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Monday, December 23, 2019

पर्वतराज हिमालय, धरती का स्वर्ग हिमालय, आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र हिमालय

                 ●●● पर्वत राज हिमालय ●●●
पर्वतों से मनुष्य समाज का सदियों से  एक गहरा रिश्ता रहा है, ये हमारे सबसे पुराने साथियों में से एक हैं ।सबसे श्रेष्ठ, पवित्र व प्राचीन पर्वत के रूप में सबसे पहले हमारे मस्तिष्क में कोई तस्वीर उभरती है, तो वह है - हिमालय की ।हिमालय मानव सभ्यता का जन्मदाता और उसका संरक्षक है।हिमालय से जुड़ा हुआ है-- हम सबका अस्तित्व।

हिमालय का सौन्दर्य अलौकिक, शाश्वत व सनातन है। हिमालय प्रकृति का विस्तार है वह आकाश को छू लेने की अभिलाषा है, हिमालय ऐसा स्थान है जहाँ से क्षितिज थोड़ा और स्पष्ट होता है।लगता है कि 'ईश्वर' सारे ऐश्वर्य व खूबसूरती के साथ हिमालय में विद्यमान है। ऋग्वेद के महान ऋषियों ने हिमालय की महिमा का गान किया है, उसका स्तवन किया है।श्वेत, हिम से ढका हुआ उत्तुंग शिखरों वाला हिमालय सृष्टि का पूर्वज है।

हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र है।"वाइब्रेंट पाॅवर हाउस ऑफ स्प्रिचुअल एनर्जी है यह"। उत्तराखंड को श्रेय जाता है हिमालय का हृदय कहाने का। ' हिमालयानाम् नगाधिराज पर्वतः।'
सदियों से हिमालय की कन्दराओं व गुफाओं में  ऋषि- मुनियों का वास रहा है, वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते हैं ।हिमालय की पर्वतश्रंखलाएँ   'शिवालिक' कहलाती हैं ।

वनों के सारे सरोकार हिमालय से ही हैं ।वन से आच्छादित हिमालय ही हमारे देश की प्राणवायु व पानी का सबसे बड़ा कारक है।हिमालय ' हिम' का ही नहीं ' हम' सबका आलय अर्थात घर है।यह देश का मुकुट ही नहीं देश का प्राण है।अपनी जिस सभ्यता पर हमें गर्व है, वह हिमालय की और उससे निकलीं नदियों की ही देन है।

नारद पुराण में कहा है -- ' शैलानां हिमवन्तो च'अर्थात पर्वतों में हिमालय भगवान् का रूप है। श्री मद्भगवद्गीता-- 10/25  में भगवान् श्रीकृष्ण हिमालय को अपना ही रूप बताते हैं ---
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः। अर्थात सब प्रकार के यज्ञों में मैं जप यज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ ।
'कैलाश' हिमालय का ही पावनतम शिखर है, जिस पर भवानी और शंकर निवास करते हैं ।गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-
              परम रम्य गिरिवर कैलासू।
              सदा जहाँ शिव उमा निवासू।।

       हिमालय कोई सामान्य शिलाखंड या पर्वत मात्र नहीं है।यह चैतन्य है,दैवी सृष्टि है। यह विश्व के पर्वतों में सर्वोच्च है।यह भारत के ऋषियों, मनीषियों की संसद है तथा एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला है।कविवर कालिदास ने अपनी रचना ' कुमारसंभव' का प्रारम्भ ही हिमालय की महिमा से किया है--
"अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो  नाम नगाधिराजः।" 
कालिदास आगे लिखते हैं-- मनीषिताः सन्ति गृहेषु देवताः।अर्थात-
हिमालय में समस्त देवताओं का वास है।

महाकवि कालिदास ने कहा है -- 'हिमालय अनेक रत्नों का जन्मदाता है  (अनन्तरत्न प्रभवस्य यस्य), ।उसकी श्रंखलाओं में जीवन औषधियाँ उत्पन्न होती हैं ।(भवन्ति यत्रौषधयो रजन्याय तैल पुरत सुरत प्रदीपः),वह पृथ्वी में रहकर भी स्वर्ग है ( भूमिर्दिवभि वारूढं)।

          हिमालय की गुफाओं से युगों- युगों से वेद की ज्योतिर्मय ऋचाएँ प्रस्फुटित होती व गुंजायमान होती रही हैं ।यहाँ नीलवर्ण  अमृतजल से भरे ब्रह्मसरोवरों व ब्रह्मकमलों को देखकर साधकों को योगनिद्रा व सहज समाधि लगती है।पूर्णिमा की चाँदनी रात में हिमालय में बैठकर तप- साधना करने का भाव-ध्यानआध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत कर सकता है।

हिमालय में ही महर्षि व्यास ने महाभारत जैसे आध्यात्मिक कोष की रचना की ।आद्यशंकराचार्य को ब्रह्मज्योति यहीं के ज्योतिर्मठ में मिली।उन्होंने बद्रीनाथ धाम में भगवान् विष्णु एवं केदारनाथ तीर्थ में भगवान् भोलेनाथ के ज्योतिर्मय रूप को स्थापित किया।

गौरीशंकर, कृष्णशैल, धौलागिरी, कंचनजंघा, पंचाचुली, केदारनाथ, नीलकंठ जैसे हिमालय के विराट शिखर सारे संसार को सत्य, शान्ति, करुणा व प्रेम का शाश्वत संदेश देते हैं तो वहीं दूसरी ओर गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु, झेलम, रावी, गंडकी आदि इसकी आत्मजा नदियाँ भारत को शस्य- स्यामल ही नहीं बल्कि भारत को महान भारत, देवभूमि व जीवन तीर्थ भी बनाती हैं ।भारत की इस पुण्यधरा पर जन्म लेना भी बहुत सौभाग्य माना जाता है।

राष्ट्र कवि रामधारीसिंह 'दिनकर' हिमालय को भारत का भाल कहकर पुकारते हैं--
      मेरे नगपति ! मेरे विशाल !
      साकार दिव्य, गौरव विराट !
      पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !  
       मेरी जननी के हिमकिरीट !
       मेरे भारत के दिव्य भाल !
वहीं जयशंकर प्रसाद जी ' कामायनी ' में अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं---
       उमड़ रही जिसके चरणों में 
       नीरवता की विमल विभूति।
       शीतल झरनों की धाराएँ 
       बिखरती  जीवन - अनुभूति।।

हिमालय के शिखर पर छिटक- छिटककर आ रहीं भगवान भास्कर की उषाकालीन स्वर्णिम रश्मियों में स्नान करते हुए, जप, तप करने का भाव- ध्यान  किसी को सदा- सदा के लिए भाव- समाधि में भिगो सकता है।

हिमालय के शस्य- स्यामल मुग्धकारी रूप- लावण्य का क्या कहना!  हिमालय के कण- कण में, अणु- अणु में, जर्रे- जर्रे में दिव्य चेतना व दैवी शक्तियों का वास है, इसलिए यह धरती का स्वर्ग और आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र है।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।



 

Saturday, December 21, 2019

मौन---मौन आत्मा का सर्वोत्तम मित्र है, मौन सर्वोत्तम भाषण है।


                              ●● मौन ●●
मौन आत्मा का सर्वोत्तम मित्र है, इसलिए मौन रहने पर ही हम अपने सबसे करीब होते हैं , अंतर्मुखी होते हैं और बोलने पर बहिर्मुखी हो जाते हैं अर्थात मौन के पलों में हम स्वयं से संवाद कर पाते हैं, जब कि बोलने में हम दूसरों से संवाद करते हैं ।वाणी का संयम केवल बाह्य मौन है और मन का मौन अंतःमौन , जब कि वास्तविक मौन वह है जिसमें मन व वाणी दोनों ही पूरी तरह शान्त हों।

