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Saturday, November 23, 2019

मन क्या है ? -- "मन है विचारों का एक रोमांचक एवं आश्चर्यजनक यंत्र" महर्षि अरविंद मन के विकास की यात्रा के पाँच भाग

                       ●●● मन क्या है? ●●●
मन के बारे में हमारे अंतर्मन में अनेक प्रश्न बिजली के समान कौंधते रहते हैं ।लेकिन समुचित उत्तर नहीं मिलने के कारण ये प्रश्न हमारे लिए एक पहेली बन जाते हैं ।इनका समाधान उनसे मिलता है, जिनकी दृष्टि स्वच्छ, सूक्ष्म एवं पारदर्शी होती है, जिन्हें हम "ऋषि"  कहते हैं ।

ऋषि की अंतर्दृष्टि कहती है कि- मन है विचारों का एक बेहद ही रोमांचक एवं आश्चर्यजनक यंत्र ।इस यंत्र का ईंधन है- विचारों का अर्जन।मन में कुछ ऐसी चमत्कारिक सामर्थ्य है जो शरीर की सामर्थ्य से कई गुना ज्यादा है ।

● महर्षि पतंजलि के अनुसार मन का निरूपण---  
सामान्य मन तमस् से आच्छादित होता है ।जिसका प्रमुख लक्षण है- जड़ता, निष्क्रियता ।तमोगुण मन की मूढ़ अवस्था को कहते हैं।
जब मन में रजोगुण का संचार होता है तो उसे क्षिप्तावस्था कहते हैं ।जिसका लक्षण है - क्रियाशीलता ।रजोगुण में विचारों की क्रियाशीलता अपने चरम पर होती है।जब सतोगुण की वृद्धि होती है तो यह मन की विक्षिप्त अवस्था होती है।

 ● महान ऋषि अरविन्द के अनुसार मन का निरूपण---
सामान्य मन में विचार नकारात्मक एवं सकारात्मक, दो छोरों के बीच झूलते हैं, या कहें तो नकारात्मक विचारों के प्रभाव अधिक दीखते हैं ।विचारों की प्रकृति को देखकर मन की स्थिति एवं स्तर का पता चलता है ।सामान्य मन में विचार अस्पष्ट एवं अत्यन्त क्रियाशील होते हैं ।श्री अरविन्द का यह भी कहना है कि सतोगुण में आते ही मन में बहने वाले विचारों की अवस्था में परिवर्तन आने लगता है।

महर्षि अरविन्द ने मन की विकास यात्रा को पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया है।
●1---  ऊर्ध्व मानस   (Higher Mind)
महर्षि अरविन्द सामान्य मन के आगे ऊर्ध्व मानस की चर्चा करते हैं, यहाँ विचारों का प्रवाह ऐसा होता है जैसे पूर्णिमा की चाँदनी में चमकती हुई गंगा की धारा।यहाँ विषय की  सही एवं समुचित ढंग से समझ विकसित होती है।यहाँ संकल्प उठते हैं और प्रतिफलित भी होते हैं ।यहाँ आनन्द अधिक टिकाऊ एवं प्रेम अधिक व्यापक होता है।मानस की यह झलक दार्शनिकों एवं चिंतकों में दिखाई देती है।परंतु मन अभी भी बोझिल होता है जो ऊपर से आने वाले पारदर्शी प्रकाश को अपने में समा लेता है।

● 2  उद्भासित मानस  ( Illumined Mind )
महर्षि अरविन्द के अनुसार जैसे- जैसे मन शान्त एवं स्थिर होने लगता है, वह ऊर्ध्व मन से उद्भासित मानस की ओर बढ़ने लगता है।ऊर्ध्व मन में विचार प्रकाशित होते हैं जब कि उद्भासित मन में विचार शान्त हो जाते हैं और दृष्टि विकसित होती चली जाती है।
दृष्टि विकसित होने के कारण घटने वाली घटनाओं के कारणों को स्पष्ट देखा जा सकता है, साथ ही मन के सभी विचार दीपमाला के समान ज्वलंत हो उठते हैं ।उद्भासित मन की नवीन चेतना में सृजनात्मक शक्तियाँ स्वतः ही प्रस्फुटित हो जाती हैं ।यहाँ प्रकाश का रंग सुनहला होता है जो नदी की धारा के समान निरंतर बहने लगता है।

श्री अरविन्द कहते हैं कि उद्भासित अवस्था में बोध और अनुभव बड़ी तेजी से होने लगता है।लेखन व रचनात्मक कला विकसित हो जाती है।श्री अरविन्द ने अपनी कृति "फ्यूचर पोयट्री"  में उद्भासित मानस से सम्बंधित कविताओं के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं-
इसमें वर्डस्वर्थ, मिल्टन ,शेक्सपियर, शैली, श्री रविन्द्रनाथ टैगोर , महादेवी वर्मा की कविताएँ दिखाई देती हैं ।उद्भासित मन का सार है -आनन्द ।

