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Tuesday, November 12, 2019

हारमोनियम(casio) का बेसिक प्रशिक्षण (बच्चों को कैसियो कैसे सिखाएँ)

"सुर के बिना अधूरा जीवन
सात सुरों की है अगणित धुन"
बच्चों के समय का सदुपयोग हो, वे व्यस्त रहें, उनका मन प्रसन्न रहे, इसके लिए संगीत से अच्छा और क्या हो सकता है।
    यदि  आपके घर में कैसियो या हारमोनियम है तो सर्वप्रथम छोटे बच्चों को अलंकार( सरगम) सिखना चाहिए।यहाँ कुछ अलंकार दिए जा रहे हैं।
1 आरोह-  सा रे ग म प ध नी सां।
  अवरोह- सां नी ध प म ग रे सा।
2 हर एक स्वर को दो दो बार जैसे 
   आरोह-  सासा,  रेरे, गग,  मम, पप,  धध, नीनी, सांसां।
   अवरोह- सांसां, नीनी, धध, पप, मम, गग, रेरे, सासा।
3 हर एक स्वर को तीन तीन बार
   आरोह- सासासा, रेरेरे, गगग, ममम, पपप,धधध, नीनीनी, सांसांसां।
   अवरोह-सांसांसां, नीनीनी, धधध, पपप, ममम, गगग,                 रेरेरे,सासासा।
4 तीन तीन स्वरों के समूह में 
   आरोह-  सरेग, रेगम, गमप, मपध, पधनी, धनीसां।
    अवरोह- सांनीध, नीधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा

कुछ दिनों तक नियमित एक घंटा इन्हीं चार अलंकारों का अभ्यास करबाते रहें ।उसके बाद ही कैसियो पर गाना सिखाएँ ।
अगले ब्लाग में आगे के अलंकारों की जानकारी रहेगी।
सा के ऊपर जहाँ बिन्दु का निशान है वह तार सप्तक का ( तेज ध्वनि का) सा है।
छोटे बच्चों को अपनी देखरेख में ही सिखाएँ ।आशा करती हूँ कि मेरे ब्लाग के माध्यम से आप अपने बच्चों को आसानी से हारमोनियम ( कैसियो) सिखा सकते हैं ।
मेरा  ब्लाग पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।
स्वरों के चढ़ते क्रम को आरोह कहते हैं और स्वरों के उतरते क्रम को अवरोह कहते हैं ।


 


Monday, November 11, 2019

"वर्तमान में जल की कमी व जल प्रदूषण के कारण"

                  ●●●जल ही जीवन है●●●
जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  भगवान् का एक नाम नारायण भी है।
नार- जल को कहते हैं और अयण - घर को अर्थात् जल भगवान् का घर है ।जल शुद्ध हो तो वहाँ नारायण वास करते हैं।लेकिन आज के समय में एक तो पर्याप्त मात्रा में जल नहीं है और दूसरा जो बचा हुआ है, उसका रूप- रंग और स्वाद तेजी से बिगड़ रहा है।
नासा के अनुसार- भारत में हर वर्ष जलस्तर 0.3मीटर की दर से लगातार गिर रहा है।नगर हो , महानगर हो या देश, जो जितना अधिक विकसित है, उतना ही प्रदूषित है।
     
 ●●●जल की कमी व जल प्रदूषण के प्रमुख कारण●●●

जनसंख्या की वृद्धि के कारण हमारी जरूरतें बढीं और हम पृथ्वी का दोहन करते चले गए।शहरीकरण के नाम पर जो विकास हुआ उसमें धरती और जल का संपर्क ही न्यून हो गया।
 
 उद्योग बढ़ते गए और उनका प्रदूषित जल व कचरा नदियों में बहाया जाने लगा जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो गया।
  पाॅलीथिन का उत्पादन जीरीलीर प्रक्रिया से जुड़ा है, जो बड़े पैमाने पर जल को प्रदूषित करने वाला कचरा उत्पन्न करता है।
वन- जंगल, खेत- खलिहान निरन्तर कम होते जा रहे हैं जिसके कारण पृथ्वी,  बरसात का जल अपने में सोख नहीं पाती ।