               मौन हमारे जीवन के बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर है और और इन उत्तरों को जानने का एक ही तरीका है-- कि हम मौन रहने का अभ्यास करके इन उत्तरों को हासिल करें ।अक्सर हम अपने अंतर्मन की उपेक्षा करके बाहर की गतिविधियों में मन रमाते हैं, दूसरों की त्रुटियों की ओर ध्यान देकर अपने लक्ष्य से भटकते हैं।

मौन रहते हुए दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा आदि के कार्य भी सरलता से किए जा सकते हैं ।जहाँ जरूरी हो वहाँ अवश्य बोलना चाहिए, सारगर्भित शब्दों में स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहिए ।सामान्य जीवन में मौन का पूरी तरह पालन करना संभव नहीं हो पाता, इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि जितना आवश्यक है,उतना ही बोलें बाकी समय यथासंभव मन को शान्त रखें ।

    बोलना सुन्दर कला है लेकिन मौन इससे भी ऊँची कला है, मौन सर्वोत्तम भाषण है।जहाँ एक शब्द से काम चले वहाँ दो बोलने की जरूरत ही नहीं ।अनावश्यक बोलने में जितनी गलतफहमियाँ होती हैं, उतनी मौन से नहीं होतीं ।निरर्थक बोलना बहुत थकाने वाली प्रक्रिया है ।जब लोग इतने पढ़े- लिखे नहीं और बुद्धिजीवी नहीं थे तब कम बोलते थे , जो सच्चा भाव होता था उसे ही कहा करते थे।

           जिस प्रकार नदियों की उलझती लहरों में कभी भी यह नहीं देखा जा सकता कि उनके तल में क्या छिपा है उसी प्रकार वाचाल ( अधिक बोलने वाला) व्यक्ति भी अपने मन के अन्दर छिपी पड़ी शक्तियों की क्षमताओं से अनभिज्ञ रहता है । 

जो मौन रहकर स्वयं के बारे में चिंतन मनन करता है , स्वयं को जानने का प्रयास करता है, वही एकांत के आनन्द को अच्छी तरह से अनुभव कर पाता है।अकेले में ही आत्मसाक्षात्कार संभव है।
जिसे आध्यात्म का अनुभव मिल जाता है , वह तो बस मौन हो जाता है और उसके इस मौन में भी आध्यात्म ही अभिव्यक्त होता है।

●मौन का अर्थ है----- कम बोलना और जितना आवश्यक है उतना बोलना ।व्यक्ति की आधे से अधिक शक्ति वाणी का प्रयोग करने में व्यर्थ हो जाती है इसलिए जितना संभव हो सके , मौन रहना चाहिए ।जब भी हमें किसी कार्य को गंभीरता के साथ, एकाग्र मनःस्थिति से करना होता है,तो हम एकांत तलाशते हैं, जहाँ पर कोई हमारे कार्य में दखल न दे सके और हम शांत चित्त से, मौन रहकर अपना कार्य कर सकें ।

जब हम मौन धारण करते हैं तो सहज ही प्रकृति का अंश बन जाते हैं; क्योंकि प्रकृति में तो सर्वत्र मौन व्याप्त है और मौन रहकर प्रकृति भी निरंतर गतिशील रहती है ।जीवन की खोज, जीवन के उद्देश्य एवं समझ की पहचान, जीवन रस का आस्वादन कभी भी भीड़ में सम्भव नहीं है ।भीड़ में भला कोई जीवन रहस्य की खोज कैसे कर सकता है--

एक महान विचारक ने कहा है ------- कि वार्तालाप भले ही बुद्धि को मूल्यवान बनाता हो, किन्तु मौन "प्रतिभा की पाठशाला" है।जिस तरह शान्त नदी का जल इतना स्वच्छ व पारदर्शी होता है कि उसके जल में क्या है, वह आसानी से देखा जा सकता है, उसी प्रकार शान्त मन भी व्यक्ति के सामने अपने विशाल जखीरे को प्रकट करने लगता है।आचार्य विनोबा कहते थे ----" मौन और एकांत आत्मा के सर्वोपरि मित्र हैं ।"

             मौन के बाहर की दुनिया मन की दुनिया है; जब कि मौन की दुनिया, आत्मा की और प्रकृति के रहस्यों की दुनिया है ।संसार में जितने भी तत्वज्ञानी हुए हैं, सभी मौन के साधक रहे हैं ।सभी ज्ञानी महात्मा, संत , साधक एकांत में मौन रहकर ही अपनी साधना सिद्ध कर सके।एकांत एवं मौन ही जीवन के रहस्य को समझने एवं अपने लक्ष्य तक पहुँचने का एकमात्र साधन एवं समाधान है।

महात्मा गाँधी जी  के लिए मौन एक प्रार्थना के समान था , जो उनके लिए आध्यात्मिक सुख लेकर आता था।संत एमर्सन का कहना था ---" आओ हम मौन रहें ताकि फ़रिश्तों की कानाफूसियाँ सुन सकें ।" तीर्थंकर महावीर स्वामी बारह वर्ष तक एकांत में रहकर गहन मौन रहे ।मौन ही उनका साथी, सहचर था।महर्षि अरविन्द सन्  1910  में पांडिचेरी गए थे ।वहाँ सन् 1950  में उन्होंने शरीर का त्याग किया ।इन चालीस वर्षों में वे प्रायः एकांत में मौन ही रहे।

भगवान् बुद्ध जब सत्य की खोज के लिए निकले तो वर्षों तक उन्होंने तरह- तरह की साधनाएँ व उपाय किए, किन्तु सत्य नहीं मिला ।अंततः वह मौन के सरोवर में डूबे और सत्य का मोती पा लिया।बाद में उनके अनुयायियों ने जब उनसे परमात्मा के बारे में प्रश्न किया तो यह 'मौन'  ही उनका उत्तर था ।महर्षि रमण ने  भी मौन रहकर ही अपनी महत्वपूर्ण साधनाओं को संपन्न किया।

                     एकांत और मौन का प्रभाव कितना विलक्षण है, "महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला" की भावांजलि में गहनता से अनुभव अनुभव किया जा सकता है-----
       बैठ लें कुछ देर
       आओ, एक पथ के पथिक से
        प्रिय, अंत और अनंत के
         तम गहन जीवन घेर।
          सरल अति स्वच्छ 
          जीवन प्रात के लघु पात से
          उत्थान पत्नाधात से
          रह जा, चुप निर्द्वन्द्व 
        
मौन के माध्यम से शान्ति का साम्राज्य फैलेगा ।मौन के माध्यम से हम साधना जगत में प्रवेश कर पाएँगे और अध्यात्म जगत के रहस्यों का अनावरण भी कर पाएँगे ।अकेले में ही हम परम शान्त और मौन हो सकते हैं, और अकेले में ही हम उस द्वार को खोज सकते हैं, जो 'परमात्मा का द्वार' है। थियोसोफी के जन्मदाताओं के अनुसार मौन रहने की स्थिति में दैवी वाणी सुनने का अवसर मिलता है।

                     जब हम शान्त और मौन बैठे होते हैं, तब ही अन्तरात्मा की वाणी सुनाई देती है, परमात्मा का स्वर निखर उठता है।मौन साधना का वह पथ है , जिस पर चलकर व्यक्ति के आन्तरिक विकास का पथ खुलता है और ऊर्जा का संरक्षण होता है।मौन व्यक्ति को साधना की अतल गहराइयों में ले जाता है, व्यक्ति को स्थिर व एकाग्र करता है।

                               आध्यात्मिक जीवन में मौन का बहुत महत्व बताया गया है; क्योंकि मौन के माध्यम से हमें एकाग्र रहने में सहायता मिलती है।मौन के माध्यम से ही आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत होती है ।आध्यात्मिक जीवन में रुझान रखने वाले लोग अपनी दिनचर्या में मौन को शामिल करते हैं और मौन के समय वे पूरी तरह से शांत चित्त रहते हैं ।

              जितना अधिक व्यक्ति का मौन सधने लगता है , उसकी क्षमताएँ उतनी ही बढ़ती चली जाती हैं । मौन रहने व कम बोलने से न केवल हमारी वाणी का संयम होता है अपितु इससे हमारी जीवनी शक्ति का भी संचय होता है।मौन रहने से भी अभिव्यक्तियाँ प्रकट होती हैं, इसके लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं होती ।बिना भाषा के ही मौन अपना प्रभाव दिखाता है।

