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Saturday, November 30, 2019

"समाधि" समस्त योग साधनाओं का सार,समस्त योग साधनाओं की पराकाष्ठा

                 'समाधि' समस्त योग साधनाओं का सार 
समाधि क्या है ? क्या यह सबके लिए सुलभ है ?  अक्सर ही साधकों के मन में इस तरह के विचार आते रहते हैं ।

'समाधि' वह अवस्था है, जिसमें साधक को जीव,जगत तथा ब्रह्म के बीच पूर्ण एकत्व की अनुभूति होती है।योग की सभी परम्पराओं का ध्येय, आत्मचेतना के भीतर ईश्वरत्व की अनुभूति को प्राप्त करना है।योग सूत्र में राजयोग के आठ अंग हैं---यम , नियम , आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। नियमित योग साधनाओं के द्वारा चित्त का क्रमिक रूप से विकास होता है।इन साधनाओं की पूर्णता समाधि है।
                वैज्ञानिक की अवस्था को 'धारणा', कलाकार की अवस्था को 'ध्यान' एवं योगी की अवस्था को 'समाधि' कहते हैं ।
जब हम शरीर के बाहर-भीतर ,किसी वस्तु, विषय, विचार पर चित्त को केन्द्रित करने का प्रयोग करते हैं तो वह 'धारणा' होती है।धारणा की गहराई में ही 'ध्यान' घटित होता है और फिर ध्यान की गहराई में 'समाधि' घटित होती है।वृत्ति का एक दिशा में चलना ही ध्यान है।ध्यान--मन को विचारों से भरना नहीं, विचारों से रिक्त करना है ।

ध्यान किया नहीं जाता, वरन् स्वयमेव होता है।अंतर्बोध से प्रकट होने वाले ज्ञान की कोई विधि या प्रणाली नहीं होती।ध्यान अंतस् की आकुल पुकार है।ध्यान यात्रा है -- चेतना से परम चेतना की।  महर्षि पतंजलि के योग सूत्र में---
      "तदेवार्थ मात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।"
अर्थात जब (ध्यान में ) केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है।चित्त का निजस्वरूप शून्य सा हो जाता है, तब वही ध्यान समाधि बन जाता है।

चित्त की परम आनन्दमयी, चैतन्यमयी, व सत्यमयी अवस्था का नाम ही समाधि है।इसे ही परमानंद, ब्रह्मानंद, मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, आत्मसाक्षात्कार, ईशदर्शन आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है।वर्षों की ध्यान साधना के  फलस्वरूप साधक को स्वतः ही एक अलौकिक, पारलौकिक आनंद की अनुभूति होने लगती है।

साधक मन के भी पार , बहुत पार चला जाता है।बुद्ध भगवान् समाधि के विषय में कहते हैं, कि समाधि सम्यक(संतुलित, सधी हुई) होनी चाहिए- जिसमें होश हो , जाग्रति हो ,बोध हो।
सम्यक समाधि हो या असम्यक समाधि हो, उस अवस्था में स्वप्न जन्म नहीं लेते व विचार की तरंगें भी शान्त हो जाती हैं ।इस अवस्था में साधक सभी प्रकार के क्लेशों से सदा- सदा के लिए मुक्त होकर सदैव आनंदित व प्रफुल्लित रहने लगता है।

प्रभु का ध्याता साधक, प्रभु रूपी समुद्र में स्वयं को विसर्जित कर देता है और मुक्त हो जाता है।इस अवस्था को 'कैवल्य अवस्था' 'निर्विकल्प समाधि' अथवा 'सबीज समाधि' भी कहते हैं ।घटाकाश ही महाकाश है --यह सिर्फ एक विचार नहीं है वरन्  ऋषि अपनी  चेतना की पराकाष्ठा में जाकर इसका अनुभव करता है।

                       ध्यान साधना के बल पर ही बुद्ध पुरुषों ने अध्यात्म के शिखर को छुआ है, अनेक जीवात्माओं ने परमात्मा का साक्षात्कार किया है। स्रहसार चक्र ही चेतना का निवास स्थान है, जहाँ योगीजन ध्यान लगाकर 'समाधिजन्य आनन्द' को प्राप्त करते हैं ।प्राचीन योगशास्त्रों में सम्पूर्ण प्रकाशित मन की अवस्था का  जो वर्णन किया है, उसके अनुसार जब साधक की  चेतना स्रहसार में गतिमान होती है तब वह साधक आनन्द का असीम सागर बन जाता है।यही जीवन चेतना का शिखर है।

जीव की ब्राह्मी स्थिति के विषय में कबीर कहते हैं--
    "आत्म अनुभव जब भयो, तब नहीं हर्ष विषाद"
     
पूर्ण एकाग्रता जिसे शून्यावस्था, योगनिद्रा या समाधि कहते हैं वह बहुत ऊँची स्थिति है।मन एक ही बिन्दु पर केन्द्रित रहे, ऐसा हो सकने को ही 'तुरीयावस्था' कहते हैं ।इससे भी ऊँची स्थिति है - स्वयं में स्थित होना ।जो स्वयं में स्थित है , वही तत्वदर्शी है।समाधि की अनुभूति में साधक को ब्रह्माण्ड के कण- कण में, सूर्य में, चन्द्र में, तारों में, सिंधु में, निर्झर बहती सरिताओं में अपने आराध्य के होने का एहसास होने लगता है।

ध्यान की अनंत गहराई में उतर कर ही समाधि की प्राप्ति होती है ।श्री रामकृष्ण देव हमेशा चलते- फिरते, नाचते-गाते समाधि में चले जाते थे। चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करते- करते ध्यान समाधि में डूब जाते थे।संत कबीर जब  निर्विकल्प समाधि लगाते  तो लम्बे समय तक उसी अवस्था में पड़े रहते और फिर स्वतः ही ध्यान की भूमिका से नीचे आते।ऐसे ही अनेक अन्य महापुरुषों के उदाहरण भी हैं ।

