , जो दो सौ ईसा पूर्व निर्मित की गईं थीं ।ये गुफाएँ बौद्ध धर्म को समर्पित हैं ।महाराष्ट्र पूणे में लोनावाला के समीप स्थित इन गुफाओं में बृहत् चैत्यगृह , एक प्रार्थना कक्ष तथा एक कोने में बना स्तूप है।यहाँ की अन्य प्रसिद्ध संरचना 14 स्तूपों का समूह है , जिसमें 5 स्तूप अंदर हैं तो 9 स्तूप बाहर ।इनमें 12 नं. की गुफा सबसे प्रभावशाली है , यह भारत का सबसे बड़ा चट्टानों से बना हुआ मंदिर है।

   7-- ●●● मशहूर राॅक कट मंदिर , काँगड़ा ●●●

मशहूर राॅक कट मंदिर ,काँगड़ा----   आठवीं और नौवीं सदी में काँगड़ा घाटी के सेंडस्टोन ( बलुआ पत्थर) रिज को तराशकर पिरामिड आकार के दर्जनों मंदिर बनाए गए, जिनमें जटिल नक्काशी की गई है ।एक ही चट्टान से तराशे मंदिर समूह के कारण इसे मिनी एलोरा भी कहा जाता है ।इनके सामने एक बहुत बड़ा 50 मीटर लंबा तालाब है, जिसमें मंदिर का अक्स परछाईं के रूप में सदा  दीखता रहता है।संभवतः यह भारतीय नागर शैली के स्थापत्य का प्राचीनतम नमूना है। माना जाता है कि 1905 के भयावह काँगड़ा भूकंप में मंदिर का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था।

 8--- ●●● महाबलीपुरम के पंचरथ राॅक कट मंदिर ●●●

महाबलीपुरम के पंचरथ भी दक्षिण भारत की स्वयं में अद्भुत संरचनाएँ हैं ।चट्टानों से तराशे गए मंदिर एवं पशुओं ( शेर,हाथी, नंदी) के स्थापत्य एक ही चट्टान से तराशे गए हैं, जिनको सातवीं सदी का माना जाता है ।यह प्राचीन पल्लव साम्राज्य की प्राचीन मंदिर नगरी महाबलीपुरम के नाम से प्रख्यात है।पंचरथ राॅक कट स्थापत्य का यह एक बहुत ही दुर्लभ उदाहरण है ; जहाँ भवन का बाहरी एवं भीतरी भाग -- सब एक ही चट्टान से तराशे गए हैं ।

      9--  ●●● कार्ला गुफाएँ, महाराष्ट्र ●●●

कार्ला गुफाएँ, महाराष्ट्र के लोनावाला में स्थित हैं ।ये भारत के सबसे प्राचीन गुफा मंदिरों में से हैं तथा हिंदू और बौद्ध गुफा स्थापत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं ।ये भारत के सबसे विलक्षण राॅक कट चैत्य हैं ।बौद्ध धर्म को समर्पित इन गुफाओं का निर्माण 120 ईसा पूर्व किया गया , जो दूसरी सदी ईसवी तक चलता रहा ।कुछ कार्य पाँचवीं से दसवीं सदी तक चले ।अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी इनकी कलात्मक बारीकियाँ बहुत उन्नत किस्म की हैं ; जो प्राचीनकला के श्रेष्ठ उदाहरणों में से हैं ।

यहाँ पर भारत का सबसे बड़ा राॅक कट हाल बना है ; जिसे पहली सदी ईसा पूर्व बनाया गया, जो 45 मीटर लंबा एवं 14 मीटर ऊँचा है ।विशेषज्ञों के अनुसार-- यह रचना कई हजार वर्ष बाद बने ईसाई कैथेड्रल के लिए सृजन-प्रेरणा रही होगी।इन गुफाओं की सीलिंग लकड़ी की बनी हैं, जिन्हें 2000 वर्ष पूर्व काटा गया था और वे आज भी संरक्षित हैं ।