जो व्यक्ति अपने मुख व जीभ पर संयम रखता है , वह अपनी आत्मा को कई संतापों से बचा लेता है, आदिकाल से ही मौन की महिमा गाई गई है ।मौन रहकर ही अपनी गतिविधियों, क्रियाओं व व्यवहारों का सूक्ष्म विश्लेष्ण किया जा सकता है ।आत्मनिरीक्षण, आत्मविश्लेषण मौन रहकर ही संभव है।मौन हमें कई बार व्यर्थ के विवादों से बचा लेता है ।

मौन को आत्मा का सर्वोत्तम मित्र मानकर हम सभी अपने जीवन में मौन का अभ्यास करना सीखें; क्योंकि स्वयं को जानने का यही एकमात्र रास्ता है ।श्रुति कहती है कि- स्वयं को जानो और अमृतत्व में लीन हो जाओ।

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।


Friday, December 13, 2019

मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में स्थित सात चक्र क्या हैं ?, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर,अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा एवं सहस्रार चक्रों का विवरण , कुंडलिनी शक्ति एक महाविज्ञान

  ●मानव शरीर में स्थित षट् चक्र अथवा सप्त चक्र क्या हैं ●   क्या भीतर अन्धेरा है ? नहीं प्रकाश का ज्योतिपुंज अपने भीतर विद्यमान है और एक पूरा संसार ही अपने भीतर बिराजमान है।
मानव देह रहस्यों से आवृत है।इसका रहस्य इतना गहरा है , जितना कि ब्रह्माण्ड का रहस्य ।योग के अनुसार इसके विभिन्न केन्द्रों के माध्यम से विराट एवं ब्रह्माण्ड की झलक झाँकी पाई जा सकती है।

सामान्यतः योग शास्त्रों में व अन्य आध्यात्मिक शास्त्रों में अक्सर  षट् चक्रों के बारे में पढ़कर मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि ये चक्र क्या हैं और कुंडलिनी शक्ति क्या है ? कैसे इनकी साधना होती है ? एवं योग में इनका क्या महत्व है ?

मानवीय काया के भीतर कुछ ऐसे मर्मस्थान सुरक्षित हैं, जो गुह्य आध्यात्मिक शक्तियों के केंद्र कहे जा सकते हैं ।इन शक्तिकेन्द्रों का जागरण मनुष्य को अपरिमित शक्ति भंडार का स्वामी बना देने में समर्थ है।इन मर्मस्थलों में से मेरुदंड या रीढ़ का स्थान प्रमुख है।

यह मेरुदंड तैंतीस अस्थिखंडों के जुड़ने से बना है , जिनका संबंध तैंतीस कोटि देवी-देवताओं की शक्ति से माना जाता रहा है।चिकित्सकीय दृष्टि से मेरुदंड के सर्वाइकल, डोर्सल, लंबर, सेक्रल, इत्यादि भाग होते हैं और ये तैंतीस अस्थिखंड उन भागों में विभक्त माने जाते हैं ।
                  आध्यात्मिक साधना के पथ पर अग्रसर होने वाले 
साधक यदि इन चक्रों के बारे में थोड़ी जानकारी कर लें तो उन्हें  आध्यात्मिक साधनाओं का महत्व पता चलता है।आत्मा और उसके साथ जुड़े हुए परमात्मा को देखने के लिए अंतर्दृष्टि की आवश्यकता है ।श्रुति कहती है - "अपने आप को जानो और अमृतत्व में विलीन हो जाओ"।उसी को ऋषियों ने दोहराया है और तत्वज्ञानिओं ने उसे ही सारी उपलब्धियों का सार कहा है।

सामान्यतः हमारी बुद्धि भौतिक जगत के तीन आयामों तक ही सिमट कर रह जाती है।मानसिक पवित्रता, प्रखरता एवं हृदय की विशालता का विस्तार शुरु होते ही चौथे आयाम का बोध होने लगता है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने योग साधनाओं एवं तपश्चर्या के बल पर चेतना के विविध आयामों का बोध किया था।
स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, शान्ति, आदि विभूतियों की खोज में कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है सब हमारे अन्दर ही है।

          कठोपनिषद् 3/12 में----
 दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मदर्शिभिः  अर्थात अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास और परमात्मा का दर्शन सूक्ष्म बुद्धि वाले विज्ञजनों को सूक्ष्म बुद्धि से ही होता है।
                  
        ●●● सात चक्रों का संक्षिप्त विवरण ●●●

योग के अनुसार शरीर में ऐसे एक सौ आठ ( 108) केंद्र हैं, जो स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर को जोड़ते हैं ।इनमें से छः या सात प्रमुख  केंद्र हैं जिन्हें षट् चक्र या सप्त चक्र कहा जाता है ।
वस्तुतः शरीर में स्थित सूक्ष्म चक्र संस्थान अर्थात षट् चक्र आणविक विद्युत भंडारों को अंतरिक्ष में संव्याप्त असंख्य शक्ति धाराओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले ट्रांसफार्मरों की तरह काम करते हैं ।

वस्तुतः ये चक्र चेतना के सप्त आयामीय सूक्ष्म केंद्र हैं ।जिनमें एक से बढकर एक उच्च स्तरीय विभूतियाँ व ज्ञान भंडार भरे पड़े हैं ।चक्रों की यह विलक्षण एवं विशिष्ट क्षमता प्रकाशमय ऊर्जा के रूप में विद्यमान है, जिसे विभिन्न रंगों के रूप में अनुभव किया जा सकता है ।इन्हें शक्ति केंद्र भी कहा जाता है।मानवीय शरीर में स्थित चक्रों का क्रम नीचे से ऊपर की ओर इस प्रकार है--
मूलाधार चक्र 
स्वाधिष्ठान चक्र 
मणिपूर चक्र 
अनाहत चक्र 
विशुद्धि चक्र 
आज्ञा  चक्र 
सहस्रार चक्र 

 1● मूलाधार चक्र--- मूलाधार को अंग्रेजी में 'रूट चक्र' के नाम से संबोधित किया गया है।जिसका स्थान जननेन्द्रिय से नीचे है ।चार पंखड़ियों वाले , कमल की आकृति वाले इस चक्र का रंग किरमिजी होता है और सोने जैसी पीली चमक दृष्टिगोचर होती है।इसमें प्रवाहित वज्र नाड़ी के रूप में कामदेव की शक्ति क्रियाशील रहती है , जिसका रंग गहरा लाल है।यदि काममूलक इस ऊर्जा शक्ति को साधना द्वारा ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो यह चक्र करोड़ों सूर्यों के सदृश दैदीप्यमान हो उठता है।इस चक्र के जागरण से वाणी में ओजस्विता आती है , निरोग जीवन के आनन्द की अनुभूति होती है और साधक का व्यक्तित्व बहुआयामी बन जाता है ।

2 ● स्वाधिष्ठान चक्र-- स्वाधिष्ठान चक्र को अंग्रेजी में  'स्पलीन चक्र' कहा जाता है ।इसका स्थान जननेन्द्रिय से ऊपर है ।छः पंखडी वाले इस चक्र की आकृति कमल जैसी है और रंग सिंदूरी है ।इस चक्र की आभा नीले रंग की होने के कारण इसे भगवान विष्णु  का वैकुण्ठधाम कहा जाता है ।इस चक्र के ऊर्ध्वगामी होने से साधक साधना-पथ में तीव्र गति से अग्रसर होने लगता है ।व्यक्तित्व विकास के नए आयाम खुलने लगते हैं ।

3 ● मणिपूर चक्र--- तीसरे चक्र मणिपूर को 'नेवल चक्र' की संज्ञा दी गई है ।यह दस पंखड़ियों वाला पीले रंग का प्रकाश है ।इस चक्र के जागरण होने पर व्यक्ति में स्नेह, सहयोग, सहकार जैसे सद्भावों की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य में दैवीय गुण जाग्रत होने लगते हैं ।