आध्यात्म अनुभूति का विषय है ।एक बार समाधि के अलौकिक आनन्द की अनुभूति हो जाने के बाद स्वामी विवेकानन्द प्रायः ध्यान की गहराई में उतरकर समाधि सुख प्राप्त करने लगे।स्वामी विवेकानन्द को शयन के समय आँखें मूँदते ही आज्ञा चक्र में निरंतर परिवर्तनशील रंगों का एक ज्योतिपुंज दिखाई देता था।

ध्यान योग के कल्पवृक्ष की छाया में सच्चे मन से बैठने वाला व्यक्ति आत्म- साक्षात्कार कर सकता है।नर- नारायण के समकक्ष बन सकता है। इस स्थिति को विरले ही प्राप्त कर पाते हैं ।जिन्हें हम इस जीवन में आध्यात्मिक जीवन के परमोच्च शिखर पर देखते हैं, उनके पीछे विगत के कई जन्मों का इतिहास जुड़ा होता है।

        संसार में रहकर सांसारिक जीवन- यापन करते हुए भी     योगसाधक  के भाव, विचार व वृत्तियाँ ब्राह्मी चेतना के साथ एकाकार होकर साधक को समाधि की अनुभूति करा सकती हैं ।
          "मैं सुबह शाम नित ध्यान करूँ 
           प्रभु ध्यान में मेरे बस जाओ "

सादर अभिवादन के साथ धन्यवाद ।




Friday, November 29, 2019

"प्लास्टिक हमारे पर्यावरण व स्वास्थ्य को किस प्रकार नष्ट कर रहा है" आइए , जानने की कोशिश करें ।

●प्लास्टिक हमारे पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक●
पहला प्लास्टिक बैग सन् 1957 में लोगों के सामने आया ।उसके कुछ वर्षों बाद उपभोक्ता वाद शुरु होने के कारण पाॅलीथिन की थैलियाँ कागज की थैलियों से भी सस्ती हो गईं और इनके कारण दूध, जूस जैसे तरल पदार्थों का व्यापार करना भी सरल हो गया।
तब से आज तक हमने खुले दिल से एक नई जीवनशैली का दौर समझकर इन्हें  अपनाया।

आजकल हमारे उपयोग की हर छोटी - बड़ी  वस्तु प्लास्टिक की पैकिंग में ही आती है।आज बाल्टियाँ, कुर्सी, मेज, डिब्बे, पानी , व ड्रिन्क की बोतलें, दूध-दही , तेल- घी की पैकिंग, दवाइयों की पैकिंग सब प्लास्टिक से ही निर्मित है।प्लास्टिक हमारे पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। यह जानते हुए भी यह हमारे जीवन का अहम् हिस्सा बना हुआ है।

            सामान्य रूप से प्लास्टिक बैग्स को फाॅसिल फ्यूल्स से बनाया जाता है, जिसकी उत्पादन प्रक्रिया में बाॅयोप्रोडक्ट्स जैसे हैवी मैटल्स, पाॅलीसाइकल एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन्स, वोलेटाइल आर्गेनिक कंपाउन्ड्स, सल्फर ऑक्साइड और डस्ट के साथ गहन औद्योगिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।ज्यादातर प्लास्टिक बायोडिग्रेडेबल ( विघटित) नहीं होते और सैकड़ों वर्ष तक बने रहते हैं ।प्लास्टिक को फोटोडिग्रेडेशन प्रक्रिया द्वारा या सूर्य के प्रकाश के जरिए नष्ट होने होने में पाँच सौ साल लग जाते हैं ।

     प्लास्टिक से बनी बोतलें या डिब्बों में रखे खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ; क्योंकि गर्मी धूप आदि कारणों से रासायनिक क्रियाएँ प्लास्टिक के विषैले प्रभाव उत्पन्न करती हैं।जो कैंसर आदि भयंकर बीमारियों पैदा कर सकती हैं ।प्लास्टिक में अस्थिर प्रकृति का जैविक कार्बनिक एस्सटर ( अम्ल और अल्कोहल से बना घोल)  होता है, जो कैंसर पैदा करने में सक्षम है।सामान्य तौर पर प्लास्टिक को रंग प्रदान करने के लिए उसमें कैडमियम और जस्ता जैसी विषैली धातुओं के अंश मिलाए जाते हैं ।इसलिए प्लास्टिक की रंगीन वस्तुओं में रखे हुए खाद्य या पेय पदार्थ को ग्रहण करने से अनेक रोग उत्पन्न हो सकते हैं ।

  वैज्ञानिकों का कहना है कि प्लास्टिक बोतलों में पाए जाने वाले खास तत्व, जैसे- थैलेट्स हमारी सेहत पर बुरा असर डालते हैं ।इनकी वजह से हार्मोनों का रिसाव करने वाली ग्रन्थियों की कार्यप्रणाली बिगड़ जाती है।घटिया किस्म की पॉलीथिन का प्रयोग करने से साँस व त्वचा सम्बन्धी रोग हो सकते हैं ।

ऐसा अनुमान है कि हर साल बीस लाख से ज्यादा पशु- पक्षी और मछलियाँ पॉलीथिन थैलियों के कारण अपनी जान गँवाते हैं ।पाॅलीथिन नष्ट नहीं होती , इसीलिए यह धरती की उपजाऊ क्षमता को नष्ट करके इसे जहरीला बना रही है और मिट्टी में दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम कर रही है, जिससे भूजल स्तर कम हो रहा है।