● 3---   अंतर्बोधी मानस  (Intuitive Mind )
महर्षि अरविन्द के अनुसार उद्भासित मानस के पार अंतर्बोधी मानस है यह  सत्य का साक्षात्कार, स्पर्श एवं अनुभव कराता है।इन अनुभवों से साधक ज्ञान की खोज बाहर नहीं , स्वयं में ही करता है ।मन की इस अवस्था में ऋषियों ने उपनिषदों का दर्शन किया था लेकिन यहाँ भी  बौद्धिक ज्ञान के सहारे परमात्मा के अनुभव को पाने का प्रयास निष्फल सिद्ध होता है, क्योंकि यहाँ सत्य तो है परन्तु सम्पूर्ण रूप में नहीं ।

● 4---  अधिमानस  (Over Mind )
श्री अरविन्द के अनुसार अंतर्बोधी मानस के उच्चतम शिखर पर अधिमानस झलकता है, जो कि किसी मनुष्य के लिए अति दुर्लभ है।इस अवस्था में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा श्री मद्भगवद्गीता का प्रवाह निःसृत हुआ था। यहाँ कला का विशेष महत्व है ।ऋषियों ने इसी अवस्था में मंत्रों को ऋचाओं के रूप में छन्दबद्ध किया था।लेकिन यहाँ भी संपूर्णता नहीं ।


● 5--- अतिमानस  (Super Mind)
महर्षि अरविन्द के अनुसार अधिमानस के ऊपर अतिमानस का साम्राज्य है। जहाँ सब कुछ एक है, प्रकृति और परमेश्वर में कोई भेद नहीं है। यहीं आकर पता चलता है कि मानसिक चेतना अविभाजित एवं अखंड है।सृष्टि केवल परमात्म तत्व से विनिर्मित है।यहाँ आकर मानसिक चेतना अतिमानसिक चेतना में रूपांतरित हो सकती है ।मनुष्य जीवन की सभी समस्याओं का समाधान इसमें सन्निहित है।

मन की शक्ति प्रचंड है।वह एकाग्र होने पर ही जीवंत- जाग्रत रहती है।यदि ध्यान द्वारा उसे एक केंद्र पर इकट्ठा कर लिया जाए तो उसका प्रभाव, परिणाम चमत्कारी होता है।
सचमुच मन बड़ा अद्भुत यंत्र है।
        "प्रभु नाम की मीठी- मीठी धुन
        इस मधुर प्रीति के राग को सुन 
        मन की वीणा के तारों में
        अंतर्मन की झंकार को सुन"



मन के बारे में यह जानकारी पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।


Friday, November 22, 2019

"जीवन दायनी नदियों का संरक्षण आवश्यक"

 

          "हम नदियों के पावन जल की महिमा नहीं घटाएँ 
           जीवन दायनी नदियों को हम निर्मल पुनः बनाएँ"
प्रकृति  की सभी कड़ियाँ एक श्रंखला की तरह आपस में जुड़ी हुई हैं, एक की भी अवमानना करना इस श्रंखला को तोड़ना है।नदी भी इस श्रंखला की अहम् कड़ी है।नदियों के बिना हमारा जीवन अधूरा है ।नदियाँ हमारी संस्कृति व सभ्यता की मूलाधार हैं। हमारी प्राचीन सभ्यता उत्तर में  सिंधु ,सतलज और सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई तो दक्षिण में यह कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के किनारे विकसित हुई।

हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रकृति के सभी घटकों का आदर करना सिखाया।ऋषि- मुनियों ने नदियों, पहाडों, तालाबों, झीलों व पेड़- पौधों को दैवीय शक्तियों का रूप दिया, इसीलिए तालाबों, कुओं आदि जलस्रोतों की पूजा की जाने लगी और नदियों को माता कहा गया।हिमालय से निकलने वाली गंगा के पवित्र जल का स्पर्श करके भारत ही नहीं, दुनिया के लोग अपने आप को धन्य मानते हैं। विदेशी नागरिक बताते हैं कि गंगा किनारे बैठकर उनका ध्यान सहज लग जाता है, इस प्रकार के अनुभव गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्ति की देन हैं ।

नदियों ने हजारों वर्षों से हमारा पालन- पोषण किया है।लेकिन आज हमने इन्हें इतना प्रदूषित कर दिया है कि ये नदियाँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं ।यदि नदियों के जल को स्वच्छ नहीं किया गया तो यह प्रदूषित जल मनुष्य व अन्य जीव-जन्तुओं के लिए तरह-तरह के संकट पैदा कर सकता है।