     10---   ●●● अजंता गुफाएँ , महाराष्ट्र ●●●

अजंता गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित हैं ।अजंता गुफाओं को वघोरा नदी के किनारे एक ठोस चट्टान से तराशा गया है ।अजंता गुफाएँ 29 गुफाओं की एक माला है, जिन्हें दो चरणों में, क्रमशः दूसरी सदी ईसा पूर्व एवं छठी शताब्दी में बनाया गया ।ये गुफाएँ भारत में बौद्ध कला के उत्कृष्टतम नमूनों में से एक हैं ।ये गुफाएँ 650 ईसवी से खाली रहीं व सन् 1819 में एक अंग्रेज अफसर द्वारा इन्हें खोजा गया।

ये गुफाएँ प्राचीनकाल की समृद्ध विरासत लिए हुए हैं और मानवता की अभूतपूर्व उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करती हैं ।1200 वर्षों की गुमनामी के बाद जब इन गुफाओं को खोजा गया तो इनके स्थापत्य ने यूरोपीय एवं अमेरिकी कला को गहराई से प्रभावित किया , यूरोप और अमेरिका के कई कलाकार तो अजंता गुफाओं की पेंटिंग एवं मूर्तियों के जैसे दीवाने ही हो गए।

अजंता गुफाओं में जहाँ एक ओर दूसरी सदी ईसा पूर्व में बनी सबसे पुरानी भारतीय पेंटिंग हैं, तो वहीं गुफा नं . 17 में भारत की कुछ सर्वश्रेष्ठ गुफा पेंटिंग भी मौजूद हैं ।अजंता की गुफाएँ इंजीनियरिंग की अद्भुत उपलब्धियोंका प्रतिनिधित्व करती हैं ।कुछ गुफाओं के बड़े-बड़े हाॅल बिना किसी खंभे की सहायता से बने हैं ।
ये हाॅल बाॅस्केट बाल के मैदान जितने बड़े हैं और 1500 वर्षों से बिना किसी परिवर्तन के यथावत् स्थिर हैं ।

अजंता गुफाओं को यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हैरिटेज साइट घोषित किया गया है और ये आर्कियलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा भी संरक्षित हैं ।अनेक पर्यटक इन्हें देखने जाते हैं ।

        11--- ●●● ऐलोरा गुफाएँ महाराष्ट्र ●●●

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित ऐलोरा गुफाएँ दो वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई हैं । 34 मठों एवं मन्दिरों को समाहित करती ये संरचनाएँ भारत के अंतिम राॅक कट मन्दिरों में से एक हैं ।ये गुफाएँ निर्माण कौशल एवं कलात्मक दृष्टि से मानवता की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक हैं ।यहाँ तीन धर्मों के मन्दिर विद्यमान हैं ।  12 बौद्ध मंदिर एवं मठ , जिनको 630 से 700 ईसवी में बनाया गया ।  17 हिन्दू मन्दिर, जिनको 550 से 780 ईसवी में बनाया गया और 5 जैन मंदिर, जिनको 800 से 1000 ईसवी में तैयार किया गया ।

ऐलोरा गुफाओं की सबसे अद्भुत रचना है -- कैलास मंदिर, जो लगभग 84 मीटर लंबी एवं 29 मीटर ऊँची संरचना है ।इसे एक ही चट्टान को ऊपर से तराशकर बनाया गया है, जिसमें 100 वर्ष लगे और दो लाख टन चट्टानी पत्थर बारीकी से तराशते हुए हटाए गए ।मन्दिर को कैलास पर्वत के रूप में आकार देने की कोशिश की गई है।

इसके अतिरिक्त कई कलात्मक गुफाएँ हैं , जिनमें कोर्पेटर गुफा  10 , दोताल गुफा  11 , दशावतार गुफा  15 , 
रामेश्वर गुफा 21 तथा अभूतपूर्व रूप में सुसज्जित इंद्रसभा गुफा 32 उल्लेखनीय एवं दर्शनीय हैं । ऐलोरा में विद्यमान मूर्तियों, पेंटिंग्स तथा उत्कीर्ण संदेशों में निहित कलात्मक एवं दार्शनिक संदेशों की अद्भुत समृद्धता को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

इसी तरह भारत में अन्य और भी गुफा मंदिर हैं, जो प्राचीन भारत की उन्नत स्थापत्य कला, सर्वधर्म समभाव एवं तकनीकी कौशल पर प्रकाश डालते हैं ।सचमुच गुफा मंदिरों का अद्भुत व रोचक संसार है।

   सादर अभिवादन व धन्यवाद ।