नदियों के जल प्रवाह में भी प्लास्टिक की थैलियाँ तैरती मिल जाती हैं भारत ही नहीं, विश्व भर में अनेक पहाड़ों पर स्थित सभी  पर्यटनस्थलों पर प्लास्टिक व पाॅलीथिन एक समस्या बनी हुई है।
प्लास्टिक से बनी पतंगों व ताँत के धागों का प्रचलन भी हानिकारक है।इनके कारण सड़कों पर अनेक दुर्घटनाएँ हो जाती हैं ।

      हाल ही में हुए शोध के अनुसार सुरक्षित प्लास्टिक यानी बीपीए ( बिस्फेनोल)  फ्री प्लास्टिक भी तीन पीढ़ियों के स्वास्थ्य  लिए खतरनाक है।अध्ययन के अनुसार बीपीए फ्री प्लास्टिक से प्रजनन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं ।

      हालाँकि हमारी सरकार ने 50 माइक्रोन से पतली प्लास्टिक पन्नी पर बैन लगा दिया है।लेकिन अनुकूल परिणाम न आने का मुख्य कारण है -- इसके अच्छे विकल्प का अभाव। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बायोप्लास्टिक ( जैव प्लास्टिक) को विकसित करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

पिछले सौ वर्षों में हम लगभग 83 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन कर चुके हैं ।इसमें से लगभग 63 अरब टन प्लास्टिक बेकार हो चुका है। आज हम सब प्लास्टिक से होने वाले नुकसानों से भलीभांति परिचित हैं ।

आइए, हम सब प्लास्टिक का उपयोग कम करके  अपने स्वास्थ्य व पर्यावरण की सुरक्षा करें ।

यह उपयोगी जानकारी पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।



Thursday, November 28, 2019

श्री मद्भगवद्गीता- साक्षात भगवान् के द्वारा गाया गया गीत (महान योग शास्त्र, सुन्दर उपनिषद् , ब्रह्म विद्या)

               ।। ओउम् श्री परमात्मने नमः ।।
               "ये ब्रह्म शास्त्र खोले प्रभु के द्वार 
                     भगवद्गीता को नमस्कार"
● श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा----- 
श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा अगाध और असीम है।भगवद्गीता का उपदेश महान अलौकिक है।यह परम पावन ग्रन्थ एक ऐसा रहस्यमय ग्रन्थ है, जिसमें वेदों का सार है। गीता में  धर्म का उपदेश समाहित है, जीवन जीने की कला का ज्ञान है एवं मनुष्य के स्वधर्म का ज्ञान है ।गीता की वाणी दिव्य है।इसे कहते समय भगवान् स्वयं अपने परमात्मस्वरूप में स्थित थे।

इसका विशेष नाम श्रीमद्भगवद्गीता है ;क्योंकि यह भगवान् के द्वारा गाया गया गीत है।यह सूपनिषद् ( सुन्दर उपनिषद्) है।उपनिषद् वह है, जिसमें शिष्य गुरू के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करता है।गीता में शिष्य अर्जुन जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण के पास बैठकर
ज्ञान प्राप्त करता है , जो कि सर्वोत्कृष्ट पल हैं ।

● श्रीमद्भगवद्गीता  महान योग शास्त्र----  श्री मद्भगवद्गीता को महान योगशास्त्र कहा गया है । आत्मा के परमात्मा से मिलन का नाम योग है।गीता देह की नश्वरता और आत्मा की अमरता- शाश्वतता का संदेश देती है । इसमें योगशास्त्र की परिभाषा,साधना की विधियाँ, तत्व विवेचना आदि सभी निहित हैं। इसमें कर्म योग, भक्ति योग एवं ज्ञान योग का अद्भुत संगम है।

कर्मयोग का तात्पर्य है-- 'शुभ व निष्काम कर्म करना' , भक्तियोग है---'भगवच्चेतना को धारण करना'  और ज्ञानयोग है-- 'भगवद्तत्व को जानना' । 

श्रीमद्भगवद्गीता ब्रह्म विद्या है।ब्रह्म अर्थात जो जीवन का आधार व सार है, और इसी कारण ब्रह्म विद्या वेदांत का आधार है, वेदों का सार है।गीता में भी यह निहित है।
           "पावन पुनीत है शान्ति गीत
           मनभावनी है भक्तों की प्रीति "

मार्गशीष शुक्ल एकादशी थी।मध्यान्ह के समय सूर्य देव सम्पूर्ण तेज के साथ विद्यमान हो रहे थे।अर्जुन के प्रश्न प्रकट हुए, जिज्ञासाएँ जगीं।तब अर्जुन की  जिज्ञासाओं के समाधान के लिए श्री भगवान् ने  "श्रीमद्भगवद्गीता" के अठारह सोपानों में ,अर्जुन को निमित्त बनाकर,  सम्पूर्ण मानव जाति को जीवन का तत्वदर्शन दिया।
           सारथी बनकर पार्थ को ज्ञान गीता का दिया ।
           विश्व का दर्शन दिखाकर धन्य अर्जुन को किया ।।

श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों में कुल सात सौ (700) श्लोक हैं ।700 श्लोकों तक एक ही धारा व चिंतन को बनाए रखने की अद्भुत विशेषता के कारण हर श्लोक एक महामंत्र है।
गीता के श्लोकों में दिव्य ऊर्जाओं के स्रोत समाए हैं ; क्योंकि भगवान् ने अपने दिव्य रूप में, चेतना के उच्चतम शिखर पर स्थिर होकर इसे गाया है।

●श्रीमद्भगवद्गीता में मुख्यतः चार पात्र हैं-----

श्रीमद्भगवद्गीता श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के रूप में कही गई है।इनके बीच में जो संवाद हो रहे हैं, जो जिज्ञासा व समाधान हो रहे हैं---उन संवादों को संजय, धृतराष्ट्र को सुनाते हैं ।