हिमालय की अनदेखी भी जल संकट का प्रमुख  कारण है।गोमुख ग्लेशियर प्रतिवर्ष तीन मीटर पीछे छूट रहा है।हिमालय के क्षेत्र में विस्फोट करके वहाँ चारलाइन सड़कें बना रहे हैं।सैकडों बाँध इनके माध्यम से बना रहे हैं और बदले में भयानक विप्लव का सामना कर रहे हैं ।

पेडों की कटाई के कारण धरती को रेगिस्तान बनते, भूमि की उर्वरता कम होते,वर्षा का अनुपात कम होते देर नहीं लगती। जल की कमी व जल प्रदूषण के अन्य कारण भी हैं।देश की कुल बरसात के जल का सिर्फ़ 15% जल का ही संरक्षण हो पाता है, शेष समुद्र में मिल जाता है।जल संचयन की तकनीकों पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया।

कहते हैं कि यदि तीसरा विश्वयुद्ध होगा तो वह पानी के लिए ही होगा।
जल की समस्याओं के समाधान के  लिए पर्यावरण की रक्षा अनिवार्य है।
धन्यवाद ।

Sunday, November 10, 2019

प्राणायाम का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

             ●●● प्राणयोग अथवा प्राणायाम●●●
प्राणायाम प्राण व आयाम इन दो शब्दोंके समायोजन से बना है।'प्राण' वायु का शुद्ध और सात्विक अंश है।वस्तुतः यह एक प्रबल जीवनी शक्ति है।
आयाम का अर्थ है-विस्तार करना या नियंत्रण करना।
प्राणों के सम्यक व संतुलित प्रवाह को ही प्राणायाम कहते हैं ।
   
योगियों ने श्वास पर गहन,गंभीर प्रयोग किए और यह निष्कर्ष निकाला-  "श्वास सधे तो सब सधे"। जैसे आहार हमारे स्थूल शरीर को पुष्ट करता है, उसी तरह प्राणायाम हमारे सूक्ष्म शरीर को पुष्ट करता है।प्राणायाम से रक्त- परिभ्रमण की गति में तेजी आती है, फलतः मस्तिष्क की सूक्ष्म नाड़ियों तक वह ( रक्त) आसानी से पहुँच जाता है।
    
वस्तुतः प्राणयोग(श्वास पर ध्यान देना)एक ऐसा सीधा,सरल योगाभ्यास है जो बिना किसी बाधा के कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है ।गहरी श्वासों से एकाग्रता में वृद्धि होती है।
   
यदि मनुष्य ने लयबद्ध, तालबद्ध ढंग से श्वास लेना सीख लिया तो शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार के विकारों से बच सकता है।योगाभ्यास एवं प्राणायाम की प्रक्रिया से प्राण की क्षमता को अद्भुत रूप से बढाया जा सकता है।
   
विद्यार्थियों के लिए भ्रामरी प्राणायाम अति उपयोगी है इससे स्मृति क्षमता, स्थिरता व एकाग्रता बढ़ती है।कपालभाति व अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करने से रक्त का संचार पूरे शरीर के साथ- साथ मस्तिष्क क्षेत्र की ओर अधिक होता है ।जिससे हार्मोन्स संतुलित होते हैं, मानसिक सामर्थ्य बढ़ती है।
    
नाड़ी- शोधन प्राणायाम के अभ्यास से न्यूरोट्रांसमीटर प्रभावित होते हैं।मनोदशा का हमारे श्वासों से गहरा सम्बन्ध है।यदि व्यक्ति अपने श्वासों को बदलने की कला सीख ले, तो मन की दशा को सरलता से काबू में लाया जा सकता है।प्राणायाम करते समय मन शान्त एवं प्रसन्न होना चाहिए ।प्राणायाम के दौरान संपूर्ण शरीर ऊर्जा से भर जाता है।
  
 मनुष्य ईश्वर का वरिष्ठ राजकुमार है।उसके भीतर अपने सृजेता  की तरह ही शक्तियों का अनंत भंडार प्रसुप्त अवस्था में छिपा पड़ा है।योग से जिसका जागरण सम्भव है।
  