हम सोचते हैं कि पानी के कारण पेड़ हैं जब कि सच्चाई यह है कि पेडों के कारण पानी है।भारत की नदियों में पाए जाने वाले जल का चार प्रतिशत जल ही ग्लेशियरों से आता है।शेष सभी नदियाँ वनों पर आधारित हैं ।इसलिए नदियों का अस्तित्व बचाने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा।

नदियों के आसपास की मिट्टी नम होनी चाहिए, यह तभी संभव है जब वहाँ पेड़- पौधे हों, क्योंकि पेड़- पौधे आकाश से और आसपास से जल खींचकर धरती को हरा-भरा रखते हैं ।
    
पिछले बीस वर्षों में जल में रहने वाली मछलियाँ व अन्य जीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो गईं हैं।जल में रहने वाली डाॅलफिन अब मुश्किल से दिखाई देती है।घडियालों की प्रजातियाँ खतरे में हैं।
इन सभी के अस्तित्व के लिए नदियों का शुद्ध जल  से परिपूर्ण  होकर बारह महीने लगातार बहना आवश्यक है।

भू जल बढ़ाना, प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को बेअसर कर, स्वयं को निर्मल रखना, मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाना नदियों के ही कार्य हैं, अतः फैक्ट्रियों से निकलने वाले दूषित जल को नदियों में जाने से रोकना होगा, नदियों में गन्दे नाले का प्रवाह भी रोकना होगा।
इसके बाद नदियों की तलों 


की सफाई करनी पड़ेगी ।बरसात के मौसम में गंदगी, रेत आदि भी नदी के प्रवाह में अवरोध बनते हैं और जल को प्रदूषित करते हैं ।
      यदि नदियों को समृद्ध बनाना है तो हमें इन्हें प्रदूषित करने वाले सभी कारणों की रोकथाम करनी होगी ।नदियाँ कभी स्वयं के लिए नहीं बहतीं।
               "नदिया न पिए कभी अपना जल 
                वृक्ष न खाए कभी अपना फल"
यदि हम नदियों का माँ के रूप में अनुभव करेंगे तो उनकी जलधारा हमें समृद्धि, संपन्नता और पवित्रता स्वतः ही देती चली जाएँगीं।
          "कहीं न कोई तट नदियों का रहे वृक्ष से खाली
          "भारत की नदियों के तट पर सजी रहे हरियाली"
सादर अभिवादन व धन्यवाद ।
          

Thursday, November 21, 2019

"जीवन के अस्तित्व के लिए पर्यावरण संतुलन की उपयोगिता"


                ●●●पर्यावरण क्या है ?●●●
 पर्यावरण 'परि' तथा 'आ' उपसर्ग में 'वरण' शब्द को जोड़कर बना है- जिसका अर्थ है, चारों ओर से वरण अर्थात आवरण।
      
पर्यावरण तथा प्राणी एक दूसरे पर आश्रित हैं।भारतीय संस्कृति पर्यावरण के संरक्षण एवं विकास के प्रति पूर्णतः जागरूक रही है। भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं को ऋतुस्वरूप, वृक्ष स्वरूप, नदीस्वरूप एवं पर्वतस्वरूप कहकर प्रकृति के इन सभी घटकों का महत्व दर्शाया है।क्योंकि ये तत्व मानव जीवन के आधार हैं ।श्रीकृष्ण की गोवर्धन पूजा की शुरुआत का लौकिक पक्ष यही है कि जनसामान्य  मिट्टी, पर्वत, वृक्ष, वनस्पति सभी का आदर सीखें।

ऋग्वेद के अनुसार- प्रकृति का अतिक्रमण तो देवों के लिए भी निषिद्ध है।अथर्ववेद के अनुसार- जिस प्रकार हृदय की धड़कन पर प्राणी का जीवन निर्भर है, उसी प्रकार अंतरिक्ष की सुरक्षा में ही पृथ्वी और पर्यावरण की सुरक्षा है।'ऋग्वेद' के ऋषि प्रदूषण रहित वायु को औषधि के समान दीर्घ जीवन प्रदायक तथा अमृत स्वरूप मानते हैं ।

वैदिक ऋषि प्रार्थना करता है--पृथ्वी, जल, औषधि एवं वनस्पतियाँ
हमारे लिए शान्त हों।ये शान्त तभी हो सकते हैं जब हम इनका सभी स्तरों पर संरक्षण करें ।
पर्यावरण संरक्षण क्या है-- हम अपने चारों ओर के आवरण को सुरक्षा प्रदान करें, उसके घेरे को अभेद्य बनाएँ तथा उसको अनुकूल बनाए रखें। जैवमंडल(बायोस्फियर)प्राणीजगत के जीवन के लिए अति उपयोगी है।सम्पूर्ण प्राणीजगत 'जलमंडल' से जल 'स्थलमंडल' से भोजन एवं निवास तथा 'वायुमंडल' से प्राणवायु ग्रहण करता है। ये तीनों मंडल एक दूसरे के पूरक हैं।
     
पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें वन- जंगलों को बचाना है, नदियों को प्रदूषित होने से बचाना है।हिमालय की रक्षा करनी है। क्योंकि   हिमालय अनेक रत्नों का जन्मदाता है।उसकी पर्वतश्रंखलाओं में जीवनदायनी औषधियाँ उत्पन्न होती हैं । प्लास्टिक का उपयोग भी कम करना है।प्लास्टिक का प्रयोग भी पर्यावरण के लिए अति हानिकारक है।

'पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षों का सर्वाधिक महत्व है।पृथ्वी सूक्त के अनुसार वन तथा वृक्ष वर्षा लाते हैं, मिट्टी को बहने से बचाते हैं, बाढ़ तथा सूखे को रोकते हैं तथा दूषित गैसों को खींचते हैं।यही कारण है कि पुरातन काल में वृक्षों का देवता के समान पूजन किया जाता था।

पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण निराकरण के लिए सर्वोपरि आवश्यकता है- 'एक अखंडित अनुशासन'। प्रकृति के सारे घटक अनुशासित एवं नियमबद्ध तरीके से परिचालित हैं।पर्यावरण के संरक्षण एवं पोषण से ही मानव जीवन  सुखी, शांत एवं समृद्ध हो सकता है।
                   पर्यावरण असंतुलन के कारण मौसम की असामान्यता मानव जीवन के लिए भीषण खतरा एवं चुनौती बन रही है।  पर्यावरण असंतुलन का एक प्रमुख कारण है जनसंख्या वृद्धि। क्योंकि जनसंख्या बढ़ी तो पेड़ कटे, पेड़ कटे तो भूमि की उर्वरता घटी, संसाधन घटे। उनके घटने से जो एक समस्या बढ़ी, वह पर्यावरण में घुलता जहर है।यहाँ तक कि पर्यावरण की शुद्धि में सहायक सुदूर आकाश में उड़ने वाले गिद्धों की अनेक प्रजातियाँ समाप्त हो गईं ।पर्यावरण की सुरक्षा व भावी पीढ़ी के सुख के लिए हर वर्ग व हर धर्म को छोटे परिवार का महत्व समझना होगा।
     
पर्यावरण की रक्षा के लिए नदियों को बचाना भी जरूरी है, क्योंकि जीव- जन्तुओं की ऐसी अनेक प्रजातियाँ होती हैं जिनके लिए नदियों का प्रदूषण मुक्त होना जरूरी है।भूमिगत जलस्तर के लिए भी पर्याप्त वन क्षेत्र आवश्यक है।जंगल न होने से ही वर्षा का जल धरती में न समाकर धरती के ऊपर बहने लगता है।जिसके परिणाम बाढ़ और सूखे के रूप में हमारे सामने आते हैं ।
         
इलेक्ट्रॉनिक क्रान्ति ने हमारी जिंदगी को सुविधापूर्ण जीने का लालच  दिया है लेकिन हमारा पर्यावरण प्रदूषित कर दिया।
प्रकृति, पर्यावरण एवं हम मनुष्य सभी एक दूसरे के परिपूरक हैं।अतः कर्तव्यनिष्ठ संतान के रूम में पर्यावरण की रक्षा के लिए धरती को पोषण, संरक्षण एवं सुरक्षा प्रदान करना हमारा परम कर्तव्य है।
  
पेड़ लगाकर, हरीतिमा संबर्धन करके हम पर्यावरण असंतुलन से उत्पन्न प्रदूषण का स्तर कम कर सकते हैं।पर्यावरण संतुलन में ही मानव जीवन की खुशहाली है।
           "पेड़ लगाकर पर्यावरण बचाएँ
            जीवन को खुशहाल बनाएँ" 
पर्यावरण के बारे में यह जानकारी पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।


धरती के तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग), जलवायु परिवर्तन

                               ग्लोबल वार्मिंग
आज विश्व में ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर समस्या बन चुकी है।जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने की लाख कोशिशों के बावजूद हमारी पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है।
   
वायु में विभिन्न गैसें एक निश्चित मात्रा में होती हैं।इनकी मात्रा में जरा सा भी अन्तर आने पर यह असंतुलित हो जाती हैं ।वर्तमान समय में पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों का घनत्व बढ़ने के कारण पृथ्वी का तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ने लगा है।कार्बनडाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व ओजोन जैसी गैसों का गुण ही यह है कि वे हमारे वातावरण को खतरनाक बना देती हैं ।इन्हें ही ग्रीनहाउस गैसें कहते हैं ।