धृतराष्ट्र, संजय और अर्जुन--- ये मनुष्यता के तीन तल हैं ।मनुष्यता के ये तीनों तल हमारे चारों ओर भी हैं ।कहीं हमें मोहग्रस्त धृतराष्ट्र खड़े मिलेंगे, तो कहीं साधना , तपस्या, ऋषि की कृपा में लीन संजय मिलेंगे, लेकिन अर्जुन कहीं- कहीं ही मिलेंगे। अर्जुन वे हैं, जिनकी चेतना भगवान् की ओर उन्मुख है, वे भगवान् श्रीकृष्ण को सब कुछ समर्पित करने का साहस रखते हैं ।श्री कृष्ण, भगवान् रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं ।

महाभारत में अनेक पात्र हैं लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता को सुनने का निमित्त केवल अर्जुन ही बन सके ; क्योंकि शिष्य बनने के लिए विवेक और भावना दोनों चाहिए । अर्जुन प्रतिभाशाली हैं, शास्त्रज्ञानी हैं,  शस्त्रज्ञानी हैं ,महानधनुर्धर हैं, निरंतर सीखते रहते हैं, झुकना जानते हैं   उनमें सत्य को पाने की अभीप्सा है।वे कहते हैं---शिष्यस्तेऽहं ! भगवन् मैं आपका शिष्य हूँ ।इसी के साथ आरंभ होता है --- श्रीमद्भगवद्गीता का  दिव्य ज्ञान व दिव्य गान।

श्रीमद्भगवद्गीता आरंभ में ही याद दिलाती है--
       धर्मक्षेत्रे  कुरुक्षेत्रे   समवेता   युयुत्सवाः।
        मामकाः  पाणडवाश्चैव  किमकुर्वत संजय ।।

यह संसार भी एक तरह का धर्मक्षेत्र व कुरुक्षेत्र है, जिसमें हर व्यक्ति हर पल- हर क्षण युद्ध कर रहा है, स्वयं से व अन्य लोगों से।

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को हम जितना गहराई से आत्मसात् करेंगे, उतना ही हमारे व्यक्तित्व में परिमार्जन, परिवर्तन, रूपान्तरण हो जाएगा।

भगवान् आश्वासन देते हैं, जहाँ धर्म होगा, वहाँ मैं उपस्थिति रहूँगा। भगवान् अनन्त हैं, उनका सब कुछ अनन्त है, फिर उनके मुखारविंद से निकली हुई गीता के भावों का अन्त आ ही कैसे सकता है।
               "भगवद्गीता को नमस्कार 
                भगवद्गीता को नमस्कार "





Wednesday, November 27, 2019

"पेड़-पौधे क्यों जरूरी हैं पर्यावरण को संतुलित करने के लिए "

 ●●● पर्यावरण संतुलन के लिए पेड़-पौधे जरूरी ●●●
पेडों के अस्तित्व पर ही मनुष्य एवं अन्य प्राणियों का जीवन आधारित है।इसीलिए हमारी भारतीय संस्कृति में वृक्ष- वनस्पतियों की पूजा- आराधना की जाती रही है।"श्री मद्भगवद्गीता" में स्वयं "भगवान् श्रीकृष्ण" ने पीपल के वृक्ष को अपनी विभूतियों में शामिल किया है--"अश्वस्थः सर्ववृक्षाणां" ।भगवान् बुद्ध ने अपने जातक उपदेशों में स्वयं को 'वृक्ष देवता' कहकर इंगित किया है।

धरती पर जीवन संतुलन के लिए प्रकृति ने जीव कोशिका ( जीव- जगत) उत्पत्ति के साथ ही पादप कोशिका (पेड़- पौधे) की भी रचना की थी।प्रकृति को यह अच्छी तरह से पता था कि मनुष्य व पेड़ दोनों ही  अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर आश्रित रहेंगे।

आज जब आबादी विस्तार ले रही है, पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं, इस कारण हमारी धरती की हरियाली कम हो गई है।कहीं-कहीं तो वृक्ष -वनस्पतियों के दर्शन भी नहीं होते।आज प्राकृतिक असंतुलन के  कारण जलवायु प्रदूषित हुई है, परिणाम- स्वरूप पूरे विश्व में प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी हो रही है ।इस जलवायु-असंतुलन को पेड- पौधे ही संतुलित कर सकते हैं ।

पेड़-पौधे हमारे वातावरण को शुद्ध करने के साथ जलवायु के बीच आवश्यक संतुलन भी बैठाते हैं ।इसलिए हर स्तर पर इन्हें बचाने, उगाने व देखभाल करने की कोशिश करनी है।

पेड़-पौधों की शाखाएँ व पत्ते छाया देते हैं व हवा की रफ्तार तेज करते हैं ।इनकी पत्तियाँ हवा में मौजूद हानिकारक तत्वों को छानने में सक्षम होती हैं और वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण को नम रखने में सहायक होती हैं ।पेड़ों की जड़ें मिट्टी के स्थिरीकरण के द्वारा क्षरण को रोकती हैं ।पेड़ों की पत्तियाँ, टहनियाँ व शाखाएँ ध्वनि प्रदूषण को सोखती हैं ।इनकी जड़ें, पत्तियाँ व तने पक्षियों, जानवरों व कीटपतंगों के लिए आवास का माध्यम बनते हैं ।

नीम, पीपल, बरगद, तुलसी आदि अधिक ऑक्सीजन छोड़ते हैं ।इनके साथ और भी कई ऐसे वृक्ष हैं जिनके औषधीय गुणों का महत्व है, इनकी जड़, शाखा, पत्ते, फल ,बीज आदि विभिन्न रोगों को दूर करने में उपयोगी होते हैं ।वनस्पतियों का औषधि विज्ञान बहुत प्रसिद्ध है।महर्षि चरक व महर्षि सुश्रुत ने इस क्षेत्र में अनेक अनुसंधान किए और आयुर्वेद विज्ञान का विकास किया।महर्षि धन्वंतरि औषधियों के देवता माने जाते हैं ।