प्राणायाम से जीवन में ध्यान का संगीत एवं समाधि की सरगम झंकृत होने लगती है।प्राणायाम से पूर्व 'ओउम्' का लम्बा उच्चारण करने से मन को शान्ति मिलती है।
     " प्राणायाम से जीवन सधता 
      लोम- अनुलोम करो स्वस्थ हमेशा रहें
      योग की राह चलें "
'स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है प्राणयोग'  इस विषय पर मेरा लेख पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद । 
        


Saturday, November 9, 2019

मंत्र विज्ञान

    ●●●मंत्र जप के द्वारा ईश्वरीय चेतना से एकाकार●●●
मंत्र जप के द्वारा साधक परमेश्वर को पुकारता है।निर्मल चित्त से उठी पुकार एक तरह से परमेश्वर के लिए आमंत्रण बन जाती है और उन्हें आना ही पड़ता है।गज ने भगवान् का हजार बार नाम लिया, तब भगवान् उसे बचाने आए थे।नन्हे ध्रुव ने "ओउम् नमो भगवते वासुदेवाय" इस मन्त्र के जाप से भगवान् के साक्षात् दर्शन किए ।
क्यों न हम भी मंत्रों द्वारा परमेश्वर को पुकारते रहें।

'पुकार सुन लो दया के सागर तुम्हारे चरणों में आ गए हैं'
     
 विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि ताप की तरह ही शब्द में भी एक प्रचंड शक्ति है।हमारे ऋषि-मुनियों ने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, पहले उन्हें अंतर्मन में देखा, अनुभव किया और फिर उन्हें प्रकट किया, इसलिए वे मंत्रदृष्टा कहे जाते हैं, रचयिता नहीं। मंत्र जप के आधार पर ही ऋषि , मनीषियों, योगियों आदि ने ब्रह्माण्ड की अनंत शक्तियों पर विजय पाई थी।
 
   मंत्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है।ध्वनि के क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृत्ताकार क्रम से निरंतर एक ही मंत्र के उच्चारण से शब्द- तरंगें वृत्ताकार घूमने लगती हैं।इसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मंत्र का चमत्कार कहा जा सकता है।हमारे मुख से निकला प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कंपन उत्पन्न करता है और इस कंपन से लोगों में अदृश्य प्रेरणाएँ जाग्रत होती हैं ।
     
 किन्हीं शब्द विशेषों को बोल देना ही मात्र 'मंत्र' नहीं है उसमें वाक्शक्ति, चिन्तन तथा प्राण एवं भावशक्ति का समावेश भी अनिवार्य है।
  
  वस्तुतः मंत्र विज्ञान में इन्फ्रासोनिक स्तर की सूक्ष्म ध्वनियाँ काम करती हैं।मंत्र जप से एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय (इलेक्ट्रो मैग्नेटिक) तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं, जो समूचे शरीर में फैल कर अनेक गुना विस्तृत हो जाती हैं।इससे प्राणऊर्जा की क्षमता एवं शक्ति में अभिवृद्धि होती है ।
    
हम जो कुछ भी बोलते हैं, उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है।जप से उत्पन्न प्रकंपन, शरीर के सूक्ष्म तंत्रों तथा हार्मोन प्रणाली पर अपना गहरा प्रभाव डालते हैं जिससे उनकी सक्रियता बढ़ जाती है और समुचित मात्रा में हार्मोन का स्राव होने लगता है।
   मंत्र का चयन साधक अपनी रुचि और श्रद्धा के अनुसार भी कर सकते हैं या अपने गुरू से भी मंत्र ले सकते हैं ।

प्रणव (ओंकार) का जाप अत्यन्त प्रभावशाली यौगिक अभ्यास है।ओंकार परमात्मा का नाम, मंत्रों का अधिपति है।गायत्री मंत्र व महामृत्युंजय मंत्र भी प्रभावशाली हैं।

मंत्र जप तो बहुत लोग करते हैं लेकिन उसका लाभ व उसमें आनन्द उन्हीं को मिलता है जो मंत्र को अपने अन्दर आत्मसात् कर लेते हैं।
  "तेरे नाम का जाप करूँ भगवन 
  प्रभु ध्यान में मेरे बस जाओ"