4 ● अनाहत चक्र---  चौथे चक्र अनाहत चक्र को अंग्रेजी में 'हार्ट चक्र' के नाम से जाना जाता है जिसका रंग सोने जैसा पीला होता है ।इन प्रकाशमय तरंगों के प्रकाशित होने से व्यक्ति भय और त्रास से त्राण पाता है । इस चक्र के जागरण से अनेक चमत्कारिक विभूतियाँ प्राप्त हो सकती हैं ।बारह पंखड़ियों वाले यह चक्र हृदय  स्थान में स्थित होता है ।

5 ● विशुद्धि चक्र--- पाँचवा चक्र विशुद्धि चक्र है, जो गले में स्थित होता है ।अंग्रेजी में इसे थ्रोट चक्र कहा जाता है ।सोलह पंखड़ियों वाले इस चक्र में हरे रंग की प्रकाश-तरंगों की बहुलता होती है ।इस चक्र के जागरण पर व्यक्ति के जीवन क्रम में समस्वरता, सरलता जैसे सहज-स्वाभाविक गुणों का विकास होने लगता है।

6 ● आज्ञा चक्र--- छठा चक्र आज्ञा चक्र है, जिसे अंग्रेजी में 'ब्रो चक्र' कहा जाता है ।इसे ही दिव्य चक्र, तीसरी आँख , ज्ञान केंद्र आदि नामों से भी जाना जाता है । मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक की पंखड़ियों का जोड़ पचास होता है। पचास इड़ा के एवं पचास पिंगला के तथा अष्टधा प्रकृति के आठ मिलकर  एक सौ आठ बनते हैं ।
 
                      इस चक्र के जागरण पर सत्प्रवृत्तियाँ विकसित होती चली जाती हैं ।आज्ञा चक्र का पूर्ण विकास होने पर दिव्य दृष्टि का वरदान मिलता है , जो मनुष्य को नीर-क्षीर विवेक बुद्धि की विभूतियों से वासंती पुष्पाहार की तरह लाद देती है।यही वह संपदा है , जो मनुष्य को श्रेयपथ की ओर अग्रसर करती है और मोक्ष प्रदान करती है।

7 ● सहस्रार चक्र--- सातवें चक्र सहस्रार को अंग्रेजी में 'क्राउन चक्र' कहा जाता है ।योग ग्रन्थों में इस चक्र को सभी चक्रों का समन्वित स्वरूप बताया गया है ।इसका रंग श्वेत माना जाता है ।इसमें षट्चक्रों के सभी रंगों का समावेश होता है ।जिस प्रकार सूर्य के सम्मिलित प्रकाश का रंग श्वेत है, उसी तरह सहस्रार से उद्भूत प्रकाश-तरंगें श्वेत हैं ।

थियोसोफिकल सोसायटी , लंदन के विख्यात गुह्य विज्ञानी चार्ल्स वैब्स्टर लेडबीटर के अनुसार मूलाधार की अपेक्षा सहस्रार चक्र में दो सौ पचास गुनी अधिक शक्तियाँ सन्निहित होती हैं ।सहस्रार में 972 ( नौ सौ बहत्तर ) पंखडियाँ हैं, जो हजार के सन्निकट होने के कारण सहस्रार कहलाती हैं ।यहीं से प्राणचेतना के स्फुलिंग सहस्त्रों की संख्या में उठते रहते हैं ।विरलों का ही यह चक्र जाग्रत होता है।
 
शिव शक्ति का , आत्मा-परमात्मा का मिलन स्थल यही है ।इसका दर्शन परिष्कृत एवं सूक्ष्म बुद्धि से ही संभव हो पाता है ।व्यक्तित्व विकास का यही उच्च सोपान है।भारतीय आध्यात्म शास्त्रों, साधना ग्रन्थों, उपनिषदों एवं तंत्रशास्त्रों में सहस्रार चक्र की महिमा- महत्ता का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है, साथ ही साथ उसकी उच्चस्तरीय आध्यात्मिक उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है।

  चक्रों की सात संख्या होने पर भी  षट् चक्र इसलिए कहे जाते हैं; क्योंकि हमारे स्थूल शरीर की सीमा रेखा आज्ञा चक्र तक ही सीमित है और स्रहसार चक्र के जागने पर व्यक्ति शरीर के दायरे से पार चला जाता है।षट् चक्र एक प्रकार की सूक्ष्म ग्रन्थियाँ हैं जो सुषुम्ना में स्थित तीन नाड़ियों में सबसे भीतर ब्रह्म नाड़ी के मार्ग में बनी हुई हैं ।अलग- अलग चक्रों की अलग-अलग प्रकृति होती है और इनके माध्यम से विभिन्न ऊर्जा स्तरों से सम्बन्ध साधा जा सकता है।

        ●●● कुंडलिनी शक्ति एक महाविज्ञान ●●●

वस्तुतः चक्र- बेधन और कुंडलिनी जागरण अत्यन्त गूढ़ प्रक्रिया है।सुपात्र शिष्य और समर्थ गुरू के संयोग से ही यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है।उपनिषदों, पुराणों और योगग्रन्थों में इसकी विशद विवेचना हुई है।षट् चक्रों का वेधन करते हुए कुंडलिनी तक पहुँचना और उसे जाग्रत करके आत्मोन्नति के मार्ग में लगा देना, यह एक महाविज्ञान है।

षट् चक्रों के बेधन और कुंडलिनी के जागरण से ब्रह्मरंध्र में ईश्वरीय दिव्यशक्ति के दर्शन होते हैं और महत्वपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा को ही महायात्रा कहते हैं ।सहस्रार को न्यूक्लियस कहते हैं ।आत्मसाक्षात्कार की ब्रह्म साक्षात्कार की प्रक्रिया यहीं सम्पन्न होती है।विरले ही होते हैं जिनमें सहस्रार पूर्णरूपेण जाग्रत होता है।।भगवान् बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, शंकर आदि ऋषियों का सहस्रार जाग्रत था।

इन चक्रों में ऊर्जा होती है यदि यह ऊर्जा स्वस्थ, सकारात्मक व क्रियाशील है तो इसका सकारात्मक लाभ व्यक्ति को मिलता है।
सामान्य व्यक्ति भी अपने सूक्ष्म शरीर में स्थित चक्रों की ऊर्जा का सामान्य लाभ ले सकता है और अपने जीवन में विशेष ढंग से आगे बढ़ पाता है।जब चक्रों में साधक अपने ध्यान को केन्द्रित करता है तो उसे वहाँ विशिष्ट कोण निकले हुए दिखाई देते हैं, जैसे पुष्प में पंखडियाँ होती हैं ।

                      आज ऐसी तकनीकें विकसित हो गईं हैं, जिनके माध्यम से हमारे ऊर्जा शरीर का प्रतिबिम्ब भी लिया जा सकता है   और शरीर में प्रवाहित ऊर्जा के स्वरूप व आकार- प्रकार को भी देखा जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र के ग्रह नक्षत्रों का हमारे शरीर से सूक्ष्म सम्बन्ध होता है।इसी कारण ये हमारे जीवन व व्यक्तित्व को प्रभावित कर पाते हैं ।

जब कुंडलिनी शक्ति का जागरण होता है तो वह सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊर्ध्व गमन करती हुई आगे बढ़ती है और अंततः आज्ञा चक्र को पार करके सहस्रार में शिव मिलन के लिए जा पहुँचती है।

कस्तूरी वाला हिरन तब तक अतृत्व ही फिरता रहेगा , जब तक कि अपने ही नाभिकेन्द्र में कस्तूरी की सुगन्ध सन्निहित होने पर विश्वास नहीं करेगा ।

यह बहुत विस्तृत विषय है --
यहाँ चक्रों के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास है।
सादर धन्यवाद ।


Tuesday, December 10, 2019

ध्यान क्या है ? ध्यान के क्या लाभ हैं ? ध्यान कैसे सधे ?