वृक्ष लगाना , उनकी सेवा करना अत्यन्त पुण्य का कार्य है ।हमारे पूर्वजों ने जो वृक्ष लगाए , आज वे ही बड़े होकर हमें फल, फूल, लकड़ियाँ प्रदान करते हैं ।यदि हमें किसी कारणवश पेड़ काटना पड़े तो उसके बदले में दस पेड़ और लगाने चाहिए ।

हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सभी कुछ प्रकृति से ही प्राप्त होता है और पेड़- पौधों से ही प्रकृति का संरक्षण व संवर्धन किया जा सकता है।वृक्ष- वनस्पतियों की सेवा से ही हमें प्रकृति माँ, धरती माता का दुलार मिलता है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार एक स्वस्थ वृक्ष जो शीतलता देता है, वह 10 वातानुकूलित संयंत्रों के 20 घंटे लगातार चलने के बराबर होता है।एक एकड़ क्षेत्र में लगे वन 6 टन कार्बन-डाइऑक्साइड 
अवशोषित करते हैं और 4  टन ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं ।पीपल जैसे वृक्षों में धुँआ तथा धूल को सोखने की असीमित शक्ति होती है।तुलसी हमें शुद्ध वायु प्रदान करती है तथा घातक कृमि,

कीटों को नष्ट करती है।

आधुनिक युग में भौतिकता का विकास तो बहुत हुआ लेकिन प्रकृति के महत्व को भुला दिया गया।इस कारण आज मानव जीवन अनेक प्रकार के प्रदूषणों का सामना कर रहा है।अनेक प्रकार की समस्याएँ व रोग उत्पन्न हो रहे हैं ।समाधान एक ही है- अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगा कर समग्र पर्यावरण को दूषित होने से बचाएँ ।

एक अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार विश्व में लगभग  तीन लाख करोड़ पेड़ हैं परंतु इनकी संख्या अब लगातार सिमटती जा रही है।विश्व में प्रतिवर्ष 70 लाख हेक्टेयर की गति से वन नष्ट हो रहे
हैं ।यदि इस गति से वन क्षेत्र कम होते रहे तो आगामी 15 वर्षों में वृक्षों की 15 प्रतिशत प्रजातियाँ लुप्त हो सकती हैं ।पेड़ों की विलुप्ति मानव जीवन के लिए घातक है।वनों की कटाई, भूमि के उपयोग में बदलाव, वन प्रबंधन और मानवीय हस्तक्षेप के कारण विश्व में लाखों पेड़ प्रतिवर्ष कम हो रहे हैं ।

हमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के सुख के लिए जीवनदायी पेड़ों को बचाना होगा।हमारी संस्कृति में वनों को देवता व पेड़ों  को पूज्य, इसके बावजूद वनों का विनाश व पेड़ों  की कटाई अत्यन्त चिंतनीय विषय है।पेड़ एक ऐसी प्राकृतिक संपदा है जिसका यदि विनाश होता है तो मनुष्य जीवन की सुखद संभावनाओं की आशा नहीं की जा सकती ।

वृक्ष हमारे लिए जीवन तत्वों का सृजन करते हैं इसलिए हमें भी वृक्षों के विकास में सहायक होना चाहिए।हमारे देश में कई तरह के वृक्षारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं ।इन अभियानों को सफल बनाने के लिए उन पेड़- पौधों की विशेष देखभाल करने की भी जरूरत है।

हमें अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगा कर अपनी वसुधा  के सौन्दर्य को पुनः स्थापित करना है।प्रकृति हमें सदा देती ही रहती है-     
    "पेड़ लगाकर धरती माँ की हरियाली लौटाएँ
          पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएँ "

सादर अभिवादन व जय श्री कृष्ण 
        





 


Tuesday, November 26, 2019

पृथ्वी एक जीवित तंत्र है ( भारतीय दर्शन की यह बात अब विज्ञान भी स्वीकारने लगा है)

पृथ्वी माँ!
            धन धान्य भरे फल फूल सजे 
             तुम शोभित हो वन उपवन से 
             चहुँ ओर सजी है हरियाली 
             तुम भरी हुई जल धारों से 
पृथ्वी को समूचे सौरमण्डल में, विश्व ब्रह्माण्ड में अनुपम स्थान प्राप्त है ।भारतीय चिंतन में आदिकाल से यही बोध है कि हमारी पृथ्वी मात्र भूमि का टुकड़ा न होकर जीती-जागती-जीवंत माँ है।इसी संवेदना से अभिभूत होकर वेदों के ऋषि यह घोषणा कर पाने में सक्षम हो पाए कि---
      " माता पृथ्वीः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।"
धरती हम सभी जीवों की धरणी है अर्थात वह हम सभी को पैदा करती है  हमें धारण करती है और हमारा पोषण भी करती है 
सोना,  चाँदी , हीरा, मोती, अन्न, जल , हवा पैट्रोल सभी तो हमें पृथ्वी से मिलता है ;क्योंकि यह धरती रत्नगर्भा है और हम सब इसकी संतानें हैं ।
              " हम सब तेरी ही सन्तानें 
                पृथ्वी माता तेरी जय हो 
               ममता की छांव हमें देती 
               पृथ्वी माता तेरी जय हो "
श्री वंकिम चन्द्र चटर्जी की सुन्दर शब्दावली से हम धरती की वंदना करते हैं-- 'वन्दे मातरम्'। सुजलाम् सुफलाम, मलयज शीतलाम् । धरती की यह कल्पना सचमुच ही बड़ी मनोहारी है ।वह जीवन दायनी, स्रोतस्विनी है, पावन है और बिना किसी भेदभाव के अपना असीमित प्रेम लुटाती है।
 