पर्यावरण असंतुलन के कारण ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं, परिणाम स्वरूप समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है।हम काफी समय से खेती- बारी व शहरों को बसाने के लिए वन्यक्षेत्रों को नष्ट करते रहे हैं ।इस गतिविधि ने भी जमीन के गरमी सोखने के व्यवहार को बदला है।इन्हें हम 'एंथ्रोपोजेनिक' यानी मानवीय गतिविधियों का नतीजा कहते हैं ।
         
  विगत अठारह वर्षों में जैविक ईंधन के जलने के कारण कार्बनडाइऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है और पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है।वनों के नष्ट होने से कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है ।

कार्बनडाइऑक्साइड की जितनी मात्रा आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी।हम मनुष्यों ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का इतना अधिक शोषण कर लिया है, जिसके कारण प्राकृतिक असंतुलन हुआ और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या उत्पन्न हो गई है।आंकड़ों के आईने में देखें तो जब से मानव सभ्यता का विकास क्रम आरंभ हुआ है, तब से अब तक पेडों की संख्या में लगभग 46% तक की कमी आई है।

जैसे ही धरती पर इन्सानों ने जीवाश्म ईंधन, तेल और प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरु किया, हवा में कार्बनडाइऑक्साइड की सघनता बढ़ती गई ।इस गैस ने वातावरण के ऊपर एक कंबल का काम किया, जिससे धरती की गर्मी बाहर नहीं निकल रही और धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है।

वातावरण में होने वाले तापमान में बदलाव का अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि सन् 1950 के दशक तक तो तापमान में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, लेकिन उसके बाद से यह बढ़ता गया है और इस वृद्धि का प्रमुख कारण ग्रीनहाउस गैसें ही रही हैं ।अध्ययन में यह भी पाया गया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में तापमान में वृद्धि की दर एक जैसी नहीं है और कारण भी एक जैसे नहीं  हैं ।

 वैज्ञानिकों के अनुसार यदि तापमान दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ गया तो सन्  2030 तक आर्कटिक महासागर की बरफ की चादर पिघल जाएगी तथा पृथ्वी पर ऊर्जा का भार अनियंत्रित हो जाएगा।संयुक्त राष्ट्र पैनल की रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि हिमालय के हिमनद अत्यधिक पिघल रहे हैं और संभवतः सन् 2035 तक उनका निशान तक नहीं रहेगा।

डेनमार्क के कोपेनहेगन में 192 देशों के प्रतिनिधियों ने पर्यावरण पर चर्चाओं के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि ग्लोबल वार्मिंग वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण हुई है फिर पर्यावरण  की रक्षा के लिए यह समाधान निकाला कि हर देश ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करे, लेकिन बड़े देश जो कि सर्वाधिक प्रदूषण फैला रहे हैं, वे झुके नहीं, वे अपने विकास की दर को प्रभावित करना नहीं चाहते।
 
हमारे देश में पश्चिमी हिमालय के बढ़ते तापमान से बरफ पिघलेगी,  जिससे नदियों में जल प्रवाह अत्यधिक बढ़ेगा ।मैदानी इलाकों में बढ़ता तापमान से अत्यधिक गर्मी बढ़ेगी और कृषिकार्यों
पर भी संकट बढ़ेगा ।

अतः आज समस्त विश्व को जलवायु परिवर्तन, विशेषकर धरती पर बढ़ते हुए तापमान को नियंत्रित व संतुलित करने हेतु सबसे पहले हरियाली बढानी होगी और ग्रीनहाउस गैसों उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार कारकों पर अंकुश लगाना होगा।

हालाँकि दुनिया के कई देशों और उनके नेतृत्व द्वारा ग्लोबलवार्मिंग से निपटने के लिए अनेकानेक प्रयास किए जा रहे हैं ।धरती में तापमान में वृद्धि का सबसे अधिक दुष्प्रभाव दक्षिण एशिया के देशों पर पड़ सकता है।
"आओ सब मिलकर पेड़- पौधे लगाकर धरतीमाता का श्रृंगार करें"
धरती को गर्म होने से बचाएँ ।

वर्तमान युग की समस्या ' ग्लोबल वार्मिंग' पर यह लेख पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।




Wednesday, November 20, 2019

सूर्य जगत की आत्मा (सूर्य का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व)

              ●●● 'सूर्य' जगत की आत्मा ●●●
                        "भोर हुई, चाँद तारे छिपे
                        संसार में तेज प्रकाश हुआ
                         हे सूर्यदेव! तुमको प्रणाम"
 सूर्य इस जगत की आत्मा है, जगत का केंद्र है।सूर्य समस्त जगत का आदिकारण है।इसलिए उसे आदित्य कहते हैं।सबको उत्पन्न करता है।इसलिए सविता कहते हैं ।
         