                   ●●●ध्यान क्या है ? ●●●
ध्यान मन का स्नान है, ध्यान से मन का परिष्कार व परिशोधन होता है।किसी भी विषय पर मन को टिकाकर जब मन स्थिर होने लगे, तो उसमें मन का गहराई से एकाग्र होना ही ध्यान है।ध्यान एक विलक्षण व समग्र प्रक्रिया है।शिखर पर आरोहण है- ध्यान ।

                    महर्षि पतंजलि अपने योग दर्शन में स्पष्ट रीति से समझाते हैं कि योग की यथार्थता- सार्थकता ध्यान में ही फलित होती है।ध्यान की प्रगाढ़ता में चित्त दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाता है ।योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त उस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा की अनुभूति करते हुए , स्वयं में ही संतुष्ट रहता है।

महर्षि पतंजलि कहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन के लिए चित्त को संस्कारों से मुक्त होना ही चाहिए ।इस शुद्धिकरण के लिए भी एक प्रक्रिया है, वह है-- पवित्र भाव, पवित्र विचार, पवित्र दृश्य अथवा पवित्र व्यक्तित्व के ध्यान की ।

                                  ध्यान का अभ्यास करते- करते धीरे- धीरे चित्त को निर्विचार अवस्था प्राप्त होती है।इस तरह ध्यान मन का पुनर्निर्माण है, पुनर्संरचना है अर्थात अब हमें नकारात्मता स्वीकार नही अस्तित्व  हमें जो भी शुभ दे रहा है उसे हम ग्रहण करें और हम भी अस्तित्व को कुछ शुभ दें।यही ध्यान का मुख्य आधार है।

      ध्यान के बारे में तीन बातें हैं- धारणा, ध्यान,समाधि  इन तीनों को मिलाकर कहते हैं, संयम।धारणा हमारे व्यक्तित्व में एक तरह का बीजारोपण है इसमें हम अपनी मनोभूमि, चित्तभूमि में एक कल्पना, एक भाव रखते हैं और इसके लिए वातावरण जुटाते हैं, धीरे-धीरे वह हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगता है।अपने अनुरूप हमारे चित्त को ढालने लगता है।

ध्यान की गहन व चरम अवस्था में ही अनेक महापुरुषों ने परमात्मा की अनुभूति की। ध्यानी व ध्यानसिद्ध व्यक्ति की दृष्टि जिधर पड़ जाती है, वहीं आनंद का साम्राज्य छा जाता है।उनके आभामंडल में प्रवेश करते ही हमको असीम आनंद व शांति का अनुभव होता है ।

                  ●●●ध्यान के लाभ ●●●

हमारे जीवन में एक लय है और इसी लय में हमारे जीवन का सौन्दर्य है ।जीवन की लय ही जीवन का कवच है। प्रकृति उसको अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती है।यदि जीवन की इस लय में असंतुलन होता है, इसमें व्यतिक्रम आता है तो ध्यान इस व्यतिक्रम की पुनर्स्थापना करता है।ध्यान द्वारा हम इस जीवन की लय में   पुनः संतुलन स्थापित करते हैं ।

                हमारे जीवन में स्थूल के साथ सूक्ष्म, सूक्ष्म के साथ अतिसूक्ष्म तत्व पिरोए हुए हैं ।ध्यान इसी तल पर लय बिठाता है, हमें संवेदनशील बनाता है, हमें चैतन्य बनाता है।शरीर का स्वस्थ होना और मन का स्वच्छ होना जीवन को लयपूर्ण बनाता है।ध्यान द्वारा स्थिर एवं शान्त स्थिति में पवित्र धारणाओं के पुष्प मुस्कराते हैं ।


ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने पर ही इसकी सामर्थ्य को जाना जा सकता है। ध्यान से हमारी नकारात्मता सकारात्मकता में परिवर्तित होने लगती है ।ध्यान का नियमित अभ्यास जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। ध्यान के अभ्यास से अंतःवृत्तियों एवं अंतःशक्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।ध्यान से हमारी मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है ।

ध्यान के नियमित अभ्यास से हम हर पल आनंदित होते चले जाते हैं ; जैसे- जैसे हमारा आनन्द सघन होता चला जाता है ,वैसे - वैसे हमारा ध्यान भी विकसित होता चला जाता है।ध्यान के अभ्यास से ही आध्यात्म के सत्य का निष्कर्ष पाया जा सकता है।

                   ●●●ध्यान कैसे सधे●●●

ध्यान में मन न लगना एक समस्या होती है।अधिकांश लोग यह कहते हैं कि ध्यान में मन स्थिर नहीं होता ।ध्यान से शरीर में जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे आत्मसात् करना होता है।यदि ऐसा नहीं कर पाते तो लोग निराश होकर ध्यान करना छोड़ देते हैं ।

कबीर कहते हैं कि- " जिन खोजा तिन पाइयाँ "
ईसा कहते हैं--- द्वार खटखटाओ, वह खुलेगा।

यही तो साधना है जो सरल भी और जटिल भी, निर्भर करता है साधक की मनोभूमि पर।स्वयं से पूछें-- क्या हम ध्यान साधना के पथिक बनने के लिए तैयार हैं  ?
यदि हमारा मन ध्यान साधना का पथिक बनने के लिए तैयार है तो अंतर्यात्रा के द्वार में स्वागत के वन्दनवार सजे हैं- बस चलते जाना है अंतर्यात्रा की अंतर्धारा के साथ ।

ध्यान के लिए मन का स्थिर व शान्त होना व शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है ।अभ्यास भी जरूरी है ध्यान सधने के लिए ।
ध्यान की शुरुआत होती है।महर्षि पतंजलि कहते हैं-- स्थिरं सुखं आसनम्। स्थिर होकर सुखपूर्वक बैठ सको वह आसन है।

शरीर के स्थिर हो जाने पर धीरे- धीरे हमारा मन स्थिर होने लगता
है, मन में परिवर्तन आने लगता है, फिर हम ध्यान के द्वारा अपनी दिशा तय कर सकते हैं ।मन का टिकना कठिन है , लेकिन मन की दिशा तय होना उससे भी ज्यादा कठिन है।ध्यान के साथ- साथ स्वांस पर भी हम ध्यान दें तो ध्यान जल्दी सधने लगता है।

        जिन्हें ध्यान का लाभ लेना है उन्हें अपने भोजन पर भी ध्यान देना चाहिए, उनका भोजन सुपाच्य, हल्का और पौष्टिक होना चाहिए ।हम जितना पौष्टिक भोजन लेंगे उतनी ही ध्यान की गति तीव्र व सुगम हो जाएगी।

ध्यान का लाभ लेने वाले को अकारण व अनावश्यक नहीं बोलना चाहिए ।अधिक देर तक मोबाइल फोन पर बात नहीं करनी चाहिए एवं तेज स्वर का संगीत श्रवण नहीं करना चाहिए ।व्यक्ति की आधे से अधिक शक्ति वाणी का प्रयोग करने में व्यर्थ हो जाती है।इसलिए ध्यान साधक को जितना संभव हो उतना मौन रहना चाहिए ।

ध्यान से ही आत्म साक्षात्कार संभव है।ध्यान से ही आध्यात्मिक
जीवन श्रेष्ठ बनता है।ध्यान से ही परमात्मा की अनुभूति हो सकती है।

          नित- नित प्रभु तेरा ध्यान करूँ 
              जीवन को सफल बनाऊँ

सादर अभिवादन व धन्यवाद ।






Monday, December 9, 2019

"ध्यान" चिकित्सा विज्ञान में भी अब ध्यान विद्या का उपयोग

           ●●● ध्यान का चिकित्सकीय पक्ष ●●●
 भारतीय योग साधना में ध्यान को सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान माना गया है।ध्यान एक विलक्षण व समग्र प्रक्रिया है।वर्तमान समय में   ध्यान- साधना के प्रभावों का अध्ययन व अनुसंधान विश्व के अनेक देशों में अपने - अपने ढंग से चल रहा है।