पृथ्वी निरंतर घूम रही है, लेकिन हम में से किसी को उसकी गतिशीलता का कोई एहसास नहीं है; क्योंकि अन्य सब कुछ भी तो उसी के साथ गतिशील है ।पृथ्वी की गतिशीलता का तो तब पता चला जब उसे सूर्य की स्थिरता के परिप्रेक्ष्य में अनुभव किया गया।धरती पर सभी कार्य समय पर होते हैं, निर्धारित समय पर वर्षा होती है,निर्धारित समय पर सर्दी, गर्मी की ऋतुएँ आती हैं ।

विगत दो- तीन शताब्दियों से जब से औद्योगीकरण ने अपने पैर पसारने शुरु किए तब से  धरती माँ के सीने को छीलने की विकृति भी पूरे ज़ोर से पनपने लगी।  तभी से स्वार्थ के वशीभूत तथाकथित  बुद्धिवाद ने यह दलील दावे के साथ प्रस्तुत की कि पृथ्वी एक निर्जीव भूमि का टुकड़ा है ।इसके बाद से अब तक पृथ्वी का बहुत अधिक मात्रा में दोहन हुआ है।

विगत कुछ वर्षों में हुए वैज्ञानिक प्रयोग ऐसे तथ्यों का प्रतिपादन करते नज़र आते हैं कि धरती और कुछ नहीं बल्कि एक जीवित तंत्र है जो अपने वातावरण का न केवल निर्माण करती है बल्कि उसी सक्षमता के साथ उसका संतुलन भी बनाए रखती है ।

इन्हीं दिनों अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र नासा में कार्यरत जेम्स लवस्टाॅक ने मंगल पर जीवन की संभावना का पता लगाने के लिए वहाँ के वातावरण का अध्ययन किया । जब उस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की तुलना धरती के वातावरण से की तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा ।उन्होंने पाया कि मंगल ग्रह के वायुमंडल में बहुत कम ऑक्सीजन, बहुत ज्यादा कार्बन-डाइऑक्साइड एवं न के बराबर मीथेन गैसें थीं; जबकि धरती के वायुमंडल में बहुत ज्यादा ऑक्सीजन, कम कार्बन-डाइऑक्साइड 
और संतुलित मात्रा में मीथेन गैसें उपस्थित थीं ।

डाॅ लवस्टाॅक जानते थे कि पिछले चालीस करोड़ वर्षों में सूर्य का तापमान 25 प्रतिशत बढ़ गया है, जिसके कारण हमारे सौरमण्डल के प्रत्येक ग्रह का तापमान 25 प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन मात्र पृथ्वी ही ऐसी है जो अपना तापमान उसी स्तर तक रोके हुए है, जैसा आज से चालीस करोड़ वर्ष पूर्व था।उन्होंने इसके आधार पर अनुमान लगाया कि धरती एक जीवित प्राणी की तरह सोचती है और स्वप्रबंधन के माध्यम से आवश्यकता के अनुसार अपने वातावरण और तापमान को संतुलित करती रहती है, ताकि यहाँ प्राणी मात्र का जीवन निर्बाध चलता रहे।

इस वैज्ञानिक सोच को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने प्रसिद्ध माइक्रोबायलोजिस्ट लिव मार्ग्यूलिस के साथ प्रमाण एकत्रित करने प्रारम्भ किए।उन्होंने पाया कि धरती के वातावरण में ऑक्सीजन एवं कार्बन-डाइऑक्साइड सदा एक निश्चित अनुपात में बनी रहती है; क्योंकि जितनी ऑक्सीजन हमारे शरीर के भीतर जाती है, उतनी ही कार्बन-डाइऑक्साइड बाहर आ जाती है।इसी प्रकार पहाड़ों के और ज्वालामुखी आदि के अध्ययन में पाया कि ये सब भी धरती के वातावरण में संतुलन बनाने में सहयोग करते हैं ।

धरती के वायुमंडल एवं वातावरण के संतुलन को बनाए रखने में मात्र जीवित प्राणी जैसे--मनुष्य, पौधे, बैक्टीरिया आदि ही भाग नहीं लेते, बल्कि पहाड़, चट्टानें, समुद्र एवं ज्वालामुखी भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।आज के समय में जरूरत है - विज्ञान के आध्यात्म सम्मत होने की, और आध्यात्म  के वैज्ञानिक सम्मत होने की ।वैदिक काल के ऋषियों के अनुसंधान से जो दर्शन विकसित हुआ, उसी दर्शन के आधार पर समाज की उन्नति सम्भव है।
वैदिक ऋषियों ने बड़े आत्मविश्वास के साथ अथर्ववेद
( 12/ 1/12) में यह उद्घोषणा की है---

               यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं 
               यास्त   ऊर्जस्तन्वः  संबभूवुः।
               तासु  नो  धेह्यभिः नः पवस्व 
                पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तुः।।

आज जब विज्ञान भी इसी वैदिक चिंतन का प्रतिपादन करता नज़र आता है तो हम भी प्रकृति और पृथ्वी को माता मान कर उसका आदर करें ।
       पृथ्वी माता तेरी जय हो, पृथ्वी माता तेरी जय हो ।

सादर अभिवादन के साथ धन्यवाद ।









Monday, November 25, 2019

"गायत्री मंत्र साधना द्वारा शरीर में स्थित सुषुप्त शक्ति केंद्रों का जागरण सम्भव "

            ●●● गायत्री मंत्र साधना ●●●
           
                   "जय- जय हो माँ गायत्री की 
                      जय हो वेदों की माता की" 

इस सृष्टि के आदि से अब तक जितना उच्चारण गायत्री मंत्र का हुआ है, उतना किसी का नहीं हुआ।गायत्री 'वैदिक संस्कृति' का एक छन्द है।गायत्री का अर्थ है- "प्राण रक्षक"।
गय =प्राण
त्री = त्राण ( संरक्षण करने वाली)