          ●●● सूर्य का वैज्ञानिक महत्व ●●●

वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार 4.5 अरब वर्ष पहले सूर्य व ग्रहों का निर्माण हुआ। 3.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर प्राथमिक सूक्ष्म जीवाणुओं की उत्पत्ति हुई ।प्रकाश के रूप में सूर्य से आने वाली प्राणशक्ति द्वारा ही पृथ्वी पर जीवन का आविर्भाव हुआ।
    
स्थूल विज्ञान की दृष्टि से सूर्य  'स्पाइरल' नामक आकाश गंगा के परिवार के लगभग डेढ़ खरब तारों में से एक छोटा सा तारा है।सूर्य परिवार में नौ ग्रह, ग्रहों के अनेक उपग्रह हैं।इसके अतिरिक्त हजारों छोटे ग्रह तथा ग्रहिकाएँ धूमकेतु, पुच्छल तारे इस सौर परिवार में सम्मिलित हैं।यह सब सूर्य की प्रबल आकर्षण शक्ति में जकड़े हुए निरन्तर उसकी परिक्रमा करते रहते हैं।
    
अपने इस सारे परिवार को लेकर सूर्य 'स्पाइरल' आकाश गंगा की परिक्रमा करता है।एक परिक्रमा में सूर्य को पच्चीस करोड़ वर्ष लगते हैं।ज्योतिषियों का अनुमान है कि जब से सूर्य पैदा हुआ है, तब से अब तक वह ऐसी सोलह परिक्रमाएँ कर चुका है।
         
        ●●●सूर्य का आध्यात्मिक महत्व ●●●

सूर्य की गर्मी और रोशनी सबको दीखती है, यह उसकी स्थूल शक्ति है।एक और सूक्ष्म सत्ता उसके अन्तर में मौजूद है वह है--जीवन शक्ति ।सूर्य की आत्मा को ही 'महाप्राण' कहा गया है।हर व्यक्ति के अन्दर उसकी जीवात्मा में सूर्य के समान प्रकाश मौजूद है।जो साधक आत्मदर्शन कर पाते हैं, वे उस प्रकाश तक पहुँचते हैं और तब उनका व्यक्तित्व आलोकित हो उठता है।
      '
सूर्य नमस्कार' एक प्रभावी यौगिक क्रिया है।सूर्य नमस्कार स्वयं में सूर्य आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी।इससे अनेक प्रकार के रोगों का निराकरण भी होता है।
वैज्ञानिक अब तक सूर्य प्रकाश की स्थूल गतिविधि को ही जान सके हैं। हमारा मानसिक सम्बन्ध भी सूर्य से है, जिसे मंत्र साधना के द्वारा अनुभव किया जा सकता है।गायत्री महाविज्ञान वस्तुतः सूर्य का ही विवेचन है।
      "गायत्री के देव तुम्हीं हो
       ध्यान के हो विज्ञान 
       हे सूर्यदेव ! तुमको प्रणाम" 

सूर्य सर्वव्यापी और सर्वान्तर्यामी तत्व है।अब चाहे उसे आत्मा या प्राणपुञ्ज कह लें या हाइड्रोजन का जलता हुआ गोला ।आत्मा का स्वरूप भी प्रकाशयुक्त माना गया है, ध्यान प्रयोजन में आत्मा को सदा ज्योति मानकर ही चला जाता है।परम योगियों को 'आत्मसाक्षात्कार' सदा ज्योति पुँञ्ज के रूप में ही होता है।ध्यान में सबसे ऊँची स्थिति में तो ब्रह्म ज्योति ही एक मात्र अवलम्बन रह जाती है ।यही आध्यात्मिक यज्ञाग्नि है , इसी को आदित्य, दिव्य आभा कहते हैं ।
   
निरंतर ध्यान करते - करते यह दिव्य आभा जिसे जितनी मात्रा में मिलती चली जाती है, वह परब्रह्म परमात्मा के साथ एकाकार होता चला जाता है।संसार के समस्त जड़- चेतन में यही ज्योति प्रकाशमान है, इसी से देवशक्तियाँ और पंचतत्व अपना कार्य कर सकने में समर्थ होती हैं ।ग्रह- नक्षत्रों में यही प्रकाश जगमगा रहा है।

प्रकाश सूर्य से ही मिलता है, गर्मी सूर्य से ही मिलती है, वर्षा सूर्य कराता है।भूमि और पानी को अलग- अलग तरह की गर्मी भी वही देता है।लकड़ी, पत्थर का कोयला, जलप्रपात और पैट्रोल आदि सभी तत्व सूर्य ही देता है।यह सब वह अपनी बाहरी क्रिया और गर्मी से करता है।उसके तल का तापमान 11000 फारेनहाइट है।
पृथ्वी पर किसी वस्तु को 11000फारेनहाइट की गर्मी में सेकेन्ड तक ही रखा जा सकता है।वनस्पति का 95% भाग सूर्य से ही विकसित होता है।