मंत्र जप एक विज्ञान इस लेख को पढ़ने वालों को सादर धन्यवाद 

Friday, November 8, 2019

ध्यान योग के द्वारा मन की शक्ति में वृद्धि

ध्यान योग-
ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है।
ध्यान के समान कोई तप नहीं है।
ध्यान के समान कोई यज्ञ नहीं है।
सामान्य रूप से संसार एक भीड़ भरा स्थान है और आध्यात्म एकात्म और एकांत की अंतर्यात्रा है।ध्यान साधना का नियमित अभ्यास जीवनी शक्ति को बढ़ाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है।यह ध्यान ही परिचय कराता है हमारा अपने आप से।यह शून्य गहनता ही हमारा अपना स्वरूप है।
 
  ध्यान योग का उद्देश्य मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर उसे एक चिन्तन बिन्दु पर केन्द्रित कल सकने में प्रवीणता प्राप्त करना है।
गुरु गोरखनाथ---
"हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान" अर्थात ध्यान में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती ।
   मन को केन्द्रित करना ध्यान है।ध्यान विश्राम की अवस्था है।
ध्यान का अर्थ निर्विचार होना है।ध्यान करने से हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता बढ़ती है, विचारों में स्पष्टता आती है।
      
शुरुआत में ध्यान का अभ्यास करना पड़ता है, बाद में तो स्वतः ही होने लगता है।खाली समय में कभी भी 'ओउम्' जाप करते हुए आज्ञा चक्र में ध्यान लगाएँ तो परम शान्ति का अनुभव होता है।जब भी खाली समय मिले तभी शान्त भाव से अपनी श्वास को सुनने का अभ्यास करें।ऐसा करने से ध्यान जल्दी सधने लगता है।
        प्रभु नाम की मीठी- मीठी धुन
        इस मधुर प्रीति के राग को सुन ।
        मन की वीणा के तारों में 
        अंतर्मन की झंकार को सुन ।।
   महर्षि पतंजलि ने योग - साधनाओं में ध्यान को विशुद्ध रूप से एकाग्रता की प्राप्ति का मुख्य आधार माना है।ध्यान में विचारों को रोकने का प्रयास न करें ।निरंतर अभ्यास करने से विचारों की संख्या कम हो जाएगी, उनकी गुणवत्ता बढ़ जाएगी।
     
ध्यान योग के कल्पवृक्ष की छाया में सच्चे मन से बैठने वाला व्यक्ति आत्म- बोध का लाभ ले सकता है, नर- नारायण के समकक्ष बन सकता है।मन में कुछ ऐसी चमत्कारिक सामर्थ्य है, जो शरीर से कई गुना ज्यादा है।ध्यान हमारी इसी सामर्थ्य को बढ़ाता है।
    
मस्तिष्क में एक अद्भुत संसार छिपा है, जिसे यन्त्रों से नहीं ध्यान साधना से ही देखा जा सकता है।ध्यान सिद्धि के माध्यम से हमारी अंतर्दृष्टि प्रकाशित हो जाती है।
     "नित ध्यान करें , प्राणायाम करें जीवन अपना चमकाएँ "
     ध्यान के इस लेख पर ध्यान देने वालों को सादर धन्यवाद ।

Thursday, November 7, 2019

"यज्ञ" एक महान वैज्ञानिक प्रयोग प्रक्रिया, सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित, यज्ञ स्वास्थ्य एवं वातावरण के लिए लाभदायक, यज्ञ जीवन की विधा


      ●●● यज्ञ एक महान वैज्ञानिक प्रयोग,प्रक्रिया ●●●
आज जब हम प्रदूषण की भीषण त्रासदी से गुज़र रहे हैं ऐसे में हमें यज्ञों की वैज्ञानिकता समझने की जरूरत है,कि किस प्रकार यज्ञ हमारे वायुमंडल को शुद्ध रखते हैं।हमारे ऋषि-मुनियों ने दीर्घकाल तक यज्ञ विज्ञान पर व्यापक, सूक्ष्म एवं गहन अन्वेषण किया।
   