गायत्री मंत्र केवल पूजा-उपासना का या जप- ध्यान करने का छोटा सा 'मंत्र' मात्र नहीं है।यह मंत्र तो विश्व-ब्रह्मांड की सर्वोपरि शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।शब्द शक्ति ( मंत्र शक्ति )वस्तुतः मानवीय काया तथा 'अंतरिक्ष जगत' को प्रभावित करने वाली एक समर्थ ऊर्जा शक्ति है, यह मन एवं अंतःकरण से प्रकट होती है।

भारतीय ज्ञान- विज्ञान की उत्पत्ति वेदों से हुई ।वेद ज्ञान को कहते हैं ।वेद चार हैं' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद ।ये चारों वेद वस्तुतः गायत्री मंत्र के तीन चरण व एक शीर्ष ही हैं, जिन्होंने कालान्तर में चारों वेदों के रूप में विस्तार पाया है।इसलिए माँ गायत्री को 'वेदमाता' कहकर पुकारा गया है।

ऋषि-मुनियों ने 'गायत्री महामंत्र' के तीन चरण बताए हैं, इसलिए गायत्री को त्रिपदा भी कहा गया है।
गायत्री के प्रारंभ व अंत में "ओउम् " यह स्पष्ट करता है कि मानव- जीवन का 'अथ' व 'इति' केवल परमात्मा है।
गायत्री का  प्रथम चरण "तत्सवितुर्वरेण्यं"  की शक्ति को धारण करने वाला साधक तेजस्वी बनता है।
गायत्री महामंत्र का दूसरा चरण "भर्गोदेवस्यधीमहि" देवत्व का वरण करने की, शालीनता को अपनाने की एवं सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
इस मंत्र के तृतीय चरण "धियो यो नः प्रचोदयात् " में बुद्धि को परिमार्जित करने वाला 'गीता' का दर्शन है।

गायत्री मंत्र तत्वज्ञान एवं दर्शन का सार है, इसका प्रत्येक अक्षर जाग्रत बीजमंत्र है।गायत्री मंत्र की 'सूक्ष्म शक्ति' ऊर्जा रूप में ओंकार गुंजन के रूप में समग्र अंतरिक्ष में व्याप्त है।इसलिए इस मंत्र के उच्चारण का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है।क्योंकि समधर्मी कंपन एक दूसरे को प्रभावित करते हैं ।गायत्री मंत्र के रहस्यों का अध्ययन करने पर जीवन के अनेक रहस्य उद्घाटित होते हैं ।इस तरह प्रकाश का स्रोत, ज्ञान का स्रोत है 'गायत्री' ।

असंभव को संभव करने वाली शक्ति- साधना की परम विद्या गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में समाई है।जो अनुभवी हैं, वे इस सच्चाई को जानते हैं ।मंत्र जप का लाभ मंत्र को आत्मसात करने वाले को ही मिलता है।इसके सभी  अक्षर ऐसे सद्गुणों की ओर संकेत करते हैं , जो साधक के व्यक्तित्व के हर पक्ष का सम्यक रूप से विकास करते हैं।गायत्री मंत्र की शक्ति संपदाओं को अर्जित करने के लिए उससे जुड़े तत्वज्ञान को समझकर अपने व्यक्तित्व में आत्मसात् करना पड़ता है।

मंत्र की शक्ति उसके क्रमबद्ध रूप से बहुत समय तक जप करने से उभरती है।गायत्री मंत्र के अनुष्ठान व पुरश्चरण का यही रहस्य है।निराकार ब्रह्म के उपासक नियमित अपने घर में गायत्री मंत्र की पाँच या सात आहुतियों के साथ हवन करते हैं ।ओउम् एवं गायत्री मंत्र के जप से एक प्रकार के सुखद वातावरण का निर्माण होता है।

गायत्री का प्रत्येक अक्षर एक विशेष यौगिक ग्रन्थि को खोलता है 
एवं उसको जाग्रत करने के साथ ही निहित शक्ति को जगाता है।
विभिन्न प्रकार के शोधों के अनुसार- गायत्री मंत्र जप से मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रन्थि से बारह प्रकार के हार्मोन्स स्रावित होते हैं।वस्तुतः मंत्र जप से एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय (इलेक्ट्रो मैग्नेटिक) तरंगें उत्पन्न होती हैं ।इससे प्राणऊर्जा की क्षमता एवं शक्ति में वृद्धि होती है ।गायत्री में महामंत्र के सभी आयाम हैं ।
गायत्री मंत्र की साधना के आरंभ से ही 'तेजपुंज सूर्य'  की आध्यात्मिक चेतना का अंतःकरण में, चित्तभूमि में अवतरण होने लगता है।अनुसंधान कर्ताओं के अनुसार गायत्री मंत्र के नियमित जप से शरीर और मन के बीच एक लयात्मकता उत्पन्न होती है।

गायत्री महामंत्र छोटा सा शब्द- समुच्चय मात्र दिखाई पड़ता है किन्तु इसमें सृष्टि का समूचा ज्ञान एवं शक्तियाँ- सभी बीज रूप में सन्निहित हैं ।महर्षि विश्वामित्र बनने से पूर्व राजा विश्वरथ ने जब कठिन तप किया तो उन्होंने यह अनुभव किया कि विश्वामित्र अर्थात विश्व का मित्र बनकर ही गायत्री मंत्र तक पहुँचा जा सकता है ।
गायत्री मंत्र साधना आरंभ होते ही शरीर में स्थित चक्रों, ग्रन्थियों एवं उपत्यिकाओं को प्रभावित करने लगती है।चित्त में जन्म- जन्मांतरों से जमी संस्कारों व कर्मराशि के मैल की परतें टूटती हैं ।