हमें शायद इस बात का अन्दाजा नहीं है, कि हम एक ग्रह होने के नाते अपने सौरमण्डल के कितने श्रेष्ठ स्थान पर हैं ।हमारी सूर्य से दूरी भी एकदम ऐसी है, जैसे किसी ने स्केल से खींचकर तय की हो।सूर्य निरंतर हमें अनुशासन, संतुलन व निरंतरता की सीख देता है।वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य इन दिनदिनों बदलाव के दौर से गुजर रहा है ।दुनिया भर के वैज्ञानिक इसका अध्ययन करने में जुटे हैं ।इस जगत में सूर्य भगवान् ही हमें साक्षात दर्शन देते हैं ।
    " सुबह सबेरे सूर्य रूप में प्रभु आते हैं
     जग में प्रकाश फैलाते हैं।"

हे सूर्यदेव !आप ही इस जगत को धारण करते हैं।आपसे ही यह लोक प्रकाशित होता है।आप ही इस जगत की आत्मा हैं ।
       "हे जग के नयन,    मेरे जीवन धन
       करूँ तुमको नमन,करूँ तुमको नमन"
आप सभी पढ़ने वालों को सादर धन्यवाद।


 

Tuesday, November 19, 2019

प्रकृति का अर्थ (प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं)


              ●●●●●प्रकृति का अर्थ●●●●●
अंग्रेजी भाषा में प्रायः प्रकृति का अनुवाद नेचर या क्रिएशन के रूप में किया जाता है।जब कि ये दोनों शब्द प्रकृति का ठीक-ठीक परिचय देने व इसे परिभाषित करने में असमर्थ हैं ।
सृजन होने से पहले किसी की शाश्वत उपस्थिति रही, वही प्रकृति है।जब कुछ भी विनिर्मित नहीं था, तब जो भी था---प्रि-क्रिएशन।
इसलिए अंग्रेजी भाषा में प्रि- क्रिएशन (कृति से पहले) शब्द प्रकृति को परिभाषित करने में समर्थ है।
प्रकृति शब्द अद्भुत है- भारत, भारतीय संस्कृति व भारतीय मनीषा ने इसे गढ़ा है।ऐसा अनूठा शब्द दुनिया की किसी दूसरी भाषा में नहीं है।
प्रकृति व शक्ति दोनों ही हमारे जीवन का मूल आधार हैं, उनके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं।हमारा शरीर प्रकृति के तत्वों से मिलकर बना है और यह संचालित भी होता है, प्रकृति की शक्ति से।भारतीय मनीषियों को इस सत्य का अहसास हो गया था कि इस परिवर्तनशील भौतिक जगत के पीछे एक शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्ता है।जिसे उन्होंने ब्रह्मांडीय अंतश्चेतना या परम आत्मा कहा।प्रकृति को जगज्जननी व परमेश्वर को परमपिता कहा गया है।
सूरज , चाँद , सितारे, पर्वत, नदियाँ, पृथ्वी आदि सब प्रकृति का ही तो स्वरूप हैं।भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि इस सृष्टि में हर वस्तु तीन गुणों से युक्त है।
इस सृष्टि की संपूर्ण रोचकता, रोमांचकता व रहस्यमयता तात्विक रूप से प्रकृति के तीन गुणों से ही निर्मित की गई है।
प्रकृति ही इन तीनों गुणों (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण )के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए सृष्टि के चक्र को माँ की तरह चलाती है।भारतीय दर्शन ने सदा से ही मनुष्य, प्रकृति एवं परमेश्वर को एक समग्र दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया है ।
प्रकृति वह है, जिसमें से सब निकलता है और जिसमें सब विलीन हो जाता है।सभी रूप व आकारों के उद्गम व विसर्जन का स्थान है।प्रकृति के सभी नियम शाश्वत एवं चिरस्थायी हैं, जैसे कि-- हमारे सौरमण्डल के सभी ग्रहों में सदा से ही एक नियमबद्धता है।सभी ग्रह एक नियमित तरीके से सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, लेकिन इस संसार में मनुष्य द्वारा निर्मित कुछ भी स्थाई नहीं है।
   हमारी संपूर्ण प्रकृति ही इस संसार की अनमोल धरोहर है, क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध हवा, शुद्ध जल सभी कुछ तो हमें प्रकृति से प्राप्त होता है।यदि हम गहराई से विचार करें तो हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्णता से अपनी प्रकृति पर ही निर्भर हैं अर्थात सब कुछ हमें प्रकृति से ही प्राप्त होता है। अतः आज पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए प्रकृति में संतुलन अति आवश्यक है ।
           वर्तमान समय में प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया है।उद्योगों के अवशिष्ट से हवा, पानी व जमीन सभी प्रदूषित होते चले जा रहे हैं।पेड़ों की कटाई से वर्षा चक्र बाधित हो रहा है।धरती की अधिक खुदाई से भूकंप जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं।ऐसे में स्वस्थ जीवन की कल्पना करना मुश्किल है।
      बढ़ता तापमान अर्थात ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी पर खतरा मँडरा रहा है।पर्यावरण से हम जीवन का अमृत रस तो ले रहे हैं लेकिन बदले में उसमें विष घोल रहे हैं।
  आज सम्पूर्ण विश्व को यह समझना होगा कि प्रकृति में इसी तरह असंतुलन बढता रहा तो मानव- जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
    वर्तमान युग में सभी तरह के प्रदूषणों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि प्रकृति के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं अर्थात प्रकृति से ही जीवन है।प्रकृति की अनदेखी के कारण ही सभी तरह के प्रदूषणों की मार झेलनी पड़ रही है।
    गोवर्धन पूजा के माध्यम से भगवान् ने प्रकृति का महत्व दर्शाया है।अतः अपनी प्रकृति का सौन्दर्य बनाए रखने के लिए हम सभी पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूक बनें ।
धरती माता का पेडों से श्रृंगार करें और नदियों के जल को स्वच्छ रखें ।
प्रकृति ही जगज्जननी है।