यज्ञ एक महान वैज्ञानिक प्रयोग प्रक्रिया है, यज्ञ प्रक्रिया में यज्ञ कुंड का बड़ा महत्व है, क्योंकि यह अपने आकार- प्रकार के आधार पर यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करता है।यज्ञ प्रयोग में भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों शक्तियों का सामंजस्य पूर्ण, संतुलित एवं सर्वोत्कृष्ट उपयोग होता है।यज्ञ में समिधाओं का चुनाव एवं हवन सामग्री का निर्धारण ऋतुओं, रोगों एवं देवताओं के निमित्त होता है।
   
मंत्रों के साथ हवन- सामग्री की आहुति देने से इनकी सूक्ष्म संरचना बदल जाती है।हवन- सामग्री को जलाने से जो रासायनिक पदार्थ निकलते हैं, वे हैं--एल्केलाइड, अमाइन्स, पिलोनिमिक, साइक्लिक, टारमेनिक आदि।ये वातावरण को परिष्कृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं ।
  
●● यज्ञ स्वास्थ्य एवं वातावरण दोनों के लिए लाभदायक ●

यज्ञ में मंत्रों का चुनाव एक विशिष्ट प्रक्रिया है।यज्ञ में अग्नि प्रज्ज्वलित करने के लिए गाय का घी प्रयोग किया जाता है जो अग्नि के ताप को नियंत्रित एवं मर्यादित कर देता है।घृत वाष्पीकृत होकर हवन सामग्रियों के सूक्ष्म कणों को चारों ओर से घेर लेता है और इसमें विद्युत शक्ति का ऋणात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है जो कि स्वास्थ्य एवं वातावरण दोनों के लिए लाभदायक होता है।
    
हवन में मंत्रों का प्रभाव तब और बढ़ जाता है, जब विशिष्ट तिथियों एवं मुहूर्तों में किया जाता है, जैसे गायत्री यज्ञ का प्रभाव रविवार और बृहस्पतिवार को प्रातःकाल करने पर अधिक होता है।
यज्ञ में तीव्र ध्वनि के साथ अच्छी तरह से प्रज्जवलित अग्नि में सामग्री अर्पण करनी चाहिए ।
  महर्षि याज्ञवल्क्य का आश्रम महाराजा जनक के मिथिला राज्य में स्थित था जिसमें वे यज्ञ अनुसंधान कार्य करते रहते थे।निःसंदेह ही यज्ञ की वैज्ञानिकता अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है।

●●सर्वव्यापी परमअक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित●●

सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही  यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं ।अतः यज्ञ में हम जो आहुति देते हैं, वो हम व्यक्ति के लिए नहीं देते, बल्कि समष्टि के लिए देते हैं ।यज्ञ की प्रक्रिया में हम समस्त लोकों के साथ , समस्त चराचर के साथ एक हो जाते हैं ।

श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान कहते हैं कि सभी यज्ञों का भोक्ता मैं हूँ---- तो वो यज्ञ की आहुति भगवान तक पहुँचाता कौन है ? कहते हैं कि देवों का मुख अग्नि है और अग्नि के स्वामी, समस्त लोकों के स्वामी यज्ञपुरुष भगवान नारायण हैं ।जब हम यज्ञपुरुष को आहुतियाँ देते हैं तो यज्ञपुरुष परमेश्वर, वो हमारी आहुति, वो हमारी चुटकीभर हवन सामग्री, वो हमारी स्वाहा समस्त लोकों तक पहुँचा देते हैं ।एक साथ , सुगंध के रूप में, सत्कर्म के रूप में, सद्भाव के रूप में, समस्त लोकों में वो भाव फैल जाता है।

           ●●● 'यज्ञ' जीवन की विधा ●●●

भगवान कहते हैं कि जो अपना हिस्सा दूसरों को देता है , वह भी यज्ञ करता है ।जो इदं न मम का उद्घोष करता है , वो यज्ञ करता है कि यह मेरे लिए नहीं है ।यज्ञ केवल यज्ञकुंड में हवन करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन की विधा है, जीवन का विधान है ।यज्ञ जीवन सबके लिए जीने का नाम है, यज्ञ सबके लिए प्रेम गीत गाने का नाम है।हमारी संस्कृति ने हमको दधीचि दिए , उन्होंने कहा कि अगर बात देवशक्तिओं के, शुभ शक्तियों के हित की है, अगर बात लोकहित की है , तो हम अपनी अस्थियाँ भी दान करते हैं ।