भारतीय ऋषि-मनीषियों ने प्राचीन काल में ही योग विज्ञान के माध्यम से मस्तिष्क की शक्ति को अभीष्ट दिशा में विकसित करने की सामर्थ्य विकसित कर ली थी।आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं ।जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक शोपेन हाॅवर ने मस्तिष्क की विद्युत तरंगों के नियमन एवं नियंत्रण के लिए ध्यान-साधना को अधिक महत्व दिया है।

              हमारे मन में, हमारी भावनाओं में अनेक ऐसे कारण हैं जो भावनाओं में विक्षोभ और विचारों में द्वंद्व उत्पन्न करते रहते है,
और हमें अस्वस्थ बनाते रहते हैं ।ध्यान एक ऐसी चिकित्सा है---
जिसके द्वारा हम मन की कमी व कमजोरियों को दूर करते हैं।

ध्यान हमारे मन में एक चुंबकीय क्षेत्र ( मैग्नेटिक फील्ड) तैयार करता है।इसी चुंबकत्व के माध्यम से हम प्रकृति से, वातावरण से अपने अनुरूप चीजों को आकर्षित करते हैं ।ध्यान से हमारी नकारात्मता,  सकारात्मकता में परिवर्तित होने लगती है।ध्यान हमारे व्यक्तित्व को पात्र बनाता है तथा हमारे अन्दर एक योग्यता, एक नई पात्रता विकसित करता है।

     "नित ध्यान करें प्राणायाम करें 
     जीवन अपना चमकाएँ "

ध्यान के माध्यम से हम अपने विचारों व भावनाओं में गहन रूपांतरण अनुभव करते हैं।विलियम सीमैन के अनुसार ध्यान- साधना के नियमित अभ्यास से अंतःवृत्तियों एवं अंतःशक्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है और चिंतामुक्त हुआ जा सकता है।
फ्रैंक पैपैंटिन ने अपने अनुसंधान पत्र 'ध्यान और शुद्धिकरण' में लिखा है कि ध्यान- साधना का नियमित अभ्यास जीवनी शक्ति में वृद्धि करता है और रोगप्रतिरोधक शक्ति भी बढाता है।

चिकित्सा विज्ञान में आज ध्यान विद्या का उपयोग शारीरिक-मानसिक उपचार में सफलतापूर्वक किया जा रहा  है ।कनाडा की मांट्रियल यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य विज्ञान वेत्ता प्राध्यापक पियरे रेनविले के निर्देशन में जेन मेडिटेशन अर्थात ध्यान की बौद्ध पद्धति पर  गहन अध्ययन व अनुसंधान किया गया और पाया कि ध्यान के अभ्यास से दर्द से परेशान लोगों की सहन शक्ति में अभिवृद्धि हुई व दर्द की अनुभूति का स्तर भी कम हो गया।यह निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए जोशुआ ग्रांट ( इस रिपोर्ट के सहलेखक) ने कहा कि यह तथ्य पहली बार उभरकर सामने आया है कि शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक दर्द को कम करने में ध्यान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

बेलिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक टाॅम जैराॅट कहते हैं कि ध्यानाभ्यासी साधक की शारीरिक क्रियाएँ सामान्य व सुचारु रूप से संपादित होने लगती हैं ।मूर्द्धन्य वैज्ञानिक डैविड डब्ल्यू आर्मे जॉन्सन के निष्कर्ष के अनुसार-- ध्यान साधना के अभ्यास द्वारा तंत्रिका- तंत्र के क्रियाकलापों में एक नई चेतना जाग्रत हो जाती है।

डेविड कोल्ब के अनुसार ध्यान के माध्यम से शरीर और मन के बीच अच्छा समन्वय, सतर्कता में वृद्धि, मतिमंदता में कमी और प्रत्यक्ष ज्ञान निष्पादनक्षमता तथा रिएक्शन टाइम में असामान्य रूप से वृद्धि होती है ।

अनुसंधानकर्ता योगविद्या के निष्णात कहते हैं कि ध्यान- साधना के अंतर्गत मस्तिष्क के नियोकाॅर्टेक्स वाले अति संवेदनशील क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रकार की लयबद्धता उत्पन्न होती है ।ऐसी स्थिति में मानवीय मस्तिष्क का कार्य स्नायुकोषों के माध्यम से प्रकाश कंपनों को लयबद्ध स्पंदन ( रिद्मिक पल्सेसन) में परिवर्तित करने का होता है।

                                    ध्यान मुद्रा में मस्तिष्क से निकलने वाली विशेष प्रकार की विद्युत तरंगों की आवृत्ति को औस्मिक फ्रिक्वेंसी कहा गया है , जो ब्रह्माण्डीय  ऊर्जा को आकर्षित कर सकने की सामर्थ्य रखती है। विश्वप्रसिद्ध न्यूरोसाइकोलाॅजिस्ट कार्ल प्रिवाम ने इन फ्रिक्वेंसीज को मानव- जीवन को सुविकसित करने एवं देवतुल्य स्तर का बनाने के लिए अत्यंत उपयोगी बताया है।इसकी उपस्थिति को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसने के लिए उन्होंने मस्तिष्क का 'होलोग्राफिक माॅडल' भी तैयार किया है।

कार्ल प्रिवाम कहते हैं कि मानसिक चेतना की यह विशेषता है कि वह स्थानीय सूचनाओं को एकत्रित करके समूचे ब्रह्मांड में बिखेर देती है।उनकी इस अभिनव मान्यता को 'होलोनोमी' के नाम से जाना जाता है ।प्रिवाम की इस नई तकनीक ने विश्व भर के भौतिकविदों को चिंतन की एक नई दिशाधारा दी है।

इन सभी अनुसंधानों के निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है कि "ध्यान साधना को आधुनिक  चिकित्सा जगत में भी महत्वपूर्ण स्थान" प्राप्त है ।प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में विभिन्न उपचारों के साथ ध्यान का अभ्यास भी कराया जाता है।
     
"मन की वीणा के तारों में अंतर्मन की झंकार को सुन"

विश्व ब्रह्मांड में "आनंद के कण" बिखरे हुए हैं---- ध्यान के माध्यम से मस्तिष्कीय शक्ति को जाग्रत करके उन आनंद के कणों को हम अपने अंदर आत्मसात् करके जीवन को सुखमय बना सकते हैं ।
                       "ध्यान एक चिकित्सा"
सादर धन्यवाद ।

Friday, December 6, 2019

"प्रार्थना" ( ऊर्जा का विज्ञान, जीवन का शिखर, आध्यात्मिक कवच एवं एक दिव्य औषधि)

             ●●● प्रार्थना जीवन का शिखर●●●
 हृदय की पुकार है प्रार्थना । भक्त और भगवान् का मिलन है प्रार्थना ।प्रार्थना वह है , जिसमें व्यक्ति हृदय की गहराई से श्रद्धा और विश्वास के भाव के साथ भगवान् से संवाद स्थापित करता है।प्रार्थना एक लयबद्धता है, जो हमारे भीतर घटित होती है, इसी लयबद्धता में हम विराट की ओर उन्मुख होते हैं ।

  "पुकार सुनलो दया  के सागर तुम्हारे चरणों में आ गए हैं" 

हमारे विश्व के सभी धर्मों में एकमात्र जो समानता है, वह है-- प्रार्थना ।हर धर्म किसी न किसी रूप में भगवान् से प्रार्थना करने को कहता है।प्रार्थना  भगवान् की सत्ता से जुड़ने का एक सरल मार्ग है, जिसे कर पाना सभी के लिए संभव है।
   
"सब एक हों, सब नेक हों चाहे धर्म उनके अनेक हों 
    हे जगत के मालिक जगत में शान्ति की धारा बहा"
              
                  श्रद्धा से सत्य प्रकट होता है और प्रार्थना के माध्यम से हम सत्य स्वरूप परमात्मा की ओर बढ़ते हैं ।प्रार्थना में जब  शरीर, मन व वाणी तीनों अपने आराध्य देव की सेवा में एक रूप होते हैं, तब वह सीधी 'परमात्मा' तक पहुँचती है।प्रार्थना तो परम प्रेम है, जीवन का शिखर है जो किसी के लिए और कभी भी की जा सकती है।प्रार्थना की वास्तविक अनुभूति तो तब होती है , जब प्रार्थना ही हमारा आनन्द बन जाती है।
 