Wednesday, November 13, 2019

"जल है तो कल है' शुद्ध जल के संरक्षण में पेड़-पौधे कितने आवश्यक


                      ●●● जल है तो कल है ●●●
प्रकृति ही जल का मूल स्रोत है, अतः शुद्ध जल के संरक्षण के लिए व जल प्रदूषण दूर करने के लिए प्रकृति का संतुलन अति आवश्यक है।पेड़ ऐसी प्राकृतिक संपदा है, जिसका यदि विनाश होता है, तो मनुष्य जीवन की सुखद संभावनाओं की आशा नहीं की जा सकती।
  सामान्यतः हम सोचते हैं कि पानी के कारण पेड़ हैं जब कि सच्चाई यह है कि पेडों के कारण पानी है।यदि जंगल नहीं होंगे तो कुछ समय बाद नदियाँ भी नहीं बचेंगी।
   पानी को व्यर्थ न बहाना - यह अति आवश्यक है, साथ ही पानी के स्थाई समाधान के लिए समग्र पर्यावरण की रक्षा अनिवार्य है।
     वर्षा ऋतु के बादल त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपना अस्तित्व मिटाकर हमें जल प्रदान करते हैं- अतः हमारा भी कर्तव्य है कि जीवन में जल की उपयोगिता को समझते हुए जल संरक्षण करें ।
शहरीकरण के साथ शहर में पेडों की वृद्धि हो और हरे-भरे वन- उपवन बनाए जाएँ ।देश भर में नदियों के किनारे भवन-निर्माण कार्य रोककर वृक्ष लगाए जाएँ ।आज की वास्तविकता यह है कि हमारे देश की 70% नदियाँ प्रदूषित हैं।हम सब की प्राथमिकता होनी चाहिए कि जीवन-दायनी नदियों को प्रदूषित होने से बचाएँ ।
   शुद्ध जल के स्थाई समाधान के लिए वन व जंगलों का विस्तार होना आवश्यक है।
    पर्यावरण संतुलन के लिए जनसँख्या को नियंत्रित करने की कोशिश भी अनिवार्य है क्योंकि जनसँख्या वृद्धि से हमारी जरूरतें बढ़ती हैं और हमारे वन - जंगल कम होते चले जाते हैं ।अधिक भवन- निर्माण के कारण भू जल- स्तर कम हो रहा है।
  भूमिगत जल- स्तर के संतुलन के लिए 33% वन- जंगल ( कच्ची भूमि) होना जरूरी है।
   भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर वर्षा होती है जो अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है परंतु हम इस बरसात के जल का महज 15% ही संचित कर पाते हैं ।शेष जल नदियों से होते हुए समुद्र में जाकर मिल जाता है।धरती पर पानी सदा एक निश्चित मात्रा में रहता ही है बस संतुलन बिगड़ गया है।
   भारत समेत 14 देशों के पीने के पानी पर किए गए विश्लेषण में यह पाया गया कि 83 % पानी में माइक्रोप्लास्टिक शामिल है।अतः शुद्ध जल बचाने के लिए प्लास्टिक का उत्पादन व उपयोग कम करना पड़ेगा ।
       हमने भौतिक विकास पर ध्यान दिया लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कदम नहीं उठाए।अब धीरे-धीरे लोगों में जल - संरक्षण हेतु जागरूकता बढ़ रही है।सरकारें भी इस ओर ध्यान दे रही हैं ।
      आने वाली पीढ़ियों को जल- संकट का सामना न करना पड़े- इसके लिए जल संरक्षण हेतु पेड़- पौधो का महत्व समझना ही पड़ेगा ।
      " हम प्रकृति के बनें पुजारी "