जब यज्ञ चलता है और उसमें वेदमंत्रों का गायन हो रहा होता है , जब सामगीत गाए जाते हैं, जब वेदमंत्रों की ध्वनि गूँजती है, तो यह वेदमंत्रों की ध्वनि क्या है ? ये प्रेमगीत हैं जो सबके लिए गाए जा रहे हैं, किसी व्यक्ति के लिए नहीं ये समष्टि के लिए होते हैं, ये यज्ञपुरुष के लिए होते हैं ।यज्ञ के रूप में हमारी संस्कृति ने हमको अमूल्य धरोहर दी है। ऐसे आदर्श जीवन की कल्पना, ऐसे उन्नत जीवन की कल्पना हमारी संस्कृति ने की ।यज्ञ मनुष्य जीवन की सामाजिक श्रेष्ठता का प्रतीक है।
    वस्तुतः यज्ञ एक पूर्णाहुति कर्म भी है अर्थात साधक का अनुष्ठान तभी पूर्ण एवं सफल होता है, जब विधि- विधान पूर्वक यज्ञ किया जाता है।
आज प्रदूषण के समय में हमारे देश को पर्यावरण की रक्षा के लिए अपने ऋषि- मुनियों के बताए मार्ग पर चलना पड़ेगा ।
सादर धन्यवाद 

Tuesday, November 5, 2019

'तुलसी' एक सर्वश्रेष्ठ औषधि ( White Bezil) तुलसी के विभिन्न नाम , तुलसी विवाह

            ●●●तुलसी एक सर्वश्रेष्ठ औषधि●●●


अमृतेऽमृतरूपासि अमृत तत्व प्रदायिनि ।
        त्वंमामुद्धर संसारात्  क्षीरसागर कन्यके।।
अर्थात हे विष्णुप्रिये (तुलसी) तुम अमृत स्वरूप हो,अमृतत्व प्रदान करती हो, मेरा उद्धार करो।

जब से संसार में संस्कृति का उदय हुआ, तभी से तुलसी को रोग- निवारक औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है।तुलसी भारत की सबसे पवित्र जड़ी- बूटी मानी जाती है।भारतीय संस्कृति में आदिकाल से घर में तुलसी का पौधा लगाने की परम्परा रही है।
  
          तुलसी शब्द का अर्थ है--- अतुलनीय पौधा।तुलसी भारत की सबसे पवित्र जड़ी-बूटी मानी जाती है।यह एक ऐसा पौधा है, जिसके जड़, तना , पत्ते , बीज, मंजरी सभी का औषधि में उपयोग होता है।तुलसी का पौधा गुणों की खान है, पूजनीय है।इसलिए हर घर में  भोजन को प्रसाद बनाने , भगवान को भोग लगाने में तुलसी की पत्तियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं ।
  
तुलसी के पौधे केवल हमारे देश में ही होते हैं।यह एक ऐसी वनस्पति है जो भारतीय जन- जीवन के साथ एक रूप हो गई है।
तुलसी का पौधा हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।इसकी पत्तियों के रस को ग्रहण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है।

तुलसी के दस- बारह पत्तों का नित्य सेवन किया जाए, तो इससे रक्त शुद्ध होता है साथ ही कई बीमारियों में भी लाभ मिलता है।
सदा तुलसी की कंठी धारण करने वाले को संक्रमित रोगों का खतरा कम हो जाता है ।
  
ग्रहण के समय वातावरण में जो विषाक्तता फैलती है तो तुलसी के प्रभाव से विषाक्तता फैलाने वाले कीटाणु समाप्त हो जाते हैं इसलिए ग्रहण के समय तुलसी के पत्तों को खाद्य सामग्री में डाला जाता है।तुलसी का पौधा दूर तक अपनी सुगंध फैलाता है और कृमियों को नष्ट करता है ।अपनी इस उपकार प्रियता के कारण ही तुलसी एक वंदनीय पौधा है।