                                   जब हम 'आचार्य शंकर' की स्तुतियाँ देखेंगे, उनका स्रोतों का  गायन सुनेंगे , तो पाएँगे कि अत्यन्त निष्कपट, सरल शिशु का हृदय पुकार रहा है।श्री कृष्ण भक्त 'मीरा'  का जीवन भी  प्रार्थना का स्रोत था ।वे पद- कविताओं के माध्यम से अपने अंतस् की पुकार भगवान् के पास निरंतर भेजती थीं ।'श्री भक्त प्रह्लाद' की भक्ति अविरल प्रवाहित रहती थी इसी भक्ति के वश में होकर भगवान् भी हर पल उनके साथ रहते थे।'ध्रुव' ने प्रार्थना की शक्ति से ही भगवान् के साक्षात् दर्शन किए ।अनेक ऐसे भक्त हुए हैं जिन्होंने अपने हृदय की पुकार से भगवान् की अनुभूति का एहसास किया।
      
       "ध्रुव ने जब घोर तपस्या की वन में आ दरश दिखाया है 
       प्रहलाद ने जप कर नारायण तुम्हें नृसिंह रूप में पाया है "

प्रार्थना के लिए हमारे शास्त्रों में अनेक श्लोक, मंत्र, स्तुतियाँ व पाठ हैं ।हिन्दी, अवधी व अन्य भाषाओं में भी विभिन्न देवी - देवताओं से प्रार्थना हेतु चालीसा, आरती व गीत हैं ।अन्य धर्मों की भी अलग-अलग प्रार्थना पद्धतियाँ प्रचलन में हैं ।

     ●●●प्रार्थना एक आध्यात्मिक कवच●●●

                      प्रार्थनामय जीवन अर्थात पूर्ण भगवत्मय जीवन ।जब भी मनुष्य किसी संकट में होता है, परेशानी में होता है तो प्रार्थना स्वतः ही उसके अंतर्मन से निकलती है।निश्चित रूप से प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है, जो किसी भी मुश्किल परिस्थिति से हमें बाहर निकालती है। जब हम सच्चे मन से अपने इष्ट या किसी अलौकिक शक्ति को पुकारते हैं तो हमें अपने विश्वास के अनुरूप ही सहायता भी मिलती है।  

सच्चे मन की पुकार से हम संकटों से मुक्ति भी पाते हैं साथ ही दिव्य सत्ता के साथ भी जुड़ जाते हैं ।प्रार्थना करते समय मन सात्विक विचारों से भरा रहता है।


प्रार्थना द्वारा हम आध्यात्मिक रक्षा कवच धारण कर लेते हैं और हमारे अन्दर आध्यात्मिक शक्तियों का प्रवाह फूट पड़ता है।

भगवान् भाव के भूखे हैं इसलिए प्रार्थना तभी चमत्कारी होती है जब हमारा अंतर्मन सच्चाई के साथ भगवान् को पुकारता है।
प्रार्थना प्रभु को याद करने के साथ- साथ उनके प्रति कृतज्ञता का अर्पण भी है: इसलिए प्रार्थना में समर्पित होकर यह कहें कि 'हे प्रभु ! जिसमें हमारा भला हो , वही हमें देना।

"भगवान् तुम्हारी भक्ति से जीवन में सब सुख पाया है "

          ●●● प्रार्थना ऊर्जा का विज्ञान ●●●

इस जगत में ऊर्जा का एक विज्ञान काम करता है, जो प्रार्थना से सम्बंधित है।संसार में प्रत्येक व्यक्ति से कुछ विशेष प्रकार की तरंगें उत्सर्जित होती रहती हैं , इनमें विशेष प्रकार की ऊर्जा होती है।रोगी व निराश व्यक्तियों में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।सकारात्मक सोचने वाले व्यक्तियों में सदा सकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

       आज विज्ञान भी प्रार्थना के प्रभाव को मानने लगा है।इस विषय पर शोध कार्य भी हो रहे हैं ।  प्रार्थना के साथ दो तथ्य जुड़े हुए हैं- पहला सकारात्मक ऊर्जा ( पाजिटिव एनर्जी) तथा दूसरा हमारा विश्वास ।प्रार्थना की शक्ति सकारात्मक ऊर्जा को प्रेषित करती है व अपनी ओर आकर्षित करती है; क्योंकि प्रार्थना में इतनी शक्ति होती है, जो नकारात्मक संवेगों को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा को प्रेषित करती है।इससे  आत्मिक शक्ति में वृद्धि होती है ।

प्रार्थना हमारे अंतर्मन को जाग्रत करती है, हमें ऐसा अनुभव होने लगता है कि हम परमात्मा से प्रत्यक्ष बातें कर रहे हैं और वहीं से आशा, उत्साह व सफलता प्राप्त कर रहे हैं ।

प्रार्थना के लिए हम मंत्र, स्रोत, स्तुतियाँ, भजन ,आरती इनमें से अपनी रुचि के अनुसार किसी का भी चयन कर सकते हैं , बस हम सच्चे मन से किसी भी माध्यम से प्रभु को पुकारें, जिससे हमारी भावनाएँ सुगमता से ऊर्जा के विभिन्न स्तरों को पार करके हमारे इष्ट तक पहुँच सकें ।
      "तेरे नाम का जाप करूँ भगवन 
      प्रभु ध्यान में मेरे बस जाओ "

           ●●●प्रार्थना एक दिव्य औषधि●●●
         
  प्रार्थना एक तरह का मानसिक और आध्यात्मिक व्यायाम है जिससे मनोबल सुदृढ़ होता है और आत्मश्रद्धा विकसित होती है। अनुसंधानकर्ता चिकित्सा विशेषज्ञों ने पाया है कि दिव्य चेतना में श्रद्धा रखने वाले रोगी अन्यों की अपेक्षा शीघ्र स्वास्थ्य लाभ पाते हैं ।बड़ी से बड़ी बीमारी प्रार्थना से नष्ट हो जाती है।कभी-कभी बड़े- बड़े चिकित्सक फ़ेल हो जाते हैं पर प्रार्थना का अस्त्र अपना काम करता ही है।

प्रार्थना से हमारा संपर्क, हमारा संस्पर्श, हमारा सान्निध्य उस परम ऊर्जा से होता है तब वह ऊर्जा हमारे अस्तित्व को घेर लेती है और रोग मुक्त होने में हमारी सहायता करती है।

प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री डाॅक्टर लैरी डाॅसी ने अपनी पुस्तक 'हीलिंग वड्रस, दि पाॅवर ऑफ प्रेयर एंड दि प्रैक्टिस ऑफ मेडीसिन'  में प्रार्थना से सम्बंधित 130 दृष्टान्तों के बारे में बताया है जिनमें प्रार्थना प्रभावी हुई।

प्रार्थना से यह विश्वास मजबूत होता है कि कोई है जो अनंत, अमर और सर्वव्यापी है।भक्त इसी विश्वास के साथ अपने हृदयरूपी मंदिर में प्रार्थना का सहारा लेकर प्रभु को बिराजमान होने के लिए आमंत्रित करता है।
      किसी कवि ने सुन्दर लिखा है-

     हर देश में तू, हर वेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एक ही है

Monday, December 2, 2019

"मस्तिष्क" मन का एक सुन्दर उपकरण जिसमें छिपा है एक अद्भुत संसार

                             "मानवीय मस्तिष्क"
नियंता ने मनुष्य की रचना बहुत सूझ-बूझ से की है,  मनुष्य चाहे तो अपने अन्दर की सुषुप्त शक्तियों का जागरण करके अद्भुत शक्तियों का स्वामी बन सकता है।वस्तुतः हम आज जो कुछ भी हैं, वह मन मस्तिष्क की ही देन है।