गायत्री साधना अंधविश्वास नहीं, एक ठोस वैज्ञानिक कृत्य है और उसके द्वारा लाभ भी सुनिश्चित ही होता है।भविष्य में अचानक एक दैवी प्रवाह उमड़ेगा जो त्रिपदा गायत्री की महिमा को पुनः स्थापित करेगा।
गायत्री महामंत्र--भारतीय संस्कृति की परिभाषा, परिचय व पर्याय की पूर्णता है।
            "जय हो ब्रह्माण्ड प्रकाशिनी की
            जय हो वेदों की माता की 
            जय सिद्धि दायनी माता की
             जय हो वेदों की माता की" 
 सादर धन्यवाद ।

Sunday, November 24, 2019

"श्री गंगा भारत की संस्कृति और भारत की पवित्रता"

  ●●● श्री गंगा भारत की संस्कृति और पवित्रता ●●●
 
           "शिव की जटा से प्रकट हुई, तेरी निर्मल धारा
              धरती माँ को पावन कर, सारे जग को तारा 
                    जय गंगा मैया  जय गंगा मैया" 
          ● गंगा का आध्यात्मिक स्वरूप--

गंगा हमारी संस्कृति का स्रोत हैं तभी तो वे हम सबकी गंगा मैया
हैं ।भारतीय परंपराओं में श्री गंगा का सम्बन्ध देवलोक से है जो प्राणिमात्र के कल्याण हेतु स्वर्ग से धरा पर अवतरित हुई है।
स्कंध पुराण में श्री गंगा को परंब्रह्म का द्रव्य रूप कहा गया है।ब्रह्मवैवर्त पुराण में गंगा को प्रकृति का अंश एवं ब्रह्म पुराण में इनकी उत्पत्ति शिव जी द्वारा कही गई है।

आदिकाल से गंगा के पवित्र आँचल ने एक माँ  की तरह , हमारे मूल्यों, हमारी संस्कृति और चेतना को  पोषित किया है।भारतीय ऋषियों ने सभी नदियों में गंगा का दर्शन कर सर्वव्यापी रूप में गंगा की महिमा बताई है।अनेक प्रसिद्ध  शासकों ने भी गंगा का महत्व स्वीकारा है।

भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इतिहास में गंगा एक शाश्वत साक्ष्य के समान हैं ।हमारी प्राचीन आर्य सभ्यता का तो यह केंद्र स्थल हैं ।इतिहास के सभी कालों में श्री गंगा का भारतीय कलाओं से अभिन्न सम्बन्ध रहा है।श्री गंगा भारत की सांस्कृतिक, सांप्रदायिक और राष्ट्रीय एकता की प्रतीक हैं ।सभी विषमताओं और विविधताओं से पूर्ण होने के बावजूद हर भारतीय गंगा के प्रति आस्थावान, श्रद्धावान है।

माघ मास, कार्तिक मास , महाशिवरात्रि, गंगादशहरा व प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा पर गंगा के तटों पर स्नानादि के लिए पूरे विश्व के कोने-कोने से श्रृद्धालु आते हैं ।भारतीय धर्मशास्त्रों में गंगा की स्तुति, स्रोत , मंत्र आदि को स्थान- स्थान पर देखा जा सकता है।गंगा के आध्यात्मिक गुणों में पवित्रता, निर्मलता, शीतलता, प्रवाहशीलता, करुणा, कर्तव्यपरायणता,समर्पण इत्यादि प्रमुख हैं ।
         "एक बार तेरे द्वारे आकर जिसने विनय सुनाई
          दूर हुए उसके सब संकट उसने मुक्ति पाई"

गंगा पहाडों से शुभविचार व वनौषधियों का गुण लेकर नीचे आती है।कुंभ में करोड़ों लोग ऐसे ही शुभविचार लेकर आते हैं ये विचार गंगा के जल में ऊर्जा की वृद्धि करते हैं ।

   ● गंगा का भौगोलिक स्वरूप

गंगा का भौगोलिक स्वरूप गोमुख से गंगासागर तक अत्यन्त विस्तृत है।यह भारत की सबसे लम्बी नदी हैं ।इनकी कुल लम्बाई 
2525 किलोमीटर है।अपने सफर में गंगा माँ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के भरण-पोषण में मुख्य भूमिका निभाती हैं ।

   ●गंगा का भौतिक स्वरूप

भौतिक दृष्टि से श्री गंगाजल में आरोग्यवर्धक गुणों की पुष्टि की गई है ।आयुर्वेद शास्त्र में भी इनके जल को अमृत तुल्य माना है।आर्थिक महत्व की दृष्टि से भी गंगा का जल गोमुख से गंगासागर तक एक विशाल भू-भाग को सिंचित करता है।कृषि के साथ ही बिजली उत्पादन, पर्यटन, व अन्य उद्योगों के माध्यम से राष्ट्रीय आय बढ़ाने में गंगा का महत्वपूर्ण योगदान है ।

  ●पर्यटन की दृष्टि से गंगा का स्वरूप 

गंगा तट पर अनेक आध्यात्मिक पर्यटन स्थल भी हैं ।पर्यटकों के लिए गंगा का शीतल जल और लौकिक स्वरूप तो आकर्षित करने वाला है ही ,साथ ही इन तीर्थों में अलौकिक लाभ भी प्राप्त होता है।गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार, काशी, प्रयाग, गंगासागर जैसे भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों का यहाँ के तीर्थाटन और पर्यटन में सर्वाग्रणी स्थान है।
गंगा के बिना हमारा जीवन अधूरा व एकांगी है।अतः हम सबका परम कर्तव्य है कि हम  हमारी गंगा मैया की पवित्रता व शुद्धता सदा बनाए रखें ।
       " नित- नित करें  आरती वन्दन  दीपक धूप जलाएँ  
        निर्मल- निर्मल जलधाराओं को नित शीश झुकाएँ
                       जय गंगा मैया  जय गंगा मैया"

सादर धन्यवाद ।