          वर्तमान समय में ग्रीस में एक विशेष दिन तुलसी का उत्सव मनाया जाता है, जिसे "सैन्ट बैसिल डे" कहते हैं ।इस दिन वहाँ की महिलाएँ , तुलसी की शाखाएँ लाकर अपने घर के दरवाजों पर टाँगती हैं, उनका ऐसा विश्वास है कि ऐसा करने से उनकी परेशानियाँ दूर होंगी ।

   तुलसी के सन्दर्भ में लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली ये मान्यताएँ अंधविश्वास पर आधारित नहीं हैं ; क्योंकि अब प्रयोगशालाओं में भी यह सिद्ध हो गया है कि तुलसी का सान्निध्य सात्विकता और पुण्य भाव के साथ आरोग्य की शक्ति को भी बढ़ाता है ।इससे आत्मिक गुण बढ़ते हैं ।विभिन्न अध्ययनों से यह पता चलता है कि तुलसी की पत्तियाँ तनाव के खिलाफ महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करतीं हैं ।

           ●●● तुलसी के विभिन्न नाम ●●●

            तुलसी के गुणों के आधार पर विभिन्न  नाम हैं ।तुलसी के पत्तों में भूख बढ़ाने वाला तत्व होता है , इसलिए इसका एक नाम सुरसा भी है।दूषित वायु , रोग और बीमारी को मार भगाने के कारण इसे भूतघ्नी, अपेतराक्षसी तथा दैत्यध्वनि भी कहते हैं ।तुलसी का सेवन रोगों में चमत्कारिक रूप से लाभ पहुँचाता है इसलिए इसे पापघ्नी भी कहते हैं ।इसकी चिकित्सा अत्यन्त सरल व जल्दी से प्रभाव डालने वाली है , इसलिए इसे सरला नाम से भी जाना जाता है। तुलसी का पौधा जगत के पालक भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है , इसलिए इसे हरिप्रिया भी कहते हैं ।तुलसी को वृन्दा भी कहते हैं ।

                           शास्त्रानुसार -- तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं ।इनमें श्री कृष्ण तुलसी , तुलसी , लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी,भू तुलसी, नील तुलसी,श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी, नींबू तुलसी मुख्य हैं ।लेकिन इनमें भी पाँच प्रकार की तुलसी प्रायः देखने मिलती हैं--- श्याम तुलसी , राम तुलसी, श्वेत/विष्णु तुलसी, वन तुलसी, नींबू तुलसी ।इन सभी तुलसियों के अलग-अलग गुण होते हैं ।

               ●●● तुलसी विवाह ●●●

तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है--- तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान । भारत में कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है ।तुलसी के सम्बंध में कई तरह की अंतर्कथाएँ प्रचलित हैं ।इन्हीं में से एक कथा के अनुसार-- तुलसी भगवान विष्णु की पत्नी भी हैं ।कन्या की तरह हर घर में तुलसी को पवित्र दायित्व की तरह पाला-पोषा जाए और फिर उसके गुणों को औरों ( प्रतीक स्वरूप भगवान विष्णु ) को सौंप दिया जाए , यही इस कथा का मुख्य संदेश है।

विष्णु पुराण के अनुसार, कार्तिक शुक्ल एकादशी ( देवोत्थानी ) 
के दिन भगवान विष्णु के साथ तुलसी का विवाह किया जाता है ।इस दिन गोधूलि बेला में भगवान शालग्राम , तुलसी व शंख के पूजन का विधान है ।देवोत्थानी एकादशी के दिन मनाया जाने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध रूप से मांगलिक व आध्यात्मिक प्रसंग है।

                  ऋषि-मुनियों ने वातावरण को स्वच्छ करने के लिए आरंभ से ही घरों में तुलसी का पौधा लगाने व इसकी पूजा करने के निर्देश दिए हैं ।यह पौधा हमारे लिए हर दृष्टि से लाभकारी व पूजनीय है ।
  हे कृष्ण प्रिया प्यारी तुलसी
  हम करते हैं तुमको वन्दन
  अमृत का हो भंडार तुम्हीं 
  हम करते हैं तुमको वन्दन

स्वास्थ्य प्रद लेख पढ़ने के लिए सादर धन्यवाद ।