अनुसंधानकर्ता, शरीरशास्त्रियों एवं तंत्रिकातंत्र विशेषज्ञों की मस्तिष्क सम्बन्धी वैज्ञानिक जानकारियाँ सीमित हैं ; जब कि भारतीय ऋषियों की शोधें इनसे कहीं अधिक विकसित हैं ।व्यक्तित्व के सर्वांगपूर्ण विकास में सहायक जिन तत्वों की व्याख्या शास्त्रों में की गई है, शरीर विज्ञानी उन्हें तंत्रिका तंत्र के अन्तर्गत मानते हैं। जिनके निर्देशानुसार काया की समस्त गतिविधियों का नियंत्रण एवं संचालन होता है।अध्यात्म वेत्ताओं ने इसका केंद्र ब्रह्मरंध्र को माना है।


महर्षि दधीचि ने हृदय और मस्तिष्क के सम्मिश्रित स्वरूप को कपाल की संज्ञा दी है।उनके अनुसार, इन्द्रियों की चेतन तरंगों का उद्गम केंद्र मस्तिष्क के मध्य स्थित 'ब्रह्मरंध्र' है।ध्यानबिंदु उपनिषद् में कहा गया है कि  कपाल के मध्य में आकाशरंध्र से आता हुआ नाद , मोर के नाद के समान सुनाई देता है।जैसे आकाश में सूर्य विद्यमान है, उसी प्रकार यहाँ आत्मा बिराजमान है और ब्रह्मरंध्र के मध्य में शक्ति स्थित है।वहाँ मन को लय करके आत्मा को देखे।वहाँ रत्नों के प्रभा वाले नादबिंदु महेश्वर का निवास है।जो यह रहस्य जानता है, वह कैवल्य को प्राप्त होता है।

मस्तिष्क  में एक अद्भुत संसार छिपा है, जिसे यंत्रों से नहीं, ध्यान- साधना से ही देखा जा सकता है।मस्तिष्क की क्षमता को जाने बिना न तो हम शरीर की यथार्थता जान सकते हैं और न स्वयं की।
मस्तिष्क की सीमाओं का कोई ओर-छोर नहीं है ।यह दृश्य जगत की गुत्थियों को सुलझाता है और अदृश्य  जगत की मनोरम कल्पनाओं में भी रंग भरता है।

ऋषियों ने अपने शरीर एवं चेतना पर अनुसंधान करके समस्त विश्व को यह बताया था कि मनुष्य अपार विभूतियों का स्वामी है और सही पात्रता होने पर ही वे विभूतियाँ प्रकट होती हैं ।

आधुनिक विश्व के अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार मस्तिष्क की अद्भुत विशेषता के कारण ही सम्भव हुए हैं ।मानव मस्तिष्क की संरचना में 100 अरब स्नायु तंत्र भाग लेते हैं ।मेमोरी अथवा स्मरण शक्ति का केंद्र मस्तिष्क है, परंतु इसे अनंत गुना बढाने की क्षमता भी इसी   मस्तिष्क में ही है। हम अपने मस्तिष्क का उपयोग जितना अधिक करते हैं, उसकी क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है।

                    स्वामी विवेकानंद के अंदर ऐसी प्रतिभा थी कि वे एक बार कोई पुस्तक पढ़ते ही उसके विषय में सब जान जाते थे।आदि शंकराचार्य को भी एकश्रुतिधर के नाम से पुकारा जाता था : क्योंकि वे एक बार में सौ व्यक्तियों के प्रश्नों को सुनकर उनका एक- एक कर उत्तर देने में सक्षम थे।कभी-कभी हम जिन तथ्यों को चमत्कार समझते हैं , वे मानवीय मस्तिष्क में छिपी हुई कोई विशिष्टता भी हो सकती है।

मानवीय मस्तिष्क एक जादुई पिटारा है।इसमें अनगिनत रहस्य समाए हुए हैं ।विज्ञान तो केवल 7 से 13 प्रतिशत की जानकारी प्राप्त कर सका है।अब इसकी गुप्त एवं सुप्त शक्तियों के विकास की तकनीकें खोजी जा रही हैं ।न्यूयॉर्क के 'अलबर्ट काॅलेज ऑफ मेडिसिन'  के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डाॅ०  बर्गीस का कहना है कि मस्तिष्क की क्षमता में अभिवृद्धि , मस्तिष्क के सदा मानसिक कार्यों में एवं रचनात्मक विचारों में संलग्न रहने से होती है।
 
अमेरिका के प्रसिद्ध शोध- संस्थान " सेंटर फाॅर माइंड" के  डाॅo एलन स्नाइडर ने मानवीय मस्तिष्क के अनुसंधान क्षेत्र में कई प्रयोग किए; उनके प्रयोगों के निष्कर्ष के अनुसार--हमारे मस्तिष्क में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनके बारे में वर्तमान विज्ञान पूरी तरह से नहीं जानता।डाॅo स्नाइडर का कहना है कि मानवीय मस्तिष्क के अन्दर अपार संभावनाओं का भंडार है।

           आधुनिक शोधों के अनुसार--- मस्तिष्क में स्थित प्रोटीन स्नायुतंत्रों की कनेक्टिविटी को बढ़ाते हैं ।परिणामस्वरूप हमारी स्मरण-शक्ति  बढ़ जाती है।GAP -43 (ग्रोथ एसोसिएटेड प्रोटीन) ऐसा ही प्रोटीन है, जो स्मरण- शक्ति में वृद्धि करता है। वर्तमान समय में मस्तिष्क की प्रणाली को समझने के लिए अनेक अनुसंधान किए जा रहे हैं ।

हमारे मस्तिष्क में अनगिनत संख्या में दृश्य, स्मृतियाँ, आवाजें, चित्र तथा घटनाओं का पूरा विवरण संग्रहीत होता है।जैसे ही इनमें से कोई भी हमें प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होता है तो मस्तिष्क में अचानक उसके प्रति प्रतिक्रिया होने लगती है।ब्रेन मैपिंग भी पुरानी स्मृतियों से उत्पन्न क्रिया पर ही आधारित है।

         ऐसा  माना जाता है कि मस्तिष्क के अंदर वे सब बातें भी दबी रहती हैं, जिनका सम्बन्ध व्यक्ति के विगत जन्म से होता है।मानस-पटल पर जीवन की घटनाएँ गहराई से अंकित हो जाती हैं ।मनोविज्ञान वेत्ता कहते हैं कि मनुष्य जब शांत एकांत में भी पड़ा रहे, तब भी उसका मस्तिष्क सक्रिय रहता है।स्थूल मस्तिष्क के अतिरिक्त उसकी अन्य कई परतें भी हैं , जिन्हें मनोविज्ञान की भाषा में चेतन, अचेतन, अवचेतन और सुपर चेतन के नाम से जाना जाता है।

     मस्तिष्क को सदैव क्रियाशील रखना ही उसकी सामर्थ्य को बढाने का रहस्य है।वैज्ञानिक, इंजीनियर, कंप्यूटर विशेषज्ञ, लेखक, चिंतक , अन्वेषण कर्ता आदि सभी अपने मस्तिष्क का अधिकतम उपयोग करते हैं और इसी कारण वे अपने से संबंधित क्षेत्रों को एक नई दिशा प्रदान करते हैं ।

आधुनिक अनुसंधान इस तथ्य को स्वीकारते हैं " कि मस्तिष्क मन का एक सुन्दर उपकरण है"। मन इसे परिचालित व संचालित करता है।स्वस्थ तन और स्वच्छ मस्तिष्क अंतरिक्ष से दिव्य विचारों को आकर्षित करते हैं ।नई- नई योजनाएँ इसी अवस्था में अवतरित होती हैं । अतः हमें अपने मस्तिष्क की क्रियाशीलता की वृद्धि करने के लिए अपने मस्तिष्क को नए- नए सकारात्मक कार्यों में संलग्न रखना चाहिए ।

"सचमुच मस्तिष्क मन का एक सुन्दर उपकरण है, जिसमें छिपा है एक अद्भुत संसार "।

सादर अभिवादन के साथ धन्यवाद ।